श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है—‘सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५।३)। अतः कर्मयोगका साधन सुगम, शीघ्र
सिद्धिदायक और किसी अन्य साधनके बिना परमात्मप्राप्ति करानेवाला स्वतन्त्र साधन है।
सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगीके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
जितेन्द्रियः | = जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, | सर्वभूतात्म- भूतात्मा | (और) = सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा | योगयुक्तः | = कर्मयोगी ---|---|---|---|---|--- विशुद्धात्मा | = जिसका अन्तः-करण निर्मल है, | | | कुर्वन् | = (कर्म) करते हुए विजितात्मा | = जिसका शरीर अपने वशमें है | | ही जिसकी आत्मा है, (ऐसा) | अपि न, लिप्यते | = भी = लिप्त नहीं होता।
व्याख्या—‘जितेन्द्रियः’ —इन्द्रियाँ वशमें होनेका तात्पर्य है—इन्द्रियोंका राग-द्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषसे रहित होनेपर इन्द्रियोंमें मनको विचलित करनेकी शक्ति नहीं रहती। साधक उनको अपने मनके अनुकूल चाहे जहाँ लगा सकता है।
कर्मयोगके साधकके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना आवश्यक है। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रकरणमें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे—‘यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्य’ (३।७); ‘तस्मात्तमिन्द्रियाण्यदादी नियम्य’ (३।४१)। कर्मयोगी-का कर्मके साथ अधिक सम्बन्ध रहता है; इसलिये इन्द्रियाँ वशमें न होनेसे उसके विचलित होनेकी सम्भावना रहती है। कर्मयोगके साधनमें दूसरोंके हितके लिये सेवारूपसे कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है, जिसके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना बहुत जरूरी है। इन्द्रियाँ वशमें हुए बिना कर्मयोगका साधन होना कठिन है।
‘विशुद्धात्मा’ —अन्तःकरणकी मलिनतामें हेतु है—सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व। जहाँ पदार्थोंका महत्त्व रहता है, वहीं उनकी कामनाएँ रहती हैं। साधक निष्काम तभी होता है, जब उसके अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका
महत्त्व नहीं रहता। जबतक पदार्थोंका महत्त्व है, तबतक वह निष्काम नहीं हो सकता।
एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होनेसे अन्तःकरणकी जितनी जल्दी और जैसी शुद्धि होती है, उतनी जल्दी और वैसी शुद्धि दूसरे किसी अनुष्ठानसे नहीं होती। इसलिये कर्मयोगमें एक उद्देश्य होनेकी जितनी महिमा है, उतनी किसीकी नहीं।
‘विजितात्मा’ —कर्मयोगमें शरीरके सुख-आरामका त्याग करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। अगर शरीरसे आलस्य-प्रमाद होगा, तो कर्मयोगका अनुष्ठान नहीं हो पायेगा। अतः यहाँ भगवान्ने शरीरको वशमें करनेकी बात कही है।
‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’ —कर्मयोगीको सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है। जैसे शरीरके किसी एक अंगमें चोट लगनेसे दूसरा अंग उसकी सेवा करनेके लिये सहजभावसे, किसी अभिमानके बिना, कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः लग जाता है, ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा सहजभावसे, किसी अभिमान या कामनाके बिना, कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः होती है। वह सेवा करनेके लिये किसी भी
१-श्रुत्वा स्मृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा श्रात्वा च यो नरः । न ह्ययति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥
(मनुस्मृति २।१८)
‘जो पुरुष सुनकर, छूकर, देखकर, खाकर और सँघकर न तो प्रसन्न होता है और न विघ्न होता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिये।’
२-चाहे अपने शरीरसे असंग हो जायँ, चाहे अपने शरीर-जैसे सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंसे एकता मान लें—दोनोंका परिणाम एक ही होगा। ज्ञानयोगी अपने शरीरसे असंग होता है और कर्मयोगी सब शरीरोंके साथ अपने शरीरकी एकता मानता है। एकता माननेसे वह उदार हो जाता है।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
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प्राणीको अपनेसे अलग नहीं समझता, सबको अपने ही अंग मानता है।
जैसे अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न अवयवोंसे भिन्न-भिन्न व्यवहार होनेपर भी सब अवयवोंके साथ अपनापन समान (एक ही) रहता है, ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा मर्यादाके अनुसार संसारमें यथार्थयोग्य भिन्न-भिन्न व्यवहार होनेपर भी सबके साथ अपनापन समान रहता है।
अपना राग मिटानेके लिये 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' होना अर्थात् सब प्राणियोंके साथ अपनी एकता मानना बहुत आवश्यक है। कर्मयोगीका स्वभाव है—उदारता। सर्वभूतात्मभूतात्मा हुए बिना उदारता नहीं आती।
विशेष बात
क्रिया और पदार्थके साथ हम निरन्तर नहीं रह सकते और वे हमारे साथ निरन्तर नहीं रह सकते। कारण यह है कि क्रिया और पदार्थमें निरन्तर परिवर्तन होता है, पर हमारेमें (स्वरूपसे) कभी परिवर्तन नहीं होता। इसलिये क्रिया और पदार्थ निरन्तर हमारा त्याग कर रहे हैं। हम भी इनका त्याग करके ही मुक्ति पा सकते हैं, परमशान्ति पा सकते हैं। इनके साथ रहकर हम मुक्ति, परमशान्ति नहीं पा सकते; क्योंकि इनके साथ रहनेका हमारा स्वभाव नहीं है और हमारे साथ रहनेका इनका स्वभाव नहीं है। इसलिये क्रिया और पदार्थको दूसरोंकी सेवामें लगाना है। दूसरोंकी सेवामें लगाना हमारी महत्ता नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है। जो वास्तविकता होती है, वह सहज होती है अर्थात् उसमें परिश्रम और अभिमान नहीं होता। अवास्तविकतामें ही परिश्रम और अभिमान होता है।
क्रिया और पदार्थ दूसरोंकी सेवामें तभी लग सकते हैं, जब हमारेमें 'उदारता' आ जाय। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि उदारता हमारा स्वरूप है*। इसलिये उदारतामें न तो धन खर्च करनेकी आवश्यकता है और न परिश्रम करनेकी आवश्यकता है। आवश्यकता केवल इसी बातकी है कि हम सुखीको देखकर प्रसन्न हो जायँ और दुःखीको देखकर करुणित, दयालु हो जायँ। हृदयमें यह करुणा पैदा हो जाय कि यह सुखी कैसे हो? सुखीको
देखकर ऐसा भाव हो जाय कि सभी सुखी हो जायँ और दुःखीको देखकर ऐसा भाव हो जाय कि कोई दुःखी न रहे।
भगवानुने भोग और संग्रहको साधनमें बाधक बताया है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। सुखीको देखकर प्रसन्न होनेसे भोग भोगनेकी इच्छा मिट जाती है; क्योंकि भोग भोगनेमें जो सुख मिलता है, वह सुख हमें दूसरोंको सुखी देखकर विशेषतासे मिल जायगा तो हमें भोग भोगनेकी आवश्यकता नहीं रहेगी। दुःखीको देखकर दुःखी होनेसे संग्रह करनेकी इच्छा मिट जाती है; क्योंकि अपना दुःख मिटानेके लिये जिन वस्तुओंका हम संग्रह करते हैं और व्यय करते हैं, वे स्वतः दूसरोंका दुःख दूर करनेमें लग जायँगी। जैसे अपनेपर कोई दुःख आनेसे हम उसे दूर करनेकी चेष्टा करते हैं, ऐसे ही दूसरोंको दुःखी देखकर अपनी शक्तिके अनुसार उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होने लगेगी।
प्रसन्नता और करुणामें एक विलक्षण रस है। वह रस क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करके जीवको परमात्मस्वरूप नित्य रसके साथ अभिन्न करा देता है।
'योगयुक्तः'—जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, विजितात्मा और सर्वभूतात्मभूतात्मा—इन चार पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त जो कर्मयोगी है, उसे ही यहाँ 'योगयुक्तः' कहा गया है।
साधनमें स्वाभाविक प्रवृत्ति न होनेमें कारण है—उद्देश्य और रुचिमें भिन्नता। जबतक अन्तःकरणमें संसारका महत्त्व है, तबतक उद्देश्य और रुचिका संघर्ष प्रायः मिटता नहीं। उद्देश्य अविनाशी परमात्माका होता है और रुचि प्रायः नाशवान् संसारके प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी होती है। उद्देश्य और रुचि अभिन्न हो जानेपर साधन स्वतः तेजीसे होने लगता है। यहाँ 'योगयुक्तः' पद ऐसे कर्मयोगीके लिये आया है, जिसका उद्देश्य और रुचि अभिन्न हो गयी है अर्थात् उद्देश्य और रुचि—दोनों एक परमात्मामें ही हो गये हैं।
उत्पन्न और नष्ट होनेवाला फल किंचिन्मात्र भी न चाहें, तभी कर्मयोग होता है। फल और उद्देश्य दोनों भिन्न-भिन्न होते हैं। कर्मयोगीमें फलकी इच्छा तो नहीं होती, पर उद्देश्य
- उदारता गुण भी है और अपना स्वरूप भी। हमारे पास जो पदार्थ हैं, वे दूसरोंकी सेवामें लग जायँ—इस भावसे उन्हें दूसरोंकी सेवामें लगाया जाय, यह उदारता 'गुण' है। हमारे पास जो पदार्थ हैं, वे हमारे हैं ही नहीं—ऐसा समझकर उन्हें दूसरोंकी सेवामें लगाया जाय, यह उदारता हमारा 'स्वरूप' है; क्योंकि इसमें पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और स्वरूप ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
अवश्य होता है। कर्मयोगीका उद्देश्य वही होता है, जो सबको मिल सकता है और सदा साथ रहता है। जो किसीको मिलता है, किसीको नहीं मिलता और कभी रहता है, कभी नहीं रहता, वह उसका उद्देश्य नहीं होता है। इस दृष्टिसे उद्देश्य सदा परमात्मतत्त्वका ही होता है। परमात्मतत्त्व किसी कर्म, अभ्यास आदिका फल नहीं है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है, पर परमात्मा नित्य रहते हैं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुको कर्मयोगी चाहता ही नहीं; क्योंकि उसकी चाहना ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। एकमात्र परमात्माका ही उद्देश्य होनेसे कर्मयोगीको 'योगयुक्त' कहा गया है।
यहाँ जिसे 'योगयुक्तः' कहा गया है, उसे ही छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें 'योगारूढः' कहा गया है।
'कुर्वन्नपि न लिप्यते '—कर्मयोगी कर्म करते हुए भी कर्मसे नहीं बँधता। कर्मके बन्धनमें हेतु हैं—कर्मके प्रति ममता, कर्मके फलकी इच्छा, कर्मजन्म सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान*। सारांशमें कर्मसे कुछ—न—कुछ पानेकी इच्छा ही बन्धनमें कारण है। किंचिन्मात्र भी पानेकी इच्छा न होनेके कारण कर्मयोगी कर्म करते हुए भी उनसे बँधता नहीं अर्थात् उसके कर्म अकर्म हो जाते हैं।
सांख्ययोगी तो 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' (गीता ३।२८) 'गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं'—ऐसा मानकर कर्मसे नहीं
परिशिष्ट भाव —शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरणसे प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है, तब कर्म करते हुए भी उसमें कर्तापन नहीं रहता। कर्तापन न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—कर्मके होनेके विषयमें कर्मयोगीकी बात कहकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें सांख्ययोगके साधनकी बात कहते हैं।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यत्शृण्वन्स्पृशज्जिघ्नन्शननाच्छस्वपञ्चवसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विस्मृजन्गृह्णन्नुमिषन्निमिषन्निपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
| तत्त्ववित् | = तत्त्वको | युक्तः | = सांख्ययोगी | शृण्वन् | = सुनता हुआ, |
|---|---|---|---|---|---|
| जाननेवाला | पश्यन् | = देखता हुआ, | स्पृशन् | = छूता हुआ, |
- दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगके स्वरूपका विवेचन करते हुए भगवान्ने 'मा कर्मफलहेतुर्भूः' पदोंसे कर्मके प्रति ममता, कर्मजन्म सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान मिटानेके लिये कहा है तथा 'मा फलेषु कदाचन' पदोंसे कर्मके फलकी इच्छा मिटानेके लिये कहा है।
श्लोक ८-९]
- साधक-संजीवनी *
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| जिघ्न् | = सँघृता हुआ, | श्वसन | = श्वास लेता हुआ | वर्तन्ते | = बरत रही हैं— |
|---|---|---|---|---|---|
| अशन् | = खाता हुआ, | (तथा) | इति | = ऐसा | |
| गच्छन् | = चलता हुआ | उन्मिषन् | = आँख खोलता हुआ | धारयन् | = समझकर |
| गृह्णन् | = ग्रहण करता हुआ, | (और) | किञ्चित् | = '(मैं स्वयं) कुछ | |
| निमिषन् | = मूँदता हुआ | एव | = भी | ||
| प्रलपन् | = बोलता हुआ, | अपि | = भी | न | = नहीं |
| विमुञ्जन् | = (मल-मूत्रका) त्याग करता हुआ, | इन्द्रियाणि | = 'सम्पूर्ण इन्द्रियाँ | करोमि | = करता हूँ— |
| इन्द्रियार्थेषु | = इन्द्रियोंके विषयोंमें | इति | = ऐसा | ||
| स्वप्न | = सोता हुआ, | मन्येत | = माने। |
व्याख्या —'तत्त्ववित् युक्तः'—यहाँ ये पद सांख्य-योगके विवेकशील साधकके वाचक हैं, जो तत्त्ववित् महापुरुषकी तरह निश्चित अनुभव करनेके लिये तत्पर रहता है। उसमें ऐसा विवेक जाग्रत् हो गया है कि सब क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं, उन क्रियाओंका मेरे साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं।
जो अपनेमें अर्थात् स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी क्रियाके कर्तापनको नहीं देखता, वह 'तत्त्ववित्' है। उसमें नित्य-निरन्तर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं। प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिके साथ वह कभी भी अपनी एकता स्वीकार नहीं करता, इसलिये इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको वह अपनी क्रियाएँ मान ही कैसे सकता है?
