भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

‘गुरुनहत्वा.....भक्ष्यमपीह लोके’—अब अर्जुन पहले अपने पक्षको सामने रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं भीष्म, द्रोण आदि पूज्यजनोंके साथ युद्ध नहीं करूँगा, तो दुर्घोधन भी अकेला मेरे साथ युद्ध नहीं करेगा। इस तरह युद्ध न होनेसे मेरेको राज्य नहीं मिलेगा, जिससे मेरेको दुःख पाना पड़ेगा। मेरा जीवन-निर्वाह भी कठिनातासे होगा। यहाँतक कि क्षत्रियके लिये निषिद्ध जो भिक्षावृत्ति है, उसको भी जीवन-निर्वाहके लिये ग्रहण करना पड़ सकता है। परन्तु गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा मैं उस कष्टदायक भिक्षा-वृत्तिको भी ग्रहण करना श्रेष्ठ मानता हूँ।

‘इह लोके’ कहनेका तात्पर्य है कि यद्यपि भिक्षा माँगकर खानेसे इस संसारमें मेरा अपमान-तिरस्कार होगा, लोग मेरी निन्दा करेंगे, तथापि गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भिक्षा माँगना श्रेष्ठ है।

‘अपि’ कहनेका तात्पर्य है कि मेरे लिये गुरुजनोंको मारना भी निषिद्ध है और भिक्षा माँगना भी निषिद्ध है; परन्तु इन दोनोंमें भी गुरुजनोंको मारना मुझे अधिक निषिद्ध दीखता है।

‘हत्वार्थकामांस्तु ..... रुधिरप्रदिग्धान्’—अब अर्जुन भगवान्के वचनोंकी तरफ दृष्टि करते हुए कहते हैं कि अगर मैं आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो युद्धमें गुरुजनोंकी हत्याके परिणाममें मैं उनके खूनसे सने हुए और जिनमें धन आदिकी कामना ही मुख्य है, ऐसे भोगोंको ही तो भोगूँगा। मेरेको भोग ही तो मिलेंगे। उन भोगोंके मिलनेसे मुक्ति थोड़े ही होगी! शान्ति थोड़े ही मिलेगी!

यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजन धनके द्वार ही कौरवोंसे बँधे थे; अतः यहाँ ‘अर्थकामान्’ पदको ‘गुरुन्’ पदका विशेषण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसका उत्तर यह है कि ‘अर्थकी कामनावाले गुरुजन’—ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है। कारण कि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण आदि गुरुजन धनकी कामनावाले नहीं थे। वे तो दुर्घोधनके वृत्तिभोगी थे, उन्होंने दुर्घोधनका अन्न खाया था। अतः युद्धके समय दुर्घोधनका साथ छोड़ना

कर्तव्य न समझकर ही वे कौरवोंके पक्षमें खड़े हुए थे। दूसरी बात, अर्जुनने भीष्म, द्रोण आदिके लिये ‘महानुभावान्’ पदका प्रयोग किया है। अतः ऐसे श्रेष्ठ भाववालोंको अर्थकी कामनावाले कैसे कहा जा सकता है! तात्पर्य है कि जो महानुभाव हैं, वे अर्थकी कामनावाले नहीं हो सकते और जो अर्थकी कामनावाले हैं, वे महानुभाव नहीं हो सकते। अतः यहाँ ‘अर्थकामान्’ पद ‘भोगान्’ पदका ही विशेषण हो सकता है।

विशेष बात

भगवान्ने दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें अर्जुनके कल्याणकी दृष्टिसे ही उन्हें कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु अर्जुन उलटा ही समझे अर्थात् वे समझे कि भगवान् राज्यका भोग करनेकी दृष्टिसे ही युद्धकी आज्ञा देते हैं*। पहले तो अर्जुनका युद्ध न करनेका एक ही पक्ष था, जिससे वे धनुष-बाण छोड़कर और शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (पहले अध्यायका सैतालीसवाँ श्लोक)। परंतु युद्ध करनेका पक्ष तो भगवान्के कहनेसे ही हुआ है। तात्पर्य है कि अर्जुनका भाव था कि हमलोग तो धर्मको जानते हैं, पर दुर्घोधन आदि धर्मको नहीं जानते, इसलिये वे धन, राज्य आदिके लोभसे युद्ध करनेके लिये तैयार खड़े हैं। अब वही बात अर्जुन यहाँ अपने लिये कहते हैं कि अगर मैं भी आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो परिणाममें गुरुजनोंके रक्तसे सने हुए धन, राज्य आदिको ही तो प्राप्त करूँगा! इस तरह अर्जुनको युद्ध करनेमें बुराई-ही-बुराई दिखायी दे रही है।

जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा सुगम होता है। परंतु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है; जैसे—सीताजीके सामने रावण और हनुमान्जीके सामने कालनेमि राक्षस आये तो उनको सीताजी और हनुमान्जी पहचान नहीं सके; क्योंकि उन दोनोंका वेश साधुओंका था। अर्जुनकी मान्यतामें युद्धरूप कर्तव्य-कर्म करना बुराई है और युद्ध न करना भलाई है अर्थात् अर्जुनके मनमें धर्म-(हिंसा-त्याग-) रूप भलाईके

  • केवल भौतिक दृष्टि रखनेवाले मनुष्य कल्याणकी बात सोच ही नहीं सकते। जबतक भौतिक पदार्थोंकी तरफ ही दृष्टि रहती है, तबतक आध्यात्मिक दृष्टि जाग्रत नहीं होती। यहाँ अर्जुनकी दृष्टिमें शरीर आदि भौतिक पदार्थोंकी मुख्यता हो रही है। वे कौटुम्बिक मोह-ममतामें फँसकर धर्मको भी भौतिक दृष्टिसे ही देख रहे हैं। भौतिक (प्राकृत) दृष्टिसे अत्यन्त विलक्षण आध्यात्मिक दृष्टिकी तरफ अभी अर्जुनका खयाल नहीं है अर्थात् उनकी दृष्टि भौतिक राज्यसे ऊपर नहीं जा रही है और वे कौटुम्बिक मोह-ममताके प्रवाहमें बह रहे हैं। इसलिये वे ऐसा समझ रहे हैं कि युद्धमें प्रवृत्त कराकर भगवान् मुझे राज्य दिलाना चाहते हैं, जबकि वास्तवमें भगवान् उनका कल्याण करना चाहते हैं।