श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —जिसकी आत्मा मित्रकी तरह है अर्थात् जिसका शरीरमें मैं-पन और मेरा-पन नहीं है, वह अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दुःख और मान-अपमान प्राप्त होनेपर भी सम, निर्विकार रहता है। ऐसा मनुष्य सिद्ध कर्मयोगी है अर्थात् उसको परमात्माका अनुभव हो चुका है—ऐसा मानना चाहिये। कारण कि अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दुःख और मान-अपमान तो आते-जाते हैं, पर परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों रहता है।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा = जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है,
कूटस्थः = जो कूटकी तरह निर्विकार है, | विजितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय है (और) | वाला है— ---|---|--- समलोष्टाश्मकाञ्चनः = मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धि- | इति = ऐसा योगी = योगी युक्तः = युक्त (योगारूढ़) उच्यते = कहा जाता है।
व्याख्या —‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’—यहाँ कर्मयोगका प्रकरण है; अतः यहाँ कर्म करनेकी जानकारीका नाम ‘ज्ञान’ है और कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें सम रहनेका नाम ‘विज्ञान’ है।
स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रिया, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला चिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली समाधि—इन तीनोंको अपने लिये करना ‘ज्ञान’ नहीं है। कारण कि क्रिया, चिन्तन, समाधि आदि मात्र कर्मोंका आरम्भ और समाप्ति होती है तथा उन कर्मोंसे मिलनेवाले फलका भी आदि और अन्त होता है। परन्तु स्वयं परमात्माका अंश होनेसे नित्य रहता है। अतः अनित्य कर्म और फलसे इस नित्य रहनेवालेको क्या तृप्त मिलेगी? जड़के द्वारा चेतनको क्या तृप्त मिलेगी? ऐसा ठीक अनुभव हो जाय कि कर्मोंके द्वारा मेरेको कुछ भी नहीं मिल सकता, तो यह कर्मोंको करनेका ‘ज्ञान’ है। ऐसा ज्ञान होनेपर वह कर्मोंकी पूर्ति-अपूर्तिमें और पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहेगा—यह ‘विज्ञान’ है। इस ज्ञान और विज्ञानसे वह स्वयं तृप्त हो जाता है। फिर उसके लिये करना, जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता।
‘कूटस्थः’ —*—कूट (अहरन) एक लौह-पिण्ड होता है, जिसपर लोहा, सोना, चाँदी आदि अनेक रूपोंमें गढ़े जाते हैं, पर वह एकरूप ही रहता है। ऐसे ही सिद्ध महापुरुषके सामने तरह-तरहकी परिस्थितियाँ आती हैं, पर वह कूटकी तरह ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है।
‘विजितेन्द्रियः’ —‘कर्मयोगके साधकको इन्द्रियोंपर विशेष ध्यान देना पड़ता है; क्योंकि कर्म करनेमें प्रवृत्ति होनेके कारण उसके कहीं-न-कहीं राग-द्वेष होनेकी पूरी सम्भावना रहती है। इसलिये गीताने कहा है—‘सर्वकर्म-फलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्’ (१२।११) अर्थात् कर्मफलके त्यागमें जितेन्द्रियता मुख्य है। इस तरह साधन-अवस्थामें इन्द्रियोंपर विशेष खयाल रखनेवाला साधक सिद्ध-अवस्थामें स्वतः ‘विजितेन्द्रिय’ होता है।
‘समलोष्टाश्मकाञ्चनः’ —‘लोष्ट’ नाम मिट्टीके ढेलेका, ‘अश्म’ नाम पत्थरका और ‘कांचन’ नाम स्वर्णका है—इन सबमें सिद्ध कर्मयोगी सम रहता है। सम रहनेका अर्थ यह नहीं है कि उसको मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णका ज्ञान नहीं होता। उसको यह देला है, यह पत्थर है, यह स्वर्ण है—ऐसा ज्ञान अच्छी तरहसे होता है और उसका व्यवहार भी उनके अनुरूप जैसा होना चाहिये, वैसा ही होता है अर्थात् वह स्वर्णको तिजोरोंमें सुरक्षित रखता है और ढेले तथा पत्थरको बाहर ही पड़े रहने देता है। ऐसा होनेपर भी स्वर्ण चला जाय, धन चला जाय तो उसके मनपर कोई असर नहीं पड़ता और स्वर्ण मिल जाय, तो भी उसके मनपर कोई असर नहीं पड़ता अर्थात् उनके आने-जानेसे, बनने-बिगड़नेसे उसको हर्ष-शोक नहीं होते—यही उसका सम रहना है। उसके लिये जैसे पत्थर है, वैसे ही सोना है; जैसे सोना है, वैसे ही देला है और जैसे देला है वैसे ही सोना है।
- जो कूट- (अहरन-) की तरह स्थित रहता है, उसको ‘कूटस्थ’ कहते हैं—‘कूटवत् तिष्ठतीति कूटस्थः।’