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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

५१३

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥

पार्थ = हे पृथानन्दन ! सर्वभूतानाम् = सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातनम् = अनादि बीजम् = बीज | माम् = मुझे विद्धि = जान । बुद्धिमताम् = बुद्धिमानोंमें बुद्धिः = बुद्धि (और) | तेजस्विनाम् = तेजस्वियोंमें तेजः = तेज अहम् = मैं अस्मि = हूँ। ---|---|---

व्याख्या— ‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि’* पार्थ सनातनम्’—हे पार्थ! सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूँ अर्थात् सबका कारण मैं ही हूँ। सम्पूर्ण प्राणी बीजरूप मेरेसे उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही रहते हैं और अन्तमें मेरेमें ही लीन होते हैं। मेरे बिना प्राणीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

जितने बीज होते हैं, वे सब वृक्षसे उत्पन्न होते हैं और वृक्ष पैदा करके नष्ट हो जाते हैं। परन्तु यहाँ जिस बीजका वर्णन है, वह बीज ‘सनातन’ है अर्थात् आदि-अन्तसे रहित (अनादि एवं अनन्त) है। इसीको नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘अव्यय बीज’ कहा गया है। यह चेतन-तत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। यह स्वयं विकाररहित रहते हुए ही सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक, आश्रय और प्रकाशक है तथा जगत्का कारण है।

गीतामें ‘बीज’ शब्द कहीं भगवान् और कहीं जीवात्मा—दोनोंके लिये आया है। यहाँ जो ‘बीज’ शब्द आया है, वह भगवान्का वाचक है; क्योंकि यहाँ कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन है। दसवें अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें विभूतरूपसे आया ‘बीज’ शब्द भी भगवान्का ही वाचक है; क्योंकि वहाँ उनको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण कहा गया है। नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘बीज’ शब्द भगवान्के लिये आया है; क्योंकि उसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें ‘सदसच्चाहमर्जुन’ पदमें कहा गया है कि कार्य और कारण सब मैं ही हूँ। सब कुछ भगवान् ही होनेसे ‘बीज’ शब्द भगवान्का वाचक है। चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘अहं बीजप्रदः पिता’ ‘मैं बीज प्रदान करनेवाला पिता हूँ’—ऐसा होनेसे वहाँ ‘बीज’ शब्द जीवात्माका वाचक है। ‘बीज’ शब्द जीवात्माका वाचक तभी होता है, जब यह

जड़के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, नहीं तो यह भगवान्का स्वरूप ही है।

‘बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि’—बुद्धिमानोंमें बुद्धि मैं हूँ। बुद्धिके कारण ही वे बुद्धिमान् कहलाते हैं। अगर उनमें बुद्धि न रहे तो उनकी बुद्धिमान् संज्ञा ही नहीं रहेगी।

‘तेजस्तेजस्विनामहम्’—तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। यह तेज दैवी-सम्पत्तिका एक गुण है। तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंमें एक विशेष तेज—शक्ति रहती है, जिसके प्रभावसे दुर्गुण-दुराचारी मनुष्य भी सदगुण-सदाचारी बन जाते हैं। यह तेज भगवान्का ही स्वरूप है।

विशेष बात

भगवान् ही सम्पूर्ण संसारके कारण हैं, संसारके रहते हुए भी वे सबमें परिपूर्ण हैं और सब संसारके मिटनेपर भी वे रहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि सब कुछ भगवान् ही हैं। इसके लिये उपनिषदोंमें सोना, मिट्टी और लोहेका दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे सोनेसे बने हुए सब गहने सोना ही हैं, मिट्टीसे बने हुए सब बर्तन मिट्टी ही हैं और लोहेसे बने हुए सब अस्त्र-शस्त्र लोहा ही हैं, ऐसे ही भगवान्से उत्पन्न हुआ सब संसार भगवान् ही है। परन्तु गीतामें भगवान्ने बीजका दृष्टान्त दिया है कि सम्पूर्ण संसारका बीज मैं हूँ। बीज वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है अर्थात् बीजसे अंकुर निकल आता है, अंकुरसे वृक्ष हो जाता है और बीज स्वयं मिट जाता है। परन्तु भगवान्ने अपनेको संसारमात्रका बीज कहते हुए भी यह एक विलक्षण बात बतायी कि मैं अनादि बीज हूँ, पैदा हुआ बीज नहीं हूँ—‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्’ (७।१०), और मैं अविनाशी बीज हूँ—‘बीजमव्ययम्’ (१।१८)। अविनाशी बीज कहनेका

  • इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने ‘उपधारय’ कहा और यहाँ ‘विद्धि’ कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मात्र संसारमें साररूपसे मैं ही हूँ—इस बातको समझो और समझकर धारण करो। समझकर धारण करनेसे असली प्रेम जाग्रत् हो जाता है।

५१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

मतलब यह है कि संसार मेरेसे पैदा हो जाता है, पर मैं मिटता नहीं हूँ, जैसा-का-तैसा ही रहता हूँ।

सोना, मिट्टी और लोहेके दृष्टान्तमें गहनोमें सोना दीखता है, बर्तनोंमें मिट्टी दीखती है और अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा दीखता है, पर संसारमें परमात्मा दीखते नहीं। अगर बीजका दृष्टान्त लें तो वृक्षमें बीज नहीं दीखता। जब वृक्षमें बीज आता है, तब पता लगता है कि इस वृक्षमें ऐसा बीज है, जिससे यह वृक्ष पैदा हुआ है। सम्पूर्ण वृक्ष बीजसे ही निकलता है और बीजमें ही समाप्त हो जाता है। वृक्षका आरम्भ बीजसे होता है और अन्त भी बाजमें ही होता है अर्थात् वह वृक्ष चाहे सौ वर्षांतक रहे, पर उसकी अन्तिम परिणति बीजमें ही होगी, बीजके सिवाय और क्या होगा? ऐसे ही भगवान् संसारके बीज हैं अर्थात् भगवान्से ही संसार उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है। अन्तमें एक भगवान् ही बाकी रहते हैं—‘शिष्यते शेषसंज्ञः’ (श्रीमद्भा० १०।३।२५)।

वृक्ष दीखते हुए भी ‘यह बीज ही है’—ऐसा जो जानते हैं, वे वृक्षको ठीक-ठीक जानते हैं और जो बीजको न देखकर केवल वृक्षको देखते हैं, वे वृक्षके तत्त्वको नहीं जानते। भगवान् यहाँ ‘बीजं मां सर्वभूतानाम्’ कहकर सबको यह ज्ञान कराते हैं कि तुम्हारेको जितना यह संसार दीखता है, इसके पहले मैं ही था, मैं एक ही प्रजारूपसे बहुत रूपोंमें प्रकट हुआ हूँ—‘बहु स्यां प्रजायेय’ (छान्दोग्य० ६।२।३) और इनके समाप्त होनेपर मैं ही रह जाता हूँ। तात्पर्य है कि पहले मैं ही था और पीछे मैं ही रहता हूँ तो बीचमें भी मैं ही हूँ।

यह संसार पांचभौतिक भी उन्हींको दीखता है, जो विचार करते हैं, नहीं तो यह पांचभौतिक भी नहीं दीखता।

