श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
| हि | = कारण कि | सुराणाम् | = (स्वर्गमें) | मम | = मेरा |
|---|---|---|---|---|---|
| भूमौ | = पृथ्वीपर | देवताओंका | यत् | = जो | |
| क्रन्दम् | = धन-धान्य- | आधिपत्यम् | = आधिपत्य | शोकम् | = शोक है, (वह) |
| समुद्ध (और) | अवाप्य | = मिल जाय | अपनुद्यात् | = दूर हो जाय | |
| असपलम् | = शत्रुरहित | अपि | = तो भी | (—ऐसा मैं) | |
| राज्यम् | = राज्य | इन्द्रियाणाम् | = इन्द्रियोंको | न | = नहीं |
| च | = तथा | उच्छोषणम् | = सुखानेवाला | प्रपश्यामि | = देखता हूँ। |
व्याख्या —[अर्जुन सोचते हैं कि भगवान् ऐसा समझते होंगे कि अर्जुन युद्ध करेगा तो उसकी विजय होगी और विजय होनेपर उसको राज्य मिल जायगा, जिससे उसके चिन्ता-शोक मिट जायेंगे और संतोष हो जायगा। परन्तु शोकके कारण मेरी ऐसी दशा हो गयी है कि विजय होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय—ऐसी बात मैं नहीं देखता।]
‘अवाप्य भूमावसपलम्बुद्धं राज्यम्’ —अगर मेरेको धन-धान्यसे सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय अर्थात् जिस राज्यमें प्रजा खूब सुखी हो, प्रजाके पास खूब धन-धान्य हो, किसी चीजकी कमी न हो और राज्यमें कोई वैरी भी न हो—ऐसा राज्य मिल जाय, तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता।
‘सुराणामपि चाधिपत्यम्’ —इस पृथ्वीके तुच्छ भोगोंवाले राज्यकी तो बात ही क्या, इन्द्रका दिव्य भोगोंवाला राज्य भी मिल जाय, तो भी मेरा शोक, जलन, चिन्ता दूर नहीं हो सकती।
अर्जुनने पहले अध्यायमें यह बात कही थी कि मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुख ही चाहता हूँ; क्योंकि उस राज्यसे क्या होगा ? उन भोगोंसे क्या होगा ? और उस जीनेसे क्या होगा ? जिनके लिये हम राज्य, भोग एवं सुख चाहते हैं, वे ही मरनेके लिये सामने खड़े हैं (पहले
अध्यायका बत्तीसवाँ-तैंतीसवाँ श्लोक)। यहाँ अर्जुन कहते हैं कि पृथ्वीका धन-धान्य-सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय तथा देवताओंका आधिपत्य मिल जाय, तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता, मैं उनसे सुखी नहीं हो सकता। वहाँ (पहले अध्यायके बत्तीसवाँ-तैंतीसवाँ श्लोकमें) तो कौटुम्बिक ममताकी वृत्ति ज्यादा होनेसे अर्जुनकी युद्धसे उपरति हुई है, पर यहाँ उनकी जो उपरति हो रही है, वह अपने कल्याणकी वृत्ति पैदा होनेसे हो रही है। अतः वहाँकी उपरति और यहाँकी उपरतिमें बहुत अन्तर है।
‘न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषण-मिन्द्रियाणाम्’ —जब कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही मेरेको इतना शोक हो रहा है, तब उनके मरनेपर मेरेको कितना शोक होगा ! अगर मेरेको राज्यके लिये ही शोक होता तो वह राज्यके मिलनेसे मिट जाता; परन्तु कुटुम्बके नाशकी आशंकासे होनेवाला शोक राज्यके मिलनेसे कैसे मिटेगा ? शोकका मिटना तो दूर रहा, प्रत्युत शोक और बढ़ेगा; क्योंकि युद्धमें सब मारे जायेंगे तो मिले हुए राज्यको कौन भोगेगा ? वह किसके काम आयेगा ? अतः पृथ्वीका राज्य और स्वर्गका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—प्राकृत पदार्थोंके प्राप्त होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय, यह मैं नहीं देखता हूँ—ऐसा कहनेके बाद अर्जुनने क्या किया ? इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं।
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
संजय बोले—
| परन्तप | = हे शत्रुतापन | जीतनेवाले अर्जुन | इति | = ऐसा |
|---|---|---|---|---|
| ध्रुतराष्ट्र ! | हृषीकेशम् | = अन्तर्धामी | ह | |
| एवम् | = ऐसा | गोविन्दम् | = भगवान् गोविन्दसे | उक्त्वा |
| उक्त्वा | = कहकर | न, योत्स्ये | = ‘मैं युद्ध नहीं | तूष्णीम् |
| गुडाकेशः | = निद्राको | करूँगा’ | बभूव |