श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, हठयोगी, लययोगी, राजयोगी आदि जितने भी योगी हो सकते हैं, उन सब योगियोंमें भगवान्का भक्त सर्वश्रेष्ठ है। अपने भक्तके विषयमें ऐसी बात भगवान्ने और जगह भी कही है; जैसे—‘ते मे युक्ततमा मताः’ (१२।२), ‘भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः’ (१२।२०), ‘स योगी परमो मतः’ (६।३२)।
परमात्मप्राप्तिके सभी साधनोंमें भक्ति मुख्य है। इतना ही नहीं, सभी साधनोंका अन्त भक्तिमें ही होता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि तो साधन हैं, पर भक्ति साध्य है। भक्ति इतनी व्यापक है कि वह प्रत्येक साधनके आदिमें भी है और अन्तमें भी है। भक्ति प्रत्येक साधनके आरम्भमें पारमार्थिक आकर्षणके रूपमें रहती है; क्योंकि परमात्मामें आकर्षण हुए बिना कोई मनुष्य साधनमें लग ही नहीं सकता। साधनके अन्तमें भक्ति प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमके रूपमें रहती है—‘मद्वक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८।५४)। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवद्भक्ति-विषयक धर्मको श्रेष्ठ बताया गया है—‘अतस्त्विज्यायो लिंगाच्च’ (३।४।३९)।
प्रस्तुत श्लोकसे यह सिद्ध होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण समग्र हैं और उनकी भक्ति अलौकिक है! उस भक्तिकी प्राप्तिमें ही मानवजीवनकी पूर्णता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘आत्मसंयमयोग’ नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
आत्मसंयम अर्थात् मनका संयमन करनेसे ध्यानयोगीको योग-(समता-) का अनुभव हो जाता है; अतः इस अध्यायका नाम ‘आत्मसंयमयोग’ रखा गया है।
छठे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ षष्ठोऽध्यायः’ के तीन, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके दस, श्लोकोंके पाँच सौ तिहत्तर और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ निन्यानबे है।
(२) ‘अथ षष्ठोऽध्यायः’ के छः, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके तैंतीस, श्लोकोंके एक हजार पाँच सौ चार और पुष्पिकाके सैंतालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार पाँच सौ नब्बे है। इस अध्यायके
सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें पाँच ‘उवाच’ हैं—तीन ‘श्रीभगवानुवाच’ और दो ‘अर्जुन उवाच’।
छठे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके सैंतालीस श्लोकोंमेंसे पहले और छब्बीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; दसवें, चौदहवें और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा पंद्रहवें, सत्ताईसवें, छत्तीसवें और बयालीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; और ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष सैंतीस श्लोक ठीक ‘पथ्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।