श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २९ ]
- साधक-संजीवनी *
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गया है, उसपर किसी भी घटना, परिस्थिति, निन्दा-स्तुति, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जीवन-मरण आदिका किंचिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।
'सदा मुक्त एव' पदोंका तात्पर्य है कि वास्तवमें साधक
परिशिष्ट भाव —बाहरके पदार्थोंको बाहर ही छोड़नेका तात्पर्य है—स्वयंको शरीरसे अलग कर लेना कि शरीर में नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है और मेरे लिये नहीं है। ये तीन बातें प्रत्येक साधकको माननी ही पड़ेंगी, चाहे वह किसी भी योगमार्गसे क्यों न चले। शरीरके साथ अपना कोई सम्बन्ध न मानें तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है।
पहले चौबीसवें श्लोकमें 'अन्तः' शब्द आया था, इसलिये यहाँ 'बाह्य' शब्द दिया है। वास्तवमें बाह्य कोई वस्तु नहीं है, प्रत्युत केवल वृत्ति है। 'बाह्य' शब्दका प्रयोग दूसरी सत्ता मानकर ही होता है, जबकि वास्तवमें सत्ता एक ही है। अतः 'स्पशान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्' पदोंका तात्पर्य है कि एक तत्त्वके सिवाय दूसरी किसी सत्ताको मान्यता न रहे।
सम्बन्ध— भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठाका वर्णन करके दोनोंके लिये उपयोगी ध्यानयोगका वर्णन किया। अब सुगमतापूर्वक कल्याण करनेवाली भगवनिष्ठाका वर्णन करते हैं।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥
| माम् | = मुझे | लोकोंका महान् | दयालु और |
|---|---|---|---|
| यज्ञतपसाम् | = सब यज्ञों और तपोंका | ईश्वर (तथा) | प्रेमी) |
| भोक्तारम् | = भोक्ता, | सर्वभूतानाम् = सम्पूर्ण | ज्ञात्वा = जानकर (भक्त) |
| सर्वलोकमहेश्वरम्=सम्पूर्ण | प्राणियोंका | शान्तिम् = शान्तिको | |
| सुहृदम् = सुहृद (स्वार्थरहित) | मृच्छति = प्राप्त हो जाता है। |
व्याख्या—****'भोक्तारं यज्ञतपसाम्' —जब मनुष्य कोई शुभ कर्म करता है, तब वह जिनसे शुभ कर्म करता है, उन शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिको अपना मानता है और जिसके लिये शुभ कर्म करता है, उसे उस कर्मका भोक्ता मानता है; जैसे—किसी देवताकी पूजा की तो उस देवताको पूजारूप कर्मका भोक्ता मानता है; किसीकी सेवा की तो उसे सेवारूप कर्मका भोक्ता मानता है; किसी भूखे व्यक्तिको अन्न दिया तो उसे अन्नका भोक्ता मानता है, आदि। इस मान्यताको दूर करनेके लिये भगवान् उपर्युक्त पदोंमें कहते हैं कि वास्तवमें सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका भोक्ता मैं ही हूँ। कारण कि प्राणिमात्रके हृदयमें भगवान् ही विद्यमान हैं*। इसलिये किसीका पूजन करना, किसीको अन्न-जल देना, किसीको मार्ग बताना आदि जितने भी शुभ कर्म हैं, उन सबका भोक्ता भगवान्को ही मानना चाहिये। लक्ष्य भगवान्पर ही रहना चाहिये, प्राणीपर नहीं।
नवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता बताया है—'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता'
दूसरी बात यह है कि जिनसे शुभ कर्म किये जाते हैं, वे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदि अपने नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्के हैं। उनको अपना मानना भूल ही है। उनको अपना मानकर अपने लिये शुभ कर्म करनेसे मनुष्य स्वयं उन कर्मोंका भोक्ता बन जाता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम सम्पूर्ण शुभ कर्मोंको अपने लिये कभी मत करो, केवल मेरे लिये ही करो। ऐसा करनेसे तुम उन कर्मोंके फलभागी नहीं बनोगे और तुम्हारा कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा।
कामनासे ही सम्पूर्ण अशुभ कर्म होते हैं। कामनाका त्याग करके केवल भगवान्के लिये ही सब कर्म करनेसे अशुभ कर्म तो स्वरूपसे ही नहीं होते तथा शुभ कर्मोंसे अपना सम्बन्ध नहीं रहता। इस प्रकार सम्पूर्ण कर्मोंसे सर्वथा
- 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' (गीता १३।१७), 'सर्वस्य चाहं हृदि संनिष्ठः' (गीता १५।१५), 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशुऽर्जुन तिष्ठति' (गीता १८।६१)।