वास्तवमें उपर्युक्त स्थिति स्वरूपसे सभी मनुष्योंकी है; परन्तु वे भूलसे स्वरूपको क्रियाओंका कर्ता मान लेते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। परमात्माकी जिस शक्तिके समष्टि संसारकी क्रियाएँ हो रही हैं, उसी शक्तिके व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी हो रही हैं। परन्तु समष्टिके ही क्षुद्र अंश व्यष्टिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण मनुष्य व्यष्टिकी कुछ क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है। इस मान्यताको हटानेके लिये ही भगवान् कहते हैं कि साधक अपनेको कभी कर्ता न माने। जबतक किसी भी अंशमें कर्तापनकी मान्यता है, तबतक वह साधक कहा जाता है। जब अपनेमें कर्तापनकी मान्यताका सर्वथा अभाव होकर अपने स्वरूपका अनुभव हो जाता है, तब वह तत्त्ववित् महापुरुष कहा जाता है। जैसे स्वप्नसे जगनेपर मनुष्यका स्वप्नसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही तत्त्ववित् महापुरुषका शरीरादिके होनेवाली
क्रियाओंसे बिलकुल सम्बन्ध (कर्तापन) नहीं रहता।
यहाँ 'तत्त्ववित्' वही है, जो प्रकृति और पुरुषके विभागको अर्थात् गुण और क्रिया सब प्रकृतिमें है, प्रकृतिके अतीत तत्त्वमें गुण और क्रिया नहीं है—इसको ठीक-ठीक जानता है। प्रकृतिके अतीत निर्विकार तत्त्व तो सबका प्रकाशक और आधार है। सबका प्रकाशक होता हुआ भी वह प्रकाशके अन्तर्गत ओत-प्रोत है। प्रकाश (शरीर आदि) में घुला-मिला रहनेपर भी प्रकाशक प्रकाशक ही है और प्रकाश प्रकाश ही है। ऐसे ही वह सबका आधार होता हुआ भी सबके (आधेयके) कण-कणमें व्याप्त है; पर वह कभी आधेय नहीं होता। कारण कि जो प्रकाशक और आधार है, उसमें करना और होना नहीं है। करना और होनारूप परिवर्तन तो प्रकाश अथवा आधेयमें ही है। इस तरह प्रकाशक और प्रकाश, आधार और आधेयके भेद-(विभाग-) को जो ठीक तरहसे जानता है, वही 'तत्त्ववित्' है। इसी प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष-(क्षेत्रज्ञ-) के विभागको जाननेकी बात भगवान्ने पहले दूसरे अध्यायके सोलहवाँ श्लोकमें और आगे सातवाँ अध्यायके चौथे-पाँचवाँ तथा तेरहवाँ अध्यायके दूसरे, उन्नीसवाँ, तेईसवाँ और चौतीसवाँ श्लोकमें कही है।
'पर्यञ्शृण्वन्स्पृशन्' " " उन्मिषन्निमिषन्निपि' — यहाँ देखना, सुनना, स्पर्श करना, सँघृणा और खाना—ये पाँचों क्रियाएँ (क्रमशः नेत्र, श्रोत्र, त्वचा, प्राण और रसना—इन पाँच) ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं। चलना, ग्रहण करना, बोलना और मल-मूत्रका त्याग करना—ये चारों क्रियाएँ (क्रमशः पाद, हस्त, वाक्, उपस्थ और गुदा—इन पाँच) कर्मेन्द्रियोंकी हैं*। सोना—यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है। श्वास लेना—यह एक क्रिया प्राणकी और आँखें खोलना
- यहाँ पाँचों कर्मेन्द्रियोंकी क्रियाओंका वर्णन चार क्रियाओंके अन्तर्गत किया गया है अर्थात् 'विमुञ्जन्' क्रियाके अन्तर्गत ही उपस्थ और गुदाकी क्रियाओंका वर्णन किया गया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
तथा मूँदना—ये दो क्रियाएँ ‘कूर्म’ नामक उपप्राणकी हैं। उपर्युक्त तेरह क्रियाएँ देकर भगवान्ने ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण, प्राण और उपप्राणसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंका उल्लेख कर दिया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं। दूसरा एक भाव यह भी प्रतीत होता है कि सांख्ययोगीके द्वारा वर्ण, आश्रम, स्वभाव, परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रविहित शरीर-निर्वाहकी क्रियाएँ, खान-पान, व्यापार करना, उपदेश देना, लिखना, पढ़ना, सुनना, सोचना आदि क्रियाएँ न होती हैं—ऐसी बात नहीं है। उसके द्वारा ये सब क्रियाएँ हो सकती हैं।
मनुष्य अपनेको उन्हीं क्रियाओंका कर्ता मानता है, जिनको वह जानकर अर्थात् मन-बुद्धिपूर्वक करता है; जैसे पढ़ना, लिखना, सोचना, देखना, भोजन करना आदि। परन्तु अनेक क्रियाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मनुष्य जानकर नहीं करता; जैसे—श्वासका आना-जाना, आँखोंका खुलना और बंद होना आदि। फिर इन क्रियाओंका कर्ता अपनेको न माननेकी बात इस श्लोकमें कैसे कही गयी? इसका उत्तर यह है कि सामान्यरूपसे श्वासोंका आना-जाना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक होनेवाली हैं; किन्तु प्राणायाम आदिमें मनुष्य श्वास लेना आदि क्रियाएँ जानकर करता है। ऐसे ही आँखोंको खोलना और बंद करना भी जानकर किया जा सकता है। इसलिये इन क्रियाओंका कर्ता भी अपनेको न माननेके लिये कहा गया है। दूसरी बात, जैसे मनुष्य ‘श्वसन् उन्मिषन् निमिषन्’ (श्वास लेना, आँखोंको खोलना और मूँदना)—इन क्रियाओंको स्वाभाविक मानकर इनमें अपना कर्तापन नहीं मानता, ऐसे ही अन्य क्रियाओंको भी स्वाभाविक मानकर उनमें अपना कर्तापन नहीं मानना चाहिये।
यहाँ ‘पश्यन्’ आदि जो तेरह क्रियाएँ बतायी हैं, इनका बिना किसी आधारके होना सम्भव नहीं है। ये क्रियाएँ जिसके आश्रित होती हैं अर्थात् इन क्रियाओंका जो आधार है, उसमें कभी कोई क्रिया नहीं होती। ऐसे ही प्रकाशित होनेवाली ये सम्पूर्ण क्रियाएँ बिना किसी प्रकाशके सिद्ध नहीं हो सकतीं। जिस प्रकाशसे ये क्रियाएँ प्रकाशित होती हैं, जिस प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं, उस प्रकाशमें कभी कोई क्रिया हुई नहीं, होती नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं और होनी सम्भव भी नहीं। ऐसा वह तत्त्व सबका आधार, प्रकाशक और स्वयं प्रकाशस्वरूप
है। वह सबमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता। उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही उपर्युक्त इन तेरह क्रियाओंका तात्पर्य है।
‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्’—जब स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं, तब क्रियाएँ कैसे और किसके द्वारा हो रही हैं?—इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् उपर्युक्त पदोंमें कहते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ इन्द्रियोंके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें ही हो रही हैं। यहाँ भगवान्का तात्पर्य इन्द्रियोंमें कर्तृत्व बतानेमें नहीं है, प्रत्युत स्वरूपको कर्तृत्वरहित (निर्लिप्त) बतानेमें है।
ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण, प्राण, उपप्राण आदि सबको यहाँ ‘इन्द्रियाणि’ पदके अन्तर्गत लिया गया है। इन्द्रियोंके पाँच विषय हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। इन विषयोंमें ही इन्द्रियोंका बर्ताव होता है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रकृतिका कार्य हैं। इसलिये इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं—
(१) प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः।
(गीता ३।२७)
(२) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
(गीता १३।२९)
गुणोंका कार्य होनेसे इन्द्रियों और उनके विषयोंको ‘गुण’ ही कहा जाता है। अतः गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८)। गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है—‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति’ (गीता १४।१९)। तात्पर्य यह है कि क्रियामात्रको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें, चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंके द्वारा होनेवाली कहें, चाहे इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली कहें, बात वास्तवमें एक ही है।
क्रियाका तात्पर्य है—परिवर्तन। परिवर्तनरूप क्रिया प्रकृतिमें ही होती है। स्वरूपमें परिवर्तनरूप क्रिया लेशमात्र भी नहीं है। कारण कि प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है और स्वरूप कर्तापनसे रहित है। प्रकृति कभी अक्रिय नहीं हो सकती और स्वरूपमें कभी क्रिया नहीं हो सकती। क्रियामात्र प्रकाश्य है और स्वरूप प्रकाशक है।
‘नैव किञ्चित्करोमीति मन्यते’—यहाँ ‘मैं (स्वरूपसे) कर्ता नहीं हूँ’—इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं (स्वरूप) पहले कर्ता था। स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें है, न भूतमें था और न भविष्यमें ही होगा।
श्लोक ८-९]
- साधक-संजीवनी *
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क्रियामात्र प्रकृतिमें ही हो रही है; क्योंकि प्रकृति सदा क्रियाशील है और पुरुष अर्थात् चेतन-तत्त्व सदा क्रियारहित है। जब चेतन अनादि भूलसे प्रकृतिके कार्यके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब वह प्रकृतिकी क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है और उन क्रियाओंका कर्ता स्वयं बन जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)।
जैसे, एक मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीके डिब्बेमें बैठा हुआ है, चल नहीं रहा है; परन्तु रेलगाड़ीके चलनेके कारण उसका चले बिना ही चलना हो जाता है। रेलगाड़ीमें चढ़नेके कारण अब वह चलनेसे रहित नहीं हो सकता। ऐसे ही क्रियाशील प्रकृतिके कार्यरूप स्थूल, सूक्ष्म और कारण—किसी भी शरीरके साथ जब स्वयं अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब स्वयं कर्म न करते हुए भी वह उन शरीरोंसे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता हुए बिना रह नहीं सकता।
सांख्ययोगी शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिके साथ कभी अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिये वह कर्मोंका कर्तापन अपनेमें कभी अनुभव नहीं करता (गीता—पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जैसे शरीरका बालकसे युवा होना, बालोंका कालेसे सफेद होना, खाये हुए अन्नका पचना, शरीरका सबल अथवा निर्बल होना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक (अपने-आप) होती हैं, ऐसे ही दूसरी सम्पूर्ण क्रियाओंको भी सांख्ययोगी स्वाभाविक होनेवाली अनुभव करता है। तात्पर्य है कि वह अपनेको किसी भी क्रियाका कर्ता अनुभव नहीं करता।
गीतामें स्वयंको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की गयी है (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। इसी प्रकार शुद्ध स्वरूपको कर्ता माननेवालेको मलिन अन्तःकरणवाला और दुर्मीत कहा गया है (अठारहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। परन्तु स्वरूपको अकर्ता माननेवालेकी प्रशंसा की गयी है (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।
‘एव’ पद देनेका तात्पर्य है कि साधक कभी किंचिन्मात्र भी अपनेमें कर्तापनकी मान्यता न करे अर्थात् कभी किसी भी अंशमें अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने। इस प्रकार जब अपनेमें कर्तापनका भाव नहीं रहता, तब उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंकी संज्ञा ‘कर्म’ नहीं रहती, प्रत्युत ‘क्रिया’ रहती है। उन्हें ‘चेष्टामात्र’ कहा जाता है। इसी लक्ष्यसे तीसरे अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें ज्ञानी महापुरुषसे होनेवाली क्रियाको ‘चेष्टते’ पदसे कहा गया है।
यहाँ ‘एव’ पद देनेका दूसरा तात्पर्य यह है कि स्वयंका शरीरके साथ तादात्म्य होनेपर भी, शरीरके साथ कितना ही घुल-मिल जानेपर भी और अपनेको ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसे मान लेनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं और न कभी आ ही सकता है। किंतु प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके यह स्वयं अपनेमें कर्तृत्व मान लेता है; क्योंकि इसमें मानने और न माननेकी सामर्थ्य है, स्वतन्त्रता है, इसलिये यह अपनेको कर्ता भी मान लेता है और जब यह अपनी तरफ देखता है तो अकर्तापन भी इसके अनुभवमें आता है। ये दोनों बातें (अपनेमें कर्तृत्व मानना और न मानना) होनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है—शरीरमें रहता हुआ भी वह न करता है और न लिप्त ही होता है। भोक्ता तो प्रकृतिस्थ पुरुष ही बनता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)। गुणोंका—क्रियाफलका भोक्ता बननेपर भी वह वास्तवमें अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होता; किन्तु अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि न रहनेसे अपनेमें लिप्तताका भाव पैदा होता है।
यद्यपि पुरुष स्वयं स्वरूपसे निलिप्त है, उसमें भोक्तापन है नहीं, हो सकता नहीं, तथापि सुख-दुःखका भोक्ता तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही बनता है अर्थात् सुखी-दुःखी तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही होता है, जड़ नहीं; क्योंकि जड़में सुखी-दुःखी होनेकी शक्ति और योग्यता नहीं है। तो फिर पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और सुख-दुःखका भोक्ता पुरुष ही बनता है—ये दोनों बातें कैसे? भोगके समय जो भोगाकार—सुख-दुःखाकार वृत्ति बनती है, वह तो प्रकृतिकी होती है और प्रकृतिमें ही होती है। परन्तु उस वृत्तिके साथ तादात्म्य होनेसे सुखी-दुःखी होना अर्थात् ‘मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ’—ऐसी मान्यता अपनेमें स्वयं पुरुष ही करता है। कारण कि यह मानना पुरुषके बिना नहीं होता अर्थात् यह मानना पुरुषमें ही हो सकता है, जड़में नहीं; इस दृष्टिसे पुरुष भोक्ता कहा गया है। सुखी-दुःखी होना अपनेमें माननेपर भी अर्थात् सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी—ऐसी मान्यता अपनेमें करनेपर भी पुरुष स्वयं अपने स्वरूपसे निलिप्त और सुख-दुःखका प्रकाशकमात्र ही रहता है; इस दृष्टिसे पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और हो सकता ही नहीं। कारण कि एकदेशीयपनसे ही भोक्तापन होता है और एकदेशीयपन अहंकारसे होता है। अहंकार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति जड़ है; अतः उसका कार्य भी जड़ ही होता
३७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
है अर्थात् भोक्तापन भी जड़ ही होता है। इसलिये भोक्तापन पुरुष-(चेतन-) में नहीं है। अगर यह पुरुष सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होता तो इसका स्वरूप परिवर्तनशील ही होता; क्योंकि सुखका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा दुःखका भी आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही यह पुरुष भी आरम्भ और अन्तवाला हो जाता, जो कि सर्वथा अनुचित है। कारण कि गीताने इसको अक्षर, अव्यय और निलिप्त कहा है और तत्त्वज्ञ पुरुषोंने इसका स्वरूप एकरस, एकरूप माना है। अगर इस पुरुषको सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होनेवाला ही मानें, तो फिर पुरुष सदा एकरस, एकरूप रहता है—ऐसा कैसे कह सकते हैं?
