श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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यहाँ जिस तत्त्वकी प्राप्ति ध्यानयोगसे बतायी गयी है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति दूसरे अध्यायके पचपनवें श्लोकमें कर्मयोगसे भी बतायी गयी है। अन्तर इतना है कि ध्यानयोग तो करणसापेक्ष है, पर कर्मयोग करणनिरपेक्ष साधन है। करणसापेक्ष साधनमें जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद देरीसे होता है और इसमें योगभ्रष्ट होनेकी सम्भावना रहती है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि ध्यानयोगी अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तोषका अनुभव करता है। अब उसके बाद क्या होता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
सुखमात्यन्तिकं यत्तदबुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
| यत् | = जो | तत् | = उस सुखका | अयम् | = यह ध्यानयोगी |
|---|---|---|---|---|---|
| सुखम् | = सुख | यत्र | = जिस अवस्थामें | तत्त्वतः | = तत्त्वसे |
| आत्यन्तिकम् | = आत्यन्तिक, | वेत्ति | = अनुभव करता है | एव | = फिर (कभी) |
| अतीन्द्रियम् | = अतीन्द्रिय (और) | च | = और (जिस सुखमें) | न, चलति | = विचलित नहीं |
| बुद्धिग्राह्यम् | = बुद्धिग्राह्य है, | स्थितः | = स्थित हुआ | होता। |
व्याख्या —‘सुखमात्यन्तिकं यत्’—ध्यानयोगी अपने द्वारा अपने-आपमें जिस सुखका अनुभव करता है, प्राकृत संसारमें उस सुखसे बढ़कर दूसरा कोई सुख हो ही नहीं सकता और होना सम्भव ही नहीं है। कारण कि यह सुख तीनों गुणोंसे अतीत और स्वतःसिद्ध है। यह सम्पूर्ण सुखोंकी आखिरी हद है—‘सा काष्ठा सा परा गतिः’। इसी सुखको अक्षय सुख (पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), अत्यन्त सुख (छठे अध्यायका अठ्ठाईसवाँ श्लोक) और ऐकांतिक सुख (चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक) कहा गया है।
इस सुखको यहाँ ‘आत्यन्तिक’ कहनेका तात्पर्य है कि यह सुख सात्त्विक सुखसे विलक्षण है। कारण कि सात्त्विक सुख तो परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे उत्पन्न होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका सैतीसवाँ श्लोक); परन्तु यह आत्यन्तिक सुख उत्पन्न नहीं होता, प्रत्युत यह स्वतःसिद्ध अनुत्पन्न सुख है।
‘अतीन्द्रियम्’ —इस सुखको इन्द्रियोंसे अतीत बतानेका तात्पर्य है कि यह सुख राजस सुखसे विलक्षण है। राजस सुख सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति आदिके सम्बन्धसे पैदा होता है और इन्द्रियोंद्वारा भोगा जाता है। वस्तु, व्यक्ति आदिका प्राप्त होना हमारे हाथकी बात नहीं है और प्राप्त होनेपर उस सुखका भोग उस विषय (वस्तु, व्यक्ति आदि) के ही अधीन होता है। अतः राजस सुखमें पराधीनता है। परन्तु आत्यन्तिक सुखमें पराधीनता नहीं है। कारण कि आत्यन्तिक सुख इन्द्रियोंका विषय नहीं है।
इन्द्रियोंकी तो बात ही क्या है, वहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है। यह सुख तो स्वयंके द्वारा ही अनुभवमें आता है। अतः इस सुखको अतीन्द्रिय कहा है।
‘बुद्धिग्राह्यम्’ —इस सुखको बुद्धिग्राह्य बतानेका तात्पर्य है कि यह सुख तामस सुखसे विलक्षण है। तामस सुख निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होता है। गाढ़ निद्रा-(सुषुप्ति) में सुख तो मिलता है, पर उसमें बुद्धि लीन हो जाती है। आलस्य और प्रमादमें भी सुख होता है, पर उसमें बुद्धि ठीक-ठीक जाग्रत् नहीं रहती तथा विवेकशक्ति भी लुप्त हो जाती है। परन्तु इस आत्यन्तिक सुखमें बुद्धि लीन नहीं होती और विवेकशक्ति भी ठीक जाग्रत् रहती है। पर इस आत्यन्तिक सुखको बुद्धि पकड़ नहीं सकती; क्योंकि प्रकृतिका कार्य बुद्धि प्रकृतिसे अतीत स्वरूपभूत सुखको पकड़ ही कैसे सकती है?
यहाँ सुखको आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य बतानेका तात्पर्य है कि यह सुख सात्त्विक, राजस और तामस सुखसे विलक्षण अर्थात् गुणातीत स्वरूपभूत है।
‘वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः’ —ध्यानयोगी अपने द्वारा ही अपने-आपके सुखका अनुभव करता है और इस सुखमें स्थित हुआ वह कभी किंचिन्मात्र भी विचलित नहीं होता अर्थात् इस सुखको अखण्डता निरन्तर स्वतः बनी रहती है। जैसे, मुसलमानोंने धोखेसे शिवाजीके पुत्र संभाजीको कैद कर लिया और उनसे मुस्लिम-धर्म स्वीकार करनेके लिये कहा। परन्तु जब संभाजीने उसको स्वीकार नहीं किया, तब मुसलमानोंने