भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

४९३

ते= तेरे लियेअशेषतः= सम्पूर्णतासेइह= इस विषयमें
अहम्= मैंवक्ष्यामि= कहूँगा,ज्ञातव्यम्= जाननेयोग्य
इदम्= यहयत्= जिसकोअन्यत्= अन्य (कुछ भी)
सविज्ञानम्= विज्ञानसहितज्ञात्वा= जाननेके बादन, अवशिष्यते= शेष नहीं
ज्ञानम्= ज्ञानभूयः= फिररहेगा।

व्याख्या—‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः’— भगवान् कहते हैं कि भैया अर्जुन! अब मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, तुम्हें कहूँगा और मैं खुद कहूँगा तथा सम्पूर्णतासे कहूँगा। ऐसे तो हरेक आदमी हरेक गुरुसे मेरे स्वरूपके बारेमें सुनता है और उससे लाभ भी होता है; परन्तु तुम्हें मैं स्वयं कह रहा हूँ। स्वयं कौन? जो समग्र परमात्मा है, वह मैं स्वयं! मैं स्वयं मेरे स्वरूपका जैसा वर्णन कर सकता हूँ, वैसा दूसरे नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो सुनकर और अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके ही कहते हैं। उनकी बुद्धि समष्टि बुद्धिका एक छोटा-सा अंश है, वह कितना जान सकती है! वे तो पहले अनजान होकर फिर जानकार बनते हैं, पर मैं सदा अलुप्तज्ञान हूँ। मेरेमें अनजानपना न है, न कभी था, न होगा और न होना सम्भव ही है। इसलिये मैं तेरे लिये उस तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसको जाननेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा।

दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियोंको कहनेमें समर्थ हैं—‘वक्तुमह्यंशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ’ तो उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है, इसलिये प्रधानतासे कहूँगा—‘प्रधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ’ (१०।१९)। फिर अन्तमें कहते हैं कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है—‘नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ’ (१०।४०)। यहाँ (७।२ में) भगवान्

कहते हैं कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, शेष नहीं रखूँगा—‘अशेषतः। ’ इसका तात्पर्य यह समझना चाहिये कि मैं तत्त्वसे कहूँगा। तत्त्वसे कहनेके बाद कहना, जानना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा।

दसवें अध्यायमें विभूति और योगकी बात आयी कि भगवान्की विभूतियोंका और योगका अन्त नहीं है। अभिप्राय है कि विभूतियोंका अर्थात् भगवान्की जो अलग-अलग शक्तियाँ हैं, उनका और भगवान्के योगका अर्थात् सामर्थ्य, ऐश्वर्यका अन्त नहीं आता। रामचरितमानसमें कहा है—

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहीं कोइ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥

(उत्तर० ७३ ख)

तात्पर्य है कि सगुण भगवान्का जो प्रभाव है, ऐश्वर्य है, उसका अन्त नहीं आता। जब अन्त ही नहीं आता, तब उसको जानना मनुष्यकी बुद्धिके बाहरकी बात है। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है, उसको मनुष्य सुगमतासे समझ सकता है। जैसे, सोनेके गहने कितने होते हैं? इसको मनुष्य नहीं जान सकता; क्योंकि गहनोंका अन्त नहीं है, परन्तु उन सब गहनोंमें तत्त्वसे एक सोना ही है, इसको तो मनुष्य जान ही सकता है। ऐसे ही परमात्माकी सम्पूर्ण विभूतियों और सामर्थ्यको कोई जान नहीं सकता; परन्तु उन सबमें तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं, इसको तो मनुष्य तत्त्वसे जान ही सकता है। परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर उसकी समझ तत्त्वसे

१-मैं ‘विज्ञानसहित ज्ञान’ सम्पूर्णतासे कहूँगा—इसमें बतानेवाला होता है। इस दृष्टिसे विशेष्य व्यापक हुआ और विशेषण व्याप्य हुआ अर्थात् ज्ञान (विशेष्य) बड़ा हुआ और विज्ञान (विशेषण) छोटा हुआ। परन्तु विज्ञानने ज्ञानकी विशेषता बता दी—इस दृष्टिसे विज्ञान बड़ा अर्थात् श्रेष्ठ हुआ। यहाँ यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन होता है—ऐसा मानना ज्ञान है; और सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान् ही सब कुछ बने हुए हैं, भगवान्के सिवाय कुछ है ही नहीं—ऐसा अनुभव हो जाना विज्ञान है। इसमें ज्ञान सामान्य हुआ और विज्ञान विशेष हुआ।

२-जैसे, कोई वर्णन करता है तो वर्णन करनेवालेका जो स्वयंका अनुभव है, वह पूरा बुद्धिमें नहीं आता; बुद्धिमें जितना आता है, उतना मनमें नहीं आता और जितना मनमें आता है, उतना कहनेमें नहीं आता। इस प्रकार जब उसका अपना अनुभव भी पूरा कहनेमें नहीं आता अर्थात् वह अपने अनुभवको भी पूरा प्रकट नहीं कर सकता, तो फिर वह भगवान्की तरह कैसे कह सकता है?

४९४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

परिपूर्ण हो जाती है, बाकी नहीं रहती। जैसे, कोई कहे कि 'मैंने जल पी लिया' तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि अब संसारमें जल बाकी नहीं रहा। अतः जल पीनेसे जलका अन्त नहीं हुआ है, प्रत्युत हमारी प्यासका अन्त हुआ है। इसी तरहसे परमात्मतत्त्वको तत्त्वसे समझ लेनेपर परमात्मतत्त्वके ज्ञानका अन्त नहीं हुआ है, प्रत्युत हमारी अपनी जो समझ है, जिज्ञासा है, वह पूर्ण हुई है, उसका अन्त हुआ है, उसमें केवल परमात्मतत्त्व ही रह गया है।

दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मेरे प्रकट होनेको देवता और महर्षि नहीं जानते और तीसरे श्लोकमें कहा है कि जो मुझे अज और अनादि जानता है, वह मनुष्योंमें असम्भूद्ध है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। तो जिसे देवता और महर्षि नहीं जानते, उसे मनुष्य जान ले—यह कैसे हो सकता है? भगवान् अज और अनादि हैं, ऐसा दृढ़तासे मानना ही जानना है। मनुष्य भगवान्को अज और अनादि मान ही सकता है। परन्तु जैसे बालक अपनी माँके विवाहकी बरात नहीं देख सकता, ऐसे ही सब प्राणियोंके आदि तथा स्वयं अनादि भगवान्को देवता, ऋषि, महर्षि, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त आदि नहीं जान सकते। इसी प्रकार भगवान्के अवतार लेनेको, लीलाको, ऐश्वर्यको कोई जान नहीं सकता; क्योंकि वे अपार हैं, अगाध हैं, अनन्त हैं। परन्तु उनको तत्त्वसे तो जान ही सकते हैं।

परमात्मतत्त्वको जाननेके लिये 'ज्ञानयोग' में जानकारी—(जानने—) की प्रधानता रहती है और 'भक्तियोग' में मान्यता—(मानने—) की प्रधानता रहती है। जो वास्तविक मान्यता होती है, वह बड़ी दृढ़ होती है। उसको कोई इधर—उधर नहीं कर सकता अर्थात् माननेवाला जबतक अपनी मान्यताको न छोड़े, तबतक उसकी मान्यताको कोई छुड़ा नहीं सकता। जैसे, मनुष्यने संसार और संसारके पदार्थोंको अपने लिये उपयोगी मान रखा है तो इस मान्यताको स्वयं छोड़े बिना दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। परन्तु स्वयं इस बातको जान ले कि ये सब पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तो इस मान्यताको मनुष्य छोड़ सकता है; क्योंकि यह मान्यता असत्य है, झूठी है। जब असत्य मान्यताको भी दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता, तब जो वास्तविक परमात्मा सबके मूलमें है, उसको कोई मान ले तो यह मान्यता कैसे छूट सकती है? क्योंकि यह मान्यता सत्य है। यह यथार्थ मान्यता ज्ञानसे कम नहीं होती, प्रत्युत

ज्ञानके समान ही दृढ़ होती है।

भक्तिमार्गमें मानना मुख्य होता है। जैसे, दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि 'हे महाबाहो अर्जुन! मैं तेरे हितके लिये परम (सर्वश्रेष्ठ) वचन कहता हूँ, तुम सुनो अर्थात् तुम इस वचनको मान लो।' वहाँ भक्तिका प्रकरण है; अतः वहाँ माननेकी बात कहते हैं। ज्ञानमार्गमें जानना मुख्य होता है। जैसे, चौदहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने कहा कि 'मैं फिर ज्ञानोंमें उत्तम और सर्वोत्कृष्ट ज्ञान कहता हूँ, जिसको जाननेसे सब—के—सब मुनि परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं।' वहाँ ज्ञानका प्रकरण है; अतः वहाँ जाननेकी बात कहते हैं। भक्तिमार्गमें मनुष्य मान करके जान लेता है और ज्ञानमार्गमें जान करके मान लेता है। अतः पूर्ण होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है।

ज्ञान और विज्ञानसम्बन्धी विशेष बात

संसार भगवान्से ही पैदा होता है और उनमें ही लीन होता है, इसलिये भगवान् इस संसारके महाकारण हैं—ऐसा मानना 'ज्ञान' है। भगवान्के सिवाय और कोई चीज है ही नहीं, सब कुछ भगवान् ही हैं, स्वयं भगवान् ही सब कुछ बने हुए हैं—ऐसा अनुभव हो जाना 'विज्ञान' है।

अपरा और परा प्रकृति मेरी है; इनके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और मैं इस सम्पूर्ण जगत्का महाकारण हूँ (चौथेसे छठे श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने 'ज्ञान' बताया। मेरे सिवाय अन्य कोई है ही नहीं, सूतके धागेमें उसी सूतकी बनी हुई मणियोंकी तरह सब कुछ मेरेमें ही ओतप्रोत है (सातवाँ श्लोक)—ऐसा कहकर भगवान्ने 'विज्ञान' बताया।

जलमें रस, चन्द्र—सूर्यमें प्रभा मैं हूँ इत्यादि; सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मैं हूँ; सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (आठवेंसे बारहवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर 'ज्ञान' बताया। ये मेरेमें और मैं इनमें नहीं हूँ, अर्थात् सब कुछ मैं—ही—मैं हूँ; क्योंकि इनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है (बारहवाँ श्लोक)—ऐसा कहकर 'विज्ञान' बताया।

जो मेरे सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता मान लेता है, वह मोहित हो जाता है। परन्तु जो गुणोंसे मोहित न होकर अर्थात् ये गुण भगवान्से ही होते हैं और भगवान्में ही लीन होते हैं—ऐसा मानकर मेरे शरण होता है, वह गुणमयी मायाको तर जाता है। ऐसे मेरे शरण होनेवाले चार प्रकारके

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

४९५

भक्त होते हैं—अर्थात्, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी (प्रेमी)। ये सभी उदार हैं; पर ज्ञानी अर्थात् प्रेमी मेरेको अत्यन्त प्रिय है और मेरी आत्मा ही है (तेरहवेंसे अठारहवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर 'ज्ञान' बताया। जिसको 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसा अनुभव हो जाता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है (उन्नीसवाँ श्लोक)—ऐसा कहकर 'विज्ञान' बताया।

मेरेको न मानकर जो कामनाओंके कारण देवताओंके शरण हो जाते हैं, उनको अन्तवाला फल (जन्म-मरण) मिलता है और जो मेरे शरण हो जाते हैं, उनको मैं मिल जाता हूँ। जो मुझे अज-अविनाशी नहीं जानते, उनके सामने मैं प्रकट नहीं होता। मैं भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंको और उनमें रहनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको जानता हूँ, पर मेरेको कोई नहीं जानता। जो द्रढ़मोहसे मोहित हो जाते हैं, वे बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं। जो एक निश्चय करके मेरे भजनमें लग जाते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वे निर्द्वन्द्व हो जाते हैं (बीसवेंसे अठ्ठाईसवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर 'ज्ञान' बताया। जो मेरा आश्रय लेते हैं, वे ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधिपञ्चको जान जाते हैं अर्थात् चर-अचर सब कुछ में

ही हूँ, ऐसा उनको अनुभव हो जाता है (७।२९-३०)—ऐसा कहकर 'विज्ञान' बताया।

'यज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ञातव्यमवशिष्यते' —विज्ञानसहित ज्ञानको जाननेके बाद जानना बाकी नहीं रहता। तात्पर्य है कि मेरे सिवाय संसारका मूल दूसरा कोई नहीं है, केवल मैं ही हूँ—'मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनंजय' (गीता ७।७) और तत्त्वसे सब कुछ वासुदेव ही है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९) और कोई है ही नहीं—ऐसा जान लेगा तो जानना बाकी कैसे रहेगा? क्योंकि इसके सिवाय दूसरा कुछ जाननेयोग्य है ही नहीं। यदि एक परमात्माको न जानकर संसारकी बहुत-सी विद्याओंको जान भी लिया तो वास्तवमें कुछ नहीं जाना है, कोरा परिश्रम ही किया है।

'जानना कुछ बाकी नहीं रहता'—इसका तात्पर्य है कि इन्द्रियोंसे, मनसे, बुद्धिसे जो परमात्माको जानता है, वह वास्तवमें पूर्ण जानना नहीं है। कारण कि ये इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि प्राकृत हैं, इसलिये ये प्रकृतिसे अतीत तत्त्वको नहीं जान सकते। स्वयं जब परमात्माके शरण हो जाता है, तब स्वयं ही परमात्माको जानता है। इसलिये परमात्माको स्वयंसे ही जाना जा सकता है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं।

परिशिष्ट भाव —परा तथा अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—यह 'ज्ञान' है और परा-अपरा सब कुछ भगवान् ही हैं—यह 'विज्ञान' है। अतः अहमसहित सब कुछ भगवान् ही हैं—यही विज्ञानसहित ज्ञान है।

'ज्ञातव्यम्' —जिसको अवश्य जानना चाहिये और जो जाना जा सकता है, उसको 'ज्ञातव्य' कहते हैं।

विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् भगवान्के समग्ररूपको जाननेके बाद फिर जाननेयोग्य कुछ भी शेष नहीं रहता अर्थात् जो यथार्थ तत्त्व जानना चाहता है, उसके लिये जानना कुछ भी बाकी नहीं रहता। कारण कि जब एक भगवान्के सिवाय किञ्चिन्मात्र भी कुछ है ही नहीं (इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक), तो फिर जाननेयोग्य क्या बाकी रहेगा?