परिशिष्ट भाव —अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज कहनेका तात्पर्य यह है कि सब प्राणियोंके रूपमें मैं ही हूँ। सृष्टि अनन्त है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें अनन्त जीव हैं। परन्तु उन अनन्त जीवोंका बीज (परमात्मा) एक ही है। अनन्त सृष्टि पैदा होनेपर भी उस बीजमें कोई फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि वह अव्यय है—‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)। उस एक ही बीजसे अनेक प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न होती है (गीता—दसवें अध्यायका उनातालीसवाँ श्लोक)। बीजको कितनी ही सूक्ष्म दृष्टिसे देखें, उसमें फल-फूल-पत्ते आदि नहीं दीखेंगे; क्योंकि वे उस बीजमें कारणरूपसे विद्यमान हैं। उस बीजसे पैदा होनेवाले वृक्षके दो पत्ते भी आपसमें नहीं मिलते—यह अनेकता भी उस एक बीजमें ही रहती है।

सृष्टिकी एक-एक वस्तुमें अनेक भेद हैं। विभिन्न देशोंमें मनुष्योंकी अनेक जातियाँ हैं। उनमें भी इतना भेद है कि दो मनुष्योंके अँगूठेकी रेखाएँ भी परस्पर नहीं मिलतीं। उनके रूप, स्वभाव, रुचि, प्रकृति, मान्यता, भाव आदि भी परस्पर नहीं मिलते। गाय, भैंस, भेंड़, बकरी, घोड़ा, ऊँट, कुत्ता आदिकी अनेक जातियाँ हैं और उनकी एक-एक जातिमें भी अनेक भेद हैं। वृक्षोंमें भी एक-एक वृक्षकी अनेक जातियाँ होती हैं। एक-एक विद्याको देखें तो उसमें इतने भेद हैं कि उनका अन्त नहीं आता। मूल रंग तीन हैं, पर उनके मिश्रणसे अनेक रंग बन जाते हैं। उनमें भी एक-एक रंगमें इतने

जैसे कोई कह दे कि ये अपने सब-के-सब शरीर पार्थिव (पृथ्वीसे पैदा होनेवाले) हैं, इसलिये इनमें मिट्टीकी प्रधानता है तो दूसरा कहेगा कि ये मिट्टी कैसे हैं? मिट्टीसे तो हाथ धोते हैं, मिट्टी तो रेतो होती है; अतः ये शरीर मिट्टी नहीं हैं। इस तरह शरीर मिट्टी होता हुआ भी उसको मिट्टी नहीं दीखता। परन्तु यह जितना संसार दीखता है, इसको जलाकर राख कर दिया जाय तो अन्तमें एक मिट्टी ही हो जाता है।

विचार करें कि इन शरीरोंके मूलमें क्या है? माँ-बापमें जो रज-वीर्यरूप अंश होता है, जिससे शरीर बनता है, वह अंश अन्तसे पैदा होता है। अन्त मिट्टीसे पैदा होता है। अतः ये शरीर मिट्टीसे ही पैदा होते हैं और अन्तमें मिट्टीमें ही लीन हो जाते हैं। अन्तमें शरीरकी तीन गतियाँ होती हैं—चाहे जमीनमें गाड़ दिया जाय, चाहे जला दिया जाय और चाहे पशु-पक्षी खा जायें। तीनों ही उपायोंसे वह अन्तमें मिट्टी हो जाता है। इस तरह पहले और आखिरमें मिट्टी होनेसे बीचमें भी शरीर या संसार मिट्टी ही है। परन्तु बीचमें यह शरीर या संसार देखनेमें मिट्टी नहीं दीखता। विचार करनेसे ही मिट्टी दीखता है, आँखोंसे नहीं। इसी तरह यह संसार विचार करनेसे परमात्मस्वरूप दीखता है। विचार करें तो जब भगवान्ने यह संसार रचा तो कहींसे कोई सामान नहीं मँगवाया, जिससे संसारको बनाया हो और बनानेवाला भी दूसरा नहीं हुआ है। भगवान् आप ही संसारको बनानेवाले हैं और आप ही संसार बन गये। शरीरोंकी रचना करके आप ही उनमें प्रविष्ट हो गये—‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ (तैत्तिरीयोपनिषद् २।६)। इन शरीरोंमें जीवरूपसे भी वे ही परमात्मा हैं। अतः यह संसार भी परमात्माका स्वरूप ही है।

श्लोक ११]

  • साधक-संजीवनी *

५१५

भेद हैं कि दो व्यक्तियोंको भी एक रंग समानरूपसे नहीं दीखता। इस प्रकार सृष्टिमें एक समान दीखनेवाली दो चीजें भी वास्तवमें समान नहीं होतीं। इतनी अनेकता होनेपर भी सृष्टिका बीज एक ही है। तात्पर्य है कि एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं और अनेक रूपोंमें प्रकट होनेपर भी एक ही रहते हैं।

भगवान् देश, काल आदि सभी दृष्टियोंसे अनन्त हैं। जब भगवान्की बनायी हुई सृष्टिका भी अन्त नहीं आ सकता तो फिर भगवान्का अन्त आ ही कैसे सकता है? आजतक भगवान्के विषयमें जो कुछ सोचा गया है, जो कुछ कहा गया है, जो कुछ लिखा गया है, जो कुछ माना गया है, वह पूरा-का-पूरा मिलकर भी अधूरा है। इतना ही नहीं, भगवान् भी अपने विषयमें पूरी बात नहीं कह सकते, अगर कह दें तो अनन्त कैसे रहेंगे?

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥

भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंरागसे रहितधर्माविरुद्धः= धर्मसे
श्रेष्ठ अर्जुन!बलम्= बलअविरुद्ध
बलवताम्अहम्= मैं हूँ(धर्मयुक्त)
कामराग-= औरकामः= काम
विवर्जितम्भूतेषु= प्राणियोंमेंअस्मि= मैं हूँ।

व्याख्या —‘बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्’—कठिन-से-कठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामना-आसक्तिरहित शुद्ध, निर्मल उत्साह रहता है। काम पूरा होनेपर भी ‘मेरा कार्य शास्त्र और धर्मके अनुकूल है तथा लोकमर्यादाके अनुसार सन्तजनानुमोदित है’—ऐसे विचारसे मनमें एक उत्साह रहता है। इसका नाम ‘बल’ है। यह बल भगवान्का ही स्वरूप है। अतः यह बल ग्राह्य है।

गीतामें भगवान्ने खुद ही बलकी व्याख्या कर दी है। सत्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘कामरागबलान्विताः’ पदमें आया बल कामना और आसक्तिसे युक्त होनेसे दुराग्रह और हठका वाचक है। अतः यह बल भगवान्का स्वरूप नहीं है, प्रत्युत आसुरी सम्पत्ति होनेसे त्याज्य है। ऐसे ही ‘सिद्धोऽहं बलवान्सुखी’ (गीता १६।१४) और ‘अहङ्कारं बलं दर्पम्’ (गीता १६।१८; १८।५३) पदोंमें आया बल भी त्याज्य है। छठे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें

