भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक २९ ]

  • साधक-संजीवनी *

४०९

माने हुए सम्बन्धका अभाव होनेसे भगवान्से अपनी सन्ची आत्मीयता जाग्रत् हो जाती है। तात्पर्य यह निकला कि चाहे मुखकी इच्छाका त्याग हो जाय, चाहे ममताका अभाव हो जाय और चाहे भगवान्में सन्ची आत्मीयता हो जाय; इसके होते ही परमशान्तिका अनुभव हो जायगा। कारण कि एक भी भाव दृढ़ होनेपर अन्य भाव भी साथमें आ ही जाते हैं।

एक तो कर्म करना चाहिये और दूसरा, कर्म करनेकी विद्या आनी चाहिये। जब मनुष्य कर्म तो करता है, पर कर्म करनेकी विद्या नहीं जानता अथवा कर्म करनेकी विद्या तो जानता है, पर कर्म नहीं करता, तब उसके द्वारा

सुचाररूपसे कर्म नहीं होते। इसलिये भगवान्ने तीसरे अध्यायमें कर्म करनेपर विशेष जोर दिया है, पर साथमें कर्मोंको जाननेकी बात भी कही है; और चौथे अध्यायमें कर्मोंका तत्त्व जाननेपर विशेष जोर दिया है, और साथमें कर्म करनेकी बात भी कही है। पाँचवें अध्यायमें यद्यपि कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनोंके द्वारा कल्याण होनेकी बात आयी है, तथापि भगवान्ने सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ बताया है। इस अध्यायमें भगवान्ने क्रमपूर्वक कर्मयोग और सांख्ययोगका वर्णन करके फिर संक्षेपसे ध्यानयोगका वर्णन किया और अन्तमें संक्षेपसे भक्तियोगका वर्णन किया, जो भगवान्का मुख्य ध्येय है।

ॐ तत्सादिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन््यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवनाओंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'कर्मसन््यासयोग' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनोंका वर्णन होनेसे इस पाँचवें अध्यायका नाम 'कर्मसन््यासयोग' है।

पाँचवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ पञ्चमोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके चार, श्लोकोंके तीन सौ बावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ बहतर है।

(२) इस अध्यायमें 'अथ पञ्चमोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके नौ सौ अट्ठाईस और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार

सम्पूर्ण अक्षरोंका योग नौ सौ छियानबे है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें दो 'उवाच' हैं—एक 'अर्जुन उवाच' और एक 'श्रीभगवानुवाच'।

पाँचवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके उन्तीस श्लोकोंमेंसे—तेरहवें और उन्तीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; और बाईसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष छब्बीस श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।