श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
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वेशमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। उनको कर्तव्य-त्यागरूप बुराई बुराईके रूपमें नहीं दीख रही है; क्योंकि उनके भीतर शरीरोंको लेकर मोह है। अतः इस बुराईको मिटानेमें भगवान्को भी बड़ा जोर पड़ रहा है और समय लग रहा है।
आजकल समाजमें एकताके बहाने वर्ण-आश्रमकी मर्यादाको मिटानेकी कोशिश की जा रही है, तो यह बुराई एकतारूप अच्छाईके वेशमें आनेसे बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। अतः वर्ण-आश्रमकी मर्यादा मिटनेसे परिणाममें लोगोंका कितना पतन होगा, लोगोंमें कितना आसुरभाव
आयेगा—इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसे ही धनके बहाने लोग झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात आदि-आदि दोषोंको भी दोषरूपसे नहीं जानते। यहाँ अर्जुनमें धर्मके रूपमें बुराई आयी है कि हम भीष्म, द्रोण आदि महानुभावोंको कैसे मार सकते हैं ? क्योंकि हम धर्मको जाननेवाले हैं। तात्पर्य है कि अर्जुने जिसको अच्छाई माना है, वह वास्तवमें बुराई ही है; परन्तु उसमें मान्यता अच्छाईकी होनेसे वह बुराईरूपसे नहीं दीख रही है।
परिशिष्ट भाव—‘महानुभावान्’ —भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनोंका अनुभाव, भीतरका भाव श्रेष्ठ है, शुद्ध है; क्योंकि युद्ध करते हुए भी उनमें पक्षपात नहीं है।
सम्बन्ध—भगवान्के वचनोंमें ऐसी विलक्षणता है कि वे अर्जुनके भीतर अपना प्रभाव डालते जा रहे हैं, जिससे अर्जुनको अपने युद्ध न करनेके निर्णयमें अधिक सन्देह होता जा रहा है। ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुए अर्जुन कहते हैं—
न चैतद्विद्यः कतरन्तो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
| एतद् | = (हम) यह | गरीयः | = अत्यन्त श्रेष्ठ है | न, जिजीविषामः | = जीना भी |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = भी | यत्, वा | = अथवा (हम उन्हें) | नहीं चाहते, | |
| न | = नहीं | जयेम | = जीतेंगे | ते | = वे |
| विद्यः | = जानते (कि) | यदि, वा | = या (वे) | एव | = ही |
| नः | = हमलोगोंके लिये | नः | = हमें | धार्तराष्ट्राः | = धृतराष्ट्रके |
| (युद्ध करना और | जयेयुः | = जीतेंगे। | सम्बन्धी | ||
| न करना—इन) | यान् | = जिनको | प्रमुखे | = (हमारे) सामने | |
| कतरत् | = दोनोंमेंसे कौन-सा | हत्वा | = मारकर (हम) | अवस्थिताः | = खड़े हैं। |
व्याख्या—‘न चैतद्विद्यः कतरन्तो गरीयः’ —में युद्ध करूँ अथवा न करूँ—इन दोनों बातोंका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ। कारण कि आपकी दृष्टिमें तो युद्ध करना ही श्रेष्ठ है, पर मेरी दृष्टिमें गुरुजनोंको मारना पाप होनेके कारण युद्ध न करना ही श्रेष्ठ है। इन दोनों पक्षोंको सामने रखनेपर मेरे लिये कौन-सा पक्ष अत्यन्त श्रेष्ठ है—यह मैं नहीं जान पा रहा हूँ। इस प्रकार उपर्युक्त पदोंमें अर्जुनके भीतर भगवान्का पक्ष और अपना पक्ष दोनों समकक्ष हो गये हैं।
‘यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः’ —अगर आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध भी किया जाय, तो हम उनको जीतेंगे अथवा वे (दुर्योधनादि) हमारेको जीतेंगे—इसका भी हमें पता नहीं है।
यहाँ अर्जुनको अपने बलपर अविश्वास नहीं है, प्रत्युत
भविष्यपर अविश्वास है; क्योंकि भविष्यमें क्या होनहार है—इसका किसीको क्या पता?
‘यानेव हत्वा न जिजीविषामः’ —हम तो कुटुम्बियोंको मारकर जीनेकी भी इच्छा नहीं रखते; भोग भोगनेकी, राज्य प्राप्त करके हुकम चलानेकी बात तो बहुत दूर रही! कारण कि अगर हमारे कुटुम्बी मारे जायेंगे, तो हम जीकर क्या करेंगे? अपने हाथोंसे कुटुम्बको नष्ट करके बैठे-बैठे चिन्ता-शोक ही तो करेंगे! चिन्ता-शोक करने और वियोगका दुःख भोगनेके लिये हम जीना नहीं चाहते।
‘तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः’ —हम जिनको मारकर जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं। धृतराष्ट्रके सभी सम्बन्धी हमारे कुटुम्बी ही तो हैं। उन कुटुम्बियोंको मारकर हमारे जीनेको धिक्कार है!
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