‘बलवदूदृढम्’ पदमें आया बल शब्द मनका विशेषण है। वह बल भी आसुरी सम्पत्तिका ही है; क्योंकि उसमें कामना और आसक्ति है। परन्तु यहाँ (७।११में) जो बल आया है, वह कामना और आसक्तिसे रहित है, इसलिये यह सात्त्विक उत्साहका वाचक है और ग्राह्य है। सत्रहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें ‘आयुःसत्त्वबलारोग्य’ पदमें आया बल शब्द भी इसी सात्त्विक बलका वाचक है।

‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ’ —हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! मनुष्योंमें धर्मसे अविरुद्ध अर्थात् धर्मयुक्त ‘काम’ मेरा स्वरूप है। कारण कि शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुसार शुभ-भावसे केवल सन्तान-उत्पत्तिके लिये जो काम होता है, वह काम मनुष्यके अधीन होता है। परंतु आसक्ति, कामना, सुखभोग आदिके लिये जो काम होता है, उस काममें मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके वशमें होकर वह न करनेलायक शास्त्रविरुद्ध काममें

१-प्राणियोंमें अनेकता होनेपर भी उनमें परस्पर प्रेमकी एकता होनी चाहिये। जैसे काँटा पैरमें गड़ता है, पर आँसू नेत्रोंमें आते हैं, ऐसा ही भाव सम्पूर्ण प्राणियोंमें रहना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः’ (गीता ५।२५, १२।४)। एकमात्र प्रेम ही ऐसी चीज है, जिसमें कोई भेद नहीं रहता। प्रेमका भेद नहीं कर सकते। प्रेममें सब एक हो जाते हैं। ज्ञानमें तत्त्वभेद तो नहीं रहता, पर मतभेद रहता है। प्रेममें मतभेद भी नहीं रहता। अतः प्रेमसे आगे कुछ भी नहीं है। प्रेमसे त्रिलोकीनाश भगवान् भी वशमें हो जाते हैं।

२-धर्मका विधान मनुष्योंके लिये ही है; क्योंकि मनुष्येतर प्राणियोंमें धर्मकी मर्यादा लागू ही नहीं होती।

३-तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस कामको सम्पूर्ण पापीका हेतु बताया है, उस कामका वाचक यहाँ ‘काम’ शब्द नहीं है। यहाँ ‘काम’ शब्द गृहस्थधर्मके पालनका वाचक है।

५१६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

प्रवृत्त हो जाता है। शास्त्रविरुद्ध काम पतनका तथा सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका हेतु होता है।

कृत्रिम उपायोंसे सन्तति-निरोध करार कर केवल भोग-बुद्धिसे काममें प्रवृत्त होना महान् नरकोंका दरवाजा है। जो सन्तानकी उत्पत्ति कर सके, वह 'पुरुष' कहलाता है और जो गर्भ धारण कर सके, वह 'स्त्री' कहलाती है। अगर पुरुष और स्त्री आपरेषनके द्वारा अपनी सन्तानोत्पत्ति करनेकी योग्यता-(पुरुषत्व और स्त्रीत्व-) को नष्ट कर

परिशिष्ट भाव —जंगम सृष्टिमात्र कामसे पैदा होती है। अतः मनुष्यमें जो काम धर्मसे विरुद्ध नहीं है, मर्यादाके अनुसार है, वह काम भगवान्का स्वरूप है। भगवान् पहले कह चुके हैं—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७) और आगे भी कहेंगे—'ये चैव सात्त्विका भावाः' (७।१२), 'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९)। अतः जैसे धर्मयुक्त काम भगवान्का स्वरूप है, ऐसे ही धर्मविरुद्ध काम भी भगवान्से अलग नहीं है। जो धर्मविरुद्ध कामका आचरण करते हैं, उनको नरकरूपसे भगवान् मिलते हैं; क्योंकि नरक भी भगवान् ही हैं! परन्तु गीताका उद्देश्य मनुष्यको नरकोंमें अथवा जन्म-मरणमें भेजना नहीं है, प्रत्युत उसका कल्याण करना है। उद्देश्य सदा कल्याणका, आनन्दका ही होता है, दुःखका नहीं। दुःख कोई भी नहीं चाहता। अर्जुनने भी कल्याणकी बात पूछी है। उदाहरणार्थ, शब्द अच्छे भी होते हैं और बुरे भी, पर व्याकरणमें अच्छे शब्दोंपर ही विचार किया जाता है; क्योंकि व्याकरण आदि भी मनुष्यके उद्धारके लिये हैं।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥

और तो क्या कहूँ—

ये= जितने= तथाविद्धि= समझो।
एव= भीतामसाः= तामस (भाव हैं,
वे सब)तु= परन्तु
सात्त्विकाः= सात्त्विकमत्तः= मुझसेअहम्= मैं
भावाः= भाव हैं (और)एव= ही होते हैं—तेषु= उनमें (और)
ये= जितनेइति= ऐसाते= वे
= भीतान्= उनकोमयि= मुझमें
राजसाः= राजस= नहीं हैं।

व्याख्या —'ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये'—ये जो सात्त्विक, राजस और तामस भाव (गुण, पदार्थ और क्रिया) हैं, वे भी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिमात्रमें जो कुछ हो रहा है, मूलमें सबका आश्रय, आधार और प्रकाशक भगवान्

ही हैं अर्थात् सब भगवान्से ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। सात्त्विक, राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं, इसलिये इनमें जो कुछ विलक्षणता दीखती है, वह सब भगवान्की ही है; अतः मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये, सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ नहीं। यदि

१-'स्यै शब्दसंधातयोः।' स्यायतः—संगते भवतः अस्यां शुक्लशोणिते इति स्त्री। (सिद्धान्तकौमुदी, बालमनोरमा)।

२-अंगहीनाश्रोत्रियषण्दशृङ्गवर्जम्। (कात्यायनश्रौतसूत्र १।१।५)

३-'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' (गीता २।७)

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाजुष्याम् ॥ (गीता ३।२)

यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ (गीता ५।१)

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

५१७

उसकी दृष्टि भगवान्की तरफ जायगी तो वह मुक्त हो जायगा और यदि उसकी दृष्टि सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ जायगी तो वह बँध जायगा।

सात्त्विक, राजस और तामस—इन भावोंके (गुण, पदार्थ और क्रियामात्रके) अतिरिक्त कोई भाव है ही नहीं। ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं। यहाँ शंका होती है कि अगर ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं तो हमलोग जो कुछ करें, वह सब भगवत्स्वरूप ही होगा, फिर ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—यह विधि-निषेध कहाँ रहा ? इसका समाधान यह है कि मनुष्यमात्र सुख चाहता है, दुःख नहीं चाहता। अनुकूल परिस्थिति विहित-कर्माका फल है और प्रतिकूल परिस्थिति निषिद्ध-कर्माका फल है। इसलिये कहा जाता है कि विहितकर्म करो और निषिद्धकर्म मत करो। अगर निषिद्धको भगवत्स्वरूप मानकर करोगे तो भगवान् दुःखों और नरकोंके रूपमें प्रकट होंगे। जो अशुभ कर्मोंकी उपासना करता है, उसके सामने भगवान् अशुभरूपसे ही प्रकट होते हैं; क्योंकि दुःख और नरक भी तो भगवान्के ही स्वरूप हैं।

जहाँ करने और न करनेकी बात होती है, वहाँ विधि और निषेध लागू होता है। अतः वहाँ विहित ही करना चाहिये, निषिद्ध नहीं करना चाहिये। परंतु जहाँ मानने और जाननेकी बात होती है, वहाँ परमात्माको ही 'मानना' चाहिये और अपनेको अथवा संसारको 'जानना' चाहिये।

जहाँ माननेकी बात है, वहाँ परमात्माको ही मानकर उनके मिलनेकी उत्कण्ठा बढ़ानी चाहिये। उनको प्राप्त और प्रसन्न करनेके लिये उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये तथा उनकी आज्ञा और सिद्धान्तोंके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिये। भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कार्य करेंगे तो उनको प्रसन्नता कैसे होगी ? और विरुद्ध कार्य करनेवालेको उनकी प्राप्ति कैसे होगी ? जैसे, किसी मनुष्यके मनके विरुद्ध काम करनेसे वह राजी कैसे होगा और प्रेमसे कैसे मिलेगा ?