यहाँ कोई कह सकता है कि 'विज्ञानसहित ज्ञान' कहनेसे ज्ञानकी मुख्यता और विज्ञानकी गौणता हुई? परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। केवल 'ज्ञान' से मुक्ति तो हो जाती है, पर प्रेमका अनन्त आनन्द तभी मिलता है, जब उसके साथ विज्ञान भी हो। 'ज्ञान' धनकी तरह है और 'विज्ञान' आकर्षण है। जैसे धनके आकर्षणमें जो सुख है, वह धनमें नहीं है, ऐसे ही 'विज्ञान' (भक्ति) में जो आनन्द है, वह 'ज्ञान' में नहीं है। 'ज्ञान' में तो अखण्डरस है, पर 'विज्ञान' में प्रतिक्षण वर्धमान रस है। इसलिये 'विज्ञानसहित ज्ञान' कहनेमें भगवान्का लक्ष्य मुख्यरूपसे 'विज्ञान' की तरफ ही है और उसीको भगवान् श्रेष्ठ बताना चाहते हैं; क्योंकि 'विज्ञान' समग्रताका वाचक है।

सम्बन्ध—भगवान्ने दूसरे श्लोकमें यह बताया कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिससे कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। जब जानना बाकी रहता ही नहीं, तो फिर सब मनुष्य उस तत्त्वको क्यों नहीं जान लेते? इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥

४९६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सहस्रेषु= हजारोंयतति= यत्न करता है (और)कश्चित्= कोई (एक)
मनुष्याणाम्= मनुष्योंमेंयतताम्= (उन) यत्न करनेवालेअपि= ही
कश्चित्= कोई (एक)माम्= मुझे
सिद्धये= सिद्धि-(कल्याण)-के लियेसिद्धानाम्= सिद्धों-(मुक्त-पुरुषों-) मेंतत्त्वतः= यथार्थरूपसे
वेत्ति= जानता है।

व्याख्या —‘मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये’—हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। तात्पर्य है कि जिनमें मनुष्यपना है अर्थात् जिनमें पशुओंकी तरह खाना-पीना और ऐश-आराम करना नहीं है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उन मनुष्योंमें भी जो नीति और धर्मपर चलनेवाले हैं, ऐसे मनुष्य हजारों हैं। उन हजारों मनुष्योंमें भी कोई एक ही सिद्धिके लिये यत्न करता है अर्थात् जिससे बढ़कर कोई लाभ नहीं, जिसमें दुःखका लेश भी नहीं और आनन्दकी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं, कमीकी सम्भावना ही नहीं—ऐसे स्वतःसिद्ध नित्यतत्त्वकी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। जो परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति नहीं चाहता और इस लोकमें धन, मान, भोग, कीर्ति आदि नहीं चाहता अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें नहीं अटकता और भोगे हुए भोगोंके तथा मान-बढ़ाई, आदर-सत्कार आदिके संस्कार रहनेसे उन विषयोंका संग होनेपर, उन विषयोंमें रुचि होते रहनेपर भी जो अपनी मान्यता, उद्देश्य, विचार, सिद्धान्त आदिसे विचलित नहीं होता—ऐसा कोई एक पुरुष ही सिद्धिके लिये यत्न करता है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धिके लिये यत्न करनेवाले अर्थात् दृढ़तासे उधर लगनेवाले बहुत कम मनुष्य होते हैं।

परमात्मप्राप्तिकी तरफ न लगनेमें कारण है—भोग और संग्रहमें लगना। सांसारिक भोग-पदार्थोंमें केवल

आरम्भमें ही सुख दीखता है। मनुष्य प्रायः तत्काल सुख देनेवाले साधनोंमें ही लगते हैं। उनका परिणाम क्या होगा—इसपर वे विचार करते ही नहीं। अगर वे भोग और ऐश्वर्यके परिणामपर विचार करने लग जायें कि ‘भोग और संग्रहके अन्तमें कुछ नहीं मिलेगा, रीते रह जायेंगे और उनकी प्राप्तिके लिये किये हुए पाप-कर्मोंके फलस्वरूप चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंके रूपमें दुःख-ही-दुःख मिलेगा’, तो वे परमात्माके साधनमें लग जायेंगे। दूसरा कारण यह है कि प्रायः लोग सांसारिक भोगोंमें ही लगे रहते हैं। उनमेंसे कुछ लोग संसारके भोगोंसे ऊँचे उठते भी हैं तो वे परलोकके स्वर्ग आदि भोग-भूमियोंकी प्राप्तिमें लग जाते हैं। परन्तु अपना कल्याण हो जाय, परमात्माकी प्राप्ति हो जाय—ऐसा दृढ़तासे विचार करके परमात्माकी तरफ लगनेवाले लोग बहुत कम होते हैं। इतिहासमें भी देखते हैं तो सकामभावसे तपस्या आदि साधन करनेवालोंके ही चरित्र विशेष आते हैं। कल्याणके लिये तत्परतासे साधन करनेवालोंके चरित्र बहुत ही कम आते हैं।

वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन या दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इधर सच्ची लगनेसे तत्परतापूर्वक लगनेवाले बहुत कम हैं। इधर दृढ़तासे न लगनेमें संयोगजन्य सुखकी तरफ आकृष्ट होना और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा रखना ही खास कारण है।

प्रायः लोग इस (तीसरे) श्लोकको तत्त्वकी कठिनता

१-संख्यावाचक शब्दको यदि किसीका विशेषण बताया जाय, तो उस शब्दमें एकवचन ही होता है। यदि उसके योगमें षष्ठी की जाय तो संख्यावाचक शब्दमें तीनों वचन होते हैं। यहाँ ‘मनुष्याणाम्’ पदमें सहस्र संख्याके योगमें षष्ठी हुई है और ‘सहस्राणि’ पदमें निर्धारण अर्थमें सप्तमीका बहुवचन हुआ है। अतः ‘मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये’ पदोंका अर्थ हुआ—‘मनुष्याणां सहस्राणि भगवति रुचिं कुर्वन्ति सहस्रेषु कश्चित् सिद्धये यतति च’ ‘हजारों मनुष्य भगवान्में रुचि रखते हैं, पर उन हजारोंमेंसे कोई एक सिद्धिके लिये यत्न करता है।’

२-स्वर्ग आदि लोकोंको और अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति वास्तवमें सिद्धि है ही नहीं, प्रत्युत वह तो अस्मिद्धि ही है; क्योंकि वह पतन करनेवाली अर्थात् बार-बार जन्म-मरण देनेवाली है (नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसलिये यहाँ परमात्माकी प्राप्तिको ही सिद्धि कहा गया है।

३-परमात्मा सब देशोंमें, सब कालोंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सब वस्तुओंमें, सब घटनाओंमें, सब परिस्थितियोंमें और सम्पूर्ण क्रियाओंमें स्वतः परिपूर्णरूपसे मौजूद है; अतः उनकी प्राप्तिमें भविष्यका कोई कारण ही नहीं है। परमात्मतत्त्व कर्मजन्य नहीं है। जो वस्तु कर्मजन्य होती है, वह भविष्यमें मिलती है। कारण कि जो वस्तु कर्मजन्य होती है, वह उत्पत्ति-विनाशवाली होती है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

४९७

बतानेवाला मानते हैं। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक तत्त्वकी कठिनातके विषयमें नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है, प्रत्युत तत्त्वप्राप्तिकी उल्टट अभिलाषा होना और अभिलाषकी पूर्तिके लिये तत्त्वज्ञ जीवनमुक्त महापुरुषोंका मिलना दुर्लभ है, कठिन है। यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि 'मैं कहूँगा और तू जानेगा', तो अर्जुन-जैसा अपने श्रेयका प्रश्न करनेवाला और भगवान्- जैसा सर्वज्ञ कहेनेवाला मिलना दुर्लभ है। वास्तवमें देखा जाय तो केवल उल्टट अभिलाषा होना ही दुर्लभ है। कारण कि अभिलाषा

होनेपर उसको जाननेकी जिम्मेवारी भगवान्पर आ जाती है।

यहाँ 'तत्त्वतः' कहनेका तात्पर्य है कि वह मेरे सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि रूपोंमें प्रकट होनेवाले और समय-समयपर तरह-तरहके अवतार लेनेवाले मुझको तत्त्वसे जान लेता है अर्थात् उसके जाननेमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता और उसके अनुभवमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी किंचिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती।

परिशिष्ट भाव —कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि जितने साधन हैं, उन साधनोंसे (यत्न करते हुए) जो सिद्ध हो चुके हैं, ऐसे जीवनमुक्त ज्ञानी महापुरुषोंमें भी 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस प्रकार भगवान्के समग्ररूपको यथार्थरूपसे अनुभव करनेवाले प्रेमी भक्त दुर्लभ हैं* (इसी अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

'यततामपि सिद्धानाम्' —वे सिद्ध अर्थात् जीवनमुक्त पुरुष अपनी स्थिति-(मुक्तावस्था-) से असन्तुष्ट हैं और उनके भीतर परमप्रेम-(अनन्तरस-) को प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा है, भूख है। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है—'मुक्तोपसृज्यव्यपदेशात्' (१।३।२) 'उस प्रेमस्वरूप भगवान्को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है'। कारण यह है कि मुक्त होनेपर नाशवान् रसकी कामना तो मिट जाती है, पर अनन्तरसकी भूख नहीं मिटती। वह भूख भगवान्की कृपासे ही जाग्रत् होती है। तात्पर्य है कि जो भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास रखते हुए साधन करते हैं, जिनके भीतर भक्तिके संस्कार हैं, उनको भगवान् ज्ञानमें सन्तुष्ट नहीं होने देते, उसमें टिकने नहीं देते और उनकी मुक्तिके रसको फीका कर देते हैं।

सिद्ध (मुक्त) तो कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी आदि सभी हो सकते हैं, पर भगवान्के समग्ररूपको जाननेवाले सब नहीं होते। अतः 'यततामपि सिद्धानाम्' पदोंका तात्पर्य है कि वे यत्न करते हुए अपनी पद्धतिसे सिद्ध तो हो गये, पर मेरे समग्ररूपको नहीं जान सके! कारण कि मेरे समग्ररूपको पराभक्तिसे ही जाना जा सकता है—'भवत्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः' (गीता १८।५५)।

'कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः' —यहाँ 'माम्' पद समग्र परमात्माका वाचक है। भगवान्के समग्ररूपको भगवान्की कृपासे ही जाना जा सकता है, विचारसे नहीं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। अर्जुनने भी गीता सुननेके बाद भगवान्से कहा है कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति प्राप्त हो गयी—'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत' (१८।७३)। जैसे दूध पिलाते समय गाय अपने बछड़ेको स्नेहपूर्वक चाटती है तो उससे बछड़ेकी जो पुष्टि होती है, वह केवल दूध पीनेसे नहीं होती। ऐसे ही भगवान्की कृपासे जो ज्ञान होता है, वह अपने विचारसे नहीं होता; क्योंकि विचार करनेमें स्वयंकी सत्ता रहती है।

केवल निर्गुणको जाननेवाला परमात्माको तत्त्वसे नहीं जानता, प्रत्युत सगुण-निर्गुण दोनोंको (समग्रको) जाननेवाला ही परमात्माको तत्त्वसे जानता है।

