भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 375

३७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ५

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥

यः = जो (भक्तियोगी) सङ्गम् = आसक्तिका पद्मपत्रम् = कमलके

कर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंको त्यक्त्वा = त्याग करके पत्तेकी

ब्रह्मणि = परमात्मामें करोति = (कर्म) करता है, इव = तरह

आधाय = अर्पण करके सः = वह पापेन = पापसे

(और) अम्भसा = जलसे न, लिप्यते = लिप्त नहीं होता ।

व्याख्या—'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि'—शरीर, इन्द्रियाँ, 'कारण गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता १३।

मन, बुद्धि, प्राण आदि सब भगवान्‌के ही हैं, अपने हैं ही २१)। रागपर ही अज्ञान टिका हुआ है, इसलिये राग

नहीं; अतः इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको भक्तियोगी मिटनेपर अज्ञान भी मिट जाता है। इस राग या आसक्तिसे

अपनी कैसे मान सकता है? इसलिये उसका यह भाव रहता ही कामना पैदा होती है—'सङ्गात्सञ्जायते कामः'

है कि मात्र क्रियाएँ भगवान्‌के द्वारा ही हो रही हैं और (गीता २। ६२)। कामना ही सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है

भगवान्‌के लिये ही हो रही हैं; मैं तो निमित्तमात्र हूँ। (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। इसलिये

भगवान् ही अपनी (मेरी) इन्द्रियोंके द्वारा आप ही यहाँ पापोंके मूल कारण आसक्तिका त्याग करनेकी बात

सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हैं—इस बातको ठीक-ठीक धारण आयी है; क्योंकि इसके रहते मनुष्य पापोंसे बच नहीं

करके सम्पूर्ण क्रियाओंके कर्तापनको भगवान्‌में ही मानना, सकता और इसके न रहनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता।

यही उपर्युक्त पदोंका अर्थ है। किसी भी क्रियाको करते समय क्रियाजन्य सुख लेनेसे

शरीरादि वस्तुएँ अपनी हैं ही नहीं, प्रत्युत मिली हुई तथा उसके फलमें आसक्त रहनेसे उस क्रियाका सम्बन्ध

हैं और बिछुड़ रही हैं। ये केवल भगवान्‌के नाते, छूटता नहीं, प्रत्युत छूटनेकी अपेक्षा और बढ़ता है। किसी

भगवत्प्रीत्यर्थ दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मिली हैं। इन भी छोटी या बड़ी क्रियाके फलरूपमें कोई वस्तु चाहना

वस्तुओंपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है अर्थात् इनको ही आसक्ति नहीं है, प्रत्युत क्रिया करते समय भी अपनेमें

अपने इच्छानुसार न तो रख सकते हैं, न बदल सकते हैं महत्त्वका, अच्छेपनका आरोप करना और दूसरोंसे अच्छा

और न मरनेपर साथ ही ले जा सकते हैं। इसलिये इन कहलानेका भाव रखना भी आसक्ति ही है। इसलिये

शरीरादिको तथा इनसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मानना अपने लिये कुछ भी नहीं करना। जिस कर्मसे अपने

ईमानदारी नहीं है। अतः मनुष्यको ईमानदारीके साथ जिसकी लिये किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी सुख पानेकी इच्छा

ये वस्तुएँ हैं, उसीकी अर्थात् भगवान्‌की मान लेनी चाहिये। है, वह कर्म अपने लिये हो जाता है। अपनी सुख-सुविधा

सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको कर्मयोगी 'संसार' और सम्मानकी इच्छा सर्वथा त्याग करके कर्म करना

के, ज्ञानयोगी 'प्रकृति' के और भक्तियोगी 'भगवान्' के ही उपर्युक्त पदोंका अभिप्राय है।

अर्पण करता है। प्रकृति और संसार—दोनोंके ही स्वामी 'लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा'—यह

भगवान् हैं। अतः क्रियाओं और पदार्थोंको भगवान्‌के कितनी विशेष बात है कि भगवान्‌के सम्मुख होकर

अर्पण करना ही श्रेष्ठ है। भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण भगवदर्थ कर्म करते हुए

'सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः'—किसी भी प्राणी, भी कर्मोंसे नहीं बँधता! जैसे कमलका पत्ता जलमें उत्पन्न

पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, क्रिया आदिमें होकर और जलमें रहकर भी जलसे निर्लिप्त रहता है, ऐसे

किंचिन्मात्र भी राग, खिंचाव, आकर्षण, लगाव, महत्त्व, ही भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण क्रियाएँ करनेपर भी

ममता, कामना आदिका न रहना ही आसक्तिका सर्वथा भगवान्‌के सम्मुख होनेके कारण संसारमें सर्वदा-सर्वथा

त्याग करना है। निर्लिप्त रहता है।

शास्त्रीय दृष्टिसे 'अज्ञान' जन्म-मरणका हेतु होते हुए भगवान्‌से विमुख होकर संसारकी कामना करना ही सब

भी साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका मुख्य हेतु है— पापोंका मुख्य हेतु है। कामना आसक्तिसे उत्पन्न होती है।