भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

अवश्य होता है। कर्मयोगीका उद्देश्य वही होता है, जो सबको मिल सकता है और सदा साथ रहता है। जो किसीको मिलता है, किसीको नहीं मिलता और कभी रहता है, कभी नहीं रहता, वह उसका उद्देश्य नहीं होता है। इस दृष्टिसे उद्देश्य सदा परमात्मतत्त्वका ही होता है। परमात्मतत्त्व किसी कर्म, अभ्यास आदिका फल नहीं है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है, पर परमात्मा नित्य रहते हैं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुको कर्मयोगी चाहता ही नहीं; क्योंकि उसकी चाहना ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। एकमात्र परमात्माका ही उद्देश्य होनेसे कर्मयोगीको 'योगयुक्त' कहा गया है।

यहाँ जिसे 'योगयुक्तः' कहा गया है, उसे ही छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें 'योगारूढः' कहा गया है।

'कुर्वन्नपि न लिप्यते '—कर्मयोगी कर्म करते हुए भी कर्मसे नहीं बँधता। कर्मके बन्धनमें हेतु हैं—कर्मके प्रति ममता, कर्मके फलकी इच्छा, कर्मजन्म सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान*। सारांशमें कर्मसे कुछ—न—कुछ पानेकी इच्छा ही बन्धनमें कारण है। किंचिन्मात्र भी पानेकी इच्छा न होनेके कारण कर्मयोगी कर्म करते हुए भी उनसे बँधता नहीं अर्थात् उसके कर्म अकर्म हो जाते हैं।

सांख्ययोगी तो 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' (गीता ३।२८) 'गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं'—ऐसा मानकर कर्मसे नहीं

परिशिष्ट भाव —शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरणसे प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है, तब कर्म करते हुए भी उसमें कर्तापन नहीं रहता। कर्तापन न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—कर्मके होनेके विषयमें कर्मयोगीकी बात कहकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें सांख्ययोगके साधनकी बात कहते हैं।

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।

पश्यत्शृण्वन्स्पृशज्जिघ्नन्शननाच्छस्वपञ्चवसन् ॥ ८ ॥

प्रलपन्विस्मृजन्गृह्णन्नुमिषन्निमिषन्निपि ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥

तत्त्ववित्= तत्त्वकोयुक्तः= सांख्ययोगीशृण्वन्= सुनता हुआ,
जाननेवालापश्यन्= देखता हुआ,स्पृशन्= छूता हुआ,
  • दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगके स्वरूपका विवेचन करते हुए भगवान्ने 'मा कर्मफलहेतुर्भूः' पदोंसे कर्मके प्रति ममता, कर्मजन्म सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान मिटानेके लिये कहा है तथा 'मा फलेषु कदाचन' पदोंसे कर्मके फलकी इच्छा मिटानेके लिये कहा है।