श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५
परिच्छिन्नता रहती है (गीता-चौदहवें अध्यायका छठा
श्लोक) और जबतक परिच्छिन्नता रहती है, तबतक
अखण्ड एकरस रहनेवाली वास्तविक शान्तिका अनुभव
नहीं होता।
'अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते' - जो
कर्मयोगी नहीं है, प्रत्युत कर्मी है, ऐसे सकाम पुरुषके लिये
यहाँ 'अयुक्तः' पद आया है।
सकाम पुरुष नयी-नयी कामनाओंके कारण फलमें
आसक्त होकर जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है।
कामनामात्रसे कोई भी पदार्थ नहीं मिलता, अगर मिलता
भी है तो सदा साथ नहीं रहता - ऐसी बात प्रत्यक्ष होनेपर
भी पदार्थोंकी कामना रखना प्रमाद ही है। तुलसीदासजी
महाराज कहते हैं-
अंतहुँ तोहि तजैंगे पामर तू न तजै अबही ते ॥
(विनय-पत्रिका १९८)
इसका अर्थ यह नहीं कि पदार्थोंको स्वरूपसे छोड़ दें।
अगर स्वरूपसे छोड़नेपर ही मुक्ति होती तो मरनेवाले (शरीर
छोड़नेवाले) सभी मुक्त हो जाते। पदार्थ तो अपने-आप
ही स्वरूपसे छूटते चले जा रहे हैं। अतः वास्तवमें उन
पदार्थोंमें जो कामना, ममता और आसक्ति है, उसीको छोड़ना
है; क्योंकि पदार्थोंसे कामना-ममता-आसक्तिपूर्वक माना हुआ
सम्बन्ध ही जन्म-मरणरूप बन्धनका कारण है। कर्मयोगके
आचरणसे (कर्मोंका प्रवाह केवल परहितके लिये होनेसे)
यह माना हुआ सम्बन्ध सुगमतासे छूट जाता है।
परिशिष्ट भाव-वास्तवमें मुक्तिके लिये अथवा परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना भी फलासक्ति है। मनुष्यकी
आदत पड़ी हुई है कि वह प्रत्येक कार्य फलकी कामनासे करता है, इसीलिये कहा जाता है कि मुक्तिके लिये, परमात्मप्राप्तिके
लिये साधन करे। वास्तवमें साधन केवल असाधनको मिटानेके लिये है। मुक्ति स्वतःसिद्ध है। परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
परमात्मप्राप्ति किसी क्रियाका फल नहीं है। अतः कुछ करनेसे परमात्मप्राप्ति होगी-ऐसी इच्छा रखना भी फलेच्छा है।
साधकको यह नहीं देखना चाहिये कि मैं यह साधन करूँगा तो इसका यह फल होगा। फलको देखना ही फलासक्ति
है, जिससे वर्तमानमें साधन ठीक नहीं होता। अतः फलको न देखकर अपने साधनको देखना चाहिये, साधन तत्पर होकर
करना चाहिये, फिर सिद्धि अपने-आप आयेगी। अगर साधक फलकी ओर देखता रहेगा तो सिद्धि नहीं होगी।
हम निर्विकल्प, निष्काम हो जायँगे तो बड़ा सुख मिलेगा-इस प्रकार मूलमें सुख लेनेकी जो इच्छा रहती है,
यह भी फलेच्छा है, जो साधकको निर्विकल्प, निष्काम नहीं होने देती।
सम्बन्ध-कर्मयोगका वर्णन करके अब भगवान् पुनः सांख्ययोगका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
वशी
= जिसकी इन्द्रियाँ
और मन वशमें
हैं, (ऐसा)
देही
= देहधारी पुरुष
नवद्वारे
= नौ द्वारोंवाले
पुरे
= (शरीररूपी) पुरमें
सर्वकर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंका
मनसा
= (विवेकपूर्वक)
मनसे
संन्यस्य
= त्याग करके
एव
= निःसन्देह
न
= न
कुर्वन्
= करता हुआ (और)
न
= न
कारयन्
= करवाता हुआ
सुखम्
= सुखपूर्वक (अपने
स्वरूपमें)
आस्ते
= स्थित रहता है।
व्याख्या-'वशी देही'-इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें
ममता-आसक्ति होनेसे ही ये मनुष्यपर अपना अधिकार
जमाते हैं। ममता-आसक्ति न रहनेपर ये स्वतः अपने वशमें
रहते हैं। सांख्ययोगीकी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-
आसक्ति न रहनेसे ये सर्वथा उसके वशमें रहते हैं। इसलिये
यहाँ उसे 'वशी' कहा गया है।
जबतक किसी भी मनुष्यका प्रकृतिके कार्य (शरीर,
इन्द्रियों आदि) के साथ किंचिन्मात्र भी कोई प्रयोजन रहता
है, तबतक वह प्रकृतिके 'अवश' अर्थात् वशीभूत रहता
है-'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (गीता
३।५)। प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है। अतः
प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहनेके कारण मनुष्य कर्मरहित हो
ही नहीं सकता। परन्तु प्रकृतिके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और
कारण-तीनों शरीरोंसे ममता-आसक्तिपूर्वक कोई सम्बन्ध