विशेष बात
तीसरे अध्यायके सताईसवें श्लोकमें ‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’—इसमें आये ‘मन्यते’ पदसे जो बात आयी थी, उसीका निषेध यहाँ ‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’—इसमें आये ‘मन्येत’ पदसे किया गया है। ‘मन्येत’ पदका अर्थ मानना नहीं है, प्रत्युत अनुभव करना है; क्योंकि स्वरूपमें क्रिया नहीं है—यह अनुभव है, मान्यता नहीं। कर्म करते समय अथवा न करते समय—दोनों अवस्थाओंमें स्वरूपमें अकर्तापन ज्यों-का-त्यों है। इसलिये तत्त्ववित् पुरुष यह अनुभव करता है कि कर्म करते समय भी मैं वही था और कर्म न करते समय भी मैं वही रहा; अतः कर्म करने अथवा न करनेसे अपने स्वरूप-(अपनी सत्ता-) में क्या फर्क पड़ा? अर्थात् स्वरूप तो अकर्ता ही रहा। इस प्रकार प्रकृतिके परिवर्तनका ज्ञान (अनुभव) तो सबको होता है, पर अपने स्वरूपके
परिशिष्ट भाव —विवेकशील ज्ञानयोगी पहले ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण तथा प्राणोंसे होनेवाली क्रियाओंको करते हुए भी ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’—ऐसा मानता है, फिर उसको ऐसा अनुभव हो जाता है। वास्तवमें चिन्मय सत्तामात्रमें न करना है, न होना है! प्रकृतिमें ही होती हैं, स्वयंमें नहीं। अतः स्वयंका किसी
अहंकारसे मोहित होकर स्वयंने भूलसे अपनेको कर्ता मान लिया तो वह कर्मोंसे तथा उनके फलोंसे बँध गया और चौरासी लाख योनियोंमें चला गया। अब अगर वह अपनेको अहंमसे अलग माने और अपनेको कर्ता न माने अर्थात् स्वयं वास्तवमें जैसा है, वैसा ही अनुभव कर ले तो उसके तत्त्ववित् (मुक्त) होनेमें आश्चर्य ही क्या है? तात्पर्य है कि जो असत्य है, वह भी जब सत्य मान लेनेसे सत्य दीखने लग गया, तो फिर जो वास्तवमें सत्य है, उसको मान लेनेपर
परिवर्तनका ज्ञान किसीको नहीं होता। स्वरूप सम्पूर्ण क्रियाओंका निलिप्तरूपसे आश्रय, आधार और प्रकाशक है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तनकी सम्भावना नहीं है।
स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता। जब वह प्रकृतिके साथ रागसे तादात्म्य मान लेता है, तब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है। उस अभावकी पूर्तिके लिये वह पदार्थोंकी कामना करने लग जाता है। कामनाकी पूर्तिके लिये उसमें कर्तापन आ जाता है; क्योंकि कामना हुए बिना स्वरूपमें कर्तापन नहीं आता।
प्रकृतिसे सम्बन्धके बिना स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकता। कारण कि जिन करणोंसे कर्म होते हैं, वे करण प्रकृतिके ही हैं। कर्ता करणके अधीन होता है। जैसे कितना ही योग्य सुनार क्यों न हो, पर वह अहरन, हथौड़ा आदि औजारोंके बिना कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही कर्ता करणोंके बिना कोई क्रिया नहीं कर सकता। इस प्रकार योग्यता, सामर्थ्य और करण—ये तीनों प्रकृतिमें ही हैं और प्रकृतिके सम्बन्धसे ही अपनेमें प्रतीत होते हैं। ये तीनों घटते-बढ़ते हैं और स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। अतः इनका स्वरूपसे सम्बन्ध है ही नहीं।
कर्तापन प्रकृतिके सम्बन्धसे है, इसलिये अपनेको कर्ता मानना परधर्म है। स्वरूपमें कर्तापन नहीं है, इसलिये अपनेको अकर्ता मानना स्वधर्म है। जैसे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपन-(मैं ब्राह्मण हूँ, इस-) में निरन्तर स्थित रहता है, ऐसे ही तत्त्ववित् अपने अकर्तापन-(स्वधर्म-) में निरन्तर स्थित रहता है—यही ‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ पदोंका भाव है।
श्लोक ८-१]
- साधक-संजीवनी *
३७३
वह वैसा ही दीखने लग जाय तो इसमें क्या आश्चर्य है?
वास्तवमें स्वयं जिस समय अपनेको कर्ता-भोक्ता मानता है, उस समय भी वह कर्ता-भोक्ता नहीं है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३।३१)। कारण कि अपना स्वरूप सत्तामात्र है। सत्तामें अहम् नहीं है और अहम्की सत्ता नहीं है। अतः ‘मैं कर्ता हूँ’—यह मान्यता कितनी ही दृढ़ हो, है तो भूल ही! भूलको भूल मानते ही भूल मिट जाती है—यह नियम है। किसी गुफामें सैकड़ों वर्षोंसे अन्धकार हो तो प्रकाश करते ही वह तत्काल मिट जाता है, उसके मिटनेमें अनेक वर्ष-महीने नहीं लगते। इसलिये साधक दृढ़तासे यह मान ले कि ‘मैं कर्ता नहीं हूँ।’ फिर यह मान्यता मान्यतारूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत अनुभवमें परिणत हो जायगी।
जड़-चेतनका तादात्म्य होनेसे ‘मैं’ का प्रयोग जड़ (तादात्म्यरूप अहम्) के लिये भी होता है और चेतन (स्वरूप) के लिये भी होता है। जैसे, ‘मैं कर्ता हूँ’—इसमें जड़की तरफ दृष्टि है और ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’—इसमें (जड़का निषेध होनेसे) चेतनकी तरफ दृष्टि है। जिसकी दृष्टि जड़की तरफ है अर्थात् जो अहम्को अपना स्वरूप मानता है, वह ‘अहंकारविमूढात्मा’ है और जिसकी दृष्टि चेतन (अहंरहित स्वरूप) की तरफ है, वह ‘तत्त्ववित्’ है।
जब साधक वर्तमानमें ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’—इस प्रकार स्वयंको अकर्ता अनुभव करनेकी चेष्टा करता है, तब उसके सामने एक बड़ी समस्या आती है। जब उसको भूतकालमें किये हुए अच्छे कर्मोंकी याद आती है, तब वह प्रसन्न हो जाता है कि मैंने बहुत अच्छा काम किया, बहुत ठीक किया! और जब उसको निषिद्ध कर्मोंकी याद आती है, तब वह दुःखी हो जाता है कि मैंने बहुत बुरा काम किया, बहुत गलती की। इस प्रकार भूतकालमें किये गये कर्मोंके संस्कार उसको सुखी-दुःखी करते हैं। इस विषयमें एक मार्मिक बात है। स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें है, न भूतकालमें था और न भविष्यमें ही होगा। अतः साधकको यह देखना चाहिये कि जैसे वर्तमानमें स्वयं अकर्ता है, ऐसे ही भूतकालमें भी स्वयं अकर्ता ही था। कारण कि वर्तमान ही भूतकालमें गया है। स्वरूप सत्तामात्र है और सत्तामात्रमें कोई कर्म करना बनता ही नहीं। कर्म केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाले अज्ञानी मनुष्यके द्वारा ही होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। साधकको भूतकालमें किये हुए कर्मोंकी याद आनेसे जो सुख-दुःख होता है, चिन्ता होती है, यह भी वास्तवमें अहंकारके कारण ही है। वर्तमानमें अहंकारविमूढात्मा होकर अर्थात् अहंकारके साथ अपना सम्बन्ध मानकर ही साधक सुखी-दुःखी होता है। स्थूलदृष्टिसे देखें तो जैसे अभी भूतकालका अभाव है, ऐसे ही भूतकालमें किये गये कर्मोंका भी अभी प्रत्यक्ष अभाव है। सूक्ष्मदृष्टिसे देखें तो जैसे भूतकालमें वर्तमानका अभाव था, ऐसे ही भूतकालका भी अभाव था। इसी तरह वर्तमानमें जैसे भूतकालका अभाव है, ऐसे ही वर्तमानका भी अभाव है। परन्तु सत्ताका नित्य-निरन्तर भाव है। तात्पर्य है कि सत्तामात्रमें भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनोंका ही सर्वथा अभाव है। सत्ता कालसे अतीत है। अतः वह किसी भी कालमें कर्ता नहीं है। उस कालातीत और अवस्थातीत सत्तामें किसी कालविशेष और अवस्थाविशेषको लेकर कर्तृत्व तथा भोक्तृत्वका आरोप करना अज्ञान है। अतः भूतकालमें किये गये कर्मोंकी स्मृति अहंकारविमूढात्माकी स्मृति है, तत्त्ववित्की नहीं।
‘नैव किञ्चित्करोमि’ का तात्पर्य है कि क्रिया नहीं है, पर सत्ता है। अतः साधककी दृष्टि सत्तामात्रकी तरफ रहनी चाहिये। वह सत्ता चिन्मय होनेसे ज्ञानस्वरूप है और निर्विकार होनेसे आनन्दस्वरूप है। यह आनन्द अखण्ड, शान्त, एकरस है।
शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण प्रत्येक क्रियामें स्वयंकी मुख्यता रहती है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ आदि। क्रिया तो होती है शरीरमें, पर मान लेते हैं अपनी। स्वयंमें कोई क्रिया नहीं है, वह करने और न करने—दोनोंसे रहित है (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), इसलिये शरीरके द्वारा क्रिया होनेपर भी सत्तामात्र अपने स्वरूपपर दृष्टि रहनी चाहिये कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।
सम्बन्ध—सातवें श्लोकमें कर्मयोगीकी और आठवें-नवें श्लोकोंमें सांख्ययोगीकी कर्मोंसे निलिप्तता बताकर अब भगवान् भक्तियोगीकी कर्मोंसे निलिप्तता बताते हैं।
३७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ५
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
यः = जो (भक्तियोगी) सङ्गम् = आसक्तिका पद्मपत्रम् = कमलके
कर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंको त्यक्त्वा = त्याग करके पत्तेकी
ब्रह्मणि = परमात्मामें करोति = (कर्म) करता है, इव = तरह
आधाय = अर्पण करके सः = वह पापेन = पापसे
(और) अम्भसा = जलसे न, लिप्यते = लिप्त नहीं होता ।
व्याख्या—'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि'—शरीर, इन्द्रियाँ, 'कारण गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता १३।
मन, बुद्धि, प्राण आदि सब भगवान्के ही हैं, अपने हैं ही २१)। रागपर ही अज्ञान टिका हुआ है, इसलिये राग
नहीं; अतः इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको भक्तियोगी मिटनेपर अज्ञान भी मिट जाता है। इस राग या आसक्तिसे
अपनी कैसे मान सकता है? इसलिये उसका यह भाव रहता ही कामना पैदा होती है—'सङ्गात्सञ्जायते कामः'
है कि मात्र क्रियाएँ भगवान्के द्वारा ही हो रही हैं और (गीता २। ६२)। कामना ही सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है
भगवान्के लिये ही हो रही हैं; मैं तो निमित्तमात्र हूँ। (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। इसलिये
भगवान् ही अपनी (मेरी) इन्द्रियोंके द्वारा आप ही यहाँ पापोंके मूल कारण आसक्तिका त्याग करनेकी बात
सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हैं—इस बातको ठीक-ठीक धारण आयी है; क्योंकि इसके रहते मनुष्य पापोंसे बच नहीं
करके सम्पूर्ण क्रियाओंके कर्तापनको भगवान्में ही मानना, सकता और इसके न रहनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता।
यही उपर्युक्त पदोंका अर्थ है। किसी भी क्रियाको करते समय क्रियाजन्य सुख लेनेसे
शरीरादि वस्तुएँ अपनी हैं ही नहीं, प्रत्युत मिली हुई तथा उसके फलमें आसक्त रहनेसे उस क्रियाका सम्बन्ध
हैं और बिछुड़ रही हैं। ये केवल भगवान्के नाते, छूटता नहीं, प्रत्युत छूटनेकी अपेक्षा और बढ़ता है। किसी
भगवत्प्रीत्यर्थ दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मिली हैं। इन भी छोटी या बड़ी क्रियाके फलरूपमें कोई वस्तु चाहना