जहाँ जाननेकी बात है, वहाँ संसारको जानना चाहिये। जो उत्पत्ति-विनाशशील है, सदा साथ रहनेवाला नहीं है, वह अपना नहीं है और अपने लिये भी नहीं है—ऐसा जानकर उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये। उसमें कामना, ममता, आसक्ति नहीं करनी चाहिये। उसका महत्त्व हृदयसे उठा देना चाहिये। इससे सत्-तत्त्व प्रत्यक्ष हो जायगा और जानना पूर्ण हो जायगा। असत् (नाशवान्) वस्तु हमारे साथ रहनेवाली नहीं है—ऐसा समझनेपर भी

अगर समय-समयपर उसको महत्त्व देते रहेंगे तो वास्तविकता (सत्-वस्तु)-की प्राप्ति नहीं होगी।

'मत्त एवेति तान्निद्धि'—उन सबको तू मेरेसे ही उत्पन्न होनेवाला समझ अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ। कार्य और कारण—ये दोनों भिन्न दीखते हुए भी कार्य कारणसे अपनी भिन्न एवं स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। अतः कार्य कारणरूप ही होता है। जैसे, सोनेसे गहने पैदा होते हैं तो वे सोनेसे अलग नहीं होते अर्थात् सोना ही होते हैं। ऐसे ही परमात्मासे पैदा होनेवाली अनन्त सृष्टि परमात्मासे भिन्न स्वतन्त्र सत्ता नहीं रख सकती।

'मत्त एव' कहनेका तात्पर्य है कि अपरा और परा प्रकृति मेरा स्वभाव है; अतः कोई उनको मेरेसे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकता। सातवें अध्यायके परिशिष्टरूप नवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि 'कल्पके आदिमें प्रकृतिको वशमें करके मैं बार-बार सृष्टिकी रचना करता हूँ' (नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और आगे कहते हैं कि मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति चराचर संसारको रचती है' (नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)—ये दोनों बातें एक ही हुई। चाहे प्रकृतिको लेकर भगवान् रचना करें, चाहे भगवान्की अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करे—इन दोनोंका तात्पर्य एक ही है। भगवान् रचना करते हैं तो प्रकृतिको लेकर ही करते हैं, तो मुख्यता भगवान्की ही हुई और प्रकृति भगवान्की अध्यक्षतामें रचना करती है, तो भी मुख्यता भगवान्की ही हुई। इसी बातको यहाँ कहा है कि 'मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ (सातवें अध्यायका छठा श्लोक), और इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि 'सात्त्विक, राजस और तामस—ये भाव मेरेसे ही होते हैं।'

भगवान्ने विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके जाननेवालेकी दुर्लभता बताते हुए जो प्रकरण आरम्भ किया, उसमें अपरा और परा प्रकृतिका कथन किया। अपरा और परा प्रकृतियोंको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण बताया; क्योंकि इनके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं। फिर अपनेको इन अपरा और पराका कारण बताया—'मत्तः परतरं नान्यत्' (७।७)। यही बात विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए यहाँ कही है कि सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको मेरेसे ही होनेवाला जान।

'न त्वहं तेषु ते मयि'—मैं उनमें नहीं हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं। तात्पर्य है कि उन गुणोंकी मेरे सिवाय कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है अर्थात् मैं-ही—मैं हूँ; मेरे सिवाय और कुछ है

५१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

ही नहीं। वे सात्त्विक, राजस और तामस जितने भी प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ हैं, वे सब-के-सब उत्पन्न और नष्ट होते हैं। परन्तु मैं उत्पन्न भी नहीं होता और नष्ट भी नहीं होता। अगर मैं उनमें होता तो उनका नाश होनेपर मेरा भी नाश हो जाता; परन्तु मेरा कभी नाश नहीं होता, इसलिये मैं उनमें नहीं हूँ। अगर वे मेरेमें होते तो मैं जैसा अविनाशी हूँ, वैसे वे भी अविनाशी होते; परंतु वे तो नष्ट होते हैं और मैं रहता हूँ, इसलिये वे मेरेमें नहीं हैं।

जैसे बीज ही वृक्ष, शाखाएँ, पत्ते, फूल आदिके रूपमें होता है; परंतु वृक्ष, शाखाएँ, पत्ते आदिमें बीजको खोजेंगे तो उनमें बीज नहीं मिलेगा। कारण कि बीज उनमें तत्त्व-रूपसे विद्यमान रहता है। ऐसे ही सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं; परन्तु उन भावोंमें मेरेको खोजोगे तो उनमें मैं नहीं मिलूँगा (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। कारण कि मैं उनमें मूलरूपसे और तत्वरूपसे विद्यमान हूँ। अतः मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ।

जैसे, बादल आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाशमें ही रहते हैं और आकाशमें ही लीन होते हैं; परंतु आकाश ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। न आकाशमें बादल रहते हैं और न बादलोंमें आकाश रहता है। ऐसे ही आठवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जितनी (सत्रह) विभूतियाँ बतायी गयी हैं, वे सब मेरेसे ही उत्पन्न होती हैं, मेरेमें ही रहती हैं और मेरेमें ही लीन हो जाती हैं। परंतु वे मेरेमें नहीं हैं और मैं उनमें नहीं हूँ। मेरे सिवाय उनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस दृष्टिसे सब कुछ मैं ही हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के सिवाय जितने सात्त्विक, राजस और तामस भाव अर्थात् प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ दिखायी देती हैं, उनकी सत्ता मानकर और उनको महत्ता देकर ये मनुष्य उनमें फँस रहे हैं। अतः भगवान् उन मनुष्योंका लक्ष्य इधर कराते हैं कि इन सब पदार्थों और क्रियाओंमें सत्ता और महत्ता मेरी ही है।

विशेष बात

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले तरह-तरहके जितने भाव (प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ) हैं, वे सब-के-सब भगवान्की शक्ति प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेके कारण इन गुणोंको भगवान्ने 'मत्त एव' 'मेरेसे ही होते हैं'—ऐसा

