श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
सामग्रीमें सम रहनेके लिये कहा गया है; जैसे—‘समदुःखसुखः’ (१२।१३; १४।२४), ‘शीतोष्ण-सुखदुःखेषु समः’ (१२।१८) आदि। जहाँ सुख-दुःखसे ‘रहित’ होनेकी बात आयी है, वहाँ भीतरकी प्रसन्नता और खिन्नतासे रहित होनेके लिये कहा गया है; जैसे—‘द्वन्द्वैविमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः’ (१५।५) आदि। जहाँ सुख-दुःखमें सम होनेकी बात है, वहाँ सुख-दुःखकी सत्ता तो है, पर उसका असर नहीं पड़ता और जहाँ सुख-दुःखसे रहित होनेकी बात है, वहाँ सुख-दुःखकी सत्ता ही नहीं है। इस तरह चाहे बाहरकी सुखदायी-दुःखदायी सामग्री प्राप्त होनेपर भीतरसे सम होना कहेँ, चाहे भीतरसे सुख-दुःखसे रहित होना कहेँ—दोनोंका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि सम भी भीतरसे है और रहित भी भीतरसे है।
यहाँ शीत-उष्ण और सुख-दुःखमें प्रशान्त (सम) रहनेकी बात कही गयी है। अनुकूलतासे सुख होता है—‘अनुकूलवेदीन्यं सुखम्’ और प्रतिकूलतासे दुःख होता है—‘प्रतिकूलवेदीन्यं दुःखम्।’ इसलिये अगर शीत-उष्णका अर्थ अनुकूलता-प्रतिकूलता लिया जाय तो सुख-दुःख कहना व्यर्थ हो जायगा और सुख-दुःख कहनेसे शीत-उष्ण कहना व्यर्थ हो जायगा; क्योंकि सुख-दुःख पद शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) के ही वाचक हैं। फिर यहाँ शीत-उष्ण और सुख-दुःख पदोंकी सार्थकता कैसे सिद्ध होगी ? इसके लिये ‘शीत-उष्ण’ पदसे प्रारब्धके अनुसार आनेवाली अनुकूलता-प्रतिकूलताको लिया जाय और ‘सुख-दुःख’ पदसे वर्तमानमें किये जानेवाले क्रियमाण कर्मोंकी पूर्ति-अपूर्ति तथा उनके तात्कालिक फलकी सिद्धि-असिद्धिको लिया जाय तो इन पदोंकी सार्थकता सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह निकला कि चाहे प्रारब्धकी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति हो, चाहे क्रियमाणकी तात्कालिक सिद्धि-असिद्धि हो—इन दोनोंमें ही प्रशान्त (निर्विकार) रहे।
इस प्रकरणके अनुसार भी उपर्युक्त अर्थ ठीक दीखता है। कारण कि इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें आये ‘नेन्द्रियार्थेषु (अनुषज्जते)’ पदको यहाँ ‘शीत-उष्ण’ पदसे कहा गया है और ‘न कर्मसु अनुषज्जते’ पदोंको यहाँ सुख-दुःख पदसे कहा गया है अर्थात् वहाँ प्रारब्धके अनुसार आयी हुई अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों और क्रियमाण कर्मोंकी पूर्ति-अपूर्ति तथा तात्कालिक फलकी सिद्धि-असिद्धिमें आसक्तिरहित होनेकी बात आयी है और यहाँ उन दोनोंमें प्रशान्त होनेकी बात आयी है।
‘तथा मानापमानयोः’—ऐसे ही जो मान-अपमानमें भी प्रशान्त है। अब यहाँ कोई शंका करे कि मान-अपमान भी तो प्रारब्धका फल है; अतः यह शीत-उष्ण (अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति) के ही अन्तर्गत आ गया। फिर इसको अलगसे क्यों लिया गया ? मान-अपमानको अलगसे इसलिये लिया गया है कि शीत-उष्ण तो दैवेच्छा-(अनिच्छा-) कृत प्रारब्धका फल है, पर मान-अपमान परेच्छाकृत प्रारब्धका फल है। यह परेच्छाकृत प्रारब्ध मान-बढ़ाईमें भी होता है और निन्दा-स्तुति आदिमें भी होता है। इसलिये ‘मान-अपमान’ पदमें निन्दा-स्तुति लेना चाहें, तो ले सकते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगी दूसरोंके द्वारा किये गये मान-अपमानमें भी प्रशान्त रहता है अर्थात् उसकी शान्तिमें किंचिन्मात्र भी फर्क नहीं पड़ता।
मान-अपमानमें प्रशान्त रहनेका उपाय—साधकका कोई मान-आदर करे, तो साधक यह न माने कि यह मेरे कर्मोंका, मेरे गुणोंका, मेरी अच्छाईका फल है, प्रत्युत यही माने कि यह तो मान-आदर करनेवालेकी सज्जनता है, उदारता है। उसकी सज्जनताको अपना गुण मानना ईमानदारी नहीं है। अगर कोई अपमान कर दे, तो ऐसा माने कि यह मेरे कर्मोंका ही फल है। इसमें अपमान करनेवालेका कोई दोष नहीं है, प्रत्युत वह तो दयाका पात्र है; क्योंकि उस बेचारेने मेरे पापोंका फल भुगतानेमें निमित्त बनकर मेरेको शुद्ध कर दिया है। इस तरह माननेसे साधक मान-अपमानमें प्रशान्त, निर्विकार हो जायगा। अगर वह मानको अपना गुण और अपमानको दूसरोंका दोष मानेगा, तो वह मान-अपमानमें प्रशान्त नहीं हो सकेगा।
‘परमात्मा समाहितः’—शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमान—इन छहोंमें प्रशान्त, निर्विकार रहनेसे सिद्ध होता है कि उसको परमात्मा प्राप्त है। कारण कि भीतरसे विलक्षण आनन्द मिले बिना बाहरकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धि-असिद्धि और मान-अपमानमें वह प्रशान्त नहीं रह सकता। वह प्रशान्त रहता है, तो उसको एकरस रहनेवाला विलक्षण आनन्द मिल गया है। इसलिये गीताने जगह-जगह कहा है कि ‘जिन पुरुषोंका मन साम्यावस्थामें स्थित है, उन पुरुषोंने इस जीवित-अवस्थामें ही संसारको जीत लिया है’ (पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक लाभका होना मान ही नहीं सकता और जिसमें स्थित होनेपर बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं हो सकता (छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), आदि-आदि।