वस्तुओंपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है अर्थात् इनको ही आसक्ति नहीं है, प्रत्युत क्रिया करते समय भी अपनेमें
अपने इच्छानुसार न तो रख सकते हैं, न बदल सकते हैं महत्त्वका, अच्छेपनका आरोप करना और दूसरोंसे अच्छा
और न मरनेपर साथ ही ले जा सकते हैं। इसलिये इन कहलानेका भाव रखना भी आसक्ति ही है। इसलिये
शरीरादिको तथा इनसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मानना अपने लिये कुछ भी नहीं करना। जिस कर्मसे अपने
ईमानदारी नहीं है। अतः मनुष्यको ईमानदारीके साथ जिसकी लिये किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी सुख पानेकी इच्छा
ये वस्तुएँ हैं, उसीकी अर्थात् भगवान्की मान लेनी चाहिये। है, वह कर्म अपने लिये हो जाता है। अपनी सुख-सुविधा
सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको कर्मयोगी 'संसार' और सम्मानकी इच्छा सर्वथा त्याग करके कर्म करना
के, ज्ञानयोगी 'प्रकृति' के और भक्तियोगी 'भगवान्' के ही उपर्युक्त पदोंका अभिप्राय है।
अर्पण करता है। प्रकृति और संसार—दोनोंके ही स्वामी 'लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा'—यह
भगवान् हैं। अतः क्रियाओं और पदार्थोंको भगवान्के कितनी विशेष बात है कि भगवान्के सम्मुख होकर
अर्पण करना ही श्रेष्ठ है। भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण भगवदर्थ कर्म करते हुए
'सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः'—किसी भी प्राणी, भी कर्मोंसे नहीं बँधता! जैसे कमलका पत्ता जलमें उत्पन्न
पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, क्रिया आदिमें होकर और जलमें रहकर भी जलसे निर्लिप्त रहता है, ऐसे
किंचिन्मात्र भी राग, खिंचाव, आकर्षण, लगाव, महत्त्व, ही भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण क्रियाएँ करनेपर भी
ममता, कामना आदिका न रहना ही आसक्तिका सर्वथा भगवान्के सम्मुख होनेके कारण संसारमें सर्वदा-सर्वथा
त्याग करना है। निर्लिप्त रहता है।
शास्त्रीय दृष्टिसे 'अज्ञान' जन्म-मरणका हेतु होते हुए भगवान्से विमुख होकर संसारकी कामना करना ही सब
भी साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका मुख्य हेतु है— पापोंका मुख्य हेतु है। कामना आसक्तिसे उत्पन्न होती है।
श्लोक ११ ] * साधक-संजीवनी * ३७५
आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेसे कामना नहीं रह सकती, इसलिये पाप होनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।
धुएँसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक)। परन्तु जिसने आशा, कामना, आसक्तिका त्याग कर दिया है, उसे ये दोष नहीं लगते। आसक्तिरहित होकर भगवदर्थ कर्म करनेके प्रभावसे सम्पूर्ण संचित पाप विलीन हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका सत्ताइसवाँ-अठाइसवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव—यहाँ सगुण ईश्वरको 'ब्रह्म' कहनेका तात्पर्य है कि ईश्वर सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार सब कुछ है; क्योंकि वह समग्र है। समग्रमें सब आ जाते हैं (गीता—सातवें अध्यायका उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। श्रीमद्भागवतमें भी ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), परमात्मा (सगुण-निराकार) और भगवान् (सगुण-साकार)—तीनोंको एक बताया है*। तात्पर्य यह हुआ कि 'सगुण' के अन्तर्गत ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—ये तीनों आ जाते हैं, पर 'निर्गुण' के अन्तर्गत केवल ब्रह्म ही आता है; क्योंकि निर्गुणमें गुणोंका निषेध है। अतः निर्गुण सीमित है और सगुण समग्र है।
वैष्णवलोग सगुण-साकार भगवान्के उत्सवको 'ब्रह्मोत्सव' नामसे कहते हैं। अर्जुनने भी भगवान् श्रीकृष्णको 'ब्रह्म' नामसे कहा है—'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्' (गीता १०।१२)। गीतामें ब्रह्मके तीन नाम बताये हैं—'ॐ', 'तत्' और 'सत्' (१७।२३)। नाम-नामीका सम्बन्ध होनेसे यह भी सगुण ही हुआ।
अतः भक्तियोगीका किसी प्रकारसे भी पापसे सम्बन्ध नहीं रहता।
यहाँ 'पापेन' पद कर्मोंसे होनेवाले उस पाप-पुण्यरूप फलका वाचक है, जो आगामी जन्मारम्भमें कारण होता है। भक्तियोगी उस पाप-पुण्यरूप फलसे कभी लिप्त नहीं होता अर्थात् बँधता नहीं। इसी बातको नवें अध्यायके अट्ठाइसवें श्लोकमें 'शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः' पदोंसे कहा गया है।
सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगीके कर्म करनेकी शैली बताते हैं।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥
योगिनः = कर्मयोगी, सङ्गम् = आसक्तिका, त्यक्त्वा = त्याग करके, केवलैः = केवल (ममतारहित), इन्द्रियैः = इन्द्रियाँ, कायेन = शरीर, मनसा = मन (और), बुद्ध्या = बुद्धिके द्वारा, आत्मशुद्धये = अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये, अपि = ही, कर्म = कर्म, कुर्वन्ति = करते हैं।
व्याख्या—'योगिनः'—यहाँ 'योगिनः' पद कर्मयोगीके लिये आया है। जो योगी भगवदर्पण-बुद्धिसे कर्म करते हैं, वे भक्तियोगी कहलाते हैं। परन्तु जो योगी केवल संसारकी सेवाके लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करते हैं, वे कर्मयोगी कहलाते हैं। कर्मयोगी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे कर्म करते हुए उन्हें अपना नहीं मानता, प्रत्युत संसारका ही मानता है। कारण कि शरीरादिकी संसारके साथ एकता है।
'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि'—जिनको साधारण मनुष्य अपनी मानते हैं, वे शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि वास्तवमें किसी भी दृष्टिसे अपनी नहीं हैं, प्रत्युत अपनेको मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। इनको अपनी मानना सर्वथा भूल है। इन सबकी संसारके साथ स्वतःसिद्ध एकता है।
विचारपूर्वक देखा जाय तो शरीरादि पदार्थ किसी भी दृष्टिसे अपने नहीं हैं। मालिककी दृष्टिसे देखें तो ये भगवान्के हैं, कारणकी दृष्टिसे देखें तो ये प्रकृति हैं और कार्यकी दृष्टिसे देखें तो ये संसारके (संसारसे अभिन्न) हैं।
इस प्रकार किसी भी दृष्टिसे इनको अपना मानना, इनमें ममता रखना भूल है। ममताको सर्वथा मिटानेके लिये ही यहाँ 'केवलैः' पद प्रयुक्त हुआ है।
यहाँ 'केवलैः' पद बहुवचन होनेसे इन्द्रियोंका ही
- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ (१।२।११)
३७६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
विशेषण है; परन्तु इन्द्रियोंसे ही ममता हटानेके लिये कहा जाय, शरीर-मन-बुद्धिसे नहीं—ऐसा सम्भव नहीं है। शरीरादिका सम्बन्ध समष्टि संसारके साथ है। व्यष्टि कभी समष्टिसे अलग नहीं हो सकती। इसलिये व्यष्टि-(शरीरादि-) से सम्बन्ध जोड़नेपर समष्टि-(संसार-) से स्वतः सम्बन्ध जुड़ जाता है। जैसे लड़कीसे विवाह होनेपर अर्थात् सम्बन्ध जुड़नेपर सास, ससुर आदि ससुरालके सभी सम्बन्धियोंसे अपने-आप सम्बन्ध जुड़ जाता है, ऐसे ही संसारकी किसी भी वस्तु-(शरीरादि-)से सम्बन्ध जुड़नेपर अर्थात् उसे अपनी माननेपर पूरे संसारसे अपने-आप सम्बन्ध जुड़ जाता है। अतः यहाँ 'केवलैः' पद शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि सबमें ही साधकको ममता हटानेकी प्रेरणा करता है।
वास्तवमें कर्ताका स्वयं निर्मम होना ही आवश्यक है। यदि कर्ता स्वयं निर्मम हो तो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब जगहसे ममता सर्वथा मिट जाती है। कारण कि वास्तवमें शरीर, इन्द्रियाँ आदि स्वरूपसे सर्वथा भिन्न हैं; अतः इनमें ममता केवल मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। कर्मयोगकी साधनामें फलकी इच्छाका त्याग मुख्य है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। साधारण लोग फलप्राप्तिके लिये कर्म करते हैं, पर कर्मयोगी फलकी आसक्तिको मिटानेके लिये कर्म करता है। परन्तु जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिको अपना मानता रहता है, वह फलकी इच्छाका त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि उसका ऐसा भाव रहता है कि शरीरादि अपने हैं तो उनके द्वारा किये गये कर्माका फल भी अपनेको मिलना चाहिये। इस प्रकार शरीरादिको अपना माननेसे स्वतः फलकी इच्छा उत्पन्न होती है। इसलिये फलकी इच्छाको मिटानेके लिये शरीरादिको कभी भी अपना न मानना अत्यन्त आवश्यक है।
'केवलैः'—पदका तात्पर्य है कि जैसे वर्षा बरसती है और उससे लोगोंका हित होता है; परन्तु उसमें ऐसा भाव नहीं होता कि मैं बरसती हूँ, मेरी वर्षा है जिससे दूसरोंका हित होगा, दूसरोंको सुख होगा। ऐसे ही इन्द्रियों आदिके द्वारा होनेवाले हितमें भी अपनापन मालूम न दे।
१-यहाँ 'अर्थवशाद् विभक्तिपरिणामः' के अनुसार 'केवलैः' पदकी विभक्तिका परिणाम कर लेना चाहिये अर्थात् 'केवलेन कायेन', 'केवलेन मनसा', 'केवलया बुद्ध्या'—इस तरह विभक्तिको बदल लेना चाहिये।
२-यदि मनुष्य फलकी इच्छा न करे, तो भी शरीरादिको अपना माननेसे वह कर्मफलका हेतु बन ही जाता है, जिसका भगवान्ने निषेध किया है—'मा कर्मफलहेतुर्भूः' (गीता २।४७)।
परन्तु शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियोंके द्वारा किसीका अभीष्ट हो गया, किसीकी मचचाही बात हो गयी—इन क्रियाओंको लेकर अपने मनमें खुशी आती है तो मन, बुद्धि आदिमें केवलपना नहीं रहा, प्रत्युत उनके साथ सम्बन्ध जुड़ गया, ममता हो गयी।
'सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये'—[पीछे दसवें श्लोकमें भी 'सङ्गं त्यक्त्वा' पद आये हैं; अतः इनकी व्याख्या वहीं देखनी चाहिये।]
साधारणतः मल, विशेष और आवरण-दोषके दूर होनेको अन्तःकरणकी शुद्धि माना जाता है। परन्तु वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धि है—शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे ममताका सर्वथा मिट जाना। शरीरादि कभी नहीं कहते कि हम तुम्हारे हैं और तुम हमारे हो। हम ही उनको अपना मान लेते हैं। उनको अपना मानना ही अशुद्धि है—'ममता मल जरि जाडु' (मानस ७।११७ क)। अतः शरीरादिके प्रति अहंता-ममतापूर्वक माने गये सम्बन्धका सर्वथा अभाव ही आत्मशुद्धि है।
इस श्लोकमें आये 'केवलैः' पदसे शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना न माननेकी बात आयी है। 'केवलैः' पदमें अपनापन हटानेका उद्देश्य है और 'आत्मशुद्धये' पदमें अपनापन सर्वथा हटनेकी बात आयी है। तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये (अपनापन सर्वथा हटानेके उद्देश्यसे) शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना न माननेपर भी इनमें सूक्ष्म अपनापन रह जाता है। उस सूक्ष्म अपनेपनका सर्वथा मिटना ही आत्मशुद्धि अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि है।