है और उसमें देश, कालकी दूरी होती है; अतः उसीके लिये भविष्य होता है। मनुष्य यह विचार करे कि परमात्मा सब देशमें है तो यहाँ भी है, जब यहाँ है तो कहीं जानेकी जरूरत नहीं। परमात्मा सब समयमें है तो अभी भी है, जब अभी है, तो भविष्य क्यों? परमात्मा सबमें है तो मेरेमें भी है, जब मेरेमें है तो दुसरे किसीमें खोजनेकी पराधीनता नहीं। परमात्मा सबके हैं, तो मेरे भी हैं; जब मेरे हैं तो मेरेको अत्यन्त प्यारे होने ही चाहिये; क्योंकि अपनी चीज सबको प्यारी होती ही है। साथ-ही-साथ परमात्मा सर्वोत्कृष्ट है अर्थात् उनसे बढ़कर कोई है ही नहीं—ऐसा विश्वास होनेपर स्वतः ही मन खिंचेगा।

उपपत्युक्त बातोंपर दृढ़ विश्वास हो जाय तो परमात्माकी आशा भविष्यका अवलम्बन करनेवाली नहीं होती; किन्तु परमात्माको तत्काल प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा हो जाती है।

  • धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥

सब ते सो दुर्लभ सुराया। राम भगति रत गत मद माया॥ (मानस, उत्तर० ५४।३-४)

४९८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

कर्मयोगसे 'शान्त आनन्द' (शान्ति) की प्राप्ति होती है, क्योंकि संसारके साथ सम्बन्ध होनेसे ही अशान्ति होती है। कर्मयोगसे संसारका सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे शान्ति प्राप्त हो जाती है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)। ज्ञानयोगसे 'अखण्ड आनन्द' की प्राप्ति होती है। अखण्ड आनन्दको 'निजानन्द' भी कहते हैं; क्योंकि यह अपने स्वरूपका आनन्द है। निजानन्दमें जीवका ब्रह्मके साथ साधर्म्य हो जाता है अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, ऐसे ही जीव भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाता है—'मम साधर्म्यमागताः' (गीता १४।२)। यद्यपि निजानन्दकी प्राप्ति होनेपर साधकमें कोई कमी नहीं रहती, फिर भी जिसके भीतर भक्तिके संस्कार हैं और भगवान्की कृपाका आश्रय है, उसको निजानन्दमें सन्तोष नहीं होता। उसके भीतर 'अनन्त आनन्द' की भूख रहती है। अतः भक्तियोगसे 'अनन्त आनन्द' की प्राप्ति होती है। निजानन्द तो अंश-(स्वरूप-) का आनन्द है, पर अनन्त आनन्द अंशी-(भगवान्-) का आनन्द है। यह सिद्धान्त है कि वस्तुके आकर्षणमें जो सुख होता है, वह सुख वस्तुके ज्ञानमें नहीं होता। जैसे, रुपयोंके लोभमें जो सुख मिलता है, वह रुपयोंका ज्ञान होनेसे नहीं मिलता। रुपयोंका ज्ञान होनेसे उनका उपयोग करना तो आ जायगा, पर विशेष आकर्षण नहीं होगा। 'और मिले, और मिले'—यह आकर्षण तो लोभ होनेसे ही होगा। रुपयोंका सुख तो लोभरूप दोषके कारण दीखता है, वास्तवमें है नहीं, पर भगवान्का आनन्द निर्दोष प्रेमके कारण है, जो वास्तवमें है। कारण कि भगवान्का ही अंश होनेसे जीवमें अंशी-(भगवान्-) का आकर्षण स्वतः है। यह सिद्धान्त है कि अंशका अंशीकी तरफ स्वतः आकर्षण होता है; जैसे—पृथ्वीका अंश होनेसे ऊपर फेंका गया पत्थर स्वतः पृथ्वीकी तरफ खिंचता है, अग्नि स्वतः सूर्यकी तरफ (ऊपर) खिंचती है नदियाँ स्वतः समुद्रकी तरफ खिंचती हैं, आदि।

हमें भगवान्की आवश्यकता क्यों है?—इसपर विचार करें तो मालूम होता है कि हमारी कोई ऐसी आवश्यकता है, जिसको हम न तो अपने द्वारा पूरी कर सकते हैं और न संसारके द्वारा ही पूरी कर सकते हैं। दुःखोंका नाश करनेके लिये और परमशान्तिको प्राप्त करनेके लिये हमें भगवान्की आवश्यकता नहीं है। कारण कि अगर हम कामनाओंका सर्वथा त्याग कर दें तो स्वतः हमारे दुःखोंका नाश होकर परमशान्तिकी प्राप्ति हो जायगी—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' अर्थात् हम मुक्त हो जायेंगे। हमें परमप्रेमकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्की आवश्यकता है; क्योंकि हम भगवान्के ही अंश हैं।

जो मनुष्य सांसारिक दुःखोंसे छूटना चाहता है, पराधीनतासे छूटकर स्वाधीन होना चाहता है, उसकी मुक्ति हो जाती है। परन्तु जो मनुष्य संसारसे दुःखी होकर ऐसा सोचता है कि कोई तो अपना होता, जो मेरेको अपनी शरण लेकर, अपने गले लगाकर मेरे दुःख, सन्ताप, पाप, अभाव, भय, नीरसता आदिको हर लेता, उसको भक्ति प्राप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मुक्ति पानेके लिये ईश्वरकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत भक्ति पानेके लिये ईश्वरकी आवश्यकता है। जब मनुष्य इस बातको जान लेता है कि इतने बड़े संसारमें, अनन्त ब्रह्माण्डोंमें कोई भी वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत जिसके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, वही अपना है, तब उसके भीतर भगवान्की आवश्यकताका अनुभव होता है। कारण कि अपनी वस्तु वही हो सकती है, जो सदा हमारे साथ रहे और हम सदा उसके साथ रहें। जो कभी हमारेसे अलग न हो और हम कभी उससे अलग न हों। ऐसी वस्तु भगवान् ही हो सकते हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब मनुष्यको भगवान्की आवश्यकता है, तो फिर भगवान् मिलते क्यों नहीं? इसका कारण यह है कि मनुष्य भगवान्की प्राप्तिके बिना सुख-आरामसे रहता है, वह अपनी आवश्यकताको भूल रहा है। वह मिली हुई वस्तु, योग्यता और सामर्थ्यमें ही सन्तोष कर लेता है। अगर वह भगवान्की आवश्यकताका अनुभव

१-जो मुक्त हो जाता है, उसको तो स्वाभाविक ही सन्तोष हो जाता है, पर जिसके भीतर भक्तिके संस्कार हैं, उसको सन्तोष नहीं होता। कारण कि भक्तिके संस्कारवालेपर भगवान् विशेष कृपा करते हैं और उसको कहीं अटकने नहीं देते।

२-यहाँ शंका हो सकती है कि रातको सूर्य नहीं रहता, फिर भी अग्नि रातको ऊपरकी तरफ क्यों जाती है? इसका समाधान है कि रात हो या दिन, सूर्य कहीं भी रहे, वह सदा पृथ्वीसे ऊपर ही रहता है। इसलिये जैसे भारतके लोग सूर्यको पृथ्वीसे ऊपर देखते हैं, ऐसे ही (पृथ्वीमण्डलपर भारतसे लगभग विपरीत दिशामें स्थित) अमेरिकाके लोग भी सूर्यको ऊपर ही देखते हैं।

श्लोक ४-५ * साधक-संजीवनी * ४९९

करे, उनके बिना चैनसे न रह सके तो भगवान्‌की प्राप्तिमें देरी नहीं है। कारण कि जो नित्यप्राप्त है, उसकी प्राप्तिमें क्या देरी? भगवान्‌ कोई वृक्ष तो हैं नहीं कि आज बोयेंगे और वर्षोंके बाद फल मिलेगा! वे तो सब देशमें, सब समयमें, सब वस्तुओंमें, सब अवस्थाओंमें, सब परिस्थितियोंमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। हम ही उनसे विमुख हुए हैं, वे हमसे कभी विमुख नहीं हुए।

सम्बन्ध—दूसरे श्लोकमें भगवान्‌ने ज्ञान-विज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अब भगवान्‌ ज्ञान-विज्ञान कहनेका उपक्रम करते हैं।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरैव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५॥

भूमिः = पृथ्वी, आपः = जल, अनलः = तेज, वायुः = वायु, खम् = आकाश (—ये पंचमहाभूत), च = और, मनः = मन, बुद्धिः = बुद्धि, एव = तथा, अहङ्कारः = अहंकार—

इति = इस प्रकार, इयम् = यह, अष्टधा = आठ प्रकारके, भिन्ना = भेदोंवाली, मे = मेरी, इयम् = यह, अपरा = अपरा, प्रकृतिः = प्रकृति है; तु = और, महाबाहो = हे महाबाहो!, इतः = इस अपरा प्रकृतिसे

अन्याम् = भिन्न, जीवभूताम् = जीवरूप बनी हुई, मे = मेरी, पराम् = परा, प्रकृतिम् = प्रकृतिको, विद्धि = जान, यया = जिसके द्वारा, इदम् = यह, जगत् = जगत्, धार्यते = धारण किया जाता है।

व्याख्या—[जो परिवर्तनशील है, कभी एकरूप नहीं रहता, उस जड़का ही भगवान्‌ने अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे 'क्षर' नामसे वर्णन किया है—'क्षरः सर्वाणि भूतानि' (१५।१६), फिर 'भूमिरापोऽनलो वायुः ............. प्रकृतिरष्टधा' (७।४)—इस श्लोकमें उसीको आठ भेदोंवाली 'अपरा प्रकृति' के नामसे कहा है और फिर 'महाभूता-न्यहङ्कारः......... पञ्च चेन्द्रियगोचराः' (१३।५)—इस श्लोकमें उसीके विस्तारसे चौबीस भेद बताये हैं।] 'भूमिरापोऽनलो वायुः ...... विद्धि मे पराम्'—परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं*। जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं, उसका नाम 'अपरा प्रकृति' है और अपना अंश जो जीव है, उसको भगवान्‌ 'परा प्रकृति' कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड़ और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तनरहित है। प्रत्येक मनुष्यका भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते, ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतंत्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है; इसलिये इसका नाम 'प्रकृति' है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि यह परमात्मा स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह

  • कहीं तो प्रकृतिको लेकर भगवान्‌ रचना करते हैं (गीता—नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और कहीं भगवान्‌की अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करती है (गीता—नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)—इन दोनों ही रीतियोंसे गीतामें संसारकी रचनाका वर्णन आता है।

५००

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

परमात्मस्वरूप ही है; फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)।

यहाँ अपरा प्रकृतिमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ शब्द लिये गये हैं। इनमेंसे अगर पाँच स्थूल भूतोंसे स्थूल सृष्टि मानी जाय तथा मन, बुद्धि और अहंकार—इन तीनोंसे सूक्ष्म सृष्टि मानी जाय तो इस वर्णनमें स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि तो आ जाती है, पर कारणरूप प्रकृति इसमें नहीं आती। कारणरूप प्रकृतिके बिना प्रकृतिका वर्णन अधूरा रह जाता है। अतः आदरणीय टीकाकारोंने पाँच स्थूल भूतोंसे सूक्ष्म पंचतन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)—को लिया है, जो कि पाँच स्थूल भूतोंकी कारण हैं। 'मन' शब्दसे अहंकार लिया है, जो कि मनका कारण है। 'बुद्धि' शब्दसे महत्त्व (समष्टि बुद्धि) और 'अहंकार' शब्दसे प्रकृति ली गयी है। इस प्रकार इन आठ शब्दोंका ऐसा अर्थ लेनेसे ही समष्टि अपरा प्रकृतिका पूरा वर्णन होता है; क्योंकि इसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीनों समष्टि शरीर आ जाते हैं। शास्त्रोंमें इसी समष्टि प्रकृतिका 'प्रकृति-विकृति'के नामसे वर्णन किया गया है*। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि भगवान्ने यहाँ अपरा और परा प्रकृतिका वर्णन 'प्रकृति-विकृति' की दृष्टिसे नहीं किया है। यदि भगवान् 'प्रकृति-विकृति' की दृष्टिसे वर्णन करते तो चेतनको प्रकृतिके नामसे कहते ही नहीं; क्योंकि चेतन न तो प्रकृति है और न विकृति है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यहाँ जड़ और चेतनका विभाग बतानेके लिये ही अपरा प्रकृतिके नामसे जड़का और परा प्रकृतिके नामसे चेतनका वर्णन किया है।

यहाँ यह आशय मालूम देता है कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच तत्त्वोंके स्थूलरूपसे स्थूल सृष्टि ली गयी है और इनका सूक्ष्मरूप जो पंचतन्मात्राएँ कही जाती हैं, उनसे सूक्ष्मसृष्टि ली गयी है। सूक्ष्मसृष्टिके

  • मूलप्रकृतिविकृतिमहदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥

( सांख्यकारिका ३ )

तात्पर्य है कि मूल प्रकृति तो किसीसे पैदा नहीं होती; अतः यह किसीकी भी विकृति (कार्य) नहीं है। मूल प्रकृतिसे पैदा होनेके कारण महत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ—ये सात पदार्थ 'विकृति' भी हैं और शब्दादि पाँच विषयों तथा दस इन्द्रियोंके कारण होनेसे 'प्रकृति' भी हैं अर्थात् ये सातों पदार्थ 'प्रकृति-विकृति' हैं। शब्दादि पाँच विषय, दस इन्द्रियाँ और मन—ये सोलह पदार्थ केवल 'विकृति' हैं; क्योंकि ये किसीकी भी प्रकृति (कारण) नहीं हैं अर्थात् इनसे कोई भी पदार्थ पैदा नहीं होता।

चेतन न प्रकृति है और न विकृति ही है अर्थात् यह न तो किसीका कारण है और न कार्य।

अंग मन, बुद्धि और अहंकार हैं।

अहंकार दो प्रकारका होता है—(१) 'अहं-अहं' करके अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम भी अहंकार है, जो कि कारणरूप है। यह हुई 'अपरा प्रकृति', जिसका वर्णन यहाँ चौथे श्लोकमें हुआ है और (२) 'अहम्'-रूपसे व्यक्तित्व, एकदेशीयताका नाम भी अहंकार है, जो कि कर्तारूप है अर्थात् अपनेको क्रियाओंका करनेवाला मानता है। यह हुई 'परा प्रकृति', जिसका वर्णन यहाँ पाँचवें श्लोकमें हुआ है। यह अहंकार कारणशरीरमें तादात्म्यरूपसे रहता है। इस तादात्म्यमें एक जड़-अंश है और एक चेतन-अंश है। इसमें जो जड़-अंश है, वह कारण-शरीर है और उसमें जो अभिमान करता है, वह चेतन-अंश है। जबतक बोध नहीं होता, तबतक यह जड़-चेतनके तादात्म्यवाला कारण-शरीरका 'अहम्' कर्तारूपसे निरन्तर बना रहता है। सुषुप्तिके समय यह सुप्तारूपसे रहता है अर्थात् प्रकट नहीं होता। नींदसे जगनेपर 'मैं सोया था, अब जाग्रत् हुआ हूँ' इस प्रकार 'अहम्' की जागृति होती है। इसके बाद मन और बुद्धि जाग्रत् होते हैं; जैसे—मैं कहाँ हूँ, कैसे हूँ—यह मनकी जागृति हुई और मैं इस देशमें, इस समयमें हूँ—ऐसा निश्चय होना बुद्धिकी जागृति हुई। इस प्रकार नींदसे जगनेपर जिसका अनुभव होता है, वह 'अहम्' परा प्रकृति है और वृत्तिरूप जो अहंकार है, वह अपरा प्रकृति है। इस अपरा प्रकृतिको प्रकाशित करनेवाला और आश्रय देनेवाला चेतन जब अपरा प्रकृतिको अपनी मान लेता है, तब वह जीवरूप परा प्रकृति होती है—'यथेदं धार्यते जगत्'।

अगर यह परा प्रकृति अपरा प्रकृतिसे विमुख होकर परमात्माके ही सम्मुख हो जाय, परमात्माको ही अपना माने और अपरा प्रकृतिको कभी भी अपना न माने अर्थात् अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर निर्लिप्तताका अनुभव कर ले तो इसको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। स्वरूपका बोध हो जानेपर परमात्माका प्रेम प्रकट हो जाता

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

५०९

है*, जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त, अगाध, असीम, आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्त-प्राप्त्य हो जाती है, अपने असंगरूपका अनुभव होनेसे ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानव-जीवनकी पूर्णता है, सफलता है।

‘प्रकृतिरष्टधा अपरेयम्’ पदोंसे ऐसा मालूम देता है कि यहाँ जो आठ प्रकारकी अपरा प्रकृति कही गयी है, वह ‘व्यष्टि अपरा प्रकृति’ है। इसका कारण यह है कि मनुष्यको व्यष्टि प्रकृति—शरीरसे ही बन्धन होता है, समष्टि प्रकृतिसे नहीं। कारण कि मनुष्य व्यष्टि शरीरके साथ अपनापन कर लेता है, जिससे बन्धन होता है।

व्यष्टि कोई अलग तत्त्व नहीं है, प्रत्युत समष्टिका ही एक क्षुद्र अंश है। समष्टिसे माना हुआ सम्बन्ध ही व्यष्टि कहलाता है अर्थात् समष्टिके अंश शरीरके साथ जीव अपना सम्बन्ध मान लेता है, तो वह समष्टिका अंश शरीर ही ‘व्यष्टि’ कहलाता है। व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है। इस बन्धनसे छुड़ानेके लिये भगवान्ने आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिका वर्णन करके कहा है कि जीवरूप परा प्रकृतिने ही इस अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। यदि धारण न करे तो बन्धनका प्रश्न ही नहीं है।

पंद्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको अपना अंश कहा है—‘ममैवांशो जीवलोकै जीवभूतः सनातनः।’ परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित रहनेवाले मन और पाँचों इन्द्रियोंको खींचता है अर्थात् उनको अपनी मानता है—‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।’ इसी तरह तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्ररूपसे समष्टिका वर्णन करके छठे श्लोकमें व्यष्टिके विकारोंका वर्णन किया; क्योंकि ये विकार व्यष्टिके ही होते हैं, समष्टिके नहीं। इन सबसे यही सिद्ध हुआ कि व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बाधक है। इस व्यष्टिसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही यहाँ व्यष्टि अपरा प्रकृतिका वर्णन किया गया है, जो कि समष्टिका ही अंग है। व्यष्टि प्रकृति

अर्थात् शरीर समष्टि सृष्टिमात्रके साथ सर्वथा अभिन्न है, भिन्न कभी हो ही नहीं सकता।

वास्तवमें मूल प्रकृति कभी किसीकी बाधक या साधक (सहायक) नहीं होती। जब साधक उससे अपना सम्बन्ध नहीं मानता, तब तो वह सहायक हो जाती है, पर जब वह उससे अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बाधक हो जाती है; क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे व्यष्टि अहंता (मैं-पन) पैदा होती है। यह अहंता ही बन्धनका कारण होती है।

यहाँ ‘इतीयं मे’ पदोंसे भगवान् यह चेता रहे हैं कि यह अपरा प्रकृति मेरी है। इसके साथ भूलसे अपनापन कर लेना ही बार-बार जन्म-मरणका कारण है; और जो भूल करता है, उसीपर भूलको मिटानेकी जिम्मेवारी होती है। अतः जीव इस अपराके साथ अपनापन न करे।

अहंतामें भोगेच्छा और जिज्ञासा—ये दोनों रहती हैं। इनमेंसे भोगेच्छाको कर्मयोगके द्वारा मिटाया जाता है और जिज्ञासाको ज्ञानयोगके द्वारा पूरा किया जाता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग—इन दोनोंमेंसे एकके भी सम्यक्तया पूर्ण होनेपर एक-दूसरेमें दोनों आ जाते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक) अर्थात् भोगेच्छाकी निवृत्ति होनेपर जिज्ञासाकी भी पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर भोगेच्छाकी भी निवृत्ति हो जाती है। कर्मयोगमें भोगेच्छा मिटनेपर तथा ज्ञानयोगमें जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर असंगता स्वतः आ जाती है। उस असंगताका भी उपभोग न करनेपर वास्तविक बोध हो जाता है और मनुष्यका जन्म सर्वथा सार्थक हो जाता है।

‘जीवभूताम्’ —वास्तवमें यह जीवरूप नहीं है, प्रत्युत जीव बना हुआ है। यह तो स्वतः साक्षात् परमात्माका अंश है। केवल स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही यह जीव बना है। यह सम्बन्ध जोड़ता है—अपने सुखके लिये। यही सुख इसके जन्म-मरणरूप महान् दुःखका खास कारण है।

‘महाबाहो’ —हे अर्जुन! तुम बड़े शक्तिशाली हो, इसलिये तुम अपरा और परा प्रकृतिके भेदको समझनेमें समर्थ हो। अतः तुम इसको समझो—‘विद्धि।’

  • जिस साधकमें ज्ञानमार्गका विशेष महत्त्व होता है, उसमें परमात्माका प्रेम अपने स्वरूपके आकर्षणके रूपमें प्रकट हो जायगा और जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, उसमें वह प्रभु-प्रेमके रूपमें प्रकट हो जायगा। यदि ज्ञानमार्गवाले साधकका आग्रह नहीं होगा तो उसमें भी प्रभु-प्रेम प्रकट हो जायगा। वास्तवमें स्वरूप-बोध होनेपर ज्ञानमार्गका आग्रह नहीं रहता; अतः उसमें प्रभु-प्रेम प्रकट हो जाता है। इस दृष्टिसे अन्तमें दोनों (भक्तियोगी और ज्ञानयोगी) एक हो जाते हैं।

५०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

'यथेदं धार्यते जगत्'—वास्तवमें यह जगत् जगद्गुरुप नहीं है, प्रत्युत भगवान्का ही स्वरूप है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), 'सदसच्चाहम्' (९।१९)। केवल इस परा प्रकृति—जीवने इसको जगत्-रूपसे धारण कर रहा है अर्थात् जीव इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मानकर अपने सुखके लिये इसका उपयोग करने लग गया। इसीसे जीवका बन्धन हुआ है। अगर जीव संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न मानकर इसको केवल भगवत्स्वरूप ही माने तो उसका जन्म-मरणरूप बन्धन मिट जायगा।

भगवान्की परा प्रकृति होकर भी जीवात्माने इस दृश्यमान जगत्को, जो कि अपरा प्रकृति है, धारण कर रहा है अर्थात् इस परिवर्तनशील, विकारी जगत्को स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मानकर 'मैं' और 'मेरे'-रूपसे धारण कर रहा है। जिसकी भोगों और पदार्थोंमें जितनी आसक्ति है, आकर्षण है, उसको उतना ही संसार और शरीर स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मालूम देता है। पदार्थोंका संग्रह तथा उनका उपभोग करनेकी लालसा ही खास बाधक है। संग्रहसे अभिमानजन्म सुख होता है और भोगोंसे संयोगजन्म सुख होता है। इस सुखासक्तिसे ही जीवने जगत्को जगत्-रूपसे धारण कर रहा है। सुखासक्तिके कारण ही वह इस जगत्को भगवत्स्वरूपसे नहीं देख सकता। जैसे स्त्री वास्तवमें जनन-शक्ति है; परन्तु स्त्रीमें आसक्त पुरुष स्त्रीको मातृरूपसे नहीं देख सकता, ऐसे ही संसार वास्तवमें भगवत्स्वरूप है; परंतु संसारको अपना भोग्य माननेवाला भोगासक्त पुरुष संसारको भगवत्स्वरूप नहीं देख सकता। यह भोगासक्ति ही जगत्को धारण कराती है अर्थात् जगत्को धारण करानेमें हेतु है।

दूसरी बात, मात्र मनुष्योंके शरीरोंकी उत्पत्ति रज-वीर्यसे ही होती है, जो कि स्वरूपसे स्वतः ही मलिन है। परंतु भोगोंमें आसक्त पुरुषोंकी उन शरीरोंमें मलिन बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत रमणीय बुद्धि होती है। यह रमणीय बुद्धि ही जगत्को धारण कराती है।

नदीके किनारे खड़े एक सन्तसे किसीने कहा कि 'देखिये महाराज! यह नदीका जल बह रहा है और उस पुलपर मनुष्य बह रहे हैं।' सन्तने उससे कहा कि 'देखो भाई! नदीका जल ही नहीं, खुद नदी भी बह रही है; और पुलपर मनुष्य ही नहीं, खुद पुल भी बह रहा है।' तात्पर्य

यह हुआ कि ये नदी, पुल तथा मनुष्य बड़ी तेजीसे नाशकी तरफ जा रहे हैं। एक दिन न यह नदी रहेगी, न यह पुल रहेगा और न ये मनुष्य रहेंगे। ऐसे ही यह पृथ्वी भी बह रही है अर्थात् प्रलयकी तरफ जा रही है। इस प्रकार भावरूपसे दीखनेवाला यह सारा जगत् प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है; परन्तु जीवने इसको भावरूपसे अर्थात् 'है' रूपसे धारण (स्वीकार) कर रहा है। परा प्रकृतिकी (स्वरूपसे) उत्पत्ति नहीं होती; पर अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेके कारण यह शरीरकी उत्पत्तिको अपनी उत्पत्ति मान लेता है और शरीरके नाशको अपना नाश मान लेता है, जिससे यह जन्मता-मरता रहता है। अगर यह अपराके साथ सम्बन्ध न जोड़े, इससे विमुख हो जाय अर्थात् भावरूपसे इसको सत्ता न दे तो जगत् सत्-रूपसे दीख ही नहीं सकता।

