भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ५ ]

सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है।

‘सर्वलोकमहेश्वरम्’—भिन-भिन लोकोंके भिन-भिन ईश्वर हो सकते हैं; किन्तु वे भी भगवान्के अधीन ही हैं। भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, इसलिये यहाँ ‘सर्वलोकमहेश्वरम्’ पद दिया गया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण सृष्टिके एकमात्र स्वामी भगवान् ही हैं, फिर कोई ईमानदार व्यक्ति सृष्टिकी किसी भी वस्तुको अपनी कैसे मान सकता है?

शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, स्त्री, पुत्र, धन, जमीन, मकान आदिको अपने मानते हुए प्रायः लोग कहा करते हैं कि भगवान् ही सारे संसारके मालिक हैं। परन्तु ऐसा कहना समझदारी नहीं है; क्योंकि मनुष्य जबतक शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिको अपने मानता है, तबतक भगवान्को सारे संसारका स्वामी कहना अपने-आपको धोखा देना ही है। कारण कि यदि सभी लोग शरीरादि पदार्थोंको अपने-अपने ही मानते रहें तो बाकी क्या रहा, जिसके स्वामी भगवान् कहलायें? अर्थात् भगवान्के हिस्सेमें कुछ नहीं बचा। इसलिये ‘सब कुछ भगवान्का है’—ऐसा वही कह सकता है, जो शरीरादि किसी भी पदार्थको अपना नहीं मानता। जो किसी भी वस्तुको अपनी मानता है, वह वास्तवमें भगवान्को यथार्थरूपसे सर्वलोकमहेश्वर मानता ही नहीं। वह जितनी वस्तुओंको अपनी मानता है, उतने अंशमें भगवान्को सर्वलोकमहेश्वर माननेमें कमी रहती है।

मनुष्यको शरीरादि पदार्थोंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है, अपने माननेका बिलकुल नहीं। इन पदार्थोंको अपने न मानकर केवल भगवान्के ही मानते हुए उन्हींकी सेवामें लगा देनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है।

‘सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमुच्छति’—जो सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, वे बिना कारण स्वाभाविक ही प्राणिमात्रका हित करनेवाले, प्राणिमात्रकी रक्षा करनेवाले तथा प्राणिमात्रसे प्रेम करनेवाले हैं और ऐसा हितैषी, रक्षक तथा प्रेमी दूसरा कोई नहीं है—इस प्रकार जान’ लेनेसे परमशान्ति प्राप्त हो जाती है; क्योंकि वे वास्तवमें ऐसे ही हैं। महान् शक्तिशाली भगवान् बिना किसी प्रयोजनके हमारे परम सुहृद हैं, फिर भय, चिन्ता, उद्वेग,

अशान्ति आदि कैसे हो सकते हैं?

जीवमात्रका बिना कारण हित करनेवाले दो ही हैं—भगवान् और उनके भक्त। भगवान्को किसीसे कुछ भी पाना है ही नहीं—‘नानापातमवाप्तव्यम्’ (गीता ३।२२), इसलिये वे स्वाभाविक ही सबके सुहृद हैं। भक्त भी अपने लिये किसीसे कुछ भी नहीं चाहता और सबका हित चाहता तथा हित करता है, इसलिये वह भी सबका सुहृद होता है—‘सुहृदः सर्वदेहिनाम्’ (श्रीमद्भा० ३।२५।२१)। भक्तोंमें जो सुहृता आती है, वह भी मूलतः भगवान्से ही आती है।

भगवान् सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंके भोक्ता हैं, सम्पूर्ण लोकोंके महान् ईश्वर हैं तथा हमारे परम सुहृद हैं—इन तीनों बातोंमेंसे अगर एक बात भी दृढ़तासे मान लें, तो भगवत्प्राप्तिरूप परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है, फिर तीनों ही बातें मान लें तो कहना ही क्या है!

अपने लिये कुछ भी चाहना, किसी भी वस्तुको अपनी मानना और भगवान्को अपना न मानना—ये तीनों बातें भगवत्प्राप्तिमें मुख्य बाधक हैं। भगवान् ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’ पदोंसे कहते हैं कि अपने लिये कुछ भी न चाहे और कुछ भी न करे; ‘सर्वलोकमहेश्वरम्’ पदसे कहते हैं कि अपना कुछ भी न माने अर्थात् सुखकी इच्छाका और वस्तु-व्यक्तियोंके आधिपत्यका त्याग कर दे तथा ‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ पदोंसे कहते हैं कि केवल मेरेको ही अपना माने, अन्य किसी वस्तु-व्यक्ति आदिको अपना न माने। इन तीनोंमेंसे एक बात भी मान लेनेसे शेष बातें स्वतः आ जाती हैं और भगवत्प्राप्ति हो जाती है।

अपने लिये सुखकी इच्छाका त्याग तभी होता है, जब मनुष्य किसी भी प्राणी-पदार्थको अपना न माने। जबतक किसी भी पदार्थको अपना मानता है, तबतक वह बदलेमें सुख चाहेगा ही। सुखकी इच्छाके त्यागसे ममताका त्याग और ममताके त्यागसे सुखकी इच्छाका त्याग होता है। जब सब वस्तु-व्यक्तियोंमें ममताका त्याग हो जाता है, तब एकमात्र भगवान् ही अपने रह जाते हैं। जो किसीको भी अपना मानता है, वह वास्तवमें भगवान्को सर्वथा अपना नहीं मानता, कहनेको चाहे कहता रहे कि भगवान् मेरे हैं।

१-यहाँ जाननेका अर्थ है—दृढ़तापूर्वक मानना। मानना जानना ही है।

जाननेसे कमजोर नहीं होता। इसलिये दृढ़तासे मान लेना भी

२-हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥ (मानस ७।४७।३)