भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक २०-२१ ]

  • साधक-संजीवनी *

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सम्बन्ध—धृतराष्ट्रने पहले श्लोकमें अपने और पाण्डुके पुत्रोंके विषयमें प्रश्न किया था। उसका उत्तर संजयने दूसरे श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक दे दिया। अब संजय भगवद्गीताके प्राकट्यका प्रसंग आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।

अथ व्यवस्थितानृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

महीपते= हे महीपते धृतराष्ट्र !करनेवालेधनुः= (अपना) गाण्डीव
अथ= अबराजाओं और उनकेधनुष
शस्त्रसम्पाते= शस्त्र चलनेकीसाथियोंकोउद्यम्य= उठा लिया (और)
प्रवृत्ते= तैयारी हो ही रहीव्यवस्थितान् = व्यवस्थितरूपसेहृषीकेशम्= अन्तर्धामी भगवान्
थी किसामने खड़े हुएश्रीकृष्णसे
तदा= उस समयदृष्ट्वा = देखकरइदम्= यह
धार्तराष्ट्रान्= अन्यायपूर्वककपिध्वजः = कपिध्वजवाक्यम्= वचन
राज्यको धारणपाण्डवः = पाण्डुपुत्र अर्जुननेआह= बोले।

व्याख्या—‘अथ’ —इस पदका तात्पर्य है कि अब संजय भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरम्भ करते हैं। अठारहवें अध्यायके चौहत्तरवें श्लोकमें आये ‘इति’ पदसे यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीताके उपदेशका आरम्भ उसके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे होता है और अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें यह उपदेश समाप्त होता है।

‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ —यद्यपि पितामह भीष्मने युद्धारम्भकी घोषणाके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पाण्डव-सेनाने उसको युद्धारम्भकी घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथमें उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेनाको शस्त्र उठाये देखकर वीरतामें भरकर अर्जुनने भी अपना गाण्डीव धनुष हाथमें उठा लिया।

‘व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्ट्वा’ —इन पदोंसे संजयका तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेनाको देखा, तब वह भागा-भाग द्रोणाचार्यके पास गया। परन्तु जब अर्जुनने कौरवोंकी सेनाको देखा, तब उनका हाथ सीधे गाण्डीव धनुषपर ही गया—‘धनुरुद्यम्य ’। इससे

मालूम होता है कि दुर्योधनके भीतर भय है और अर्जुनके भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।

‘कपिध्वजः’ —अर्जुनके लिये ‘कपिध्वज’ विशेषण देकर संजय धृतराष्ट्रको अर्जुनके रथकी ध्वजापर विराजमान हनुमान्जीका स्मरण कराते हैं। जब पाण्डव वनमें रहते थे, तब एक दिन अकस्मात् वायुने एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर द्रौपदीके सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उसने भीमसेनसे कहा कि ‘वीरवर! आप ऐसे बहुत-से कमल ला दीजिये।’ द्रौपदीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भीमसेन वहाँसे चल पड़े। जब वे कदलीवनमें पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान्जीसे भेंट हो गयी। उन दोनोंकी आपसमें कई बातें हुईं। अन्तमें हनुमान्जीने भीमसेनसे वरदान माँगनेके लिये आग्रह किया तो भीमसेनने कहा कि ‘मेरेपर आपकी कृपा बनी रहे’। इसपर हनुमान्जीने कहा कि ‘हे वायुपुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्तिके आधातसे व्याकुल शत्रुओंकी सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जनासे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुनके रथकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी,

सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भडिहई॥

इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥

(मानस ३। २८। ४-५)