श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ११ ] * साधक-संजीवनी * ३७५
आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेसे कामना नहीं रह सकती, इसलिये पाप होनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।
धुएँसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक)। परन्तु जिसने आशा, कामना, आसक्तिका त्याग कर दिया है, उसे ये दोष नहीं लगते। आसक्तिरहित होकर भगवदर्थ कर्म करनेके प्रभावसे सम्पूर्ण संचित पाप विलीन हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका सत्ताइसवाँ-अठाइसवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव—यहाँ सगुण ईश्वरको 'ब्रह्म' कहनेका तात्पर्य है कि ईश्वर सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार सब कुछ है; क्योंकि वह समग्र है। समग्रमें सब आ जाते हैं (गीता—सातवें अध्यायका उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। श्रीमद्भागवतमें भी ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), परमात्मा (सगुण-निराकार) और भगवान् (सगुण-साकार)—तीनोंको एक बताया है*। तात्पर्य यह हुआ कि 'सगुण' के अन्तर्गत ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—ये तीनों आ जाते हैं, पर 'निर्गुण' के अन्तर्गत केवल ब्रह्म ही आता है; क्योंकि निर्गुणमें गुणोंका निषेध है। अतः निर्गुण सीमित है और सगुण समग्र है।
वैष्णवलोग सगुण-साकार भगवान्के उत्सवको 'ब्रह्मोत्सव' नामसे कहते हैं। अर्जुनने भी भगवान् श्रीकृष्णको 'ब्रह्म' नामसे कहा है—'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्' (गीता १०।१२)। गीतामें ब्रह्मके तीन नाम बताये हैं—'ॐ', 'तत्' और 'सत्' (१७।२३)। नाम-नामीका सम्बन्ध होनेसे यह भी सगुण ही हुआ।
अतः भक्तियोगीका किसी प्रकारसे भी पापसे सम्बन्ध नहीं रहता।
यहाँ 'पापेन' पद कर्मोंसे होनेवाले उस पाप-पुण्यरूप फलका वाचक है, जो आगामी जन्मारम्भमें कारण होता है। भक्तियोगी उस पाप-पुण्यरूप फलसे कभी लिप्त नहीं होता अर्थात् बँधता नहीं। इसी बातको नवें अध्यायके अट्ठाइसवें श्लोकमें 'शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः' पदोंसे कहा गया है।
सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मयोगीके कर्म करनेकी शैली बताते हैं।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥
योगिनः = कर्मयोगी, सङ्गम् = आसक्तिका, त्यक्त्वा = त्याग करके, केवलैः = केवल (ममतारहित), इन्द्रियैः = इन्द्रियाँ, कायेन = शरीर, मनसा = मन (और), बुद्ध्या = बुद्धिके द्वारा, आत्मशुद्धये = अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये, अपि = ही, कर्म = कर्म, कुर्वन्ति = करते हैं।
व्याख्या—'योगिनः'—यहाँ 'योगिनः' पद कर्मयोगीके लिये आया है। जो योगी भगवदर्पण-बुद्धिसे कर्म करते हैं, वे भक्तियोगी कहलाते हैं। परन्तु जो योगी केवल संसारकी सेवाके लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करते हैं, वे कर्मयोगी कहलाते हैं। कर्मयोगी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे कर्म करते हुए उन्हें अपना नहीं मानता, प्रत्युत संसारका ही मानता है। कारण कि शरीरादिकी संसारके साथ एकता है।
'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि'—जिनको साधारण मनुष्य अपनी मानते हैं, वे शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि वास्तवमें किसी भी दृष्टिसे अपनी नहीं हैं, प्रत्युत अपनेको मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। इनको अपनी मानना सर्वथा भूल है। इन सबकी संसारके साथ स्वतःसिद्ध एकता है।
विचारपूर्वक देखा जाय तो शरीरादि पदार्थ किसी भी दृष्टिसे अपने नहीं हैं। मालिककी दृष्टिसे देखें तो ये भगवान्के हैं, कारणकी दृष्टिसे देखें तो ये प्रकृति हैं और कार्यकी दृष्टिसे देखें तो ये संसारके (संसारसे अभिन्न) हैं।
इस प्रकार किसी भी दृष्टिसे इनको अपना मानना, इनमें ममता रखना भूल है। ममताको सर्वथा मिटानेके लिये ही यहाँ 'केवलैः' पद प्रयुक्त हुआ है।
यहाँ 'केवलैः' पद बहुवचन होनेसे इन्द्रियोंका ही
- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ (१।२।११)