भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ६ ]

उनकी आँखें निकाल लीं, उनकी चमड़ी खींच लीं, तो भी वे अपने हिन्दूधर्मसे किंचिन्मात्र भी विचलित नहीं हुए। तात्पर्य यह निकला कि मनुष्य जबतक अपनी मान्यताको स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। जब अपनी मान्यताको भी कोई छुड़ा नहीं सकता, तो फिर जिसको वास्तविक सुख प्राप्त हो गया है, उस सुखको कोई कैसे छुड़ा सकता है और वह स्वयं भी उस सुखसे कैसे विचलित हो सकता है? नहीं हो सकता।

मनुष्य उस वास्तविक सुखसे, ज्ञानसे, आनन्दसे कभी

चलायमान नहीं होता—इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य सात्त्विक सुखसे भी चलायमान होता है; उसका समाधिसे भी व्यूथान होता है। परन्तु आत्यन्तिक सुखसे अर्थात् तत्त्वसे वह कभी विचलित और व्यूथित नहीं होता; क्योंकि उसमें उसकी दूरी, भेद, भिन्नता मिट गयी और अब केवल वह—ही—वह रह गया। अब वह विचलित और व्यूथित कैसे हो? विचलित और व्यूथित तभी होता है, जब जड़ताका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध रहता है। जबतक जड़ताका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह एकरस नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृति सदा ही क्रियाशील रहती है।

परिशिष्ट भाव —स्वरूपका अनुभव होनेपर ध्यानयोगीको उस अविनाशी, अखण्ड सुखकी अनुभूति हो जाती है, जो 'आत्यन्तिक' अर्थात् सात्त्विक सुखसे विलक्षण, 'अतीन्द्रिय' अर्थात् राजस सुखसे विलक्षण और 'बुद्धिग्राह्य' अर्थात् तामस सुखसे विलक्षण है।

अविनाशी सुखको 'बुद्धिग्राह्य' कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि वह बुद्धिकी पकड़में आनेवाला है। कारण कि बुद्धि तो प्रकृतिका कार्य है, फिर वह प्रकृतिसे अतीत सुखको कैसे पकड़ सकती है? इसलिये अविनाशी सुखको बुद्धिग्राह्य कहनेका तात्पर्य उस सुखको तामस सुखसे विलक्षण बतानेमें ही है। निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला सुख तामस होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका उन्नतालीसवाँ श्लोक)। गाढ़ निद्रा—(सुषुप्ति) में बुद्धि अविद्यामें लीन हो जाती है और आलस्य तथा प्रमादमें बुद्धि पूरी तरह जाग्रत् नहीं रहती। परन्तु स्वतःसिद्ध अविनाशी सुखमें बुद्धि अविद्यामें लीन नहीं होती, प्रत्युत पूरी तरह जाग्रत् रहती है—'ज्ञानदीपिते' (गीता ४।२७)। अतः बुद्धिकी जाग्रतिकी दृष्टिसे ही उसको 'बुद्धिग्राह्य' कहा गया है। वास्तवमें बुद्धि वहाँतक पहुँचती ही नहीं।

जैसे दर्पणमें सूर्य नहीं आता, प्रत्युत सूर्यका बिम्ब आता है, ऐसे ही बुद्धिमें वह अविनाशी सुख नहीं आता, प्रत्युत उस सुखका बिम्ब आभास आता है, इसलिये भी उसको 'बुद्धिग्राह्य' कहा गया है।

तात्पर्य यह हुआ कि स्वयंका अखण्ड सुख सात्त्विक, राजस और तामस सुखसे भी अत्यन्त विलक्षण अर्थात् गुणातीत है। उसको बुद्धिग्राह्य कहनेपर भी वास्तवमें वह बुद्धिसे सर्वथा अतीत है।

बुद्धियुक्त (प्रकृतिसे मिला हुआ) चेतन ही बुद्धिग्राह्य है, शुद्ध चेतन नहीं। वास्तवमें स्वयं प्रकृतिसे मिल सकता ही नहीं, पर वह अपनेको मिला हुआ मान लेता है—'ययेदं धार्यते जगत्' (गीता ७।५)।

सम्बन्ध—ध्यानयोगी तत्त्वसे चलायमान क्यों नहीं होता—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।

यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥

यम्= जिस(लाभ)(वह)
लाभम्= लाभकीन, मन्यते= (उसके) माननेमें
लब्ध्वा= प्राप्ति होनेपरभी नहीं आतागुरुणा
ततः= उससे= और
अधिकम्= अधिकयस्मिन्= जिसमें
अपरम्= कोई दूसरास्थितः= स्थित होनेपर
गुरुणा
दुःखेन
अपि
= भी
न, विचाल्यते
= विचलित नहीं
किया जा सकता।