'इदम्' पदसे शरीर और संसार—दोनों लेने चाहिये; क्योंकि शरीर और संसार अलग-अलग नहीं हैं। तत्त्वतः (धातु चीज) एक ही है। शरीर और संसारका भेद केवल माना हुआ है, वास्तवमें अभेद ही है। इसलिये तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने 'इदं शरीरम्' पदोंसे शरीरको क्षेत्र बताया (तेरहवें अध्यायका पहला श्लोक); परन्तु जहाँ क्षेत्रका वर्णन किया है, वहाँ समष्टिका ही वर्णन हुआ है (तेरहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और इच्छा-द्वेषादि विकार व्यष्टिके माने गये हैं (तेरहवें अध्यायका छठा श्लोक); क्योंकि इच्छा आदि विकार व्यष्टि प्राणीके ही होते हैं। तात्पर्य है कि समष्टि और व्यष्टि तत्त्वतः एक ही हैं। एक होते हुए भी अपनेको शरीर माननेसे 'अहंता' और शरीरको अपना माननेसे 'ममता' पैदा होती है, जिससे बन्धन होता है। अगर शरीर और संसारकी अभिन्नताका अथवा अपनी और भगवान्की अभिन्नताका साक्षात् अनुभव हो जाय तो अहंता और ममता स्वतः मिट जाती हैं। ये अहंता और ममता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंसे ही मिटती हैं। कर्मयोगसे—'निर्ममो निरहङ्कारः' (गीता २।७१), ज्ञानयोगसे—'अहङ्कारः' विमुच्य निर्ममः' (गीता १८।५३) और भक्तियोगसे 'निर्ममो निरहङ्कारः' (गीता १२।१३)। तात्पर्य है कि जड़ताके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होना चाहिये, जो कि केवल माना हुआ है। अतः विवेकपूर्वक न माननेसे अर्थात्

  • गीतामें 'जगत्' शब्द कहीं 'परा' प्रकृतिका (७।१३), कहीं 'अपरा' प्रकृतिका (७।५) और कहीं 'परा-अपरा' दोनों प्रकृतियोंका वाचक है (७।६)।

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

५०३

वास्तविकताका अनुभव करनेसे वह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है।

विशेष बात

जैसे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध होता है, तो इसमें गुरु शिष्यको अपना शिष्य मानता है। शिष्य गुरुको अपना गुरु मानता है। इस प्रकार गुरु अलग है और शिष्य अलग है अर्थात् उन दोनोंकी अलग-अलग सत्ता दीखती है। परन्तु उन दोनोंके सम्बन्धसे एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको 'सम्बन्धकी सत्ता' कहते हैं*। ऐसे ही साक्षात् परमात्माके अंश जीवने शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। इस सम्बन्धके कारण एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको 'मैं'-पन कहते हैं। सम्बन्धकी यह सत्ता ('मैं'-पन) केवल मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। जीव भूलसे इस माने हुए सम्बन्धको सत्य मान लेता है अर्थात् इसमें सदभाव कर लेता है और बँध जाता है। इस प्रकार जीव संसारसे नहीं, प्रत्युत संसारसे माने हुए सम्बन्धसे ही बँधता है।

गुरु और शिष्यमें तो दोनोंकी अलग-अलग सत्ता है और दोनों एक-दूसरेसे सम्बन्ध मानते हैं; परन्तु जीव (चेतन) और संसार (जड)—इन दोनोंमें केवल एक जीवकी ही वास्तविक सत्ता है और यही भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानता है। संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है; अतः उससे माना हुआ सम्बन्ध भी प्रतिक्षण स्वतः नष्ट हो रहा है। ऐसा होते हुए भी जबतक संसारमें सुख प्रतीत होता है, तबतक उससे माना हुआ सम्बन्ध स्थायी प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध सुखासक्तिपर ही टिका हुआ है। संसारसे सुखासक्तिपूर्वक माने हुए सम्बन्धके कारण ही संसार अप्राप्त होनेपर भी

प्राप्त और परमात्मा प्राप्त होनेपर भी अप्राप्त प्रतीत हो रहे हैं। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही परमात्माके वास्तविक सम्बन्धका अथवा संसारकी अप्राप्ति और परमात्माकी प्राप्तिका अनुभव हो जाता है।

'मैं'-पनको मिटानेके लिये साधक प्रकृति और प्रकृतिके कार्यको न तो अपना स्वरूप समझे, न उससे कुछ मिलनेकी इच्छा रखे और न ही अपने लिये कुछ करे। जो कुछ करे, वह सब केवल संसारकी सेवाके लिये ही करता रहे। तात्पर्य है कि जो कुछ प्रकृतिजन्य पदार्थ हैं, उन सबकी संसारके साथ एकता है; अतः उनको केवल संसारका मानकर संसारकी ही सेवामें लगाता रहे। इससे क्रिया और पदार्थोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना स्वरूप अवशिष्ट रह जाता है अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। यह कर्मयोग हुआ। ज्ञानयोगमें विवेक-विचारपूर्वक प्रकृतिके कार्य पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकार जड़के सम्बन्धसे जो अहंता ('मैं'-पन) पैदा हुई थी, उसकी निवृत्ति हो जाती है।

भक्तियोगमें 'मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ और शरीर-संसार मेरे नहीं हैं'—ऐसी दृढ़ मान्यता करके भक्त संसारसे विमुख होकर केवल भगवत्परायण हो जाता है, जिससे संसारका सम्बन्ध स्वतः टूट जाता है और अहंताकी निवृत्ति हो जाती है।

इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक अनुष्ठान करनेपर जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव —जब चेतन अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य कर लेता है अर्थात् 'अहम्' के साथ एक होकर अपनेको 'मैं हूँ' ऐसा मान लेता है, तब वह जीवरूप बनी हुई 'परा प्रकृति' कहलाता है। 'अहम्' (मैं) से इधर जगत् (अपरा प्रकृति) है और उधर परमात्मा हैं। परन्तु जीव उन परमात्माको स्वीकार न करके, प्रत्युत उनकी अपरा प्रकृतिको स्वीकार करके उसको जगत्-रूपसे धारण कर लेता है और जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है।

'अपरेयमितस्वन्त्याम्' —अपरासे अन्य परा है और परासे अन्य अपरा है। अपरा 'अन्य' अर्थात् विजातीय है। अन्यको पकड़नेसे ही परा 'जीव' बनी है—'जीवभूताम्'।

अपरा (परिवर्तनशील) और परा (अपरिवर्तनशील)—दोनों ही भगवान्की प्रकृतियाँ अर्थात् शक्तियाँ हैं, स्वभाव हैं। भगवान्की शक्ति होनेसे दोनों भगवान्से अभिन्न हैं; क्योंकि शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। जैसे

  • गुरु-शिष्यके सम्बन्धमें गुरुका काम केवल शिष्यका हित करना है और शिष्यका काम केवल गुरुकी सेवा करना है। इस प्रकार संसारमें माने हुए जितने भी सम्बन्ध हैं, सब केवल एक-दूसरेका हित या सेवा करनेके लिये ही हैं, अपने लिये नहीं।

५०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

नख और केश निष्प्राण होनेपर भी हमारे प्राणयुक्त शरीरसे अलग नहीं हैं, ऐसे ही अपरा प्रकृति जड़ होनेपर भी चेतन भगवान्से अलग नहीं है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। इस प्रकार जब अपरा और परा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्का स्वरूप हुईं तो फिर भगवान्के सिवाय क्या शेष रहा? कुछ भी शेष नहीं रहा—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। तात्पर्य है कि अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके सहित भगवान्का स्वरूप ‘समग्र’ है अर्थात् परा-अपरा, सत्-असत्, जड़-चेतन सब कुछ भगवान् ही हैं।

‘ययेदं धार्यते जगत्’ का तात्पर्य है कि संसार न तो भगवान्की दृष्टिमें है और न महात्माकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टि-(मान्यता-) में है। भगवान्की दृष्टिमें सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९) और महात्माकी दृष्टिमें भी सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। जीवने ही राग-द्वेषके कारण जगत्को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ पदोंसे कहा गया है। जगत्को सत्ता देनेसे ही राग-द्वेष पैदा होते हैं।

जीवने संसारकी सत्ता मान ली और सत्ता मानकर उसको महत्ता दे दी। महत्ता देनेसे कामना अर्थात् सुखभोगकी इच्छा पैदा हुई, जिससे जीव जन्म-मरणमें पड़ गया। तात्पर्य यह हुआ कि एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही जीव संसार-बन्धनमें पड़ा है। अतः दूसरी सत्ता न माननेकी जिम्मेवारी जीवकी ही है। अगर वह संसारकी सत्ता न माने तो संसार है ही कहाँ?

भगवान्ने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंको अपरा (जड़) प्रकृति कहा है। अतः जैसे पृथ्वी जड़ और जाननेमें आनेवाली है, ऐसे ही अहम् भी जड़ और जाननेमें आनेवाला है। तात्पर्य है कि पृथ्वी, जल आदि आठों एक ही जातिके हैं। अतः जिस जातिकी पृथ्वी है, उसी जातिका अहम् भी है अर्थात् अहम् भी मिट्टीके ढेलेकी तरह जड़ और दूष्य है। अतः भगवान्ने अहम्को एतत्तासे कहा है; जैसे—‘एतद् यो वेत्ति’ (गीता १३।१)। ‘एतत्’ (यह) कभी ‘अहम्’ (मैं) नहीं होता; अतः अहम्को एतत्तासे कहनेका तात्पर्य है कि यह अपना स्वरूप नहीं है। परन्तु जब चेतन (जीव) इस अहम्के साथ अपना तादात्म्य मान लेता है, तब वह बँध जाता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। इसीको चिञ्चदुग्रन्थि कहते हैं।

‘अहङ्कार इतीयं मे’—यह धातुरूप अहंकार तो अपरा प्रकृतिका (जड़) है, पर ‘मैं हूँ’—यह ग्रन्थिरूप अहंकार केवल अपरा प्रकृति नहीं है, प्रत्युत इसमें परा प्रकृति (चेतन) भी मिली हुई है। तत्त्वज्ञान होनेपर यह जन्म-मरण देनेवाला ग्रन्थिरूप अहंकार तो नहीं रहता, पर अपरा प्रकृतिका धातुरूप अहंकार रहता है।

क्रिया और पदार्थ न तो परा प्रकृतिमें हैं और न परमात्मामें हैं, प्रत्युत अपरा प्रकृतिमें हैं। अपरा प्रकृति क्रियारूप और पदार्थरूप है। परमात्मा प्रकृतिकी सहायतासे ही सृष्टि-रचना करते हैं। परा प्रकृति अर्थात् जीव क्रिया और पदार्थरूप अपरा प्रकृतिमें आसक्ति करके और उसका आश्रय लेकर बँध जाता है। अपराकी आसक्ति और उसका आश्रय लेना ही जगत्को धारण करना है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ही ‘मव्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः’ पदोंसे अपनेमें आसक्ति (प्रेम) करने और अपना आश्रय लेनेकी बात कही है। अगर जीव अपरा प्रकृतिमें आसक्ति न रखे और उसका आश्रय न ले तो वह ‘मुक्त’ हो जायगा। अगर वह भगवान्में आसक्ति (प्रेम) करे और उनका आश्रय ले तो वह ‘भक्त’ हो जायगा।

जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। बाँधनेवाला जगत् तो जीवने ही बना रखा है। जीव जगत्को धारण करता है, इसीसे सुख-दुःख होते हैं, बन्धन होता है, चौरासी लाख योनियाँ, भूत, प्रेत, पिशाच, देवता आदि योनियाँ तथा नरकोंकी प्राप्ति

१-पृथ्वी स्थूल है। पृथ्वीसे सूक्ष्म जल है। जलसे सूक्ष्म तेज है। तेजसे सूक्ष्म वायु है। वायुसे सूक्ष्म आकाश है। आकाशसे सूक्ष्म मन है। मनसे सूक्ष्म बुद्धि है। बुद्धिसे सूक्ष्म अहम् है। अपरा प्रकृतिमें अहम् सबसे सूक्ष्म है। इस प्रकार भगवान्ने स्थूलसे सूक्ष्म तक क्रमसे अपरा प्रकृतिका वर्णन किया है।

२-एक अनेकमें अनुगत हो तो उसे ‘जाति’ कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंमें जातीय एकता तो है, पर स्वरूपकी एकता नहीं है अर्थात् जाति एक होनेपर भी इनका स्वरूप अलग-अलग है। इसीलिये इसको ‘अष्टधा’ कहा गया है। अपरा प्रकृतिका कार्य होनेसे यहाँ पृथ्वी, जल आदिको भी अपरा प्रकृति कहा गया है।

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

५०५

होती है। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण कोई बाधा नहीं देते; परन्तु इनका संग करनेसे जीव ऊर्ध्वगति, मध्यगति अथवा अधोगतिमें जाता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु ’ (गीता १३।२१)। गुणोंका संग जीव स्वयं करता है। अपरा प्रकृति किसीके साथ कोई सम्बन्ध नहीं करती। सम्बन्ध न प्रकृति करती है, न गुण करते हैं, न इन्द्रियाँ करती हैं, न मन करता है, न बुद्धि करती है। जीव स्वयं ही सम्बन्ध करता है, इसीलिये सुखी-दुःखी हो रहा है, जन्म-मरणमें जा रहा है। जीव स्वतन्त्र है; क्योंकि यह ‘परा’ अर्थात् उत्कृष्ट प्रकृति है। अपरा प्रकृति तो बेचारी कुछ नहीं करती; क्योंकि उसमें चेतना और कामना नहीं है। उससे सम्बन्ध जोड़कर, उसका सदुपयोग-दुरुपयोग करके जीव ऊँच-नीच योनियोंमें जाता है, भटकता है। तात्पर्य है कि अपरिवर्तनशील होते हुए भी जीव विजातीय जगत्के साथ सम्बन्ध जोड़कर परिवर्तनशील जगत्-रूप हो जाता है१ (इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। उसकी दृष्टि शरीरकी तरफ ही रहती है, अपने स्वरूपकी स्फुरणा होती ही नहीं!

