श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ८-९]
- साधक-संजीवनी *
३६९
| जिघ्न् | = सँघृता हुआ, | श्वसन | = श्वास लेता हुआ | वर्तन्ते | = बरत रही हैं— |
|---|---|---|---|---|---|
| अशन् | = खाता हुआ, | (तथा) | इति | = ऐसा | |
| गच्छन् | = चलता हुआ | उन्मिषन् | = आँख खोलता हुआ | धारयन् | = समझकर |
| गृह्णन् | = ग्रहण करता हुआ, | (और) | किञ्चित् | = '(मैं स्वयं) कुछ | |
| निमिषन् | = मूँदता हुआ | एव | = भी | ||
| प्रलपन् | = बोलता हुआ, | अपि | = भी | न | = नहीं |
| विमुञ्जन् | = (मल-मूत्रका) त्याग करता हुआ, | इन्द्रियाणि | = 'सम्पूर्ण इन्द्रियाँ | करोमि | = करता हूँ— |
| इन्द्रियार्थेषु | = इन्द्रियोंके विषयोंमें | इति | = ऐसा | ||
| स्वप्न | = सोता हुआ, | मन्येत | = माने। |
व्याख्या —'तत्त्ववित् युक्तः'—यहाँ ये पद सांख्य-योगके विवेकशील साधकके वाचक हैं, जो तत्त्ववित् महापुरुषकी तरह निश्चित अनुभव करनेके लिये तत्पर रहता है। उसमें ऐसा विवेक जाग्रत् हो गया है कि सब क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं, उन क्रियाओंका मेरे साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं।
जो अपनेमें अर्थात् स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी क्रियाके कर्तापनको नहीं देखता, वह 'तत्त्ववित्' है। उसमें नित्य-निरन्तर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं। प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिके साथ वह कभी भी अपनी एकता स्वीकार नहीं करता, इसलिये इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको वह अपनी क्रियाएँ मान ही कैसे सकता है?
वास्तवमें उपर्युक्त स्थिति स्वरूपसे सभी मनुष्योंकी है; परन्तु वे भूलसे स्वरूपको क्रियाओंका कर्ता मान लेते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। परमात्माकी जिस शक्तिके समष्टि संसारकी क्रियाएँ हो रही हैं, उसी शक्तिके व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी हो रही हैं। परन्तु समष्टिके ही क्षुद्र अंश व्यष्टिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण मनुष्य व्यष्टिकी कुछ क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है। इस मान्यताको हटानेके लिये ही भगवान् कहते हैं कि साधक अपनेको कभी कर्ता न माने। जबतक किसी भी अंशमें कर्तापनकी मान्यता है, तबतक वह साधक कहा जाता है। जब अपनेमें कर्तापनकी मान्यताका सर्वथा अभाव होकर अपने स्वरूपका अनुभव हो जाता है, तब वह तत्त्ववित् महापुरुष कहा जाता है। जैसे स्वप्नसे जगनेपर मनुष्यका स्वप्नसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही तत्त्ववित् महापुरुषका शरीरादिके होनेवाली
क्रियाओंसे बिलकुल सम्बन्ध (कर्तापन) नहीं रहता।
यहाँ 'तत्त्ववित्' वही है, जो प्रकृति और पुरुषके विभागको अर्थात् गुण और क्रिया सब प्रकृतिमें है, प्रकृतिके अतीत तत्त्वमें गुण और क्रिया नहीं है—इसको ठीक-ठीक जानता है। प्रकृतिके अतीत निर्विकार तत्त्व तो सबका प्रकाशक और आधार है। सबका प्रकाशक होता हुआ भी वह प्रकाशके अन्तर्गत ओत-प्रोत है। प्रकाश (शरीर आदि) में घुला-मिला रहनेपर भी प्रकाशक प्रकाशक ही है और प्रकाश प्रकाश ही है। ऐसे ही वह सबका आधार होता हुआ भी सबके (आधेयके) कण-कणमें व्याप्त है; पर वह कभी आधेय नहीं होता। कारण कि जो प्रकाशक और आधार है, उसमें करना और होना नहीं है। करना और होनारूप परिवर्तन तो प्रकाश अथवा आधेयमें ही है। इस तरह प्रकाशक और प्रकाश, आधार और आधेयके भेद-(विभाग-) को जो ठीक तरहसे जानता है, वही 'तत्त्ववित्' है। इसी प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष-(क्षेत्रज्ञ-) के विभागको जाननेकी बात भगवान्ने पहले दूसरे अध्यायके सोलहवाँ श्लोकमें और आगे सातवाँ अध्यायके चौथे-पाँचवाँ तथा तेरहवाँ अध्यायके दूसरे, उन्नीसवाँ, तेईसवाँ और चौतीसवाँ श्लोकमें कही है।
'पर्यञ्शृण्वन्स्पृशन्' " " उन्मिषन्निमिषन्निपि' — यहाँ देखना, सुनना, स्पर्श करना, सँघृणा और खाना—ये पाँचों क्रियाएँ (क्रमशः नेत्र, श्रोत्र, त्वचा, प्राण और रसना—इन पाँच) ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं। चलना, ग्रहण करना, बोलना और मल-मूत्रका त्याग करना—ये चारों क्रियाएँ (क्रमशः पाद, हस्त, वाक्, उपस्थ और गुदा—इन पाँच) कर्मेन्द्रियोंकी हैं*। सोना—यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है। श्वास लेना—यह एक क्रिया प्राणकी और आँखें खोलना
- यहाँ पाँचों कर्मेन्द्रियोंकी क्रियाओंका वर्णन चार क्रियाओंके अन्तर्गत किया गया है अर्थात् 'विमुञ्जन्' क्रियाके अन्तर्गत ही उपस्थ और गुदाकी क्रियाओंका वर्णन किया गया है।