भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

जो स्वयं बड़ा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण वह स्थान भी बड़ा माना जाता है। जैसे भगवान् यहाँ सारथि

बने हैं, तो उनके कारण वह सारथिका स्थान (पद) भी ऊँचा हो गया।

सम्बन्ध—अब संजय आगेके चार श्लोकोंमें पूर्वश्लोकका खुलासा करते हुए दूसरोंके शंखवादनाका वर्णन करते हैं।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥

हृषीकेशः = अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णनेदेवदत्तम् = देवदत्त नामक (शंख बजाया और)वृकोदरः = वृकोदर भीमने
पाञ्चजन्यम् = पांचजन्य नामक (तथा)भीमकर्मा = भयानक कर्म करनेवालेपौण्ड्रम् = पौण्ड्र नामक
महाशङ्खम् = महाशंख
दध्मौ = बजाया।

व्याख्या—‘पाञ्चजन्यं हृषीकेशः’— सबके अन्तर्यामी अर्थात् सबके भीतरकी बात जाननेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके पक्षमें खड़े होकर ‘पांचजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान्ने पंचजन नामक शंखरूपधारी दैत्यको मारकर उसको शंखरूपसे ग्रहण किया था, इसलिये इस शंखका नाम ‘पांचजन्य’ हो गया।

‘देवदत्तं धनञ्जयः’— राजसूय यज्ञके समय अर्जुनने बहुत-से राजाओंको जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस कारण अर्जुनका नाम ‘धनंजय’ पड़ गया*। निवातकवचादि दैत्योंके साथ युद्ध करते समय इन्द्रने अर्जुनको ‘देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंखकी ध्वनि बड़े जोरसे होती

थी, जिससे शत्रुओंकी सेना घबरा जाती थी। इस शंखको अर्जुनने बजाया।

‘पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः’— हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान् वीरोंको मारनेके कारण भीमसेनका नाम ‘भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेटमें जठराग्निके सिवाय ‘वृक’ नामकी एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम ‘वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेनने बहुत बड़े आकारवाला ‘पौण्ड्र’ नामक शंख बजाया।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥

कुन्तीपुत्रः = कुन्तीपुत्रनामक (शंख बजाया तथा)सहदेवः = सहदेवने
राजा = राजासुघोषमणिपुष्पकौ = सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।
युधिष्ठिरः = युधिष्ठिरनेनकुलः = नकुल
अनन्तविजयम् = अनन्तविजय = और

व्याख्या—‘अनन्तविजयं राजा’……………‘सुघोषमणि-पुष्पकौ’— अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर—ये तीनों कुन्तीके पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हैं, यह विभाग दिखानेके लिये ही यहाँ युधिष्ठिरके लिये ‘कुन्तीपुत्र’ विशेषण दिया गया है।

युधिष्ठिरको ‘राजा’ कहनेका तात्पर्य है कि युधिष्ठिरजी

वनवासके पहले अपने आधे राज्य-(इन्द्रप्रस्थ-)के राजा थे, और नियमके अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवासके बाद वे राजा होने चाहिये थे। ‘राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर ही सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलके राजा होंगे।

  • सर्वाञ्जनपदाञ्जित्वा वित्तमादाय केवलम्। मध्ये धनस्य तिष्ठामि तेनाहर्मा धनञ्जयम् ॥ (महाभारत, विराट० ४४।१३)