श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें{
"lines": [
"श्लोक १० ] * साधक-संजीवनी * ७५",
"व्याख्या—'एवमुक्त्वा हृषीकेशम्............बभूव ह'—",
"अर्जुनने अपना और भगवान्का—दोनोंका पक्ष सामने",
"रखकर उनपर विचार किया, तो अन्तमें वे इसी निर्णयपर",
"पहुँचे कि युद्ध करनेसे तो अधिक-से-अधिक राज्य",
"प्राप्त हो जायगा, मान हो जायगा, संसारमें यश हो जायगा,",
"परन्तु मेरे हृदयमें जो शोक है, चिन्ता है, दुःख है, वे",
"दूर नहीं होंगे। अतः अर्जुनको युद्ध न करना ही ठीक",
"मालूम दिया।",
"यद्यपि अर्जुन भगवान्की बातका आदर करते हैं और",
"उसको मानना भी चाहते हैं; परंतु उनके भीतर युद्ध",
"करनेकी बात ठीक-ठीक जँच नहीं रही है। इसलिये अर्जुन",
"अपने भीतर जँची हुई बातको ही यहाँ स्पष्टरूपसे, साफ-",
"साफ कह देते हैं कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'। इस प्रकार",
"जब अपनी बात, अपना निर्णय भगवान्से साफ-साफ कह",
"दिया, तब भगवान्से कहनेके लिये और कोई बात बाकी",
"नहीं रही; अतः वे चुप हो जाते हैं।",
"सम्बन्ध—जब अर्जुनने युद्ध करनेके लिये साफ मना कर दिया, तब उसके बाद क्या हुआ—इसको संजय आगेके",
"श्लोकमें बताते हैं।",
"तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।",
"सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥",
"भारत = हे भरतवंशोद्भव विषीदन्तम् = विषाद करते हुए हृषीकेश",
"धृतराष्ट्र ! तम् = उस अर्जुनके इदम् = यह (आगे कहे",
"उभयोः = दोनों प्रति जानेवाले)",
"सेनयोः = सेनाओंके प्रहसन्, इव = हँसते हुए-से वचः = वचन",
"मध्ये = मध्यभागमें हृषीकेशः = भगवान् उवाच = बोले ।",
"व्याख्या—'तमुवाच हृषीकेशः........विषीदन्तमिदं",
"वचः'—अर्जुनने बड़ी शूरवीरता और उत्साहपूर्वक",
"योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान्से दोनों सेनाओंके बीचमें",
"रथ खड़ा करनेके लिये कहा था। अब वहींपर अर्थात् दोनों",
"सेनाओंके बीचमें अर्जुन विषादमग्न हो गये! वास्तवमें होना",
"यह चाहिये था कि वे जिस उद्देश्यसे आये थे, उस",
"उद्देश्यके अनुसार युद्धके लिये खड़े हो जाते। परन्तु उस",
"उद्देश्यको छोड़कर अर्जुन चिन्ता-शोकमें फँस गये। अतः",
"अब दोनों सेनाओंके बीचमें ही भगवान् शोकमग्न अर्जुनको",
"उपदेश देना आरम्भ करते हैं।",
"'प्रहसन्निव'—(विशेषतासे हँसते हुएकी तरह-) का",
"तात्पर्य है कि अर्जुनके भाव बदलनेको देखकर अर्थात्",
"पहले जो युद्ध करनेका भाव था, वह अब विषादमें बदल",
"गया—इसको देखकर भगवान्को हँसी आ गयी। दूसरी",
"बात, अर्जुनने पहले (दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें)",
"कहा था कि मैं आपके शरण हूँ, मेरेको शिक्षा दीजिये",
"अर्थात् मैं युद्ध करूँ या न करूँ, मेरेको क्या करना",
"चाहिये—इसकी शिक्षा दीजिये; परन्तु यहाँ मेरे कुछ बोले",
"बिना अपनी तरफसे ही निश्चय कर लिया कि 'मैं युद्ध",
"नहीं करूँगा'—यह देखकर भगवान्को हँसी आ गयी।",
"कारण कि शरणागत होनेपर 'मैं क्या करूँ और क्या नहीं",
"करूँ' आदि कुछ भी सोचनेका अधिकार नहीं रहता।",
"उसको तो इतना ही अधिकार रहता है कि शरण जो काम",
"कहता है, वही काम करे। अर्जुन भगवान्के शरण होनेके",
"बाद 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' ऐसा कहकर एक तरहसे",
"शरणागत होनेसे हट गये। इस बातको लेकर भगवान्को",
"हँसी आ गयी। 'इव' का तात्पर्य है कि जोरसे हँसी आनेपर",
"भी भगवान् मुसकराते हुए ही बोले।",
"जब अर्जुनने यह कह दिया कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'",
"तब भगवान्को यही कह देना चाहिये था कि जैसी तेरी मर्जी",
"आये, वैसा कर—'यथेच्छसि तथा कुरु' (१८। ६३)।",
"परन्तु भगवान्ने यही समझा कि मनुष्य जब चिन्ता-शोकसे",
"विकल हो जाता है, तब वह अपने कर्तव्यका निर्णय न कर",
"सकनेके कारण कभी कुछ, तो कभी कुछ बोल उठता है।",
"यही दशा अर्जुनकी हो रही है। अतः भगवान्के हृदयमें",
"अर्जुनके प्रति अत्यधिक स्नेह होनेके कारण कृपालुता उमड़",
"पड़ी। कारण कि भगवान् साधकके वचनोंकी तरफ ध्यान न",
"देकर उसके भावकी तरफ ही देखते हैं। इसलिये भगवान्",
"अर्जुनके 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' इस वचनकी तरफ ध्यान न",
"देकर (आगेके श्लोकसे) उपदेश आरम्भ कर देते हैं।",
"जो वचनमात्रसे भी भगवान्के शरण हो जाता है,",
"भगवान् उसको स्वीकार कर लेते हैं। भगवान्के हृदयमें"
]
}
}