भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

४९३

ते= तेरे लियेअशेषतः= सम्पूर्णतासेइह= इस विषयमें
अहम्= मैंवक्ष्यामि= कहूँगा,ज्ञातव्यम्= जाननेयोग्य
इदम्= यहयत्= जिसकोअन्यत्= अन्य (कुछ भी)
सविज्ञानम्= विज्ञानसहितज्ञात्वा= जाननेके बादन, अवशिष्यते= शेष नहीं
ज्ञानम्= ज्ञानभूयः= फिररहेगा।

व्याख्या—‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः’— भगवान् कहते हैं कि भैया अर्जुन! अब मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, तुम्हें कहूँगा और मैं खुद कहूँगा तथा सम्पूर्णतासे कहूँगा। ऐसे तो हरेक आदमी हरेक गुरुसे मेरे स्वरूपके बारेमें सुनता है और उससे लाभ भी होता है; परन्तु तुम्हें मैं स्वयं कह रहा हूँ। स्वयं कौन? जो समग्र परमात्मा है, वह मैं स्वयं! मैं स्वयं मेरे स्वरूपका जैसा वर्णन कर सकता हूँ, वैसा दूसरे नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो सुनकर और अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके ही कहते हैं। उनकी बुद्धि समष्टि बुद्धिका एक छोटा-सा अंश है, वह कितना जान सकती है! वे तो पहले अनजान होकर फिर जानकार बनते हैं, पर मैं सदा अलुप्तज्ञान हूँ। मेरेमें अनजानपना न है, न कभी था, न होगा और न होना सम्भव ही है। इसलिये मैं तेरे लिये उस तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसको जाननेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा।

दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियोंको कहनेमें समर्थ हैं—‘वक्तुमह्यंशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ’ तो उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है, इसलिये प्रधानतासे कहूँगा—‘प्रधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ’ (१०।१९)। फिर अन्तमें कहते हैं कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है—‘नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ’ (१०।४०)। यहाँ (७।२ में) भगवान्

कहते हैं कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, शेष नहीं रखूँगा—‘अशेषतः। ’ इसका तात्पर्य यह समझना चाहिये कि मैं तत्त्वसे कहूँगा। तत्त्वसे कहनेके बाद कहना, जानना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा।

दसवें अध्यायमें विभूति और योगकी बात आयी कि भगवान्की विभूतियोंका और योगका अन्त नहीं है। अभिप्राय है कि विभूतियोंका अर्थात् भगवान्की जो अलग-अलग शक्तियाँ हैं, उनका और भगवान्के योगका अर्थात् सामर्थ्य, ऐश्वर्यका अन्त नहीं आता। रामचरितमानसमें कहा है—

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहीं कोइ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥

(उत्तर० ७३ ख)

तात्पर्य है कि सगुण भगवान्का जो प्रभाव है, ऐश्वर्य है, उसका अन्त नहीं आता। जब अन्त ही नहीं आता, तब उसको जानना मनुष्यकी बुद्धिके बाहरकी बात है। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है, उसको मनुष्य सुगमतासे समझ सकता है। जैसे, सोनेके गहने कितने होते हैं? इसको मनुष्य नहीं जान सकता; क्योंकि गहनोंका अन्त नहीं है, परन्तु उन सब गहनोंमें तत्त्वसे एक सोना ही है, इसको तो मनुष्य जान ही सकता है। ऐसे ही परमात्माकी सम्पूर्ण विभूतियों और सामर्थ्यको कोई जान नहीं सकता; परन्तु उन सबमें तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं, इसको तो मनुष्य तत्त्वसे जान ही सकता है। परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर उसकी समझ तत्त्वसे

१-मैं ‘विज्ञानसहित ज्ञान’ सम्पूर्णतासे कहूँगा—इसमें बतानेवाला होता है। इस दृष्टिसे विशेष्य व्यापक हुआ और विशेषण व्याप्य हुआ अर्थात् ज्ञान (विशेष्य) बड़ा हुआ और विज्ञान (विशेषण) छोटा हुआ। परन्तु विज्ञानने ज्ञानकी विशेषता बता दी—इस दृष्टिसे विज्ञान बड़ा अर्थात् श्रेष्ठ हुआ। यहाँ यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन होता है—ऐसा मानना ज्ञान है; और सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान् ही सब कुछ बने हुए हैं, भगवान्के सिवाय कुछ है ही नहीं—ऐसा अनुभव हो जाना विज्ञान है। इसमें ज्ञान सामान्य हुआ और विज्ञान विशेष हुआ।

२-जैसे, कोई वर्णन करता है तो वर्णन करनेवालेका जो स्वयंका अनुभव है, वह पूरा बुद्धिमें नहीं आता; बुद्धिमें जितना आता है, उतना मनमें नहीं आता और जितना मनमें आता है, उतना कहनेमें नहीं आता। इस प्रकार जब उसका अपना अनुभव भी पूरा कहनेमें नहीं आता अर्थात् वह अपने अनुभवको भी पूरा प्रकट नहीं कर सकता, तो फिर वह भगवान्की तरह कैसे कह सकता है?