भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 382

श्लोक १३ ] * साधक-संजीवनी * ३८१

न होनेसे सांख्ययोगी उनकी क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता।

यद्यपि सांख्ययोगीका शरीरके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध

नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह शरीरधारी ही

दीखता है। इसलिये उसे 'देही' कहा गया है।

'नवद्वारे पुरे'—शब्दादि विषयोंका सेवन करनेके

लिये दो कान, दो नेत्र, दो नासिकाछिद्र तथा एक मुख—

ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं, और मल-मूत्रका

त्याग करनेके लिये गुदा और उपस्थ—ये दो द्वार शरीरके

निचले भागमें हैं। इन नौ द्वारोंवाले शरीरको 'पुर' अर्थात्

नगर कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे नगर और उसमें

रहनेवाला मनुष्य—दोनों अलग-अलग होते हैं, ऐसे ही यह

शरीर और इसमें रहनेका भाव रखनेवाला जीवात्मा—दोनों

अलग-अलग हैं। जैसे नगरमें रहनेवाला मनुष्य नगरमें

होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता, ऐसे ही

सांख्ययोगी शरीरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ

नहीं मानता।

'सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य'—इसी अध्यायके

आठवें-नवें श्लोकोंमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और

प्राणोंके द्वारा होनेवाली जिन तेरह क्रियाओंका वर्णन हुआ

है, उन सब क्रियाओंका बोधक यहाँ 'सर्वकर्माणि' पद है।

यहाँ 'मनसा सन्न्यस्य' पदोंका अभिप्राय है—

विवेकपूर्वक मनसे त्याग करना। यदि इन पदोंका अर्थ

केवल मनसे त्याग करना माना जाय तो दोष आता है;

क्योंकि मनसे त्याग करना भी मनकी एक क्रिया है और

गीता मनसे होनेवाली क्रियाको 'कर्म' मानती है—

'शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः' (१८। १५)।

शरीरसे होनेवाली क्रियाओंके कर्तापनका मनसे त्याग

करनेपर भी मनकी (त्यागरूप) क्रियाका कर्तापन तो रह

ही गया! अतः 'मनसा सन्न्यस्य' पदोंका तात्पर्य है—

विवेकपूर्वक मनसे क्रियाओंके कर्तापनका त्याग करना

अर्थात् कर्तापनसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करना। जहाँसे

कर्तापनका सम्बन्ध माना है, वहींसे उस सम्बन्धका त्याग

करना है। सांख्ययोगी अपनेमें कर्तापन न मानकर उसे

शरीरमें ही छोड़ देता है अर्थात् कर्तापन शरीरमें ही है,

अपनेमें कभी नहीं।

'नैव कुर्वन्न कारयन्'—सांख्ययोगीमें कर्तृत्व और

कारयितृत्व— दोनों ही नहीं होते अर्थात् वह करनेवाला भी

नहीं होता और करवानेवाला भी नहीं होता।

शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे किंचिन्मात्र भी

अहंता-ममताका सम्बन्ध न होनेके कारण सांख्ययोगी उनके

द्वारा होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको कैसे मान सकता

है? अर्थात् कभी नहीं मान सकता। इसी अध्यायके आठवें

श्लोकमें भी 'नैव किञ्चित् करोमि' पदोंसे यही बात कही

गयी है। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने

'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति' पदोंसे कहा है कि

शरीरमें रहते हुए भी यह अविनाशी आत्मा कुछ नहीं करता।

यहाँ शंका होती है कि जीवात्मा स्वयं कोई कर्म नहीं

करता; किन्तु वह प्रेरक बनकर कर्म तो करवा सकता

है? इसका समाधान यह है कि जैसे सूर्यभगवान्का उदय

होनेपर सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा जाता है, लोग अपने-

अपने कामोंमें लग जाते हैं, कोई खेती करता है, कोई

वेदपाठ करता है, कोई व्यापार करता है आदि। परन्तु

सूर्यभगवान् विहित या निषिद्ध किसी भी क्रियाके प्रेरक

नहीं होते। उनसे सबको प्रकाश मिलता है, पर उस

प्रकाशका कोई सदुपयोग करे या दुरुपयोग, इसमें

सूर्यभगवान्की कोई प्रेरणा नहीं है। यदि उनकी प्रेरणा होती

तो पाप या पुण्य-कर्मोंका भागी भी उन्हींको होना पड़ता।

ऐसे ही चेतनतत्त्वसे प्रकृतिको सत्ता और शक्ति तो प्राप्त

होती है, पर वह किसी क्रियाका प्रेरक नहीं होता। यही

बात भगवान्ने यहाँ 'न कारयन्' पदोंसे कही है।

'आस्ते सुखम्'—मनुष्यमात्रकी स्वरूपमें स्वाभाविक

स्थिति है; परन्तु वे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन,

बुद्धि, प्राण आदिमें मान लेते हैं, जिससे उन्हें इस

स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। परन्तु सांख्ययोगीको

निरन्तर स्वरूपमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव

होता रहता है। स्वरूप सदा-सर्वदा सुख-स्वरूप है। वह

सुख अखण्ड, एकरस और परिच्छिन्नतासे रहित है।

एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें जैसी स्थिति होती है,

स्वरूपमें वैसी स्थिति नहीं होती। कारण कि स्वरूप ज्यों-

का-त्यों विद्यमान रहता है। उस स्वरूपमें मनुष्यकी स्थिति

स्वतः-स्वाभाविक है; अतः उसमें स्थित होनेमें कोई श्रम,

उद्योग नहीं है। स्वरूपको पहचाननेपर एक स्वरूप-ही-

स्वरूप रह जाता है। पहचानमात्रको समझानेके लिये ही

यहाँ 'आस्ते' पदका प्रयोग हुआ है। इसे ही चौदहवें

अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें 'स्वस्थः' पदसे कहा गया है।

यहाँ 'आस्ते' क्रिया जिस तत्त्वकी सत्ताको प्रकट कर

रही है, वह सब आधारोंका आधार है। समस्त उत्पन्न तत्त्व

उस अनुत्पन्न तत्त्वके आश्रित हैं। उस सर्वाधिष्ठानरूप