श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
तेरहवाँ श्लोक ) ।
जो हमसे घुला-मिला हुआ है, उस परमात्माको तो अपनेसे अलग मान लिया और जो हमसे अलग है, उस शरीरको अपनेसे घुला-मिला मान लिया—यह अज्ञान है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि अज्ञानके द्वारा ज्ञान ढका जानेके कारण सब जीव मोहित हो रहे हैं। अपने विवेकके द्वारा उस अज्ञानका नाश कर देनेपर जिस ज्ञानका उदय होता है, उसकी महिमा आगेके श्लोकमें कहते हैं।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
| तु | = परन्तु | अज्ञानम् | = अज्ञानका | आदित्यवत् | = सूर्यकी तरह |
|---|---|---|---|---|---|
| येषाम् | = जिन्होंने | नाशितम् | = नाश कर दिया है, | परम् | = परमतत्त्व |
| आत्मनः | = अपने जिस | तेषाम् | = उनका | परमात्माको | |
| ज्ञानेन | = ज्ञानके द्वारा | तत् | = वह | प्रकाशयति | = प्रकाशित कर |
| तत् | = उस | ज्ञानम् | = ज्ञान | देता है। |
व्याख्या—‘ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः’—पौछेके श्लोकमें कही बातसे विलक्षण बात बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पदका प्रयोग किया गया है।
पौछेके श्लोकमें जिसको ‘अज्ञानेन’ पदसे कहा था, उसको ही यहाँ ‘तत् अज्ञानम्’ पदसे कहा गया है।
अपनी सत्ताको और शरीरको अलग-अलग मानना ‘ज्ञान’ है और एक मानना ‘अज्ञान’ है।
उत्पत्ति-विनाशशील संसारके किसी अंशमें तो हमने अपनेको रख लिया अर्थात् मैं-पन (अहंता) कर लिया और किसी अंशको अपनेमें रख लिया अर्थात् मेरापन (ममता) कर लिया। अपनी सत्ताका तो निरन्तर अनुभव होता है और मैं-मेरापन बदलता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है; जैसे—पहले मैं बालक था और खिलौने आदि मेरे थे, अब मैं युवा या वृद्ध हूँ और स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि मेरे हैं। इस प्रकार मैं-मेरेपनके परिवर्तनका ज्ञान हमें है, पर अपनी सत्ताके परिवर्तनका ज्ञान हमें नहीं है—यह ज्ञान अर्थात् विवेक है।
मैं-मेरेपनको जड़के साथ न मिलाकर साधक अपने विवेकको महत्त्व दे कि मैं-मेरापन जिससे मिलाता हूँ, वह सब बदलता है; परन्तु मैं-मेरा कहलानेवाला मैं (मेरी सत्ता) वही रहता हूँ। जड़का बदलना और अभाव तो समझमें आता है, पर स्वयंका बदलना और अभाव किसीकी समझमें नहीं आता; क्योंकि स्वयंमें किंचित् भी परिवर्तन और अभाव कभी होता ही नहीं—इस विवेकके द्वारा मैं-मेरेपनका त्याग कर दे कि
शरीर ‘मैं’ नहीं और बदलनेवाली वस्तु ‘मेरी’ नहीं। यही विवेकके द्वारा अज्ञानका नाश करना है। परिवर्तनशीलके साथ अपरिवर्तनशीलका सम्बन्ध अज्ञानसे अर्थात् विवेकको महत्त्व न देनेसे है। जिसने विवेकको जाग्रत् करके परिवर्तनशील मैं-मेरेपनके सम्बन्धका विच्छेद कर दिया है, उसका वह विवेक सच्चिदानन्दधन परमात्माको प्रकाशित कर देता है अर्थात् अनुभव करा देता है।
‘तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्’—विवेकके सर्वथा जाग्रत् होनेपर परिवर्तनशीलकी निवृत्ति हो जाती है। परिवर्तनशीलकी निवृत्ति होनेपर अपने स्वरूपका स्वच्छ बोध हो जाता है, जिसके होते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्व प्रकाशित हो जाता है अर्थात् उसके साथ अभिन्नताका अनुभव हो जाता है।
यहाँ ‘परम्’ पद परमात्मतत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है। दूसरे अध्यायके उनसठवें श्लोकमें तथा तेरहवें अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भी परमात्मतत्त्वके लिये ‘परम्’ पद आया है।
‘प्रकाशयति’ पदका तात्पर्य है कि सूर्यका उदय होनेपर नयी वस्तुका निर्माण नहीं होता, प्रत्युत अन्धकारसे ढके जानेके कारण जो वस्तु दिखायी नहीं दे रही थी, वह दीखने लग जाती है। इसी प्रकार परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध है, पर अज्ञानके कारण उसका अनुभव नहीं हो रहा था। विवेकके द्वारा अज्ञान मिटते ही उस स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका अनुभव होने लग जाता है।