भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 388

श्लोक १७]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव —अज्ञानका नाश विवेकसे ही होता है, उद्योगसे नहीं—‘यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्य-चेतसः’ (गीता १५।११)। कारण कि अज्ञानका नाश क्रियासाध्य, परिश्रमसाध्य नहीं है। परिश्रम करनेसे शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहता है; क्योंकि शरीरसे सम्बन्ध जोड़े बिना परिश्रम नहीं होता। दूसरी बात, अज्ञानको हटानेका उद्योग करनेसे अज्ञान दूद होता है; क्योंकि उसकी सत्ता मानकर ही उसको हटानेका उद्योग करते हैं।

अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकताकी विपरीत भावना (अज्ञान) अपनेमें ही है। अतः विवेकका आदर करनेसे उसका निराकरण हो जाता है।

सम्बन्ध—जिस स्थितिमें सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है, उस स्थितिकी प्राप्तिके लिये आगेके श्लोकमें साधन बताते हैं।

तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।

गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्पषाः ॥ १७ ॥

तदात्मानः | = जिनका मन तदाकार हो रहा है, | परमात्मतत्त्वमें है, (ऐसे) | पापरहित होकर ---|---|---|--- तदबुद्धयः | = जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, | तत्परायणाः = परमात्मपरायण साधक | अपुनरावृत्तिम् = अपुनरावृत्ति (परमगति)को तन्निष्ठाः | = जिनकी स्थिति | ज्ञाननिर्धूतकल्पषाः = ज्ञानके द्वारा | गच्छन्ति = प्राप्त होते हैं।

व्याख्या —[परमात्मतत्त्वका अनुभव करनेके लिये दो प्रकारके साधन हैं—एक तो विवेकके द्वारा असत्का त्याग करनेपर सत्यमें स्वरूप-स्थिति स्वतः हो जाती है और दूसरा, सत्का चिन्तन करते-करते सत्की प्राप्ति हो जाती है। चिन्तनसे सत्की ही प्राप्ति होती है। असत्की प्राप्ति कर्मोंसे होती है, चिन्तनसे नहीं। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु कर्मोंसे मिलती है और नित्य परिपूर्ण तत्त्व चिन्तनसे मिलता है। चिन्तनसे परमात्मा कैसे प्राप्त होते हैं—इसकी विधि इस श्लोकमें बताते हैं।]

‘तदबुद्धयः’ —‘निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम ‘बुद्धि’ है। साधक पहले बुद्धिसे यह निश्चय करे कि सर्वत्र एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। संसारके उत्पन्न होनेसे पहले भी परमात्मा थे और संसारके नष्ट होनेके बाद भी परमात्मा रहेंगे। बीचमें भी संसारका जो प्रवाह चल रहा है, उसमें भी परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं। इस प्रकार परमात्माकी सत्ता-(होनेपन-) में अटल निश्चय होना ही ‘तदबुद्धयः’ पदका तात्पर्य है।

‘तदात्मानः’ —‘यहाँ ‘आत्मा’ शब्द मनका वाचक है। जब बुद्धिमें एक परमात्मतत्त्वका निश्चय हो जाता है, तब मनसे स्वतः-स्वाभाविक परमात्माका ही चिन्तन होने लगता है। सब क्रियाएँ करते समय यह चिन्तन अखण्ड रहता है कि सत्तारूपसे सब जगह एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। चिन्तनमें संसारकी सत्ता आती ही नहीं।

‘तन्निष्ठाः’ —‘जब साधकके मन और बुद्धि परमात्मामें लग जाते हैं, तब वह हर समय परमात्मामें अपनी (स्वयंकी) स्वतः-स्वाभाविक स्थितिका अनुभव करता है। जबतक मन-बुद्धि परमात्मामें नहीं लगते अर्थात् मनसे परमात्माका चिन्तन और बुद्धिसे परमात्माका निश्चय नहीं होता, तबतक परमात्मामें अपनी स्वाभाविक स्थिति होते हुए भी उसका अनुभव नहीं होता।

‘तत्परायणाः’ —‘परमात्मासे अलग अपनी सत्ता न रहना ही परमात्माके परायण होना है। परमात्मामें अपनी स्थितिका अनुभव करनेसे अपनी सत्ता परमात्माकी सत्तामें लीन हो जाती है और स्वयं परमात्मस्वरूप हो जाता है।

जबतक साधक और साधनकी एकता नहीं होती, तबतक साधन छूटता रहता है, अखण्ड नहीं रहता। जब साधकपन अर्थात् अहंभाव मिट जाता है, तब साधन साध्यरूप ही हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें साधन और साध्य—दोनोंमें नित्य एकता है।

‘ज्ञाननिर्धूतकल्पषाः’ —‘ज्ञान अर्थात् सत्-असत्के विवेककी वास्तविक जागृति होनेपर असत्की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। असत्के सम्बन्धसे ही पाप-पुण्यरूप कल्पष होता है, जिनसे मनुष्य बँधता है। असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर पाप-पुण्य मिट जाते हैं।

‘गच्छन्त्यपुनरावृत्तिम्’ —‘असत्का संग ही पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म-) का कारण है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य