भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

‘विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः’—इस प्रकार कायरताके कारण विषाद करते हुए अर्जुनसे भगवान् मधुसूदनने ये ( आगे दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें कहे जाने-वाले) वचन कहे।

यहाँ ‘विषीदन्तमुवाच’ कहनेसे ही काम चल सकता था, ‘इदं वाक्यम्’ कहनेकी जरूरत ही नहीं थी; क्योंकि ‘उवाच’ क्रियाके अन्तर्गत ही ‘वाक्यम्’ पद आ जाता है। फिर भी ‘वाक्यम्’ पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का यह वचन, यह वाणी बड़ी विलक्षण है। अर्जुनमें धर्मका बाना पहनकर जो कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आ गयी थी, उसपर यह

भगवद्वाणी सीधा आघात पहुँचानेवाली है। अर्जुनका युद्धसे उपराम होनेका जो निर्णय था, उसमें खलबली मचा देनेवाली है। अर्जुनको अपने दोषका ज्ञान कराकर अपने कल्याणकी जिज्ञासा जाग्रत् करा देनेवाली है। इस गम्भीर अर्थवाली वाणीके प्रभावसे ही अर्जुन भगवान्का शिष्यत्व ग्रहण करके उनके शरण हो जाते हैं (दूसरे अध्यायका सातवाँ श्लोक)।

संजयके द्वारा ‘मधुसूदनः’ पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण ‘मधु नामक’ दैत्यको मारनेवाले अर्थात् दुष्ट स्वभाववालोंका संहार करनेवाले हैं। इसलिये वे दुष्ट स्वभाववाले दुर्घोषनादिका नाश करवाये बिना रहेंगे नहीं।

सम्बन्ध—भगवान्ने अर्जुनके प्रति कौन-से वचन कहे—इसे आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन

॥ २ ॥

श्रीभगवान् बोले१—

अर्जुन = हे अर्जुन! विषमे = इस विषम अवसरपर त्वा = तुम्हें इदम् = यह कश्मलम् = कायरता

कुतः = कहाँसे समुपस्थितम् = प्राप्त हुई, (जिसका कि) अनार्यजुष्टम् = श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते,

अस्वर्ग्यम् = (जो) स्वर्गको देनेवाली नहीं है (और) अकीर्तिकरम् = कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।

व्याख्या—‘अर्जुन’—यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तुम स्वच्छ, निर्मल अन्तःकरणवाले हो। अतः तुम्हारे स्वभावमें कालुष्य—कायरताका आना बिलकुल विरुद्ध बात है। फिर यह तुम्हारेमें कैसे आ गयी?

‘कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्’—भगवान् आश्चर्य प्रकट करते हुए अर्जुनसे कहते हैं कि ऐसे युद्धके मौकेपर तो तुम्हारेमें शूरवीरता, उत्साह आना चाहिये था, पर इस बेमौकेपर तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी!

आश्चर्य दो तरहसे होता है—अपने न जाननेके कारण और दूसरेको चेतानेके लिये। भगवान्का यहाँ जो आश्चर्य-पूर्वक बोलना है, वह केवल अर्जुनको चेतानेके लिये ही

है, जिससे अर्जुनका ध्यान अपने कर्तव्यपर चला जाय।

‘कुतः’ कहनेका तात्पर्य यह है कि मूलमें यह कायरतारूपी दोष तुम्हारेमें (स्वयंमें) नहीं है। यह तो आगन्तुक दोष है, जो सदा रहनेवाला नहीं है।

‘समुपस्थितम्’ कहनेका तात्पर्य है कि यह कायरता केवल तुम्हारे भावोंमें और वचनोंमें ही नहीं आयी है; किन्तु तुम्हारी क्रियाओंमें भी आ गयी है। यह तुम्हारेपर अच्छी तरहसे छा गयी है, जिसके कारण तुम धनुष-बाण छोड़कर रथके मध्यभागमें बैठ गये हो।

‘अनार्यजुष्टम्’१—समझदार श्रेष्ठ मनुष्योंमें जो भाव पैदा होते हैं, वे अपने कल्याणके उद्देश्यको लेकर ही होते

१-यहाँ ‘भगवान्’ पदमें ‘भग’ शब्दमें जो ‘मनुष्य’ प्रत्यय किया गया है, वह नित्ययोगमें किया गया है; क्योंकि समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छहों ‘भग’ भगवान्में नित्य रहते हैं।

२-‘अनार्यजुष्टम्’ पदमें जो ‘नञ्’ समास है, वह ‘आर्यजुष्टमार्जुनजुष्टम्’—इस तृतीया समासके बाद ही करना चाहिये; जैसे—‘न आर्यजुष्टम् अनार्यजुष्टम्’। अगर ‘नञ्’ समास तृतीया समासके पहले किया जाय कि ‘न आर्या अनार्याः अनार्यजुष्टमनार्यजुष्टम्’ तो यहाँ यह कहना बनता ही नहीं; क्योंकि अनार्य पुरुषोंके द्वारा जिसका सेवन किया जाता है, वह दूसरोंके लिये आदर्श नहीं होता।