कहा है। तात्पर्य यह कि प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेसे ये सभी भाव भगवान्से उत्पन्न होते हैं और भगवान्में ही लीन हो जाते हैं, पर परा प्रकृति (जीवात्मा-) ने इनके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् इनको अपना और अपने लिये मान लिया—यही परा प्रकृतिद्वारा जगत्को धारण करना है। इसीसे वह जन्मता-मरता रहता है। अब उस बन्धनका निवारण करनेके लिये यहाँ कहते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस—ये सब भाव मेरेसे ही होते हैं। इसी रीतिसे दसवें अध्यायमें कहा है—'भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथगविधाः' (१०।५) अर्थात् प्राणियोंके ये अलग-अलग प्रकारवाले (बीस) भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं; और 'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वप्रवर्तते' (१०।८) अर्थात् सबका प्रभव मैं हूँ और सब मेरेसे प्रवृत्त होते हैं। पंद्रहवें अध्यायमें भी कहा है कि स्मृति, ज्ञान आदि सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहन् च' (१५।१५)। जब सब कुछ परमात्मासे ही उत्पन्न होता है, तब मनुष्यके साथ उन गुणोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने साथ गुणोंका सम्बन्ध न माननेसे यह मनुष्य बँधता नहीं अर्थात् वे गुण उसके लिये जन्म-मरणके कारण नहीं बनते।

गीतामें जहाँ भक्तिका वर्णन है, वहाँ भगवान् कहते हैं कि सब कुछ मैं ही हूँ—'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९) और अर्जुन भी भगवान्के लिये कहते हैं कि आप सत् और असत् भी हैं तथा उनसे पर भी हैं—'सदसत्तत्परं यत्' (११।३७)। ज्ञानी (प्रेमी) भक्तके लिये भी भगवान् कहते हैं कि उसकी दृष्टिमें सब कुछ वासुदेव ही है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९)। कारण यह है कि भक्तिमें श्रद्धा और मान्यताकी मुख्यता होती है तथा भगवान्में दृढ़ अनन्यता होती है। भक्तिमें अन्यका अभाव होता है। जैसे उत्तम पत्रित्त्राको एक पत्रिके सिवाय संसारमें दूसरा कोई पुरुष दीखता ही नहीं, ऐसे ही भक्तको एक भगवान्के सिवाय और कोई दीखता ही नहीं, केवल भगवान् ही दीखते हैं।

गीतामें जहाँ ज्ञानका वर्णन है, वहाँ भगवान् बताते हैं कि सत् और असत्—दोनों अलग-अलग हैं—'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' (२।१६)। ऐसे ही ज्ञानमार्गमें शरीर-शरीरी, देह-देही, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, प्रकृति-पुरुष—दोनोंको अलग-अलग जाननेकी बात बहुत बार आयी है; जैसे—'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्वद्गनादी

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

५१९

उभावपि' (१३।१९); 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञानम्' (१३।२); 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्' (१३।२६); 'क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नम्' (१३।३३); 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरैवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा' (१३।३४)। कारण यह है कि ज्ञानमार्गमें विवेककी प्रधानता होती है। अतः वहाँ नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशी आदिका विचार होता है और फिर अपना स्वरूप बिलकुल निलिप्त है—ऐसा बोध होता है।

साधकमें श्रद्धा और विवेक—दोनों ही रहने चाहिये। भक्तिमार्गमें श्रद्धाकी मुख्यता होती है और ज्ञानमार्गमें विवेककी मुख्यता होती है। ऐसा होनेपर भी भक्तिमार्गमें विवेकका और ज्ञानमार्गमें श्रद्धाका अभाव नहीं है। भक्ति-मार्गमें मानते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव

परिशिष्ट भाव—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७) का विस्तार करते हुए भगवान्ने पिछले चार श्लोकोंमें जो बात कही है और जो बात नहीं कही है, वह सब-की-सब बात उपसंहाररूपसे भगवान्ने इस श्लोकमें कह दी है। भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं, मेरेसे ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं, तथापि मैं इनमें नहीं हूँ और ये मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ। अतः मेरी प्राप्ति चाहनेवाले साधककी दृष्टि इन भावोंकी तरफ न जाकर मेरी तरफ ही जानी चाहिये। अगर वह उन भावोंमें ही उलझ जायगा तो कभी मुक्त अथवा भक्त नहीं हो सकेगा।

देखने, सुनने, समझने आदिमें जो भी भाव आते हैं और जो नहीं आते, वे सब-के-सब 'ये' पदके अन्तर्गत समझने चाहिये।

भगवान्ने उत्पन्न होनेके कारण यहाँ सात्त्विक, राजस और तामस गुणोंको 'भाव' नामसे कहा गया है। तात्पर्य है कि भगवान् भाव (सत्ता)-रूप हैं; अतः उनसे भाव ही उत्पन्न होगा, अभाव कैसे उत्पन्न होगा? भगवान्ने उत्पन्न होनेके कारण सब भाव भगवान्के ही स्वरूप हैं—'भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः' (गीता १०।५)। तात्पर्य है कि शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव, क्रिया, पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं, वे सब भगवान् ही हैं। मनकी स्फुरणामात्र चाहे अच्छी हो या बुरी, भगवान् ही हैं। संसारमें अच्छा-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध, शत्रु-मित्र, दुष्ट-सज्जन, पापात्मा-पुण्यात्मा आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने आदिमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय कहीं कुछ भी नहीं है।

अपना कुछ स्वार्थ रखें, लेनेकी इच्छा रखें, तभी सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन भेद होते हैं। यदि अपना कुछ स्वार्थ न रखें और दूसरेके हितकी दृष्टि रखें तो ये भगवान्के ही स्वरूप हैं। इनको अपने लिये मानना, इनसे सुख लेना ही पतनका कारण है (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)।

'तीनों गुण मेरेसे ही प्रकट होते हैं'—ऐसा कहकर भगवान्ने यह भाव प्रकट किया है कि साधककी दृष्टि इन गुणोंकी तरफ न जाकर मुझ गुणातीतकी तरफ ही जानी चाहिये, अर्थात् मेरी सत्ता और महत्ता मानकर मेरे ही साथ सम्बन्ध जोड़ना चाहिये, जिससे मेरी प्राप्ति हो जाय और सदाके लिये दुःख मिटकर महान् आनन्दका अनुभव हो जाय। 'मैं उनमें नहीं

१-'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गीता २।१६); 'मद्भावं सोऽधिगच्छति' (गीता १४।१९); 'सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।' (गीता १८।२०)

२-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा॥

(श्रीमद्भा ११।१३।२४)

'मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ (शब्दादि विषय) ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार करके अनुभव कर लें।'।

५२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं'—ऐसा कहकर भगवान्ने यह भाव प्रकट किया है कि अगर कोई मनुष्य मेरेको सत्ता और महत्ता न देकर सात्त्विक, राजस और तामस गुण, पदार्थ तथा क्रियाको सत्ता और महत्ता देकर उनके साथ सम्बन्ध जोड़ेगा तो वह मेरेको प्राप्त न होकर जन्म-मरणमें चला जायगा—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनमस्यु' (गीता १३।२१)।

