श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १०]
- साधक-संजीवनी *
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विशिष्यते' पदोंसे कही है। समबुद्धिवाला मनुष्य निलिप्त रहता है। निलिप्त रहनेसे 'योग' होता है, लिप्तता होते ही 'भोग' हो जाता है। समबुद्धि तीनों योगोंमें है, पर कर्मयोगमें विशेष है; क्योंकि भौतिक साधना होनेसे कर्मयोगीके सामने विषमता ज्यादा आती है।
सम्बन्ध—जो समता (समबुद्धि) कर्मयोगसे प्राप्त होती है, वही समता ध्यानयोगसे भी प्राप्त होती है। इसलिये भगवान् ध्यानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले ध्यानयोगके लिये प्रेरणा करते हैं।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
अपरिग्रहः | = भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, | तथा शरीरको वशमें रखनेवाला | स्थितः | = स्थित होकर ---|---|---|---|--- निराशीः | = इच्छारहित (और) | योगी एकाकी | = योगी = अकेला | आत्मानम् सततम् | = मनको = निरन्तर यतचित्तात्मा | = अन्तःकरण | रहसि | = एकात्ममें | युञ्जीत | = (परमात्मामें) लगाये।
व्याख्या —[पाँचवें अध्यायके सताईसवें-अट्ठाईसवें श्लोकोंमें जिस ध्यानयोगका संक्षेपसे वर्णन किया था, अब यहाँ उसीका विस्तारसे वर्णन कर रहे हैं।
'युज् समाधी' धातुसे जो 'योग' शब्द बनता है, जिसका अर्थ चित्तवृत्तियोंका निरोध करना है, उस योगका वर्णन यहाँ दसवें श्लोकसे आरम्भ करते हैं।]
'अपरिग्रहः' —चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगका साधन संसारमात्रसे विमुख होकर और केवल परमात्माके सम्मुख होकर किया जाता है। अतः उसके लिये पहला साधन बताते हैं—'अपरिग्रहः' अर्थात् अपने लिये सुखबुद्धिसे कुछ भी संग्रह न करे। कारण कि अपने सुखके लिये भोग और संग्रह करनेसे उसमें मनका विंचाव रहेगा, जिससे साधकका मन ध्यानमें नहीं लगेगा। अतः ध्यानयोगके साधकके लिये अपरिग्रह होना जरूरी है।
'निराशीः' —पहले 'अपरिग्रहः' पदसे बाहरके भोग-पदार्थोंका त्याग बताया, अब 'निराशीः' पदसे भीतरकी भोग और संग्रहकी इच्छाका त्याग करनेके लिये कहते हैं। तात्पर्य यह है कि भीतरमें किसी भी भोगको भोगबुद्धिसे भोगनेकी इच्छा, कामना, आशा न रखे। कारण कि मनमें उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंका महत्त्व, आशा, कामना परमात्मप्राप्तिमें महान् बाधक है। अतः इसमें साधकको सावधान रहना चाहिये।
'यतचित्तात्मा' —बाहरसे अपने सुखके लिये पदार्थ और संग्रहका त्याग तथा भीतरसे उनकी कामना-आशाका त्याग होनेपर भी अन्तःकरण आदिमें नया राग होनेकी सम्भावना रहती है, अतः यहाँ तीसरा साधन बताते हैं—'यतचित्तात्मा' अर्थात् साधक अन्तःकरणसहित शरीरको वशमें रखनेवाला हो। इनके वशमें होनेपर फिर नया राग पैदा नहीं होगा। इनको वशमें करनेका उपाय है—कोई भी नया काम रागपूर्वक न करे। कारण कि रागपूर्वक प्रवृत्ति होनेसे शरीरकी आराम-आलस्यमें, इन्द्रियोंकी भोगोंमें और मनकी भोगोंके चिन्तनमें अथवा व्यर्थ चिन्तनमें प्रवृत्ति होती है, इसलिये अन्तःकरण और शरीरको वशमें करनेकी बात कही गयी है।
'योगी' —जिसका ध्येय, लक्ष्य केवल परमात्मामें लगनेका ही है अर्थात् जो परमात्मप्राप्तिके लिये ही ध्यानयोग करनेवाला है, सिद्धियों और भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, उसको यहाँ 'योगी' कहा गया है।
'एकाकी' —धानयोगका साधक अकेला हो, साथमें कोई सहायक न हो; क्योंकि दो होंगे तो बातचीत होने लग जायगी और साथमें कोई सहायक होगा तो रागके कारण उसकी याद आती रहेगी, जिससे मन भगवान्में नहीं लगेगा।
'रहसि स्थितः' —साधकको कहाँ स्थित होना
१-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (पातंजलयोगदर्शन १।२)
२-'आशिष्' नाम इच्छाका है और 'निस्' नाम रहित होनेका है; अतः 'निराशीः' का अर्थ हुआ—इच्छासे रहित होना।