अहंतामें भी ममता रहती है। ममता सर्वथा मिटनेपर जब अहंतामें भी ममता नहीं रहती, तब सर्वथा शुद्धि हो जाती है।
'कर्म कुर्वन्ति'—शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें जो सूक्ष्म अपनापन रह जाता है, उसे सर्वथा दूर करनेके लिये कर्मयोगी कर्म करते हैं।
जबतक मनुष्य कर्म करते हुए अपने लिये किसी प्रकारका सुख चाहता है अर्थात् किसी फलकी इच्छा रखता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि कर्म-सामग्रीको अपनी
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
३७७
मानता है, तबतक वह कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके और कर्म-सामग्रीको अपनी न मानकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। कारण कि योगारूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील योगीके लिये (दूसरोंके हितके लिये) कर्म
परिशिष्ट भाव —शुद्ध करनेसे अन्तःकरण शुद्ध नहीं होता; क्योंकि शुद्ध करनेसे अन्तःकरणके साथ सम्बन्ध बना रहता है। जबतक 'मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो जाय'—यह भाव रहेगा, तबतक अन्तःकरणकी शुद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि ममता ही खास अशुद्धि है। इसीलिये रामायणमें आया है—'ममता मल जरि जाइ' (मानस, उत्तर० ११७ क)। भगवान्ने भी यहाँ 'केवलैः' पदसे अन्तःकरणके साथ ममता न रखनेकी बात कही है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिमें ममताका सर्वथा अभाव हो जाना ही अन्तःकरणकी शुद्धि है। अतः अन्तःकरणमें ममता (अपनापन) सर्वथा मिटानेके उद्देश्यसे कर्मयोगी अनासक्त भावसे कर्म करते हैं। वे अपने लिये कोई कर्म नहीं करते। कारण कि ममता रखनेसे कर्म होते हैं, कर्मयोग नहीं होता। अपने लिये कोई कर्म न करनेसे कर्मयोगीकी गति स्वरूपकी तरफ होती है। कर्मयोगी पहले ममतारहित होनेका उद्देश्य बनाकर कर्म करता है, फिर उसके उद्देश्यकी सिद्धि हो जाती है।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें अन्वय और व्यतिरेक-रीतिसे कर्मयोगकी महिमाका वर्णन करते हैं।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
| युक्तः | = कर्मयोगी | शान्तिम् | = शान्तिको | कामकारेण | = कामनाके कारण |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मफलम् | = कर्मफलका | आप्नोति | = प्राप्त होता है। | फले | = फलमें |
| त्यक्त्वा | = त्याग करके | (परन्तु) | सक्तः | = आसक्त होकर | |
| नैष्ठिकीम् | = नैष्ठिकी | अयुक्तः | = सकाम मनुष्य | निबध्यते | = बँध जाता है। |
व्याख्या —'युक्तः'—इस पदका अर्थ प्रसंगके अनुसार लिया जाता है; जैसे—इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अपनेको अकर्ता माननेवाले सांख्ययोगीके लिये 'युक्तः' पद आया है, ऐसे ही यहाँ कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीके लिये 'युक्तः' पद आया है।
जिनका उद्देश्य 'समता' है, वे सभी पुरुष युक्त अर्थात् योगी हैं। यहाँ कर्मयोगीका प्रकरण चल रहा है, इसलिये यहाँ 'युक्तः' पद ऐसे कर्मयोगीके लिये आया है, जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होनेसे जिसमें सांसारिक कामनाओंका अभाव हो गया है।
'कर्मफलं त्यक्त्वा'—यहाँ कर्मफलका त्याग करनेका तात्पर्य फलकी इच्छा, आसक्तिका त्याग करना है; क्योंकि वास्तवमें त्याग कर्मफलका नहीं, प्रत्युत कर्मफलकी इच्छाका होता है। कर्मफलकी इच्छाका त्याग करनेका अर्थ है—किसी भी कर्म और कर्मफलसे अपने लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारका सुख लेनेकी इच्छा न रखना। कर्म करनेसे एक तो तात्कालिक फल (सुख)
करना ही हेतु कहा जाता है—'आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते' (गीता ६।३)। इस प्रकार दूसरोंके हितके लिये वह ज्यों-ज्यों कर्म करता है, त्यों-ही-त्यों ममता-आसक्ति मिटती चली जाती है और अन्तःकरणकी शुद्धि होती चली जाती है।
मिलता है और दूसरा परिणाममें फल मिलता है—इन दोनों ही फलोंकी इच्छाका त्याग करना है। अपना कुछ नहीं है, अपने लिये कुछ नहीं करना है और अपनेको कुछ नहीं चाहिये—इस प्रकार कर्ताके सर्वथा निष्काम होनेपर कर्मफलकी इच्छाका त्याग हो जाता है।
संचित-कर्मोंके अनुसार प्रारब्ध बनता है, प्रारब्धके अनुसार मनुष्यका जन्म होता है और मनुष्य-जन्ममें नये कर्म होनेसे नये कर्म-संस्कार संचित होते हैं। परन्तु कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके कर्म करनेसे कर्म भुने हुए बीजकी तरह संस्कार उत्पन्न करनेमें असमर्थ हो जाते हैं और उनकी संज्ञा 'अकर्म' हो जाती है (गीता—चौथे अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। वर्तमानमें निष्कामभावपूर्वक किये कर्मोंके प्रभावसे उसके पुराने कर्म-संस्कार (संचित कर्म) भी समाप्त हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। इस प्रकार उसके पुनर्जन्मका कारण ही समाप्त हो जाता है।
कर्मफल चार प्रकारके होते हैं—
३७८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
(१) दृष्ट कर्मफल —वर्तमानमें किये जानेवाले नये कर्मोंका फल, जो तत्काल प्रत्यक्ष मिलता हुआ दीखता है; जैसे—भोजन करनेसे तृप्ति होना आदि।
(२) अदृष्ट कर्मफल —वर्तमानमें किये जानेवाले नये कर्मोंका फल, जो अभी तो संचितरूपसे संगृहीत होता है, पर भविष्यमें इस लोक और परलोकमें अनुकूलता या प्रतिकूलताके रूपमें मिलेगा।
(३) प्राप्त कर्मफल —प्रारब्धके अनुसार वर्तमानमें मिले हुए शरीर, जाति, वर्ण, धन, सम्पत्ति, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आदि।
(४) अप्राप्त कर्मफल —प्रारब्ध-कर्मके फल-रूपमें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें मिलनेवाली है।
उपर्युक्त चार प्रकारके कर्मफलोंमें दृष्ट और अदृष्ट कर्मफल 'क्रियमाण-कर्म' के अधीन हैं तथा प्राप्त और अप्राप्त कर्मफल 'प्रारब्ध-कर्म' के अधीन हैं। कर्मफलका त्याग करनेका अर्थ है—दृष्ट कर्मफलका आग्रह नहीं रखना तथा मिलनेपर प्रसन्न या अप्रसन्न न होना; अदृष्ट कर्मफलकी आशा न रखना; प्राप्त कर्मफलमें ममता न करना तथा मिलनेपर सुखी या दुःखी न होना और अप्राप्त कर्मफलकी कामना न करना कि मेरा दुःख मिट जाय और सुख हो जाय।
साधारण मनुष्य किसी-न-किसी कामनाको लेकर ही कर्मोंका आरम्भ करता है और कर्मोंकी समाप्तिपर उस कामनाका चिन्तन करता रहता है। जैसे व्यापारी धनकी इच्छासे व्यापार आरम्भ करता है तो उसकी वृत्तियों धनके लाभ और हानिकी ओर ही रहती हैं कि लाभ हो जाय, हानि न हो। धनका लाभ होनेपर वह प्रसन्न होता है और हानि होनेपर दुःखी होता है। इसी तरह सभी मनुष्य स्त्री, पुत्र, धन, मान, बड़ाई आदि कोई-न-कोई अनुकूल फलकी इच्छा रखकर ही कर्म करते हैं। परन्तु कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके कर्म करता है।
यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि अगर कोई इच्छा ही न हो तो कर्म करें ही क्यों? इसके उत्तरमें सबसे पहली बात तो यह है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा त्याग नहीं कर सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। यदि ऐसा मान भी लिया जाय कि मनुष्य बहुत अंशोंमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर सकता है, तो भी
मनुष्यके भीतर जबतक संसारके प्रति राग है, तबतक वह शान्तिसे (कर्म किये बिना) नहीं बैठ सकता। उससे विषयोंका चिन्तन अवश्य होगा, जो कि कर्म है। विषयोंका चिन्तन होनेसे वह क्रमशः पतनकी ओर चला जायगा (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। इसलिये जबतक रागका सर्वथा अभाव नहीं हो जाता, तबतक मनुष्य कर्मोंसे छूट नहीं सकता। कर्म करनेसे पुराना राग मिटता है और निःस्वार्थभावसे केवल परहितके लिये कर्म करनेसे नया राग पैदा नहीं होता।
विचारपूर्वक देखा जाय तो कर्मफलकी इच्छा रखकर कर्म करना बड़ी बेसमझी है। पहली बात तो यह है कि जब प्रत्येक कर्म आरम्भ और समाप्त होनेवाला है, तब उसका फल नित्य कैसे होगा? फल भी प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कर्म और कर्मफल—दोनों ही नाशवान् हैं या तो फल नहीं रहेगा या हमारा कहलाने-वाला शरीर नहीं रहेगा। दूसरी बात, इच्छा रखें या न रखें, जो फल मिलनेवाला है, वह तो मिलेगा ही। इच्छा करनेसे अधिक फल मिलता हो और इच्छा न करनेसे कम फल मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। अतः फलकी कामना करना बेसमझी ही है।
निष्कामभावसे अर्थात् फलकी कामना न रखकर लोकहितार्थ कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। कर्मयोगीके कर्म उद्देश्यहीन अर्थात् पागलके कर्मकी तरह नहीं होते, प्रत्युत परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका महान् उद्देश्य रखकर ही वह लोकहितार्थ सब कर्म करता है। उसके कर्मोंका लक्ष्य परमात्मतत्त्व रहता है, सांसारिक पदार्थ नहीं। शरीरमें ममता न रहनेसे उसमें आलस्य, अकर्मण्यता आदि दोष नहीं आते, प्रत्युत वह कर्मोंको सुचारुरूपसे और तत्परताके साथ करता है।
मामिक बात
जिन कर्मोंको करनेसे नाशवान् पदार्थोंकी प्राप्ति होती है, वे ही कर्म निष्कामभावपूर्वक एकमात्र परमात्मतत्वकी प्राप्तिका उद्देश्य रखकर लोकहितार्थ करनेसे नित्यसिद्ध परमात्मतत्वकी अनुभूतिमें हेतु बन सकते हैं। तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें कहा गया है कि कर्मोंके द्वारा ही जनकादि कर्मयोगियोंको परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि मिली; और छठे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहा गया है कि योगमें आरूढ़ होनेके लिये कर्म करना आवश्यक है। इन सब
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
३७९
बातोंसे यह अर्थ निकलता है कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर्मसे होती है। पार्वती, मनु-शतरूपा आदिको भी तप रूप कर्मसे भगवत्प्राप्ति हुई। यह बात भी आती है कि जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय, श्रवण, मनन आदि साधनोंसे तत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है। इसके विपरीत ऐसी बात भी आती है कि तप आदि कर्मोंसे भगवत्प्राप्ति नहीं होती (गीता—ग्यारहवें अध्यायका तिरपनवॉ श्लोक), परमात्मा किसी कर्मका फल नहीं हैं आदि। इन दोनों बातोंमें सामंजस्य कैसे हो?
