श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ५
सदसद्योनिजन्मसु' (गीता १३।२१)। असत्का संग
सर्वथा मिटनेपर पुनरावृत्तिका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।
जो वस्तु एकदेशीय होती है, उसीका आना-जाना होता
है। जो वस्तु सर्वत्र परिपूर्ण है, वह कहाँसे आये और कहाँ
जाय ? परमात्मा सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, परिस्थिति आदिमें
एकरस परिपूर्ण रहते हैं। उनका कहीं आना-जाना नहीं होता।
इसलिये जो महापुरुष परमात्मस्वरूप ही हो जाते हैं, उनका
भी कहीं आना-जाना नहीं होता। श्रुति कहती है—
'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति'
(बृहदारण्यक० ४। ४। ६)
'उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही
होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।'
उसके कहलानेवाले शरीरको लेकर ही यह कहा जाता
है कि उसका पुनर्जन्म नहीं होता। वास्तवमें यहाँ 'गच्छन्ति'
पदका तात्पर्य है—वास्तविक बोध होना, जिसके होते ही
नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव—अस्वाभाविकतामें स्वाभाविकताकी भावना मिटनेपर एक परमात्माके सिवाय अन्य किसीकी
स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती और साधक परमात्मस्वरूप ही हो जाता है, जो कि वास्तवमें स्वतःसिद्ध है। अतः उसके
पुनः संसार-बन्धनमें आनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता—'सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' (गीता १४। २)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित साधनद्वारा सिद्ध हुए महापुरुषका ज्ञान व्यवहारकालमें कैसा रहता है—इसे आगेके
श्लोकमें बताते हैं।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
पण्डिताः = ज्ञानी महापुरुष
विद्याविनय-
सम्पन्ने = विद्या-
विनययुक्त
ब्राह्मणे = ब्राह्मणमें
च = और
श्वपाके = चाण्डालमें
च = तथा
गवि = गाय,
हस्तिनि = हाथी (एवं)
शुनि = कुत्तेमें
एव = भी
समदर्शिनः = समरूप
परमात्माको
देखनेवाले होते हैं।
व्याख्या—'विद्याविनयसम्पन्ने ................. पण्डिताः
समदर्शिनः'—यहाँ ब्राह्मणके लिये दो विशेषण दिये गये
हैं—विद्यायुक्त और विनययुक्त अर्थात् ऐसा ब्राह्मण जो
विद्वान् भी है और विनम्र स्वभाववाला (ब्राह्मणपनके
अभिमानसे रहित) भी है। ब्राह्मण होनेसे वह जातिसे तो
ऊँचा है ही, साथ-ही-साथ विद्या और विनयसे भी सम्पन्न
है—यह ब्राह्मणत्वकी पूर्णता है। जहाँ पूर्णता होती है, वहाँ
अभिमान नहीं रहता। अभिमान वहीं रहता है, जहाँ पूर्णता
नहीं होती।
ब्राह्मण और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें
व्यवहारकी विषमता अनिवार्य है। इनमें समान बर्ताव शास्त्र
भी नहीं कहता, उचित भी नहीं और कर सकते भी नहीं।
जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है,
न कि चाण्डालका; दूध गायका ही पीया जाता है, न कि
कुतियाका; सवारी हाथीकी ही हो सकती है, न कि
कुत्तेकी। इन पाँचों प्राणियोंका उदाहरण देकर भगवान् यह
कह रहे हैं कि इनमें व्यवहारकी समता सम्भव न होनेपर
भी तत्त्वतः सबमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है।
महापुरुषोंकी दृष्टि उस परमात्मतत्त्वपर ही सदा-सर्वदा
रहती है। इसलिये उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती।
यहाँ एक शंका हो सकती है कि दृष्टि विषम हुए
बिना व्यवहारमें भिन्नता कैसे होगी ? इसका समाधान यह
है कि अपने शरीरके सब अंगों (मस्तक, पैर, हाथ, गुदा
आदि) में हमारी दृष्टि अर्थात् अपनेपन और हितकी
भावना समान रहती है, फिर भी हम उनके व्यवहारमें भेद
रखते हैं; जैसे—किसीको पैर लग जाय तो क्षमा-याचना
करते हैं, पर किसीको हाथ लग जाय तो क्षमा-याचना नहीं
करते। प्रणाम मस्तक और हाथोंसे करते हैं, पैरोंसे नहीं।
गुदासे हाथ लगनेपर हाथ धोते हैं, हाथसे हाथ लगनेपर
नहीं। इतना ही नहीं, एक हाथकी अँगुलियोंमें भी व्यवहारमें
भेद रहता है। किसीको तर्जनी अँगुली दिखाने और अँगूठा
दिखानेका भेद तो सब जानते ही हैं। इस प्रकार शरीरके
भिन्न-भिन्न अंगोंके व्यवहारमें तो भेद होता है, पर
आत्मीयतामें भेद नहीं होता। इसलिये शरीरके किसी भी