'मत्त एव' पदोंका प्रयोग करके भगवान् मानो यह कहते हैं कि तीनों गुण मेरेसे ही होते हैं, फिर तुम मेरी तरफ न आकर गुणोंमें क्यों फँसते हो ? जो गुणोंमें फँस जाते हैं, वे मेरा भजन नहीं कर सकते (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु जो गुणोंमें नहीं फँसते, वे भक्त मेरा भजन करते हैं (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ और दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। ये गुण टिकनेवाले नहीं हैं; क्योंकि कारण टिकता है, कार्य नहीं टिकता। जैसे सोना टिकता है, गहने नहीं टिकते; मिट्टी टिकती है, घड़ा नहीं टिकता, ऐसे ही भगवान् टिकते हैं, गुण नहीं टिकते। गुण तो परिवर्तनशील और मिटनेवाले हैं, पर भगवान् नित्य-निरन्तर ज्यों-के-त्यों रहनेवाले हैं। उनका न परिवर्तन होता है, न नाश। इसलिये भगवान्की प्राप्ति गुणोंसे नहीं होती, प्रत्युत गुणोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। अतः तमोगुणको रजोगुणसे और रजोगुणको सत्त्वगुणसे जीतकर गुणोंसे अतीत होना है।

यहाँ एक विशेष बात समझनेयोग्य है कि सगुण-साकार भगवान् भी वास्तवमें निर्गुण ही हैं; क्योंकि वे सत्त्व, रज और तमोगुणसे युक्त नहीं हैं, प्रत्युत ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त हैं। इसलिये सगुण-साकार भगवान्की भक्तिको भी निर्गुण (सत्त्वादि गुणोंसे रहित) बताया गया है; जैसे—'मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्', 'मन्निकेतं तु निर्गुणम्', 'निर्गुणो मदपाश्रयः', 'मत्सेवायां तु निर्गुणा' (श्रीमद्भ० ११।२५।२४—२७)।

प्रश्न —जब सब कुछ भगवान् ही हैं, तो फिर सात्त्विक-राजस-तामस भाव त्याग्य क्यों हैं?

उत्तर —जैसे जमीनमें जल सब जगह रहता है, पर उसका प्राप्ति-स्थान कुआँ है, ऐसे ही भगवान् सब जगह हैं, पर उनका प्राप्ति-स्थान यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) है—'तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्' (गीता ३।१५)। परन्तु सात्त्विक-राजस-तामस भाव भगवान्के प्राप्ति-स्थान नहीं हैं अर्थात् इनके द्वारा भगवान्की प्राप्ति नहीं होती (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। अतः ये साधकके लिये कामके नहीं हैं। इसलिये भगवान्ने कहा है कि ये भाव मेरेसे होनेपर भी मैं इनमें और ये मेरेमें नहीं हैं।

जैसे, बाजरीकी खेतीमें बाजरी ही मुख्य होती है, पत्ती-डंटल नहीं। किसानका लक्ष्य केवल बाजरीको प्राप्त करनेका ही होता है। बाजरीको प्राप्त करनेके लिये वह खेतीको जल, खाद आदिसे पुष्ट करता है, जिससे बढ़िया बाजरी प्राप्त हो सके। ऐसे ही साधकका लक्ष्य भी केवल भगवान्का होना चाहिये, संसारका नहीं। भगवान्को प्राप्त करनेके लिये साधकको संसारकी सेवा करनी चाहिये। सेवाके सिवाय संसारसे अपना कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। महत्त्व बाजरी (दाने-) का है, पत्ती-डंटलका नहीं; क्योंकि आरम्भमें भी बाजरी रहती है और अन्तमें भी बाजरी ही रहती है। बाजरी प्राप्त करनेके बाद जो शेष बचता है, वह (पत्ती-डंटल) बाजरीसे अलग न होनेपर भी अपने लिये किसी कामकी चीज नहीं है, प्रत्युत पशुओंके खानेकी चीज है। ऐसे ही सात्त्विक-राजस-तामस भाव मूढ़ (अविवेकी) मनुष्योंके लिये हैं। ये तीनों ही भाव मनुष्यको बाँधनेवाले हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। इसलिये ये भाव भगवान्के रूप होते हुए भी स्वयंके लिये नहीं हैं, प्रत्युत विवेकपूर्वक सांसारिक व्यवहारके लिये हैं। जैसे, जहर भी भगवान्का रूप है, पर वह खानेके लिये नहीं है!

जैसे बाजरी (बीज)-से पत्ती-डंटल पैदा होनेपर भी पत्ती-डंटलमें बाजरी नहीं है और बाजरीमें पत्ती-डंटल नहीं है, ऐसे ही भगवान्से पैदा होनेपर भी सात्त्विक-राजस-तामस भावोंमें भगवान् नहीं हैं और भगवान्में सात्त्विक-राजस-तामस भाव नहीं हैं।

सम्बन्ध —भगवान्ने पहले बारहवें श्लोकमें कहा कि ये सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं, पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। इस विवेचनसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा निलिप्त हैं। ऐसे ही भगवान्का शुद्ध अंश यह जीव भी निलिप्त है। इसपर यह प्रश्न होता है कि यह जीव निलिप्त होता हुआ भी बँधता कैसे है? इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

श्लोक १३]

  • साधक-संजीवनी *

५२१

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।

मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥

किन्तु—

एभिः= इनइदम्= यहपरम्= अतीत
त्रिभिः= तीनोंसर्वम्= सम्पूर्णअव्ययम्= अविनाशी
गुणमयैः= गुणरूपजगत्= जगत्
(प्राणिमात्र)माम्= मुझे
भावैः= भावोंसेएभ्यः= इन गुणोंसे= नहीं
मोहितम्= मोहितअभिजानाति= जानता।

व्याख्या —‘त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः’ ‘परमव्ययम्’—सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न और लीन होती रहती हैं। उनके साथ तादात्म्य करके मनुष्य अपनेको सात्त्विक, राजस और तामस मान लेता है अर्थात् उनका अपनेमें आरोप कर लेता है कि ‘मैं सात्त्विक, राजस और तामस हो गया हूँ।’ इस प्रकार तीनों गुणोंसे मोहित मनुष्य ऐसा मान ही नहीं सकता कि मैं परमात्माका अंश हूँ। वह अपने अंशी परमात्माकी तरफ न देखकर उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वृत्तियोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है—यही उसका मोहित होना है। इस प्रकार मोहित होनेके कारण वह ‘मेरा परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्ध है’—इसको समझ ही नहीं सकता।

यहाँ ‘जगत्’ शब्द जीवात्माका वाचक है। निरन्तर परिवर्तनशील शरीरके साथ तादात्म्य होनेके कारण ही यह जीव ‘जगत्’ नामसे कहा जाता है। तात्पर्य है कि शरीरके जन्मनेमें अपना जन्मना, शरीरके मरनेमें अपना मरना, शरीरके बीमार होनेमें अपना बीमार होना और शरीरके स्वस्थ होनेमें अपना स्वस्थ होना मान लेता है, इसीसे यह ‘जगत्’ नामसे कहा जाता है। जबतक यह शरीरके साथ अपना तादात्म्य मानेगा, तबतक यह जगत् ही रहेगा अर्थात् जन्मता-मरता ही रहेगा, कहीं भी स्थायी नहीं रहेगा।

