श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
तत्त्वको किसी आधारकी आवश्यकता ही क्या है? उस स्वतःसिद्ध तत्त्वमें स्वाभाविक स्थितिको ही यहाँ ‘आस्ते’
पढ़से कहा गया है। इसे ही आगे बीसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः’ पढ़ोंसे कहा गया है।
परिशिष्ट भाव—‘नैव कुर्वन् कारयन्’ —तत्त्वप्राप्तिमें करनेका भाव ही बाधक है। करनेके भावसे ही कर्तृत्व आता है और कर्तृत्वसे व्यक्तित्व आता है। क्रिया प्रकृतिमें है, स्वरूपमें स्वतः अक्रियता है। अतः करनेसे प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और कुछ नहीं करनेसे स्वरूपमें स्वतः स्थिति होती है। मेरेको कुछ नहीं करना है—यह भाव भी ‘करने’ के ही अन्तर्गत है। अतः करनेसे भी मतलब नहीं होना चाहिये और न करनेसे भी मतलब नहीं होना चाहिये—‘नैव तस्य कृतेनाथो नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३।१८)। स्वरूप करने और न करने—दोनोंसे रहित अर्थात् निरपेक्ष तत्त्व है।
वशी —गुणोंके संगसे ही जीव ‘अवश’ अर्थात् पराधीन होता है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे अवशता मिट जाती है और जीव ‘वशी’ अर्थात् स्वाधीन, निरपेक्ष जीवन हो जाता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि सांख्ययोगी न तो कर्म करता है और न करवाता ही है; किन्तु भगवान् तो कर्म करवाते होंगे? इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
प्रभुः = परमेश्वर लोकस्य = मनुष्योंके न = न कर्तृत्वम् = कर्तापनकी, न = न
कर्माणि = कर्मोंकी (और) न = न कर्मफल- संयोगम् = कर्मफलके साथ संयोगकी
सृजति = रचना करते हैं; तु = किन्तु स्वभावः = स्वभाव (ही) प्रवर्तते = बरत रहा है।
व्याख्या—‘न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः’ —सृष्टिकी रचनाका कार्य सगुण भगवान्का है, इसलिये ‘प्रभुः’ पद दिया है। भगवान् सर्वसमर्थ हैं और सबके शासक, नियामक हैं। सृष्टिरचनाका कार्य करनेपर भी वे अकर्ता ही हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
किसी भी कर्मके कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ नहीं है। मनुष्य स्वयं ही कर्मोंके कर्तापनकी रचना करता है। सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके द्वारा किये जाते हैं; परन्तु मनुष्य अज्ञानवश प्रकृतिसे तादात्म्य कर लेता है और उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका कर्ता बन जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। यदि कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता, तो भगवान् इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें ‘नैव किञ्चित्कारोमीति युक्तो मन्येत तत्त्वचित्’—ऐसा कैसे कहते? तात्पर्य यह है कि कर्तापन भगवान्का बनाया हुआ नहीं है, अपितु जीवका अपना माना हुआ है। अतः जीव इसका त्याग कर सकता है।
भगवान् ऐसा विधान भी नहीं करते कि अमुक जीवको अमुक शुभ अथवा अशुभ कर्म करना पड़ेगा। यदि
ऐसा विधान भगवान् कर देते तो विधि-निषेध बतानेवाले शास्त्र, गुरु, शिक्षा आदि सब व्यर्थ हो जाते, उनकी कोई सार्थकता ही नहीं रहती और कर्मोंका फल भी जीवको नहीं भोगना पड़ता। ‘न कर्माणि’ पढ़ोंसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है।
‘न कर्मफलसंयोगम्’—जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल उसे भोगना पड़ता है। जड़ होनेके कारण कर्म स्वयं अपना फल भुगतानेमें असमर्थ हैं। अतः कर्मोंके फलका विधान भगवान् करते हैं—‘लभते च ततः कामान्मयैव विहिताहि तान्’ (गीता ७।२२)। भगवान् कर्मोंका फल तो देते हैं, पर उस फलके साथ सम्बन्ध भगवान् नहीं जोड़ते, प्रत्युत जीव स्वयं जोड़ता है। जीव अज्ञानवश कर्मोंका कर्ता बनकर और कर्मफलमें आसक्त होकर कर्मफलके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और इसीसे सुखी-दुःखी होता है। यदि वह कर्मफलके साथ स्वयं अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो वह कर्मफलके सम्बन्धसे मुक्त रह सकता है। ऐसे कर्मफलसे सम्बन्ध न जोड़नेवाले पुरुषोंके लिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ‘सन्त्यासिनाम्’ पद आया है। उन्हें कर्मोंका फल