भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

४२५

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥

जितात्मनः | =जिसने अपने- आपपर विजय कर ली है, उस | दुःखेषु | =शीत-उष्ण ( अनुकूलता- प्रतिकूलता), सुख-दुःख | मानापमानयोः= मान-अपमानमें ---|---|---|---|--- शीतोष्णसुख- | | तथा | = तथा | प्रशान्तस्य = निर्विकार मनुष्यको | | | | परमात्मा = परमात्मा | | | | समाहितः = नित्यप्राप्त हैं ।

व्याख्या —[छठे श्लोकमें ‘अनात्मनः’ पद और यहाँ ‘जितात्मनः’ पद आया है। इसका तात्पर्य है कि जो ‘अनात्मा’ होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंके साथ ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन करके अपने साथ शत्रुताका बर्ताव करता है और जो ‘जितात्मा’ होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर अपने साथ मित्रताका बर्ताव करता है। इस तरह अनात्मा मनुष्य अपना पतन करता है और जितात्मा मनुष्य अपना उद्धार करता है।]

‘जितात्मनः’—जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि किसी भी प्राकृत पदार्थकी अपने लिये सहायता नहीं मानता और उन प्राकृत पदार्थोंके साथ किंचिन्मात्र भी अपनेपनका सम्बन्ध नहीं जोड़ता, उसका नाम ‘जितात्मा’ है। जितात्मा मनुष्य अपना तो हित करता ही है, उसके द्वारा दुनियाका भी बड़ा भारी हित होता है।

‘शीतोष्णसुखदुःखेषु प्रशान्तस्य’—यहाँ ‘शीत’ और ‘उष्ण’—इन दोनों पदोंपर गहरा विचार करें तो ये सरदी और गरमीके वाचक सिद्ध नहीं होते; क्योंकि सरदी और गरमी—ये दोनों केवल त्वगिन्द्रियोंके विषय हैं। अगर जितात्मा पुरुष केवल एक त्वगिन्द्रियोंके विषयमें ही शान्त रहेगा तो श्रवण, नेत्र, रसना और श्राण—इन इन्द्रियोंके विषय बाकी रह जायेंगे, अर्थात् इनमें उसका प्रशान्त रहना बाकी रह जायगा तो उसमें पूर्णता नहीं आयेगी। अतः यहाँ ‘शीत’ और ‘उष्ण’ पद अनुकूलता और प्रतिकूलताके वाचक हैं।

शीत अर्थात् अनुकूलताकी प्राप्ति होनेपर भीतरमें एक तरहकी शीतलता मालूम देती है और उष्ण अर्थात् प्रतिकूलताकी प्राप्ति होनेपर भीतरमें एक तरहका सन्ताप मालूम देता है। तात्पर्य है कि भीतरमें न शीतलता हो और न सन्ताप हो, प्रत्युत एक समान शान्ति बनी रहे अर्थात् इन्द्रियोंके अनुकूल-प्रतिकूल विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होनेपर भीतरकी शान्ति भंग न हो। कारण कि भीतरमें जो स्वतःसिद्ध शान्ति है, वह अनुकूलतामें

राजी होनेसे और प्रतिकूलतामें नाराज होनेसे भंग हो जाती है। अतः शीत-उष्णमें प्रशान्त रहनेका अर्थ हुआ कि बाहरसे होनेवाले संयोग-वियोगका भीतर असर न पड़े।

अब यह विचार करना चाहिये कि ‘सुख’ और ‘दुःख’ पदसे क्या अर्थ लें। सुख और दुःख दो-दो तरहके होते हैं—

(१) साधारण लौकिक दृष्टिसे जिसके पास धन-सम्पत्ति-वैभव, स्त्री-पुत्र आदि अनुकूल सामग्रीकी बहुलता हो, उसको लोग ‘सुखी’ कहते हैं। जिसके पास धनसम्पत्ति-वैभव, स्त्री-पुत्र आदि अनुकूल सामग्रीका अभाव हो, उसको लोग ‘दुःखी’ कहते हैं।

(२) जिसके पास बाहरकी सुखदायी सामग्री नहीं है, वह भोजन कहाँ करेगा—इसका पता नहीं है, पासमें पहननेके लिये पूरे कपड़े नहीं हैं, रहनेके लिये स्थान नहीं है, साथमें कोई सेवा करनेवाला नहीं है—ऐसी अवस्था होनेपर भी जिसके मनमें दुःख-सन्ताप नहीं होता और जो किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी आवश्यकताका अनुभव भी नहीं करता, प्रत्युत हर हालतमें बड़ा प्रसन्न रहता है, वह ‘सुखी’ कहलाता है। परन्तु जिसके पास बाहरकी सुखदायी सामग्री पूरी है, भोजनेके लिये बढिया-से-बढिया पदार्थ हैं, पहननेके लिये बढिया-से-बढिया कपड़े हैं, रहनेके लिये बहुत बढिया मकान है, सेवाके लिये कई नौकर हैं—ऐसी अवस्था होनेपर भी भीतरमें रात-दिन चिन्ता रहती है कि मेरी यह सामग्री कहीं नष्ट न हो जाय! यह सामग्री कायम कैसे रहे, बढ़े कैसे? आदि। इस तरह बाहरकी सामग्री रहनेपर भी जो भीतरसे दुःखी रहता है, वह ‘दुःखी’ कहलाता है।

उपर्युक्त दो प्रकारसे सुख-दुःख कहनेका तात्पर्य है—बाहरकी सामग्रीको लेकर सुखी-दुःखी होना और भीतरकी प्रसन्नता-खिन्नताको लेकर सुखी-दुःखी होना। गीतामें जहाँ सुख-दुःखमें ‘सम’ होनेकी बात आयी है, वहाँ बाहरकी