जो हमसे सर्वथा अलग है, उस जगत् अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्के साथ अपनी एकता मान ली—यही जगत्को धारण करना है। वास्तवमें जगत् हमारा है ही नहीं; क्योंकि अगर हमारी चीज हमारेको मिल गयी होती तो हमारी कामनाएँ सदाके लिये मिट जातीं, हम निर्मम, निर्भय, निश्चिन्त, निष्काम हो जाते। परन्तु जगत् हमें ऐसी चीज नहीं दे सकता, जो हमारी हो अर्थात् जो हमसे कभी बिछुडे नहीं। जो चीज वास्तवमें हमारी है, वह जगत्के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती, प्रत्युत जगत्के सम्बन्ध-विच्छेदसे प्राप्त हो सकती है। हमारी वस्तु है—परमात्मा। हम उस परमात्माके ही अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (गीता १५।७)। उसकी प्राप्तिका उपाय (कर्मयोगकी दृष्टिसे) यह है कि जगत्से मिली हुई वस्तुओं-(शरीरादि-) को जगत्की ही सेवामें लगा दें और बदलेमें उससे कुछ भी आशा (फलेच्छा) न रखें। उससे कोई सम्बन्ध न जोड़ें, न क्रियाके साथ, न पदार्थके साथ। सेवा करनेकी अपेक्षा भी किसीको दुःख न देना श्रेष्ठ है। किसीको भी दुःख न देनेसे, किसीका भी अहित न करनेसे सेवा अपने-आप होने लगती है, करनी नहीं पड़ती२। अपने-आप होनेवाली क्रियाका अभिमान नहीं होता और उसके फलकी इच्छा भी नहीं होती। अभिमान और फलेच्छाका त्याग होनेपर हमें वह वस्तु मिल जाती है, जो वास्तवमें हमारी है।

वास्तवमें अपरा प्रकृतिकी परमात्माके सिवाय अलग सत्ता है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भावः ’। उसको विशेष सत्ता जीवने ही दी है। जैसे, रूपयोंकी अपनी कोई महत्ता नहीं है, हम ही लोभके कारण उसको महत्ता देते हैं। हम जिसको महत्ता देते हैं, उसीमें हमारा आकर्षण होता है। महत्ता तब देते हैं, जब दोषोंको स्वीकार करते हैं३। कामरूप दोषके कारण ही स्त्रीमें आकर्षण होता है, लोभ-रूप दोषके कारण ही धनमें आकर्षण होता है, मोह-रूप दोषके कारण ही कुटुम्ब-परिवारमें आकर्षण होता है, आदि। परन्तु दोषोंके साथ तादात्म्य होनेके कारण दोष दोषरूपसे नहीं दीखते और हमें इस बातका पता नहीं लगता कि हम ही उनको (अपरा प्रकृतिको) सत्ता और महत्ता दे रहे हैं। तादात्म्य मिटनेपर दोष तो रहते नहीं और गुण दीखते नहीं!

अनन्त ब्रह्माण्डोंमें तीन लोक, चौदह भुवन, जड़-चेतन, स्थावर-जंगम, थलचर-जलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-स्वेदज-उद्भिज्ज, सात्त्विक-राजस-तामस, मनुष्य, देवता, पितर, गन्धर्व, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, भूत-प्रेत-पिशाच, ब्रह्म-राक्षस आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है, उसमें ‘परा’ और ‘अपरा’—इन दो प्रकृतियोंके सिवाय कुछ भी नहीं है। जो देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है और जिन शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्के

१-यहाँ ‘जगत्’ शब्द परिवर्तनशीलका वाचक है—‘गच्छतीति जगत्’।

२-किसीका भी अहित न करनेसे दो बातें होंगी—हम कुछ नहीं करेंगे, अगर कुछ करेंगे तो हमारेसे सेवा ही होगी। कुछ न करना अथवा सेवा करना—इन दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। कारण कि कुछ न करनेमें कोई दोष होता ही नहीं और अपने-आप सेवा होनेसे सब दोष मिट जाते हैं। जैसे भोजन करनेमें ‘मैं खाता हूँ’—इस प्रकार जो अभिमान होता है, वह भोजन पचनेमें नहीं होता; क्योंकि वह अपने-आप पचता है। ऐसे ही सेवा अपने-आप होनेसे कर्तृत्वाभिमान और फलासक्तिका त्याग स्वतः होता है।

३-संसारके सब सुख दोषजनित हैं। दोषोंको स्वीकार करनेसे ही सुख दीखता है। कामके कारण ही मनुष्य स्त्रीके बिना नहीं रह सकता। लोभके कारण ही मनुष्य धनके बिना नहीं रह सकता। मोहके कारण ही मनुष्य परिवारके बिना नहीं रह सकता। दोषके कारण ही उसको त्यागका महत्त्व नहीं दीखता।

५०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

द्वारा देखा, सुना, पढ़ा, सोचा जाता है, वह सब-का-सब 'अपरा' है। परन्तु जो देखता, सुनता, पढ़ता, सोचता, जानता, मानता है, वह 'परा' है। परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्तियाँ होनेसे भगवान्से अभिन्न अर्थात् भगवत्स्वरूप ही हैं। अतः अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रूपमें एक भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), 'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९)। संसारके सभी दर्शन, मत-मतान्तर आचार्योंको लेकर हैं, पर 'वासुदेवः सर्वम्' किसी आचार्यका दर्शन, मत नहीं है, प्रत्युत साक्षात् भगवान्का अटल सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी दर्शन, मत-मतान्तर आ जाते हैं।

'अपरा' (जगत्) को स्वतन्त्र सत्ता जीवने ही दी है—'यदेदं धार्यते जगत्'। 'अपरा' भगवान्की है, पर उसको अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्को अपना और अपने लिये मान लेनेसे ही जीव बन्धनमें पड़ा है। अतः साधकको अगर जगत् दीखता है तो यह उसकी व्यक्तित्व दृष्टि है। व्यक्तित्व दृष्टि सिद्धान्त नहीं होता। दीखना सीमित होता है, जबकि तत्त्व असीम है। जैसे, सूर्य थालीकी तरह दीखता है, पर वास्तवमें वह थालीके आकारका नहीं है, प्रत्युत पृथ्वीसे भी कई गुना अधिक बड़ा है!

अगर साधकको जगत् दीखता है तो उसको निष्कामभावपूर्वक जगत्की सेवा करनी चाहिये। जगत्को अपना और अपने लिये मानना तथा उससे सुख लेना ही असाधन है, बन्धन है। कारण कि हमारे पास शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि जो कुछ भी है, वह सब जगत्का है और जगत्के लिये है। अतः जगत्की वस्तुको जगत्की सेवामें लगानेसे जगत् जगत्-रूपसे नहीं दीखेगा, प्रत्युत भगवत्स्वरूप दीखने लगेगा, जो कि वास्तवमें है। तात्पर्य है कि साधक चाहे जगत्को माने, चाहे आत्माको माने, चाहे परमात्माको माने, किसीको भी मानकर वह साधन कर सकता है और अन्तिम तत्त्व 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव कर सकता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥

सर्वाणि= सम्पूर्णप्रकृतियोंकाकृत्स्नस्य= सम्पूर्ण
भूतानि= प्राणियोंके
(उत्पन्न होनेमें)संयोग ही कारण है—जगतः= जगत्का
एतद्योनीनि= अपरा और
परा—इन दोनोंइति = ऐसाप्रभवः= प्रभव
उपधारय = तुम समझो।तथा= तथा
अहम् = मैंप्रलयः= प्रलय हूँ।

व्याख्या —'एतद्योनीनि भूतानि'*—जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जंगम और वृक्ष, लता, घास आदि स्थावर प्राणी हैं, वे सब-के-सब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं।

तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति बताया है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बताया है कि स्थावर, जंगम

योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं, वे सब प्रकृतिके हैं और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है, वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने 'परा प्रकृति' (सातवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और 'अपना अंश' (पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) कहा है।

'सर्वाणीत्युपधारय'—'स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सब-के-सब अपरा और परा प्रकृतिके

  • 'एतद्योनीनि भूतानि' पदोंका अर्थ है—'एते अपरा-परे योनी कारणे येषां तानि' अर्थात् 'अपरा और परा—ये दो प्रकृतियाँ जिनकी कारण हैं, ऐसे सम्पूर्ण प्राणी'।

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५०७

संयोगसे ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि परा प्रकृतिने अपराको अपना मान लिया है, उसका संग कर लिया है, इसीसे सब प्राणी पैदा होते हैं—इसको तुम धारण करो अर्थात् ठीक तरहसे समझ लो अथवा मान लो।

‘अहं कृतनस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा’ —मात्र वस्तुओंको सता-स्फूर्ति परमात्मासे ही मिलती है, इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव (उत्पन्न करनेवाला) और प्रलय (लीन करनेवाला) हूँ।

‘प्रभवः’ का तात्पर्य है कि मैं ही इस जगत्का निमित्तकारण हूँ; क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे संकल्पसे पैदा हुई है—‘सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति’ (छान्दोग्य० ६। २। ३)।

जैसे घड़ा बनानेमें कुम्हार और सोनेके आभूषण बनानेमें सुनार ही निमित्तकारण है, ऐसे ही संसारमात्रकी उत्पत्तिमें भगवान् ही निमित्तकारण हैं।

‘प्रलयः’ कहनेका तात्पर्य है कि इस जगत्का उपादान-कारण भी मैं ही हूँ; क्योंकि कार्यमात्र उपादान-कारणसे उत्पन्न होता है; उपादान-कारण-रूपसे ही रहता है और अन्तमें उपादान-कारणमें ही लीन हो जाता है।

जैसे घड़ा बनानेमें मिट्टी उपादान-कारण है, ऐसे ही सृष्टिकी रचना करनेमें भगवान् ही उपादान-कारण हैं। जैसे घड़ा मिट्टीसे ही पैदा होता है, मिट्टीरूप ही रहता है और अन्तमें टूट करके घिसते-घिसते मिट्टी ही बन जाता है; और जैसे सोनेके यावन्मात्र आभूषण सोनेसे ही उत्पन्न होते हैं, सोनारूप ही रहते हैं और अन्तमें सोना ही रह जाता है, ऐसे ही यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है, भगवान्में ही रहता है और अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाता है। ऐसा जानना ही ‘ज्ञान’ है। सब कुछ भगवत्स्वरूप है, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं—ऐसा अनुभव हो जाना ‘विज्ञान’ है।

‘कृतनस्य जगतः’ पदोंमें भगवान्ने अपनेको जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय बताया है। इसमें जड-(अपरा प्रकृति-)का प्रभव और प्रलय बताना तो ठीक है, पर चेतन-(परा प्रकृति अर्थात् जीवात्मा-)का उत्पत्ति और विनाश कैसे हुआ? क्योंकि वह तो नित्य तत्त्व है—‘नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः’ (गीता २। २४)। जो परिवर्तनशील है, उसको जगत् कहते हैं—‘गच्छतीति जगत्’ । पर यहाँ जगत् शब्द जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण संसारका वाचक है। इसमें जड-अंश तो परिवर्तनशील है और चेतन-अंश सदा-सर्वथा परिवर्तनरहित तथा निर्विकार है। वह निर्विकार तत्त्व जब जड़के साथ अपना सम्बन्ध मानकर तादात्म्य कर लेता है, तब वह जड-(शरीर-) के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश मान लेता है। इसीसे उसके जन्म-मरण कहे जाते हैं। इसीलिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अपरा और परा प्रकृतिका प्रभव तथा प्रलय बताया है।

