श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 490, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने छठे अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें योगीकी महिमा कही और सैंतालीसवें श्लोकमें कहा कि योगियोंमें भी जो मुझमें श्रद्धा-प्रेम करके मेरा भजन करते हैं, वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्तोंको जैसे भगवान्की याद आती है तो वे उसमें तल्लीन हो जाते हैं—मस्त हो जाते हैं, ऐसे ही भगवान्के सामने भक्तोंका विशेष प्रसंग आता है तो भगवान् उसमें मस्त हो जाते हैं। इसी मस्तीमें सराबोर होते हुए भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सातवें अध्यायका विषय अपनी तरफसे प्रारम्भ कर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
मव्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | युञ्जन् | = अभ्यास करता | यथा | = जिस प्रकारसे |
|---|---|---|---|---|---|
| मयि | = मुझमें | हुआ | ज्ञास्यसि | = जानेगा, | |
| आसक्तमनाः | = आसक्त मनवाला, | माम् | = (तू) मेरे | तत् | = उसको (उसी |
| मदाश्रयः | = मेरे आश्रित होकर | समग्रम् | = (जिस) समग्ररूपको | प्रकारसे) | |
| योगम् | = योगका | असंशयम् | = निःसन्देह | शृणु | = सुन। |
व्याख्या—‘मव्यासक्तमनाः’ —मेरेमें ही जिसका मन आसक्त हो गया है अर्थात् अधिक स्नेहेके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरेमें लग गया है, चिपक गया है, उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं—ऐसा तू मेरेमें मनवाला हो।
जिसका उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धका आकर्षण मिट गया है, जिसका इस लोकमें शरीरके आराम, आदर-सत्कार और नामकी बड़ाईमें तथा स्वर्गादि परलोकके भोगोंमें किंचिन्मात्र भी खिंचाव, आसक्ति या प्रियता नहीं है, प्रत्युत केवल मेरी तरफ ही खिंचाव है, ऐसे पुरुषका नाम ‘मव्यासक्तमनाः’ है।
साधक भगवान्में मन कैसे लगाये, जिससे वह ‘मव्यासक्तमनाः’ हो जाय—इसके लिये दो उपाय बताये जाते हैं—
(१) साधक जब सच्ची नीयतसे भगवान्के लिये ही जप-ध्यान करने बैठता है, तब भगवान् उसको अपना भजन मान लेते हैं। जैसे, कोई धनी आदमी किसी नौकरसे कह दे कि ‘तुम यहाँ बैठो, कोई काम होगा तो तुम्हारेको बता देंगे।’ किसी दिन उस नौकरको मालिकने कोई काम नहीं बताया। वह नौकर दिनभर खाली बैठा रहा और शामको मालिकसे कहता है—‘बाबू! मेरेको पैसे दीजिये।’ मालिक कहता है—‘तुम सारे दिन बैठे रहे, पैसे किस बातके?’ वह नौकर कहता है—‘बाबूजी! सारे दिन बैठा रहा, इस बातके!’ इस तरह जब एक मनुष्यके लिये बैठनेवालेको भी पैसे मिलते हैं, तब जो केवल भगवान्में मन लगानेके लिये सच्ची लगनसे बैठता है, उसका बैठना क्या भगवान् निरर्थक मानेंगे? तात्पर्य यह हुआ कि जो भगवान्में मन लगानेके लिये भगवान्का आश्रय लेकर, भगवान्के ही भरोसे बैठता है, वह भगवान्की कृपासे