भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

(२) अवलम्बन —जैसे किसीके हाथकी हड्डी टूटनेपर डॉक्टरलोग उसपर पट्टी बाँधकर उसको गलेके सहारे लटका देते हैं तो वह हाथ गलेके अवलम्बित हो जाता है, ऐसे ही संसारसे निराश और अनाश्रित होकर भगवान्के गले पड़ने अर्थात् भगवान्को पकड़ लेनेका नाम 'अवलम्बन ' है।

(३) अधीनता —अधीनता दो तरहसे होती है—१- कोई हमें जबर्दस्तीसे अधीन कर ले या पकड़ ले और २-हम अपनी तरफसे किसीके अधीन हो जायँ या उसके दास बन जायँ। ऐसे ही अपना कुछ भी प्रयोजन न रखकर अर्थात् केवल भगवान्को लेकर ही अनन्यभावसे सर्वथा भगवान्का दास बन जाना और केवल भगवान्को ही अपना स्वामी मान लेना 'अधीनता ' है।

(४) प्रपत्ति —जैसे कोई किसी समर्थके चरणोंमें लम्बा पड़ जाता है, ऐसे ही संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होकर भगवान्के चरणोंमें गिर जाना 'प्रपत्ति ' (प्रपन्नता) है।

(५) सहारा —जैसे जलमें डूबनेवालेको किसी वृक्ष, लता, रस्से आदिका आधार मिल जाय, ऐसे ही संसारमें बार-बार जन्म-मरणमें डूबनेके भयसे भगवान्का आधार ले लेना 'सहारा ' है।

इस प्रकार उपर्युक्त सभी शब्दोंमें केवल शरणागतिका

परिशिष्ट भाव —जिसका मन स्वाभाविक ही भगवान्की तरफ खिंच गया है, जो सर्वथा भगवान्के आश्रित हो गया है और जिसने भगवान्के साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्ययोग-(आत्मीय सम्बन्ध-) को स्वीकार कर लिया है, वह भक्त भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सब कुछ भगवान् ही हैं—यह भगवान्का समग्ररूप है।

'मध्यासक्तमनाः ' में प्रेमकी और 'मदाश्रयः ' में श्रद्धाकी मुख्यता है।

'समग्रं माम् —इसमें 'समग्रम् ' (समग्ररूप) विशेषण है और 'माम् ' (भगवान्) विशेष्य है। भक्तका सम्बन्ध विशेषणके साथ न होकर विशेष्यके साथ होता है।

छठे अध्यायके अन्तमें 'श्रद्धावाम्बजते यो माम् ' पदोंमें आये 'माम् ' का क्या स्वरूप है—इसको भगवान् यहाँ बताते हैं कि वह 'माम् ' मेरा समग्ररूप है।

'यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु —उस समग्ररूपका वर्णन मैं इस प्रकार, ढंग, युक्ति, शैलीसे करूँगा, जिससे तू मेरेको सुगमतापूर्वक यथार्थरूपसे जान लेगा।

अर्जुनने पिछले अध्यायमें अपना संशय प्रकट किया था—'एतन्मे संशयं कृष्णो ' (६।३९), इसलिये भगवान् कहते हैं कि अब मैं वही बात कहूँगा, जिससे कोई संशय बाकी न रहे।

सम्बन्ध —पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि तू मेरे समग्र रूपको जैसा जानेगा, वह सुन। अब भगवान् आगेके श्लोकमें उसे सुनानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।

यज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