इसका समाधान है कि वास्तवमें परमात्माकी प्राप्ति किसी कर्मसे नहीं होती। वे किसी कर्मका फल नहीं हैं। परमात्मा प्रत्येक देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें सदा-सर्वदा विद्यमान हैं। वे सदा-सर्वदा सबको प्राप्त हैं और सभी प्राणियोंकी सदा-सर्वदा उन्हींमें स्थिति हैं। परमात्मासे कोई भी मनुष्य कभी अलग था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। परन्तु जड़ प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिसे अहंता-ममतापूर्वक अपना सम्बन्ध मानते रहनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो जाता है और जो वास्तवमें अपने हैं, उन परमात्माको अपना न मानकर जो अपने हैं ही नहीं, उन नाशवान् पदार्थोंको अपना मानने लग जाता है। अतः जड़ पदार्थोंके साथ जीवका जो रागयुक्त सम्बन्ध है, उसे मिटानेमें ही सम्पूर्ण साधनोंकी सार्थकता है।
जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है। अतः तप आदि साधन करते-करते जब जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है तभी परमात्मप्राप्ति होती है। वही सम्बन्ध-विच्छेद तब बहुत सुगमतासे हो जाता है, जब निष्कामभावसे केवल लोकहितके लिये कर्तव्य-कर्म किये जायें।
परमात्मा किसी साधनसे खरीदे नहीं जा सकते; क्योंकि प्रकृतिके सम्पूर्ण पदार्थ एक साथ मिलकर भी चिन्मय और अविनाशी परमात्माकी किंचिन्मात्र भी समानता नहीं कर सकते। दूसरी बात, मूल्य देकर जो वस्तु मिलती है, वह उस मूल्यसे कमजोर (कम मूल्यवाली) ही होती है। यदि कर्मोंसे परमात्मा मिल जायें तो वे कर्मोंसे कमजोर ही सिद्ध होंगे।
यहाँ एक मार्मिक बात समझनेकी है कि प्रायः साधक
जिन शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे साधन करते हैं, उनका सम्बन्ध, महत्त्व और आश्रय रखते हुए ही साधन करते हैं। जबतक इन शरीरादिसे यत्किंचित् भी सम्बन्ध है; तबतक जड़तासे सम्बन्ध बना हुआ है। जड़तासे सम्बन्ध रखते हुए परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता। परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति जड़ताके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है।
जिस जातिका संसार है, उसी जातिके ये शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि हैं। अतः इन्हें संसारका ही मानकर, संसारकी ही सेवामें लगा दे (जो कर्मयोग है)। परन्तु इन शरीरादिसे किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न माने, इन्हें महत्त्व न दे, इनका आश्रय न रखे; क्योंकि असत्से सम्बन्ध रखते हुए असत्की सर्वथा निवृत्ति नहीं हो सकती। असत्से सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये निष्कामभावसे किये हुए सब कर्म (साधन) सहायक होते हैं। असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही परमात्मासे जो विमुखता हो रही थी, वह मिट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है।
‘शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्’ —यह बात अनुभव-सिद्ध है कि सांसारिक पदार्थोंकी कामना और ममताके त्यागसे शान्ति मिलती है। सुषुप्तिमें जब संसारकी विस्मृति हो जाती है, तब उसमें भी शान्तिका अनुभव होता है। यदि जाग्रत्में ही संसारका सम्बन्ध-विच्छेद (कामना-ममताका त्याग) हो जाय, तो फिर कहना ही क्या है! ऐसे ही नींद आने, किसी कार्यके पूरा होने, लड़कीका विवाह होने आदिसे भी एक शान्ति मिलती है। तात्पर्य है कि सांसारिक कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करते ही शान्ति प्राप्त होती है। परन्तु इस शान्तिका उपभोग करनेसे अर्थात् इसमें सुख लेनेसे और इसे ही लक्ष्य मान लेनेसे साधक इस शान्तिके फलस्वरूप मिलनेवाली ‘नैष्ठिकी शान्ति’* अर्थात् परमशान्तिसे वंचित रह जाता है। कारण कि यह शान्ति ध्येय नहीं है, प्रत्युत परमशान्तिका कारण है—‘योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)।
संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे होनेवाली शान्ति सत्त्व-गुणसे सम्बन्ध रखनेवाली सात्त्विकी शान्ति है। जबतक साधक इस शान्तिका भोग करता है और इस शान्तिसे ‘मुझमें शान्ति है’ इस प्रकार अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक
- यह ‘नैष्ठिकी शान्ति’ परमात्मप्राप्तिरूप ही है। इसे ही गीतामें कहीं ‘शशवच्छान्तिम्’ (९।३१) पदसे, कहीं ‘परां शान्तिम्’ (४।३९;१८।६२) पदोंसे और कहीं ‘शान्तिम्’ (५।२९;२।७०-७१) पदोंसे भी कहा गया है।
३८०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५
परिच्छिन्नता रहती है (गीता-चौदहवें अध्यायका छठा
श्लोक) और जबतक परिच्छिन्नता रहती है, तबतक
अखण्ड एकरस रहनेवाली वास्तविक शान्तिका अनुभव
नहीं होता।
'अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते' - जो
कर्मयोगी नहीं है, प्रत्युत कर्मी है, ऐसे सकाम पुरुषके लिये
यहाँ 'अयुक्तः' पद आया है।
सकाम पुरुष नयी-नयी कामनाओंके कारण फलमें
आसक्त होकर जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है।
कामनामात्रसे कोई भी पदार्थ नहीं मिलता, अगर मिलता
भी है तो सदा साथ नहीं रहता - ऐसी बात प्रत्यक्ष होनेपर
भी पदार्थोंकी कामना रखना प्रमाद ही है। तुलसीदासजी
महाराज कहते हैं-
अंतहुँ तोहि तजैंगे पामर तू न तजै अबही ते ॥
(विनय-पत्रिका १९८)
इसका अर्थ यह नहीं कि पदार्थोंको स्वरूपसे छोड़ दें।
अगर स्वरूपसे छोड़नेपर ही मुक्ति होती तो मरनेवाले (शरीर
छोड़नेवाले) सभी मुक्त हो जाते। पदार्थ तो अपने-आप
ही स्वरूपसे छूटते चले जा रहे हैं। अतः वास्तवमें उन
पदार्थोंमें जो कामना, ममता और आसक्ति है, उसीको छोड़ना
है; क्योंकि पदार्थोंसे कामना-ममता-आसक्तिपूर्वक माना हुआ
सम्बन्ध ही जन्म-मरणरूप बन्धनका कारण है। कर्मयोगके
आचरणसे (कर्मोंका प्रवाह केवल परहितके लिये होनेसे)
यह माना हुआ सम्बन्ध सुगमतासे छूट जाता है।
परिशिष्ट भाव-वास्तवमें मुक्तिके लिये अथवा परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना भी फलासक्ति है। मनुष्यकी
आदत पड़ी हुई है कि वह प्रत्येक कार्य फलकी कामनासे करता है, इसीलिये कहा जाता है कि मुक्तिके लिये, परमात्मप्राप्तिके
लिये साधन करे। वास्तवमें साधन केवल असाधनको मिटानेके लिये है। मुक्ति स्वतःसिद्ध है। परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
परमात्मप्राप्ति किसी क्रियाका फल नहीं है। अतः कुछ करनेसे परमात्मप्राप्ति होगी-ऐसी इच्छा रखना भी फलेच्छा है।
साधकको यह नहीं देखना चाहिये कि मैं यह साधन करूँगा तो इसका यह फल होगा। फलको देखना ही फलासक्ति
है, जिससे वर्तमानमें साधन ठीक नहीं होता। अतः फलको न देखकर अपने साधनको देखना चाहिये, साधन तत्पर होकर
करना चाहिये, फिर सिद्धि अपने-आप आयेगी। अगर साधक फलकी ओर देखता रहेगा तो सिद्धि नहीं होगी।
हम निर्विकल्प, निष्काम हो जायँगे तो बड़ा सुख मिलेगा-इस प्रकार मूलमें सुख लेनेकी जो इच्छा रहती है,
यह भी फलेच्छा है, जो साधकको निर्विकल्प, निष्काम नहीं होने देती।
सम्बन्ध-कर्मयोगका वर्णन करके अब भगवान् पुनः सांख्ययोगका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
वशी
= जिसकी इन्द्रियाँ
और मन वशमें
हैं, (ऐसा)
देही
= देहधारी पुरुष
नवद्वारे
= नौ द्वारोंवाले
पुरे
= (शरीररूपी) पुरमें
सर्वकर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंका
मनसा
= (विवेकपूर्वक)
मनसे
संन्यस्य
= त्याग करके
एव
= निःसन्देह
न
= न
कुर्वन्
= करता हुआ (और)
न
= न
कारयन्
= करवाता हुआ
सुखम्
= सुखपूर्वक (अपने
स्वरूपमें)
आस्ते
= स्थित रहता है।
व्याख्या-'वशी देही'-इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें
ममता-आसक्ति होनेसे ही ये मनुष्यपर अपना अधिकार
जमाते हैं। ममता-आसक्ति न रहनेपर ये स्वतः अपने वशमें
रहते हैं। सांख्ययोगीकी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-
आसक्ति न रहनेसे ये सर्वथा उसके वशमें रहते हैं। इसलिये
यहाँ उसे 'वशी' कहा गया है।
जबतक किसी भी मनुष्यका प्रकृतिके कार्य (शरीर,
इन्द्रियों आदि) के साथ किंचिन्मात्र भी कोई प्रयोजन रहता
है, तबतक वह प्रकृतिके 'अवश' अर्थात् वशीभूत रहता
है-'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (गीता
३।५)। प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है। अतः
प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहनेके कारण मनुष्य कर्मरहित हो
ही नहीं सकता। परन्तु प्रकृतिके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और
कारण-तीनों शरीरोंसे ममता-आसक्तिपूर्वक कोई सम्बन्ध
श्लोक १३ ] * साधक-संजीवनी * ३८१
न होनेसे सांख्ययोगी उनकी क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता।
यद्यपि सांख्ययोगीका शरीरके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध
नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह शरीरधारी ही
दीखता है। इसलिये उसे 'देही' कहा गया है।
'नवद्वारे पुरे'—शब्दादि विषयोंका सेवन करनेके
लिये दो कान, दो नेत्र, दो नासिकाछिद्र तथा एक मुख—
ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं, और मल-मूत्रका
त्याग करनेके लिये गुदा और उपस्थ—ये दो द्वार शरीरके
निचले भागमें हैं। इन नौ द्वारोंवाले शरीरको 'पुर' अर्थात्
नगर कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे नगर और उसमें
रहनेवाला मनुष्य—दोनों अलग-अलग होते हैं, ऐसे ही यह
शरीर और इसमें रहनेका भाव रखनेवाला जीवात्मा—दोनों
अलग-अलग हैं। जैसे नगरमें रहनेवाला मनुष्य नगरमें
होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता, ऐसे ही
सांख्ययोगी शरीरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ
