भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ६ ]

किसी लक्षणकी जरूरत नहीं है अर्थात् जिसको वास्तविक समताकी प्राप्ति हो गयी है, उसमें सभी सदगुण-सदाचार स्वतः आ जायेंगे और उसकी संसारपर विजय हो जायगी (पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। विष्णुपुराणमें ब्रह्मदजीने भी कहा है कि समता भगवान्की आराधना (भजन) है—‘समत्वमाराधनमच्युतस्य’ (१।१७।१०)। इस तरह जिस समताकी असौम, अपार, अनन्त महिमा है, जिसका वर्णन कभी कोई कर ही नहीं सकता, उस समताकी प्राप्तिका उपाय है—बुर्गईरहित होना। बुर्गईरहित होनेका उपाय है—(१) किसीको बुरा न मानें (२) किसीका बुरा न करें, (३) किसीका बुरा न सोचें, (४) किसीमें बुर्गई न देखें, (५) किसीकी बुर्गई न सुनें, (६) किसीकी बुर्गई न कहें। इन छः बातोंका दृढ़तासे पालन करें, तो हम बुर्गईरहित हो जायेंगे। बुर्गईरहित होते ही हमारेमें स्वतः-स्वाभाविक अच्छाई आ जायगी; क्योंकि अच्छाई हमारा स्वरूप है।

अच्छाईको लानेके लिये हम प्रयत्न करते हैं, साधन करते हैं; परन्तु वर्षातक साधन करनेपर भी वास्तविक अच्छाई हमारेमें नहीं आती और साधन करनेपर खुदको भी सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत यही विचार होता है कि इतना साधन करनेपर भी सदगुण-सदाचार नहीं आये। अतः ये

सदगुण-सदाचार आनेके हैं नहीं—ऐसा समझकर हम साधनसे हताश हो जाते हैं। हताश होनेमें मुख्य कारण यही है कि हमने अच्छाईको उद्योगसाध्य माना है और बुर्गईको सर्वथा नहीं छोड़ा है। बुर्गईका सर्वथा त्याग किये बिना आंशिक अच्छाई बुर्गईको बल देती रहती है। कारण कि आंशिक अच्छाईसे अच्छाईका अभिमान होता है और जितनी बुर्गई है, वह सब-की-सब अच्छाईके अभिमानपर ही अवलम्बित है। पूर्ण अच्छाई होनेपर अच्छाईका अभिमान नहीं होता और बुर्गई भी उत्पन्न नहीं होती। अतः बुर्गईका त्याग करनेपर अच्छाई बिना उद्योग किये और बिना चाहे स्वतः आ जाती है। जब अच्छाई हमारेमें आ जाती है, तब हम अच्छे हो जाते हैं। जब हम अच्छे हो जाते हैं, तब हमारे द्वारा स्वाभाविक ही अच्छाई होने लगती है। जब अच्छाई होने लग जाती है, तब सृष्टिके द्वारा स्वाभाविक ही हमारा जीवन-निर्वाह होने लगता है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये हमें परिश्रम नहीं करना पड़ता और दूसरोंका आश्रय भी नहीं लेना पड़ता। ऐसी अवस्थामें हम संसारके आश्रयसे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। संसारके आश्रयसे सर्वथा मुक्त होते ही हमें स्वतःसिद्ध समता प्राप्त हो जाती है और हम कृतकृत्य हो जाते हैं, जीवन्मुक्त हो जाते हैं।

परिशिष्ट भाव —समताका विभाग अलग है और विषमताका विभाग अलग है। परमात्मतत्त्व सम है और संसार विषम है। सिद्ध कर्मयोगीकी विषम व्यवहारमें भी समबुद्धि रहती है। बर्ताव करनेमें जिनसे कभी एकता नहीं हो सकती, एकता करनी भी नहीं चाहिये और एकता कर भी नहीं सकते, उन मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें और सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, साधु तथा पापी व्यक्तियोंमें भी उसकी समबुद्धि रहती है। कारण कि उसको ‘एक परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है’—ऐसा अनुभव हो गया है।

एक सोनेसे बनी हुई विष्णुभगवान्की मूर्ति हो और एक सोनेसे बनी हुई कुत्तेकी मूर्ति हो तो तौलमें बराबर होनेके कारण दोनोंका मूल्य समान होगा। विष्णुभगवान् सर्वश्रेष्ठ एवं परमपूज्य हैं और कुत्ता नीच (अस्पृश्य) एवं अपूज्य है—इस तरह बाहरी रूपको देखें तो दोनोंमें बड़ा भारी फर्क है, पर सोनेको देखें तो दोनोंमें कोई फर्क नहीं! इसी तरह संसारमें कोई मित्र है, कोई शत्रु है; कोई महात्मा है, कोई दुर्गत्मा है; कोई अच्छा है, कोई मन्द है; कोई सज्जन है, कोई दुष्ट है; कोई सदाचारी है, कोई दुराचारी है; कोई धर्मात्मा है, कोई पापी है; कोई विद्वान् है, कोई मूर्ख है—यह सब तो बाहरी दृष्टिसे है, पर तत्त्वसे देखें तो सब-के-सब एक भगवान् ही हैं। एक भगवान् ही अनन्त रूपोंमें प्रकट हुए हैं। जानकार मनुष्य उनको पहचान लेता है, दूसरा नहीं पहचान सकता।

स्नान करते समय शरीरमें साबुन लगाकर दर्पणमें देखें तो शरीर बहुत बुरा, भद्दा दीखेगा। कहीं फफोले दीखेंगे, कहीं लकीरें दीखेंगी। परन्तु ऐसा दीखनेपर भी मनमें दुःख नहीं होगा कि कैसी बीमारी हो गयी! कारण कि भीतर यह भाव रहता है कि यह तो ऊपरसे ऐसा दीखता है, जल डालते ही साफ हो जायगा। ऐसे ही सब परमात्माके स्वरूप हैं, पर ऊपरसे शरीरोंमें उनका अलग-अलग स्वभाव दीखता है। वास्तवमें ऊपरसे दीखनेवाले भी परमात्माके ही स्वरूप हैं, पर अपने राग-द्वेषके कारण वे अलग-अलग दीखते हैं।

जो बात पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें ‘कर्मयोगो विशिष्यते’ पदोंसे कही थी, वही बात यहाँ ‘समबुद्धि-