भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 430

श्लोक १]

  • साधक-संजीवनी *

४२९

व्यवहार करनेमें तो अन्तर होता है और अन्तर होना ही चाहिये, पर उन दोनोंकी हितैषितामें अर्थात् उनका हित करनेमें, दुःखके समय उनकी सहायता करनेमें उसके अन्तःकरणमें कोई विषमभाव, पक्षपात नहीं होता। 'सबमें एक परमात्मा हैं, ऐसा स्वयंमें होता है, बुद्धिमें सबकी हितैषिता होती है, मनमें सबका हितचिन्त होता है, और व्यवहारमें परता-ममता छोड़कर सबके सुखका सम्पादन होता है।

जहाँ विषमबुद्धि अधिक रहनेकी सम्भावना है, वहाँ भी समबुद्धि होना विशेष है। वहाँ समबुद्धि हो जाय, तो फिर सब जगह समबुद्धि हो जाती है।

इस श्लोकमें भाव, गुण, आचरण आदिकी भिन्नताको लेकर नौ प्रकारके प्राणियोंका नाम आया है। इन प्राणियोंके भाव, गुण, आचरण आदिकी भिन्नताको लेकर उनके साथ बर्ताव करनेमें विषमता आ जाय, तो वह दोषी नहीं है। कारण कि वह बर्ताव तो उनके भाव, आचरण, परिस्थिति आदिके अनुसार ही है और उनके लिये ही है, अपने लिये नहीं। परन्तु उन सबमें परमात्मा ही परिपूर्ण हैं—इस भावमें कोई फर्क नहीं आना चाहिये और अपनी तरफसे सबकी सेवा बन जाय—इस भावमें भी कोई अन्तर नहीं आना चाहिये।

तात्पर्य यह हुआ कि जिस किसी मार्गसे जिसको तत्त्वबोध हो जाता है, उसकी सब जगह समबुद्धि हो जाती है अर्थात् किसी भी जगह पक्षपात न होकर समान रीतिसे सेवा और हितका भाव हो जाता है। जैसे भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके सुहृद् हैं—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता ५। २९), ऐसे ही वह सिद्ध कर्मयोगी भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है—'सुहृदः सर्वदेहिनाम्' (श्रीमद्भगवद् गीता ३। २५। २१)।

यहाँ सुहृद्, मित्र आदि नाम लेनेके बाद अन्तमें 'साधुव्यपि च पापेषु' कहनेका तात्पर्य है कि जिसकी श्रेष्ठ आचरणवालों और निकृष्ट आचरणवालोंमें समबुद्धि हो जायगी, उसकी सब जगह समबुद्धि हो जायगी। कारण कि संसारमें आचरणोंकी ही मुख्यता है, आचरणोंका ही असर पड़ता है, आचरणोंसे ही मनुष्यकी परीक्षा होती है, आचरणोंसे ही श्रद्धा-अश्रद्धा होती है, स्वाभाविक दृष्टि आचरणोंपर ही पड़ती है और आचरणोंसे ही सद्भाव-दुर्भाव पैदा होते हैं। भगवान्ने भी 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तनदेवेतरो जनः' (३। २१) कहकर आचरणकी बात मुख्य बतायी है। इसलिये श्रेष्ठ आचरणवाले और

निकृष्ट आचरणवाले—इन दोनोंमें समता हो जायगी, तो फिर सब जगह समता हो जायगी, इन दोनोंमें भी श्रेष्ठ आचरणवाले पुरुषोंमें तो सद्भाव होना सुगम है, पर पाप-आचरणवाले पुरुषोंमें सद्भाव होना कठिन है। अतः भगवान्ने यहाँ 'अपि च' दो अव्ययोंका प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है 'और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी' जिसकी समबुद्धि है, वह श्रेष्ठ है।

यहाँ दीखनेवालोंको लेकर देखनेवालेकी स्थितिका वर्णन किया गया है; अतः 'समबुद्धिविशिष्यते' कहा है। देखनेवालेमें जो समबुद्धि होती है, वह हरेको दीखती नहीं, पर साधकके लिये तो वही मुख्य है; क्योंकि साधक 'मैं अपनी दृष्टिसे कैसा हूँ', ऐसे अपने-आपको देखता है। इसलिये अपने-आपसे अपना उद्धार करनेके लिये कहा गया है (छठे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।

संसारमें प्रायः दूसरोंके आचरणोंपर ही दृष्टि रहती है। साधकको विचार करना चाहिये कि मेरी दृष्टि अपने भावोंपर रहती है या दूसरेके आचरणोंपर? दूसरोंके आचरणोंपर दृष्टि रहनेसे जिस दृष्टिसे अपना कल्याण होता है, वह दृष्टि बंद हो जाती है और अँधेरा हो जाता है। इसलिये दूसरोंके श्रेष्ठ और निकृष्ट आचरणोंपर दृष्टि न रहकर उनका जो वास्तविक स्वरूप है, उसपर दृष्टि रहनी चाहिये। स्वरूपपर दृष्टि रहनेसे उनके आचरणोंपर दृष्टि नहीं रहेगी; क्योंकि स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, जब कि आचरण बदलते रहते हैं। सत्य-तत्त्वपर रहनेवाली दृष्टि भी सत्य होती है। परन्तु जिसकी दृष्टि केवल आचरणोंपर ही रहती है, उसकी दृष्टि असत्पर रहनेसे असत् ही होती है। इसमें भी अशुद्ध आचरणोंपर जिसकी ज्यादा दृष्टि है, उसका तो पतन ही समझना चाहिये। तात्पर्य है कि जो आचरण आदरणीय नहीं है, ऐसे अशुद्ध आचरणोंको जो मुख्यता देता है, वह तो अपना पतन ही करता है। अतः भगवान्ने यहाँ अशुद्ध आचरण करनेवाले पापीमें भी समबुद्धिवालेको श्रेष्ठ बताया है। कारण कि उसकी दृष्टि सत्य-तत्त्वपर रहनेसे उसकी दृष्टिमें सब कुछ परमात्मतत्त्व ही रहता है। फिर आगे चलकर 'सब कुछ' नहीं रहता, केवल परमात्मतत्त्व ही रहता है। उसीकी यहाँ 'समबुद्धिविशिष्यते' पदसे महिमा गायी गयी है।

विशेष बात

गीताका योग 'समता' ही है—'समत्वं योग उच्यते' (२। ४८)। गीताकी दृष्टिसे अगर समता आ गयी तो दूसरे