नहीं मानता।
'सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य'—इसी अध्यायके
आठवें-नवें श्लोकोंमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और
प्राणोंके द्वारा होनेवाली जिन तेरह क्रियाओंका वर्णन हुआ
है, उन सब क्रियाओंका बोधक यहाँ 'सर्वकर्माणि' पद है।
यहाँ 'मनसा सन्न्यस्य' पदोंका अभिप्राय है—
विवेकपूर्वक मनसे त्याग करना। यदि इन पदोंका अर्थ
केवल मनसे त्याग करना माना जाय तो दोष आता है;
क्योंकि मनसे त्याग करना भी मनकी एक क्रिया है और
गीता मनसे होनेवाली क्रियाको 'कर्म' मानती है—
'शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः' (१८। १५)।
शरीरसे होनेवाली क्रियाओंके कर्तापनका मनसे त्याग
करनेपर भी मनकी (त्यागरूप) क्रियाका कर्तापन तो रह
ही गया! अतः 'मनसा सन्न्यस्य' पदोंका तात्पर्य है—
विवेकपूर्वक मनसे क्रियाओंके कर्तापनका त्याग करना
अर्थात् कर्तापनसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करना। जहाँसे
कर्तापनका सम्बन्ध माना है, वहींसे उस सम्बन्धका त्याग
करना है। सांख्ययोगी अपनेमें कर्तापन न मानकर उसे
शरीरमें ही छोड़ देता है अर्थात् कर्तापन शरीरमें ही है,
अपनेमें कभी नहीं।
'नैव कुर्वन्न कारयन्'—सांख्ययोगीमें कर्तृत्व और
कारयितृत्व— दोनों ही नहीं होते अर्थात् वह करनेवाला भी
नहीं होता और करवानेवाला भी नहीं होता।
शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे किंचिन्मात्र भी
अहंता-ममताका सम्बन्ध न होनेके कारण सांख्ययोगी उनके
द्वारा होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको कैसे मान सकता
है? अर्थात् कभी नहीं मान सकता। इसी अध्यायके आठवें
श्लोकमें भी 'नैव किञ्चित् करोमि' पदोंसे यही बात कही
गयी है। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने
'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति' पदोंसे कहा है कि
शरीरमें रहते हुए भी यह अविनाशी आत्मा कुछ नहीं करता।
यहाँ शंका होती है कि जीवात्मा स्वयं कोई कर्म नहीं
करता; किन्तु वह प्रेरक बनकर कर्म तो करवा सकता
है? इसका समाधान यह है कि जैसे सूर्यभगवान्का उदय
होनेपर सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा जाता है, लोग अपने-
अपने कामोंमें लग जाते हैं, कोई खेती करता है, कोई
वेदपाठ करता है, कोई व्यापार करता है आदि। परन्तु
सूर्यभगवान् विहित या निषिद्ध किसी भी क्रियाके प्रेरक
नहीं होते। उनसे सबको प्रकाश मिलता है, पर उस
प्रकाशका कोई सदुपयोग करे या दुरुपयोग, इसमें
सूर्यभगवान्की कोई प्रेरणा नहीं है। यदि उनकी प्रेरणा होती
तो पाप या पुण्य-कर्मोंका भागी भी उन्हींको होना पड़ता।
ऐसे ही चेतनतत्त्वसे प्रकृतिको सत्ता और शक्ति तो प्राप्त
होती है, पर वह किसी क्रियाका प्रेरक नहीं होता। यही
बात भगवान्ने यहाँ 'न कारयन्' पदोंसे कही है।
'आस्ते सुखम्'—मनुष्यमात्रकी स्वरूपमें स्वाभाविक
स्थिति है; परन्तु वे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन,
बुद्धि, प्राण आदिमें मान लेते हैं, जिससे उन्हें इस
स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। परन्तु सांख्ययोगीको
निरन्तर स्वरूपमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव
होता रहता है। स्वरूप सदा-सर्वदा सुख-स्वरूप है। वह
सुख अखण्ड, एकरस और परिच्छिन्नतासे रहित है।
एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें जैसी स्थिति होती है,
स्वरूपमें वैसी स्थिति नहीं होती। कारण कि स्वरूप ज्यों-
का-त्यों विद्यमान रहता है। उस स्वरूपमें मनुष्यकी स्थिति
स्वतः-स्वाभाविक है; अतः उसमें स्थित होनेमें कोई श्रम,
उद्योग नहीं है। स्वरूपको पहचाननेपर एक स्वरूप-ही-
स्वरूप रह जाता है। पहचानमात्रको समझानेके लिये ही
यहाँ 'आस्ते' पदका प्रयोग हुआ है। इसे ही चौदहवें
अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें 'स्वस्थः' पदसे कहा गया है।
यहाँ 'आस्ते' क्रिया जिस तत्त्वकी सत्ताको प्रकट कर
रही है, वह सब आधारोंका आधार है। समस्त उत्पन्न तत्त्व
उस अनुत्पन्न तत्त्वके आश्रित हैं। उस सर्वाधिष्ठानरूप
३८२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
तत्त्वको किसी आधारकी आवश्यकता ही क्या है? उस स्वतःसिद्ध तत्त्वमें स्वाभाविक स्थितिको ही यहाँ ‘आस्ते’
पढ़से कहा गया है। इसे ही आगे बीसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः’ पढ़ोंसे कहा गया है।
परिशिष्ट भाव—‘नैव कुर्वन् कारयन्’ —तत्त्वप्राप्तिमें करनेका भाव ही बाधक है। करनेके भावसे ही कर्तृत्व आता है और कर्तृत्वसे व्यक्तित्व आता है। क्रिया प्रकृतिमें है, स्वरूपमें स्वतः अक्रियता है। अतः करनेसे प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और कुछ नहीं करनेसे स्वरूपमें स्वतः स्थिति होती है। मेरेको कुछ नहीं करना है—यह भाव भी ‘करने’ के ही अन्तर्गत है। अतः करनेसे भी मतलब नहीं होना चाहिये और न करनेसे भी मतलब नहीं होना चाहिये—‘नैव तस्य कृतेनाथो नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३।१८)। स्वरूप करने और न करने—दोनोंसे रहित अर्थात् निरपेक्ष तत्त्व है।
वशी —गुणोंके संगसे ही जीव ‘अवश’ अर्थात् पराधीन होता है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे अवशता मिट जाती है और जीव ‘वशी’ अर्थात् स्वाधीन, निरपेक्ष जीवन हो जाता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि सांख्ययोगी न तो कर्म करता है और न करवाता ही है; किन्तु भगवान् तो कर्म करवाते होंगे? इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
प्रभुः = परमेश्वर लोकस्य = मनुष्योंके न = न कर्तृत्वम् = कर्तापनकी, न = न
कर्माणि = कर्मोंकी (और) न = न कर्मफल- संयोगम् = कर्मफलके साथ संयोगकी
सृजति = रचना करते हैं; तु = किन्तु स्वभावः = स्वभाव (ही) प्रवर्तते = बरत रहा है।
व्याख्या—‘न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः’ —सृष्टिकी रचनाका कार्य सगुण भगवान्का है, इसलिये ‘प्रभुः’ पद दिया है। भगवान् सर्वसमर्थ हैं और सबके शासक, नियामक हैं। सृष्टिरचनाका कार्य करनेपर भी वे अकर्ता ही हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
किसी भी कर्मके कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ नहीं है। मनुष्य स्वयं ही कर्मोंके कर्तापनकी रचना करता है। सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके द्वारा किये जाते हैं; परन्तु मनुष्य अज्ञानवश प्रकृतिसे तादात्म्य कर लेता है और उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका कर्ता बन जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। यदि कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता, तो भगवान् इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें ‘नैव किञ्चित्कारोमीति युक्तो मन्येत तत्त्वचित्’—ऐसा कैसे कहते? तात्पर्य यह है कि कर्तापन भगवान्का बनाया हुआ नहीं है, अपितु जीवका अपना माना हुआ है। अतः जीव इसका त्याग कर सकता है।
भगवान् ऐसा विधान भी नहीं करते कि अमुक जीवको अमुक शुभ अथवा अशुभ कर्म करना पड़ेगा। यदि
ऐसा विधान भगवान् कर देते तो विधि-निषेध बतानेवाले शास्त्र, गुरु, शिक्षा आदि सब व्यर्थ हो जाते, उनकी कोई सार्थकता ही नहीं रहती और कर्मोंका फल भी जीवको नहीं भोगना पड़ता। ‘न कर्माणि’ पढ़ोंसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है।
‘न कर्मफलसंयोगम्’—जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल उसे भोगना पड़ता है। जड़ होनेके कारण कर्म स्वयं अपना फल भुगतानेमें असमर्थ हैं। अतः कर्मोंके फलका विधान भगवान् करते हैं—‘लभते च ततः कामान्मयैव विहिताहि तान्’ (गीता ७।२२)। भगवान् कर्मोंका फल तो देते हैं, पर उस फलके साथ सम्बन्ध भगवान् नहीं जोड़ते, प्रत्युत जीव स्वयं जोड़ता है। जीव अज्ञानवश कर्मोंका कर्ता बनकर और कर्मफलमें आसक्त होकर कर्मफलके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और इसीसे सुखी-दुःखी होता है। यदि वह कर्मफलके साथ स्वयं अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो वह कर्मफलके सम्बन्धसे मुक्त रह सकता है। ऐसे कर्मफलसे सम्बन्ध न जोड़नेवाले पुरुषोंके लिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ‘सन्त्यासिनाम्’ पद आया है। उन्हें कर्मोंका फल
श्लोक १४]
- साधक-संजीवनी *
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इस लोक या परलोकमें कहीं नहीं मिलता। यदि कर्मफलका सम्बन्ध भगवान्ने जोड़ा होता तो जीव कभी कर्मफलसे मुक्त नहीं होता।
दूसरे अध्यायके सैतालीसवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—‘मा कर्मफलहेतुर्भूः ’ अर्थात् कर्मफलका हेतु भी मत बन। तात्पर्य हुआ कि सुखी-दुःखी होना अथवा न होना और कर्मफलका हेतु बनना अथवा न बनना मनुष्यके हाथमें है। यदि कर्मफलका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता, तो मनुष्य कभी सुख-दुःखमें सम नहीं हो पाता और निष्कामभावसे कर्म भी नहीं कर पाता, जिसे करनेकी बात भगवान्ने गीतामें जगह-जगह कही है (जैसे चौथे अध्यायका बीसवाँ, पाँचवें अध्यायका बारहवाँ और चौदहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक आदि)।
शंका—श्रुतिमें आता है कि भगवान् जिसकी ऊर्ध्वगति करना चाहते हैं, उससे तो शुभ-कर्म करवाते हैं और जिसकी अधोगति करना चाहते हैं, उससे अशुभ-कर्म करवाते हैं। जब भगवान् ही शुभाशुभ कर्म करवाते हैं, तो फिर ‘भगवान् किसीके कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल-संयोगकी रचना नहीं करते’—ऐसा कहना तो श्रुतिके साथ विरोध हुआ!