गुणोंकी भगवान्के सिवाय अलग सत्ता माननेसे ही प्राणी मोहित होते हैं। अगर वे गुणोंको भगवत्स्वरूप मानें तो कभी मोहित हो ही नहीं सकते।

तीनों गुणोंका कार्य जो शरीर है, उस शरीरको चाहे अपना मान लें, चाहे अपनेको शरीर मान लें—दोनों ही मान्यताओंसे मोह पैदा होता है। शरीरको अपना मानना ‘ममता’ हुई और अपनेको शरीर मानना ‘अहंता’ हुई। शरीरके साथ अहंता-ममता करना ही मोहित होना है। मोहित हो जानेसे गुणोंसे सर्वथा अतीत जो भगवत्त्व है,

उसको नहीं जान सकता। यह उस भगवत्त्वको तभी जान सकता है, जब त्रिगुणात्मक शरीरके साथ इसकी अहंता-ममता मिट जाती है। यह सिद्धान्त है कि मनुष्य संसारसे सर्वथा अलग होनेपर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे सर्वथा अभिन्न होनेपर ही परमात्माको जान सकता है। कारण इसका यह है कि त्रिगुणात्मक शरीरसे यह स्वयं सर्वथा भिन्न है और परमात्माके साथ यह स्वयं सर्वथा अभिन्न है।

अस्वाभाविकमें स्वाभाविक भाव होना ही मोहित होना है। जो प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले तीनों गुणोंसे परे हैं, अत्यन्त निर्विघ्न हैं और नित्य-निरन्तर एकरूप रहनेवाले हैं, ऐसे परमात्मा ‘स्वाभाविक’ हैं। परमात्माकी यह स्वाभाविकता बनायी हुई नहीं है, कृत्रिम नहीं है, अभ्याससाध्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। परंतु शरीर तथा संसारमें अहंता-ममता अर्थात् ‘मैं’ और ‘मेरा’-भाव उत्पन्न हुआ है एवं नष्ट होनेवाला है, यह केवल माना हुआ है, इसलिये यह ‘अस्वाभाविक’ है। इस अस्वाभाविकको स्वाभाविक मान लेना ही मोहित होना है, जिसके कारण मनुष्य स्वाभाविकताको समझ नहीं सकता।

जीव पहले परमात्मासे विमुख हुआ या पहले संसारके सम्मुख (गुणोंसे मोहित) हुआ ?—इसमें दार्शनिकोंका मत यह है कि परमात्मासे विमुख होना और संसारसे सम्बन्ध जोड़ना—ये दोनों अनादि हैं, इनका आदि नहीं है। अतः इनमें पहले या पीछेकी बात नहीं कही जा सकती। परन्तु मनुष्य यदि मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे, उसे केवल भगवान्में ही लगाना शुरू कर दे तो यह संसारसे ऊपर उठ जाता है अर्थात् इसका जन्म-मरण मिट जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मनुष्य प्रभुकी दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके ही बन्धनमें पड़ा है। अपनी स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके नष्ट होनेवाले पदार्थमें उलझ

५२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

जानेसे यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता।

‘परमव्ययम्’ पदसे भगवान् कहते हैं कि मैं इन गुणोंसे पर हूँ अर्थात् इन गुणोंसे सर्वथा रहित, असम्बद्ध,

निलिप्त हूँ। मैं न कभी किसी गुणसे बँधा हुआ हूँ और न गुणोंके परिवर्तनसे मेरेमें कोई परिवर्तन ही होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूपको गुणोंसे मोहित प्राणी नहीं जान सकते।

परिशिष्ट भाव —जो मनुष्य भगवान्को न देखकर सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको ही देखता है, उनका भोग करता है, उनसे सुख लेता है, वह उन भावोंसे मोहित हो जाता है अर्थात् भगवान्की दुरत्यय गुणमयी मायासे बँध जाता है और फलस्वरूप बार-बार जन्मता-मरता है। तात्पर्य है कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव (कर्म, पदार्थ, काल, स्वभाव, गुण आदि) अनित्य हैं और भगवान् नित्य हैं। जो अनित्यका भोग करते हैं, वे बँध जाते हैं; परन्तु जो अनित्यका त्याग करके नित्यस्वरूप भगवान्का आश्रय लेते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।

इस श्लोकमें जीवात्माके लिये ‘जगत्’ शब्द आया है। इसका तात्पर्य है कि जिसकी सत्ता विद्यमान है ही नहीं, उसको सत्ता और महत्ता देकर उससे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव भी जगत् हो जाता है! चेतन भी (चेतनताका दुरुपयोग करके) जड़ हो जाता है! उत्कृष्ट परा प्रकृति भी निकृष्ट अपरा प्रकृति बन जाती है! जीव जगत्के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश, जगत्के लाभ-हानिको अपना लाभ-हानि मान लेता है। जैसे मनुष्य कामनाके साथ अभिन्न होकर ‘कामात्मानः’ अर्थात् कामना-रूप हो जाता है (गीता २।४३) और भगवान्के साथ अभिन्न होकर ‘मन्मयाः’ अर्थात् भगवद्भूत हो जाता है (गीता ४।१०), ऐसे ही जीव जगत्के साथ अभिन्न होकर जगत्-रूप हो जाता है। फर्क यही है कि भगवद्भूतसे वह नित्य है, पर कामनारूप या जगत्-रूपसे वह अनित्य है।

जीवने भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको माना, सत्ता मानकर उसको महत्त्व दिया, महत्त्व देकर उससे सम्बन्ध जोड़ा और सम्बन्ध जोड़कर अपनी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव कर लिया, इसलिये वह ‘जगत्’ बन गया! जो केवल जगत्की सत्ताको मानता है, वह अपनी सत्तासे विमुख होकर जगत् हो जाता है, जो अवास्तविक है और जो केवल भगवान्की सत्ताको मानता है, वह अपनी स्वतन्त्र सत्ताकी मान्यताको मिटाकर भगवान् हो जाता है—‘मम साधर्म्यमागताः’ (गीता १४।२), जो वास्तविक है।

जीवको ‘जगत्’ कहनेका तात्पर्य है कि उसका चेतनताकी तरफ खयाल ही नहीं रहा, प्रत्युत जड़ शरीरको ही ‘मैं’ (अपना स्वरूप) और ‘मेरा’ मानने लग गया। जीव स्वरूपसे निर्गुण तथा अव्यय होनेपर भी ‘जगत्’ हो जानेके कारण सात्त्विक-राजस-तामस गुणोंसे बँध जाता है—‘निबधन्ति महाबाहो देहे देहिन्मव्ययम्’ (गीता १४।५)। वास्तवमें अलौकिक परमात्माका अंश होनेसे जीव भी अलौकिक ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक), पर लौकिक जगत्को पकड़नेसे वह भी लौकिक हो जाता है! अहमसे लेकर पृथ्वीतक सब अपरा प्रकृति है (गीता ७।४)। अतः जैसे पृथ्वी जड़ है, ऐसे ही अहम् भी जड़ है। जब जीव अहम्को दृढ़तासे पकड़कर ‘अहंकारविमूढात्मा’ हो जाता है अर्थात् अहम्को अपना स्वरूप मान लेता है, तब उसका पतन होते-होते वह भी जड़ जगत् ही बन जाता है अर्थात् उसका चेतनपना लुप्त (विस्मृत) हो जाता है, उसको चेतनपनेका अनुभव नहीं होता।