अगर यहाँ ‘जगत्’ शब्दसे केवल नाशवान् परिवर्तन-शील और विकारी संसारको ही लिया जाय, चेतनको नहीं लिया जाय तो बड़ी बाधा लगेगी। भगवान्ने ‘कृतनस्य जगतः’ पदोंसे अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है। अतः सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्गत स्थावर-जंगम, जड-चेतन सभी लिये जायेंगे। अगर केवल जड़को लिया जायगा तो चेतन-भाग छूट जायगा, जिससे ‘मैं सम्पूर्ण जगत्का कारण हूँ’ यह कहना नहीं बन सकेगा और आगे भी बड़ी बाधा लगेगी। कारण कि आगे इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि तीनों गुणोंसे मोहित जगत् मेरेको नहीं जानता, तो यहाँ जानना अथवा न जानना चेतनका ही हो सकता है, जड़का जानना अथवा न जानना होता ही नहीं। इसलिये ‘जगत्’ शब्दसे केवल जड़को ही नहीं, चेतनको भी लेना पड़ेगा।

१-इसमें एक विचित्र बात है कि सम्बन्ध केवल क्षेत्रज्ञने माना है, क्षेत्रने नहीं। यदि यह अपना सम्बन्ध न माने तो इसका पुनर्जन्म हो ही नहीं सकता; क्योंकि पुनर्जन्मका कारण गुणोंका संग ही है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु ।’ (गीता १३। २१)।

२-जीवोंके द्वारा किये हुए अनादिकालके कर्म जीवोंके प्रलयकालमें लीन होनेपर जब परिपक्व होते हैं अर्थात् फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब उससे (प्रलयका समय समाप्त होनेपर, सर्गके आदिमें) भगवान्का संकल्प होता है और उसी संकल्पसे शरीरोंकी उत्पत्ति होती है।

३-अपरा प्रकृति और भगवान्में तो कार्य-कारणका सम्बन्ध है; क्योंकि अपरा प्रकृति भगवान्का कार्य है। परन्तु परा प्रकृति और भगवान्में कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि परा प्रकृति (जीव) भगवान्का अंश है, कार्य नहीं। इसलिये अंश-अंशीकी दृष्टिसे ही भगवान् जीवके कारण कहे गये हैं, कार्य-कारणकी दृष्टिसे नहीं।

५०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

ऐसे ही सोलहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भी आसुरी सम्पदावालोंकी मान्यताके अनुसार 'जगत्' शब्दसे जड और चेतन—दोनों ही लेने पड़ेंगे; क्योंकि आसुरी सम्पदावाले व्यक्ति सम्पूर्ण शरीरधारी जीवोंको असत्य मानते हैं, केवल जडको नहीं। इसलिये अगर वहाँ 'जगत्' शब्दसे केवल जड संसार ही लिया जाय तो जगत्को (जड संसारको) असत्य, मिथ्या और अप्रतिष्ठित कहनेवाले अद्वैत-सिद्धान्ती भी आसुरी सम्पदावालोंमें आ जायेंगे, जो कि सर्वथा अनुचित है। ऐसे ही आठवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें आये 'शुक्लकृष्णो गती ह्येतं जगतः' पदोंमें

परिशिष्ट भाव— जो न खुदको जान सके और न दूसरेको जान सके, वह 'अपरा प्रकृति' है। जो खुदको भी जान सके और दूसरेको भी जान सके, वह 'परा प्रकृति' है। इन अपरा और परा—दोनोंके माने हुए संयोगसे ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी पैदा होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

मूल दोष एक ही है, जो स्थानभेदसे अनेक रूपसे दीखता है, वह है—अपराके साथ सम्बन्ध। इस एक दोषसे ही सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं। यह एक दोष आ जाय तो सम्पूर्ण दोष आ जायेंगे और यह एक दोष दूर हो जाय तो सम्पूर्ण दोष दूर हो जायेंगे। इसी तरह मूल गुण भी एक ही है, जिससे सम्पूर्ण गुण प्रकट होते हैं, वह है—भगवान्के साथ सम्बन्ध।

अपराको चाहे नित्य मानें, चाहे अनित्य मानें, पर उसके साथ हमारा सम्बन्ध अनित्य है—यह सर्वसम्मत बात है। यह सम्बन्ध ही जन्म-मरणका कारण है—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनम्यसु' (गीता १३।२१)। यही संसारका बीज है।

मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ—इसका तात्पर्य है कि इस स्थावर-जंगमरूप जगत्को मैं ही उत्पन्न करनेवाला हूँ और मैं ही उत्पन्न होनेवाला हूँ; मैं ही नाश करनेवाला हूँ और मैं ही नष्ट होनेवाला हूँ; क्योंकि मेरे सिवाय संसारका दूसरा कोई भी कारण तथा कार्य नहीं है (इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक) अर्थात् मैं ही इसका निमित्त तथा उपादान कारण हूँ। अतः जगत्-रूपसे मैं ही हूँ। नवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है—'अमृतं चैव मृत्युञ्च सदसच्चाहमर्जुन' अर्थात् 'अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।' श्रीमद्भगवतमें भगवान् कहते हैं—

आत्मैव तदिदं विश्वं सूज्यते सूजति प्रभुः। त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः॥

(११।२८।६)

'जो कुछ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वस्तु है, वह सर्वशक्तिमान् परमात्मा ही है। जो कुछ सृष्टि प्रतीत हो रही है, इसके निमित्त कारण भी वे ही हैं और उपादान कारण भी वे ही हैं अर्थात् वे ही विश्व बनाते हैं और वे ही विश्व बनते हैं। वे ही रक्षक हैं और वे ही रक्षित हैं। वे ही सर्वात्मा भगवान् इसका संहार करते हैं और जिसका संहार होता है, वह भी वे ही हैं।'

तैत्तिरीयोपनिषद्में आया है कि अन्न भी मैं ही हूँ और अन्नको खानेवाला भी मैं ही हूँ—'अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः।' (३।१०।६)

तात्पर्य यह हुआ कि अपरा और परा प्रकृति तथा उनके संयोगसे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण प्राणी—ये सब-के-सब एक भगवान् ही हैं। कारण भी भगवान् हैं और कार्य भी!

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपनेको परा और अपरा प्रकृतिरूप सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण बताया। अब भगवान्के सिवाय भी जगत्का और कोई कारण होगा—इसका आगेके श्लोकमें निषेध करते हैं।

मत्तः परतरं नात्यक्तिक्विदस्ति धनञ्जय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७॥

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

५०९

इसलिये—

धनञ्जय= हे धनंजय!(कारण तथा कार्य)(पिरोयी हुई होती हैं,)
मत्तः= मेरे= नहींइव= ऐसे ही
परतरम्= सिवाय (इस
जगत्का)अस्ति= है।इदम्= यह
अन्यत्= दूसरा कोईमणिगणाः= (जैसे सूतकी)
मणियाँसर्वम्= सम्पूर्ण जगत्
किञ्चित्= किञ्चिन्मात्र भीसूत्रे= सूतके धागेंमेंमयि= मेरेमें (ही)
प्रोतम्= ओतप्रोत है।

व्याख्या— मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय’— हे अर्जुन! मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं ही सब संसारका महाकारण हूँ। जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही रहती है और आकाशमें ही लीन होती है अर्थात् आकाशके सिवाय वायुकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ऐसे ही संसार भगवान्से उत्पन्न होता है, भगवान्में स्थित रहता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है अर्थात् भगवान्के सिवाय संसारकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

यहाँ ‘परतरम्’ कहकर सबका मूल कारण बताया गया है। मूल कारणके आगे कोई कारण नहीं है अर्थात् मूल कारणका कोई उत्पादक नहीं है। भगवान् ही सबके मूल कारण हैं। यह संसार अर्थात् देश, काल, व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदि सभी परिवर्तनशील हैं। परन्तु जिसके होनेपनसे इन सबका होनापन दीखता है अर्थात् जिसकी सत्तासे ये सभी ‘है’ दीखते हैं, वह परमात्मा ही इन सबमें परिपूर्ण हैं।

भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिसको जाननेके बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा—‘यज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ञातव्य-मवशिष्यते’ और यहाँ कहते हैं कि मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है—‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति’। दोनों ही जगह ‘न अन्यत्’ कहनेका तात्पर्य है कि जब मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं, तब मेरेको जाननेके बाद जानना कैसे बाकी रहेगा? अतः भगवान्ने यहाँ ‘मयि सर्वमिदं प्रोतम्’ और आगे ‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९) तथा ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९) कहा है।

परिशिष्ट भाव— जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेंमें पिरोयी हुईं हों तो उनमें सूतके सिवाय और कुछ नहीं है, ऐसे ही संसारमें भगवान्के सिवाय और कुछ नहीं है। तात्पर्य है कि मणिरूप अपरा प्रकृति और धागरूप परा प्रकृति—दोनोंमें भगवान् ही परिपूर्ण हैं। मणियाँ बननेमें अपरा प्रकृतिकी मुख्यता है और धागा बननेमें परा प्रकृतिकी मुख्यता है। ‘मणिगणाः’ पद बहुवचनमें देनेका तात्पर्य है कि अपरा प्रकृति स्थावर-जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, चौदह भुवन, चौरासी लाख योनियाँ आदि अनन्त रूपोंमें और अनन्त समुदायोंमें विभक्त है।

जो कार्य होता है, वह कारणके सिवाय अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। वास्तवमें कारण ही कार्यरूपसे दीखता है। इस प्रकार जब कारणका ज्ञान हो जायगा, तब कार्य कारणमें लीन हो जायगा अर्थात् कार्यकी अलग सत्ता प्रतीत नहीं होगी और ‘एक परमात्माके सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है’—ऐसा अनुभव स्वतः हो जायगा।

‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’ —यह सारा संसार सूतमें सूतकी ही मणियोंकी तरह मेरेमें पिरोया हुआ है अर्थात् मैं ही सारे संसारमें अनुस्पृृत (व्याप्त) हूँ। जैसे सूतसे बनी मणियोंमें और सूतमें सूतके सिवाय अन्य कुछ नहीं है; ऐसे ही संसारमें मेरे सिवाय अन्य कोई तत्त्व नहीं है। तात्पर्य है कि जैसे सूतमें सूतकी मणियाँ पिरोयी गयी हों तो दीखनेमें मणियाँ और सूत अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें सूत एक ही होता है। ऐसे ही संसारमें जितने प्राणी हैं, वे सभी नाम, रूप, आकृति आदिसे अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें व्याप्त रहनेवाला चेतन-तत्त्व एक ही है। वह चेतन-तत्त्व मैं ही हूँ—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्विद्व सर्वक्षेत्रेषु भारत’ (गीता १३।२) अर्थात् मणिरूप अपरा प्रकृति भी मेरा स्वरूप है और धागरूप परा प्रकृति भी मैं ही हूँ। दोनोंमें मैं ही परिपूर्ण हूँ, व्याप्त हूँ। साधक जब संसारको संसारबुद्धिसे देखता है, तब उसको संसारमें परिपूर्णरूपसे व्याप्त परमात्मा नहीं दीखते। जब उसको परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है, तब व्याप्य-व्यापक भाव मिटकर एक परमात्मतत्त्व ही दीखता है। इस तत्त्वको बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ कारणरूपसे अपनी व्यापकताका वर्णन किया है।

५२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

अपरा और पराका भेद 'अपरा' प्रकृतिके कारण ही है; क्योंकि अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही जीव है (इसी अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। अतः अपरा प्रकृति जगत्में भी है और जीवमें भी। परन्तु परमात्मामें न अपरा है, न परा है; न जगत् है, न जीव है। तात्पर्य है कि वास्तवमें न धागा है, न मणियाँ हैं, प्रत्युत एक सूत (रुई) ही है। इसी तरह न अपरा है, न परा है, प्रत्युत एक परमात्मा ही हैं। इसी बातका भगवान्ने आगे बारहवें श्लोकतक वर्णन किया है। इस श्लोकमें आये 'मत्तः' पदसे आरम्भ करके बारहवें श्लोकके 'मत्त एव' पदोंतक भगवान्ने यही बात बतायी है कि मेरे सिवाय कुछ भी नहीं है। यहाँ 'मत्तः' पद समग्र परमात्माका वाचक है, जो परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंका मालिक है।

कारण ही कार्यमें परिणत होता है; जैसे, रुई ही धागा बनती है, बीज ही वृक्ष बनता है। अतः सबके परम कारण भगवान् होनेसे सब रूपोंमें भगवान् ही हैं—'वासुदेवः सर्वम्।' इसलिये भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको देखना भूल है।

'मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति'—जो दोमें श्रेष्ठ हो, उसको 'परतर' कहते हैं। भगवान् अद्वितीय हैं, उनके सिवाय दूसरी कोई वस्तु ('पर') है ही नहीं, फिर वे 'परतर' कैसे हो सकते हैं? उनमें 'परतर' शब्द लागू ही नहीं होता। यहाँ भगवान्को अद्वितीय बतानेके लिये ही 'परतर' शब्द आया है। तात्पर्य है कि भगवान्से अन्य भी कुछ नहीं है और श्रेष्ठ भी कुछ नहीं है। उपनिषद्में आया है—

पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥

(कठ० १।३।११)

'पुरुषसे पर कुछ भी नहीं है। वही सबकी परम अवधि और वही परम गति है।'

अर्जुनने भी कहा है—

न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।

(गीता ११।४३)

सम्बन्ध—जो कुछ कार्य दीखता है, उसके मूलमें परमात्मा ही हैं—यह ज्ञान करानेके लिये अब भगवान् आठवेंसे बारहवें श्लोकतकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभारस्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥८॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!प्रभा= प्रभा (प्रकाश)शब्दः= शब्द
अप्सु= जलोंमेंअस्मि= मैं हूँ,(और)
रसः= रससर्ववेदेषु= सम्पूर्ण वेदोंमेंनृषु= मनुष्योंमें
अहम्= मैं हूँ,प्रणवः= प्रणव (ओंकार),पौरुषम्= पुरुषार्थ
शशिसूर्ययोः= चन्द्रमा और सूर्यमेंखे= आकाशमें(मैं हूँ)।

व्याख्या—[जैसे साधारण दृष्टिसे लोगोंने रुपयोंको ही सर्वश्रेष्ठ मान रखा है तो रुपये पैदा करने और उनका संग्रह करनेमें लोभी आदमीकी स्वाभाविक रुचि हो जाती है। ऐसे ही देखने, सुनने, मानने और समझनेमें जो कुछ जगत् आता है, उसका कारण भगवान् हैं (सातवें अध्यायका छठा श्लोक); भगवान्के सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—ऐसा माननेसे भगवान्में स्वाभाविक रुचि हो जाती है। फिर स्वाभाविक ही उनका भजन होता है। यही बात

दसवें अध्यायके आठवें श्लोकमें कही है कि 'मैं सम्पूर्ण संसारका कारण हूँ, मेरेसे ही संसारकी उत्पत्ति होती है'—ऐसा समझकर बुद्धिमान् मनुष्य मेरा भजन करते हैं। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें कहा है कि 'जिस परमात्मासे सम्पूर्ण जगत्की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है।' इसी सिद्धान्तको बतानेके लिये यह प्रकरण आया है।]

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

५११

‘रसोऽहमप्सु कौन्तेय’—हे कुन्तीनन्दन! जलोंमें ‘रस’ हूँ। जल रस-तन्मात्रासे पैदा होता है; रस-तन्मात्रामें रहता है और रस-तन्मात्रामें ही लीन होता है। जलमैंसे अगर ‘रस’ निकाल दिया जाय तो जलतत्त्व कुछ नहीं रहेगा। अतः रस ही जलरूपसे है। वह रस मैं हूँ।

‘प्रभास्मि शशिसूर्ययोः’—चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश करनेकी जो एक विलक्षण शक्ति ‘प्रभा’ है, वह मेरा स्वरूप है। प्रभा रूप-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, रूप-तन्मात्रामें रहती है और अन्तमें रूप-तन्मात्रामें ही लीन हो जाती है। अगर चन्द्रमा और सूर्यमेंसे प्रभा निकाल दी जाय तो चन्द्रमा और सूर्य निस्तत्त्व हो जायेंगे। तात्पर्य है कि केवल प्रभा ही चन्द्र और सूर्यरूपसे प्रकट हो रही है। भगवान् कहते हैं कि वह प्रभा भी मैं ही हूँ।

‘प्रणवः सर्ववेदेषु’—सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मेरा स्वरूप है। कारण कि सबसे पहले प्रणव प्रकट हुआ। प्रणवसे त्रिपदा गायत्री और त्रिपदा गायत्रीसे वेदत्रयी प्रकट हुई है। इसलिये वेदोंमें सार ‘प्रणव’ ही रहा। अगर वेदोंमेंसे प्रणव निकाल दिया जाय तो वेद वेदरूपसे नहीं रहेंगे। प्रणव ही वेद और गायत्रीरूपसे प्रकट हो रहा है। वह प्रणव मैं ही हूँ।

‘शब्दः खे’—सब जगह यह जो पोलाहट दीखती है, यह आकाश है। आकाश शब्द-तन्मात्रासे पैदा होता है,

परिशिष्ट भाव—छठे-सातवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है। इसलिये अब भगवान् आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक ‘कारण’-रूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन करते हैं। यद्यपि कारणकी अपेक्षा कार्यमें विशेष गुण होता है, पर स्वतन्त्र सत्ता कारणकी ही होती है अर्थात् कारणके बिना कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। जैसे, मिट्टी कारण है और घड़ा कार्य है। घड़ेमें जल भरा जा सकता है, पर यह विशेषता मिट्टीमें नहीं है। परन्तु मिट्टीके बिना घड़ेकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है। घड़ेकी रचनामें कर्ता, कारण और कार्य—तीनों एक नहीं होते अर्थात् कारण (मिट्टी) और कार्य-(घड़ा-) की तो एक सत्ता होती है, पर

१-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन स्थूल पंचमहाभूतोंके कारणोंका नाम भी क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द है, जो ‘पंचतन्मात्राएँ’ कहलाती हैं। पंचतन्मात्राएँ इन्द्रियों और अन्तःकरणकी विषय नहीं हैं तथा केवल शास्त्रोंसे सुनकर मानी जाती हैं। पंचमहाभूतोंके कार्योंका नाम भी गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द है, जो इन्द्रियों और अन्तःकरणके विषय हैं।

२-रूप-तन्मात्रामें दो शक्तियाँ होती हैं—एक ‘प्रकाशिका’ अर्थात् प्रकाश करनेवाली और एक ‘दाहिका’ अर्थात् जलानेवाली। प्रकाशिका शक्तिको ‘प्रभा’ कहते हैं और दाहिका शक्तिको ‘तेज’ कहते हैं। ‘प्रकाशिका शक्ति’ दाहिका शक्तिके बिना भी रह सकती है (जैसे—माण, चन्द्र आदिमें), पर ‘दाहिका शक्ति’ प्रकाशिका शक्तिके बिना नहीं रह सकती। यहाँ ‘प्रभास्मि शशिसूर्ययोः’ पदोंमें चन्द्रमा और सूर्यकी ‘प्रकाशिका शक्ति’ की प्रधानताको लेकर ‘प्रभा’ शब्दका प्रयोग हुआ है और आगे इसी अध्यायके नवें श्लोकमें ‘तेजश्चारस्मि विभावसी’ पदोंमें अग्निकी ‘दाहिका शक्ति’ की प्रधानताको लेकर ‘तेज’ शब्दका प्रयोग हुआ है।

सूर्य और अग्निमें प्रकाशिका और दाहिका—दोनों शक्तियाँ हैं। चन्द्रमामें प्रकाशिका शक्ति तो है, पर उसमें दाहिका शक्ति तिरस्कृत होकर ‘सौम्य शक्ति’ प्रकट हो गयी है, जो कि शीतलता देनेवाली है।

शब्द-तन्मात्रामें ही रहता है और अन्तमें शब्द-तन्मात्रामें ही लीन हो जाता है। अतः शब्द-तन्मात्रा ही आकाश-रूपसे प्रकट हो रही है। शब्द-तन्मात्राके बिना आकाश कुछ नहीं है। वह शब्द मैं ही हूँ।

‘पौरुषं नृपु’—मनुष्योंमें सार चीज जो पुरुषार्थ है, वह मेरा स्वरूप है। वास्तवमें नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव करना ही मनुष्योंमें असली पुरुषार्थ है। परन्तु मनुष्योंने अप्राप्तको प्राप्त करनेमें ही अपना पुरुषार्थ मान रखा है; जैसे—निर्धन आदमी धनकी प्राप्तिमें पुरुषार्थ मानता है, अपढ़ आदमी पढ़ लेनेमें पुरुषार्थ मानता है, अप्रसिद्ध आदमी अपना नाम विख्यात कर लेनेमें अपना पुरुषार्थ मानता है, इत्यादि। निष्कर्ष यह निकला कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्तिमें ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ मानता है। पर यह पुरुषार्थ वास्तवमें पुरुषार्थ नहीं है। कारण कि जो पहले नहीं थे, प्राप्तिके समय भी जिनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है और अन्तमें जो ‘नहीं’ में भरती हो जायेंगे, ऐसे पदार्थोंको प्राप्त करना पुरुषार्थ नहीं है। परमात्मा पहले भी मौजूद थे, अब भी मौजूद हैं और आगे भी सदा मौजूद रहेंगे; क्योंकि उनका कभी अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको उत्साहपूर्वक प्राप्त करनेका जो प्रयत्न है, वही वास्तवमें पुरुषार्थ है। उसकी प्राप्ति करनेमें ही मनुष्योंकी मनुष्यता है। उसके बिना मनुष्य कुछ नहीं है अर्थात् निरर्थक है।

५१२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

कर्ता-(कुम्हार-) की अलग (स्वतन्त्र) सत्ता होती है। परन्तु सृष्टिकी रचनामें कर्ता, कारण और कार्य—तीनों एक भगवान् ही होते हैं। अतः रस भी भगवान् हैं और जल भी भगवान् हैं। प्रभा भी भगवान् हैं और चन्द्र-सूर्य भी भगवान् हैं। ओंकार भी भगवान् हैं और वेद भी भगवान् हैं। शब्द भी भगवान् हैं और आकाश भी भगवान् हैं। पुरुषार्थ भी भगवान् हैं और मनुष्य भी भगवान् हैं।

[मिट्टी तो घड़ेके रूपमें परिणत होती है, पर परमात्मा संसारके रूपमें परिणत नहीं होते। कारण कि परिणत होनेवाली वस्तु विकारी होती है, जबकि परमात्मा निर्विकार हैं। अतः जैसे अँधेरेमें रस्सी ही साँपके रूपमें दीखती है अथवा साँप ही कुण्डलीरूपमें दीखता है, ऐसे ही परमात्मा संसाररूपमें दीखते हैं। तात्पर्य है कि परमात्मामें कार्य-कारणका भेद नहीं है; क्योंकि उनके सिवाय अन्य कोई वस्तु है ही नहीं। कार्य-कारणका भेद मनुष्योंकी दृष्टिमें ही है। इसलिये मनुष्योंको समझानेके लिये अन्य वस्तुकी कुछ-न-कुछ सत्ता मानकर ही परमात्माका वर्णन, विवेचन, विचार, चिन्तन, प्रश्नोत्तर आदि किया जाता है—‘नोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया।’]

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ १ ॥

पृथिव्याम्= पृथ्वीमेंतेजः= तेजजीवनम्= जीवनीशक्ति (मैं हूँ)
पुण्यः= पवित्रअस्मि= मैं हूँ= और
गन्धः= गन्ध (मैं हूँ)= तथातपस्विषु= तपस्वियोंमें
= औरसर्वभूतेषु= सम्पूर्णतपः= तपस्या
विभावसौ= अग्निमेंप्राणियोंमेंअस्मि= मैं हूँ।

व्याख्या—‘पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्’— पृथ्वी गन्ध-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, गन्ध-तन्मात्रारूपसे रहती है और गन्ध-तन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ।

यहाँ गन्धके साथ ‘पुण्यः’ विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है, पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है।

‘तेजश्चास्मि विभावसौ’— तेज रूप-तन्मात्रासे प्रकट होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। अग्निमें तेज ही तत्त्व है। तेजके बिना अग्नि निस्तत्त्व

है, भगवान् ही कारण हैं और भगवान् ही कार्य हैं। अतः गन्ध और पृथ्वी, तेज और अग्नि, जीवनीशक्ति और प्राणी, तपस्या और तपस्वी—ये सब-के-सब (कारण तथा कार्य) एक भगवान् ही हैं। कारण कि परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्ति होनेसे भगवान्से अभिन्न हैं। अतः परा-अपराके संयोगसे पैदा होनेवाली सम्पूर्ण सृष्टि भगवत्स्वरूप ही है।

‘पुण्यो गन्धः’— गन्ध-तन्मात्रा कारण है और पृथ्वी उसका कार्य है। गन्धको पवित्र कहनेका तात्पर्य है कि कारण (तन्मात्रा) सदा पवित्र ही होता है। अपवित्रता कार्यमें विकृति होनेसे ही आती है। अतः जैसे गन्ध-तन्मात्रा पवित्र है, ऐसे ही शब्द, स्पर्श, रूप और रस-तन्मात्रा भी पवित्र समझनी चाहिये।