समाधान—वास्तवमें श्रुतिके उपर्युक्त कथनका तात्पर्य शुभाशुभ कर्म करवाकर मनुष्यकी ऊर्ध्वगति और अधोगति करनेमें नहीं है, प्रत्युत प्रारब्धके अनुसार कर्मफल भुगताकर उसे शुद्ध करनेमें है। अर्थात् मनुष्य शुभाशुभ कर्मोंका फल जैसे भोग सके, भगवान् कृपापूर्वक उसे कर्मबन्धनसे मुक्त करके अपना वास्तविक प्रेम प्रदान करनेके लिये (उसके प्रारब्धके अनुसार) वैसी ही परिस्थिति और बुद्धि बना देते हैं। जैसे, जिस मनुष्यको प्रारब्धके अनुसार धनकी प्राप्ति होनेवाली है, उसे व्यापार आदिमें वैसी ही (खरीदने आदिकी) प्रेरणा कर देते हैं अर्थात् उस समय उसकी वैसी ही बुद्धि बन जाती है और जिसे प्रारब्धके अनुसार हानि
परिशिष्ट भाव —कर्तापन, कर्म और कर्मफलका संयोग परमात्माकी सृष्टि नहीं है, प्रत्युत जीवकी सृष्टि है। इसलिये जीवपर ही इनके त्यागकी जिम्मेवारी है।
‘स्वभावस्तु प्रवर्तते’ —वास्तवमें संसारके साथ सम्बन्ध-विच्छेद स्वाभाविक है; परन्तु अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकता देखनेके कारण संसारका सम्बन्ध स्वाभाविक दीखने लग गया। यह स्वभाव स्वतः नहीं है, प्रत्युत बनाया हुआ (कृत्रिम) है।
होनेवाली है, उसे व्यापार आदिमें वैसी ही प्रेरणा कर देते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस प्रकारसे अपने शुभाशुभ कर्मोंका फल भोग सके, भगवत्प्रेरणासे वैसी ही परिस्थिति और बुद्धि बन जाती है।
यदि श्रुतिका यही अर्थ लिया जाय कि भगवान् जिसकी ऊर्ध्वगति और अधोगति करना चाहते हैं, उससे शुभ और अशुभ-कर्म करवाते हैं, तो मनुष्य कर्म करनेमें सर्वथा पराधीन हो जायगा और शास्त्रों, सन्त-महात्माओं आदिका विधि-निषेध, गुरुकी शिक्षा आदि सभी व्यर्थ हो जायेंगे। अतः यहाँ श्रुतिका तात्पर्य कर्मोंका फल भुगताकर मनुष्यको शुद्ध करना ही है।
‘स्वभावस्तु प्रवर्तते’ —कर्तापन, कर्म और कर्मफलका सम्बन्ध—इन तीनोंको मनुष्य अपने स्वभावके वशमें होकर करता है। यहाँ ‘स्वभावः ’ पद व्यष्टि प्रकृति-(आदत) का वाचक है, जिसे स्वयं जीवने बनाया है। जबतक स्वभावमें राग-द्वेष रहते हैं, तबतक स्वभाव शुद्ध नहीं होता। जबतक स्वभाव शुद्ध नहीं होता, तबतक जीव स्वभावके वशीभूत रहता है।
तीसरे अध्यायके तैत्तीसवें श्लोकमें ‘प्रकृतिं यान्ति भूतानि ’ पदोंसे भगवान्ने कहा है कि मनुष्योंको अपनी प्रकृति अर्थात् स्वभावके वशीभूत होकर कर्म करने पड़ते हैं। यही बात भगवान् यहाँ ‘तु स्वभावः प्रवर्तते ’ पदोंसे कह रहे हैं।
जबतक प्रकृति अर्थात् स्वभावसे जीवका सम्बन्ध माना हुआ है, तबतक कर्तापन, कर्म और कर्मफलके साथ संयोग—इन तीनोंमें जीवकी परतन्त्रता बनी रहेगी, जो जीवकी ही बनायी हुई है।
उपर्युक्त पदोंसे भगवान् यह कह रहे हैं कि कर्तृत्व, कर्म और कर्मफलसंयोग (भोक्तृत्व)—तीनों जीवके अपने बनाये हुए हैं, इसलिये वह स्वयं इनका त्याग करके निलिप्तताका अनुभव कर सकता है।
१-‘एष होव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष होवासाम्ना कर्म कारयति तं यमधो निनीषते।’ (कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ३।८)
२-मूलमें शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप) कर्म मनुष्य कामनाके वशीभूत होकर ही करता है (गीता ३।३७), जिनका फल क्रमशः ऊर्ध्वगति (स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति) और अधोगति (नरकोंकी प्राप्ति) होता है। मनुष्य मुक्तिके लिये भगवान्की दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके ही कामना करता है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
सम्बन्ध—जब भगवान् किसीके कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल-संयोगकी रचना नहीं करते, तो फिर वे किसीके कर्मोंके फलभागी कैसे हो सकते हैं?—इस बातको आगेके श्लोकमें स्पष्ट करते हैं।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
| विभुः | = सर्वव्यापी | न | = न | ज्ञानम् | = ज्ञान |
|---|---|---|---|---|---|
| परमात्मा | सुकृतम् | = शुभ-कर्मको | आवृतम् | = ढका हुआ है, | |
| न | = न | एव | = ही | तेन | = उसीसे |
| कस्यचित् | = किसीके | आदत्ते | = ग्रहण करता है; | जन्तवः | = सब जीव |
| पापम् | = पापकर्मको | (किन्तु) | मुह्यन्ति | = मोहित हो | |
| च | = और | अज्ञानेन | = अज्ञानसे | रहे हैं। |
व्याख्या —'नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः'—पूर्वश्लोकमें जिसको 'प्रभुः' पदसे कहा गया है, उसी परमात्माको यहाँ 'विभुः' पदसे कहा गया है।
कर्मफलका भागी होना दो प्रकारसे होता है—जो कर्म करता है, वह भी कर्मफलका भागी होता है और जो दूसरेसे कर्म करवाता है, वह भी कर्मफलका भागी होता है। परन्तु परमात्मा न तो किसीके कर्मको करनेवाला है और न कर्म करवानेवाला ही है; अतः वह किसीके भी कर्मका फलभागी नहीं हो सकता।
सूर्य सम्पूर्ण जगत्को प्रकाश देता है और उस प्रकाशके अन्तर्गत मनुष्य पाप और पुण्य-कर्म करते हैं; परन्तु उन कर्मोंसे सूर्यका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। इसी प्रकार परमात्मत्वसे प्रकृति सत्ता पाती है अर्थात् सम्पूर्ण संसार सत्ता पाता है। उसीकी सत्ता पाकर प्रकृति और उसका कार्य संसार-शरीरादि क्रियाएँ करते हैं। उन शरीरादिसे होनेवाले पाप-पुण्योंका परमात्मत्वसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। कारण कि भगवान्ने मनुष्यमात्रको स्वतन्त्रता दे रखी है; अतः मनुष्य उन कर्मोंका फलभागी अपनेको भी मान सकता है और भगवान्को भी मान सकता है अर्थात् सम्पूर्ण कर्म और कर्मफलोंको भगवान्के अर्पण भी कर सकता है। जो भगवान्की दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता अपनेको मान लेता है, वह बन्धनमें पड़ जाता है। उसके कर्म और कर्मफलको भगवान् ग्रहण नहीं करते। परन्तु जो मनुष्य उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके कर्म और कर्मफल भगवान्के अर्पण करता है, वह मुक्त हो जाता है। उसके कर्म और कर्मफलको भगवान् ग्रहण करते हैं।
जैसे सातवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें 'सर्वस्य'
पदसे और छब्बीसवें श्लोकमें 'कश्चन' पदसे सामान्य मनुष्योंको बात कही गयी है, ऐसे ही यहाँ 'कस्यचित्' पदसे अपनेको कर्ता और भोक्ता मानकर कर्म करनेवाले सामान्य मनुष्योंको बात कही गयी है, न कि भक्तोंको। कारण कि भावग्राही होनेसे भगवान् भक्तोंके द्वारा अर्पण किये हुए पत्र, पुष्प आदि पदार्थोंको और सम्पूर्ण कर्मोंको ग्रहण करते हैं (गीता—नवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ श्लोक)।
'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्'—स्वरूपका ज्ञान सभी मनुष्योंमें स्वतःसिद्ध है; किन्तु अज्ञानके द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है। उस अज्ञानके कारण जीव मूढ़ताको प्राप्त हो रहे हैं। अपनेको कर्मोंका कर्ता मानना मूढ़ता है (गीता—तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान्के द्वारा मनुष्य-मात्रको विवेक दिया हुआ है, जिसके द्वारा इस मूढ़ताका नाश किया जा सकता है। इसलिये इस अध्यायके आठवें श्लोकमें कहा गया है कि सांख्ययोगी कभी भी अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने और तेरहवें श्लोकमें कहा गया है कि सम्पूर्ण कर्मोंके कर्तापनको विवेकपूर्वक मनसे छोड़ दे।
शरीरादि सम्पूर्ण पदार्थोंमें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। स्वरूपमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। स्वरूपसे अपरिवर्तनशील होनेपर भी अपनेको परिवर्तनशील पदार्थोंसे एक मान लेना अज्ञान है। शरीरादि सब पदार्थ बदल रहे हैं—ऐसा जिसे अनुभव है वह स्वयं कभी नहीं बदलता। इसलिये स्वयंके बदलनेका अनुभव किसीको नहीं होता। अतः मैं बदलनेवाला नहीं हूँ—इस प्रकार परिवर्तनशील पदार्थोंसे अपनी असंगताका अनुभव कर लेनेसे अज्ञान मिट जाता है और तत्त्वज्ञान स्वतः प्रकाशित हो जाता है। कारण
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
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कि प्रकृतिके कार्यसे अपना सम्बन्ध मानते रहनेसे ही तत्त्वज्ञान ढका रहता है।
‘अज्ञान’ शब्दमें जो ‘नञ्’ समास है, वह ज्ञानके अभावका वाचक नहीं है, प्रत्युत अल्पज्ञान अर्थात् अधूरे ज्ञानका वाचक है। कारण कि ज्ञानका अभाव कभी होता ही नहीं, चाहे उसका अनुभव हो या न हो। इसलिये अधूरे ज्ञानको ही अज्ञान कहा जाता है। इन्द्रियोंका और बुद्धिका ज्ञान ही अधूरा ज्ञान है। इस अधूरे ज्ञानको महत्त्व देनेसे, इसके प्रभावसे प्रभावित होनेसे वास्तविक ज्ञानकी ओर दृष्टि जाती ही नहीं—यही अज्ञानके द्वारा ज्ञानका आवृत होना है।
इन्द्रियोंका ज्ञान सीमित है। इन्द्रियोंके ज्ञानकी अपेक्षा बुद्धिका ज्ञान असीम है। परन्तु बुद्धिका ज्ञान मन और इन्द्रियोंके ज्ञान—(जानने और न जानने—)को ही प्रकाशित करता है अर्थात् बुद्धि अपने विषय-पदार्थोंको ही प्रकाशित करती है। बुद्धि जिस प्रकृतिका कार्य है और जिस बुद्धिका कारण प्रकृति है, उस प्रकृतिको बुद्धि प्रकाशित नहीं करती। बुद्धि जब प्रकृतिको भी प्रकाशित नहीं कर सकती, तब प्रकृतिसे अतीत जो चेतन-तत्त्व है, उसे कैसे प्रकाशित कर सकती है! इसलिये बुद्धिका ज्ञान अधूरा ज्ञान है।
‘तेन मुह्यन्ति जनत्वः’—भगवान्ने ‘जनत्वः’ पद देकर मानो मनुष्योंकी ताड़ना की है कि जो मनुष्य अपने
परिशिष्ट भाव—जैसे अन्धकारमें सूर्यको ढकनेकी सामर्थ्य नहीं है, ऐसे ही अज्ञानमें ज्ञानको ढकनेकी सामर्थ्य नहीं है। अस्वाभाविकको स्वाभाविक मान लिया—यही अज्ञान है, जिससे मनुष्य मोहित हो जाता है। अतः अज्ञानके द्वारा ज्ञानको ढकनेकी बात केवल मूढ़तावश की गयी मान्यता है, वास्तविकता नहीं है। मनुष्य चाहे तो अपने विवेकको महत्त्व देकर इस मूढ़ताको मिटा सकता है (गीता—पाँचवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।
वास्तवमें ज्ञान नहीं ढकता, प्रत्युत बुद्धि ही ढकती है। परन्तु मनुष्यको ज्ञान ढका हुआ दीखता है, इसलिये यहाँ ‘आवृत’ शब्द दिया है। यही बात तीसरे अध्यायके उनालीसवें श्लोकमें भी ‘आवृतं ज्ञानमेतेन’ पदोंसे कही गयी है। अज्ञान अभावरूप है, उसकी सत्ता नहीं है। जिसका अभाव है, उससे आवरण नहीं हो सकता। अतः उलटा ज्ञान अर्थात् अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकताका आरोप ही अज्ञान है। अगर अस्वाभाविकता मिटकर स्वाभाविकता हो जाय तो सर्वव्यापी परमात्माके साथ एकताका अनुभव हो जायगा। व्यक्तित्व ही पाप-पुण्यको, सुकृत-दुष्कृतको ग्रहण करता है; अतः सर्वव्यापी परमात्माके साथ एकताका अनुभव होनेपर अर्थात् व्यक्तित्व मिटनेपर फिर पाप-पुण्यका ग्रहण नहीं होता।
अज्ञान अर्थात् उलटे ज्ञान (अस्वाभाविकमें स्वाभाविक बुद्धि) के कारण मनुष्य ‘जन्तु’ हो जाता है—‘तेन मुह्यन्ति जनत्वः।’ इसी तरह जड़से सम्बन्ध माननेके कारण जीव ‘जगत्’ (जड़) हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका
विवेकको महत्त्व नहीं देते, वे वास्तवमें जन्तु अर्थात् पशु ही हैं; क्योंकि उनके और पशुओंके ज्ञानमें कोई अन्तर नहीं है। आकृतिमात्रसे कोई मनुष्य नहीं होता। मनुष्य वही है, जो अपने विवेकको महत्त्व देता है। इन्द्रियोंके द्वारा भोग तो पशु भी भोगते हैं; पर उन भोगोंको भोगना मनुष्य-जीवनका लक्ष्य नहीं है। मनुष्य-जीवनका लक्ष्य सुख-दुःखसे रहित तत्त्वको प्राप्त करना है। जिनको अपने कर्तव्य और अकर्तव्यका ठीक-ठीक ज्ञान है, वे मनुष्य साधक कहलानेयोग्य हैं।
अपनेको कर्मोंका कर्ता मान लेना तथा कर्मफलमें हेतु बनकर सुखी-दुःखी होना ही अज्ञानसे मोहित होना है। पाप-पुण्य हमें करने पड़ते हैं, इनसे हम कैसे छूट सकते हैं? सुखी-दुःखी होना हमारे कर्मोंका फल है, इनसे हम अतीत कैसे हो सकते हैं?—इस प्रकारकी धारणा बना लेना ही अज्ञानसे मोहित होना है।
जीव स्वरूपसे अकर्ता तथा सुख-दुःखसे रहित है। केवल अपनी मूर्खताके कारण वह कर्ता बन जाता है और कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता है। इस मूढ़ता—(अज्ञान—) को ही यहाँ ‘तेन’ पदसे कहा गया है। इस मूढ़तासे अज्ञानी मनुष्य सुखी-दुःखी हो रहे हैं, इस बातको यहाँ ‘तेन मुह्यन्ति जनत्वः’ पदोंसे कहा गया है।
१-आहारनिद्राभयमैश्वनानि समानि चैतानि नृणां पशूनाम्।
ज्ञानं नराणामधिको विशेषो ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (चाणक्यनीति १७।१७)
‘आहार, निद्रा, भय और मैथुन—ये मनुष्यों और पशुओंमें समान ही हैं। मनुष्योंमें विशेषता यही है कि उनमें विवेक रहता है। विवेकसे शून्य मनुष्य तो पशुके समान है।’
२-अनित्याशुचिदुःखानात्समु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या। (योगदर्शन २।५)
‘अनित्यमें नित्य, अपवित्रमें पवित्र, दुःखमें सुख और अनात्मामें आत्मभावको अनुभूति अविद्या है।’