श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १७-१९ ]
- साधक-संजीवनी *
४१
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ दुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥
| पृथिवीपते | = हे राजन् ! | विराटः | = राजा विराट | भुजाओंवाले |
|---|---|---|---|---|
| परमेष्वासः | = श्रेष्ठ धनुषवाले | च | = और | सौभद्रः |
| काश्यः | = काशिराज | अपराजितः | = अजेय | |
| च | = और | सात्यकिः | = सात्यकि, | |
| महारथः | = महारथी | दुपदः | = राजा दुपद | सर्वशः |
| शिखण्डी | = शिखण्डी | च | = और | पृथक्, पृथक् |
| च | = तथा | द्रौपदेयाः | = द्रौपदीके पाँचों पुत्र | |
| धृष्टद्युम्नः | = धृष्टद्युम्न | च | = तथा | शङ्खान् |
| च | = एवं | महाबाहुः | = लम्बी-लम्बी | दध्मः |
व्याख्या —‘काश्यश्च परमेष्वासः.....शङ्खान् दध्मः पृथक् पृथक्’—महारथी शिखण्डी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्ममें स्त्री (काशिराजकी कन्या अम्बा) था और इस जन्ममें भी राजा दुपदको पुत्रीरूपसे प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखण्डी स्थाणाकर्ण नामक यक्षसे पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्मजी इन सब बातोंको जानते थे और शिखण्डीको स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इसपर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुनने युद्धके समय इसीको आगे करके भीष्मजीपर बाण चलाये और उनको रथसे नीचे गिरा दिया। अर्जुनका पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्धके समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूहमें घुसकर अपने पराक्रमसे बहुत-से वीरोंका संहार किया। अन्तमें कौरव-सेनाके छः महारथियोंने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इसपर शस्त्र-
अस्त्र चलाये। दुःशासनपुत्रके द्वारा सिरपर गदाका प्रहार होनेसे इसकी मृत्यु हो गयी। संजयने शंखवादनेके वर्णनमें कौरव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे केवल भीष्मजीका ही नाम लिया और पाण्डव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरोंके नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजयके मनमें अधर्मके पक्ष-(कौरवसेना-) का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्मके पक्षका अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परन्तु उनके मनमें धर्मके पक्ष-(पाण्डवसेना-) का आदर होनेसे और भगवान् श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंके प्रति आदरभाव होनेसे वे उनके पक्षका ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्षका वर्णन करनेमें ही उनको आनन्द आ रहा है।
सम्बन्ध—पाण्डव-सेनाके शंखवादनका कौरवसेनापर क्या असर हुआ—इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥
| च | = और | नभः | = आकाश | धार्तराष्ट्राणाम् | = अन्यायपूर्वक |
|---|---|---|---|---|---|
| सः | = (पाण्डव-सेनाके शंखोंके) उस | च | = और | राज्य हड़पनेवाले | |
| तुमुलः | = भयंकर | पृथिवीम् | = पृथ्वीको | दुर्योधन आदिके | |
| घोषः | = शब्दने | एव | = भी | हृदयानि | = हृदय |
| व्यनुनादयन् | = गुँजाते हुए | व्यदारयत् | = विदीर्ण कर दिये। |
व्याख्या —‘स घोषो धार्तराष्ट्राणां.....तुमुलो गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस (ध्वनि-व्यनुनादयन्’—पाण्डव-सेनाकी वह शंखध्वनि इतनी विशाल, प्रतिध्वनि-) से पृथ्वी और आकाशके बीचका भाग गुँज