भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है—‘सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५।३)। अतः कर्मयोगका साधन सुगम, शीघ्र

सिद्धिदायक और किसी अन्य साधनके बिना परमात्मप्राप्ति करानेवाला स्वतन्त्र साधन है।

सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगीके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥

जितेन्द्रियः | = जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, | सर्वभूतात्म- भूतात्मा | (और) = सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा | योगयुक्तः | = कर्मयोगी ---|---|---|---|---|--- विशुद्धात्मा | = जिसका अन्तः-करण निर्मल है, | | | कुर्वन् | = (कर्म) करते हुए विजितात्मा | = जिसका शरीर अपने वशमें है | | ही जिसकी आत्मा है, (ऐसा) | अपि न, लिप्यते | = भी = लिप्त नहीं होता।

व्याख्या—‘जितेन्द्रियः’ —इन्द्रियाँ वशमें होनेका तात्पर्य है—इन्द्रियोंका राग-द्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषसे रहित होनेपर इन्द्रियोंमें मनको विचलित करनेकी शक्ति नहीं रहती। साधक उनको अपने मनके अनुकूल चाहे जहाँ लगा सकता है।

कर्मयोगके साधकके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना आवश्यक है। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रकरणमें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे—‘यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्य’ (३।७); ‘तस्मात्तमिन्द्रियाण्यदादी नियम्य’ (३।४१)। कर्मयोगी-का कर्मके साथ अधिक सम्बन्ध रहता है; इसलिये इन्द्रियाँ वशमें न होनेसे उसके विचलित होनेकी सम्भावना रहती है। कर्मयोगके साधनमें दूसरोंके हितके लिये सेवारूपसे कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है, जिसके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना बहुत जरूरी है। इन्द्रियाँ वशमें हुए बिना कर्मयोगका साधन होना कठिन है।

‘विशुद्धात्मा’ —अन्तःकरणकी मलिनतामें हेतु है—सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व। जहाँ पदार्थोंका महत्त्व रहता है, वहीं उनकी कामनाएँ रहती हैं। साधक निष्काम तभी होता है, जब उसके अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका

महत्त्व नहीं रहता। जबतक पदार्थोंका महत्त्व है, तबतक वह निष्काम नहीं हो सकता।

एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होनेसे अन्तःकरणकी जितनी जल्दी और जैसी शुद्धि होती है, उतनी जल्दी और वैसी शुद्धि दूसरे किसी अनुष्ठानसे नहीं होती। इसलिये कर्मयोगमें एक उद्देश्य होनेकी जितनी महिमा है, उतनी किसीकी नहीं।

‘विजितात्मा’ —कर्मयोगमें शरीरके सुख-आरामका त्याग करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। अगर शरीरसे आलस्य-प्रमाद होगा, तो कर्मयोगका अनुष्ठान नहीं हो पायेगा। अतः यहाँ भगवान्ने शरीरको वशमें करनेकी बात कही है।

‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’ —कर्मयोगीको सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है। जैसे शरीरके किसी एक अंगमें चोट लगनेसे दूसरा अंग उसकी सेवा करनेके लिये सहजभावसे, किसी अभिमानके बिना, कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः लग जाता है, ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा सहजभावसे, किसी अभिमान या कामनाके बिना, कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः होती है। वह सेवा करनेके लिये किसी भी

१-श्रुत्वा स्मृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा श्रात्वा च यो नरः । न ह्ययति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥

(मनुस्मृति २।१८)

‘जो पुरुष सुनकर, छूकर, देखकर, खाकर और सँघकर न तो प्रसन्न होता है और न विघ्न होता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिये।’

२-चाहे अपने शरीरसे असंग हो जायँ, चाहे अपने शरीर-जैसे सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंसे एकता मान लें—दोनोंका परिणाम एक ही होगा। ज्ञानयोगी अपने शरीरसे असंग होता है और कर्मयोगी सब शरीरोंके साथ अपने शरीरकी एकता मानता है। एकता माननेसे वह उदार हो जाता है।