जो गुणोंमें आसक्त नहीं होते, उनके सामने जड़ता रहती ही नहीं, इसलिये उनको सब जगह भगवान्-ही-भगवान् दीखते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। परन्तु जो गुणोंमें आसक्त होते हैं, उनको भगवान् दीखते ही नहीं, प्रत्युत संसार-ही-संसार दीखता है, इसलिये वे भगवान्को भी संसारी ही देखते हैं! वे गुणोंसे अतीत भगवान्को भी गुणोंसे बँधे हुए देखते हैं, अविनाशी भगवान्को भी जन्मने-मरनेवाला देखते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। भक्तकी दृष्टि तो भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती, पर गुणोंमें आसक्त संसारी लोगोंकी दृष्टि संसारको छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती। इसलिये भक्तको आनन्द-ही-आनन्द प्राप्त होता है और संसारी मनुष्यको दुःख-ही-दुख—‘दुःखालयम्’ (गीता ८।१५)।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनेको न जान सकनेमें हेतु बताते हैं।

दैवी होषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४॥

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२३

हि= क्यौंकिदुरत्यया= दुरत्यय है अर्थात्प्रपद्यन्ते= शरण
मम= मेरीइससे पार पानाहोते हैं,
एषा= यहबड़ा कठिन है।ते= वे
गुणमयी= गुणमयीये= जोएताम्= इस
दैवी= दैवीमाम्= केवल मेरेमायाम्= मायाको
माया= मायाएव= हीतरन्ति= तर जाते हैं।

व्याख्या —‘दैवी होषा गुणमयी * मम माया दुरत्यया’—सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंवाली दैवी (देव अर्थात् परमात्माकी) माया बड़ी ही दुरत्यय है। भोग और संग्रहकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य इस मायासे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं कर सकते।

‘दुरत्यय’ कहनेका तात्पर्य है कि ये मनुष्य अपनेको कभी सुखी और कभी दुःखी, कभी समझदार और कभी बेसमझ, कभी निर्बल और कभी बलवान् आदि मानकर इन भावोंमें तल्लीन रहते हैं। इस तरह आने-जानेवाले प्राकृत भावों और पदार्थोंमें ही तादात्म्य, ममता, कामना करके उनसे बँधे रहते हैं और अपनेको इनसे रहित अनुभव नहीं कर सकते। यही इस मायामें दुरत्ययपना है। यह गुणमयी माया तभी दुरत्यय होती है; जब भगवान्के सिवाय गुणोंकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता मानी जाय। अगर मनुष्य भगवान्के सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता और महत्ता नहीं मानेगा, तो वह इस गुणमयी मायासे तर जायगा।

‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते’—मनुष्योंमेंसे जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं; क्यौंकि उनकी दृष्टि केवल मेरी ही तरफ रहती है, तीनों गुणोंकी तरफ नहीं। जैसा कि पहले वर्णन किया है, सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण न मेरेमें हैं और न मैं उनमें हूँ। मैं तो निर्लिप्त रहकर सभी कार्य करता हूँ। इस प्रकार जो मेरे स्वरूपको जानते हैं, वे गुणोंमें नहीं फँसते, इस मायासे तर जाते हैं। वे गुणोंका कार्य मन-बुद्धिका किंचिन्मात्र भी सहारा नहीं लेते। क्यों नहीं लेते? क्यौंकि वे इस बातको जानते हैं कि प्रकृतिका कार्य होनेसे मन-बुद्धि भी तो प्रकृति हैं। प्रकृतिकी क्रियाशीलता प्रकृतिमें ही है। जैसे प्रकृति हरदम प्रलयकी तरफ जा रही है, ऐसे ही ये मन-बुद्धि भी तो प्रलयकी तरफ जा रहे हैं।

  • भगवान् पहले बारहवें श्लोकमें यह कहकर आये हैं कि ये सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं। उसी बातको लेकर भगवान्ने यहाँ गुणमयी मायाको अपनी दैवी (अलौकिक) माया बताया है। पीछेके तेरहवें श्लोकमें जिन तीन गुणमय भावोंसे सम्पूर्ण जगत्को मोहित बताया था, उनको ही यहाँ ‘एषा’ पदसे कहा है। मायाको ‘गुणमयी’ कहनेका तात्पर्य है कि यह माया कार्यरूप है; क्यौंकि गुण प्रकृतिके कार्य हैं और वे गुण ही जीवको बाँधते हैं, स्वयं प्रकृति नहीं।

अतः उनका सहारा लेना परतन्त्रता ही है। ऐसी परतन्त्रता बिलकुल न रहे और परा प्रकृति (जो कि परमात्माका अंश है) केवल परमात्माकी तरफ आकृष्ट हो जाय तथा अपरासे सर्वथा विमुक्त हो जाय—यही भगवान्के सर्वथा शरण होनेका तात्पर्य है।

यहाँ ‘मामेव’ कहनेका तात्पर्य है कि वे अनन्यभावसे केवल मेरे ही शरण होते हैं; क्यौंकि मेरे सिवाय दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं।

कई साधक मेरे शरण तो हो जाते हैं; परन्तु केवल मेरे ही शरण नहीं होते। इसलिये कहा कि जो ‘मामेव’—केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे तर जाते हैं। मायाकी शरण न ले अर्थात् हमारे पास रुपये-पैसे, चीज-वस्तु आदि सब रहें, पर हम इनको अपना आधार न मानें, इनका आश्रय न लें, इनका भरोसा न करें, इनको महत्त्व न दें। इनका उपयोग करनेका हमें अधिकार है। इनपर कब्जा करनेका हमें अधिकार नहीं है। इनपर कब्जा कर लेना ही इनके आश्रित होना है। आश्रित होनेपर इनसे अलग होना कठिन मालूम देता है—यही वास्तवमें दुरत्ययपना है। इस दुरत्ययपनासे छूटनेके लिये ही उपाय बताते हैं—‘मामेव ये प्रपद्यन्ते।’

शरीर, इन्द्रियाँ आदि सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर, भगवान्की और भगवान्के लिये ही मानकर भगवान्के भजनमें, उनके आज्ञापलनमें लगा देना है। अपनेको इनसे कुछ नहीं लेना है। इनको भगवान्में लगा देनेका फल भी अपनेको नहीं लेना है; क्यौंकि जब भगवान्की वस्तु सर्वथा भगवान्के अर्पण कर दी अर्थात् उसमें भूलसे जो अपनापन कर लिया था, वह हटा लिया, तब उस समर्पणका फल हमारा कैसे हो सकता है? यह सब सामग्री तो भगवान्की सेवाके लिये ही भगवान्से मिली है। अतः इसको उनकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य है,

५२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

हमारी ईमानदारी है। इस ईमानदारीसे भगवान् बड़े प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी कृपासे मनुष्य मायाको तर जाते हैं। अपने पास अपनी करके कोई वस्तु है नहीं। भगवान्की दी हुई वस्तुओंको अपनी मानकर अपनेमें अभिमान किया था—यह गलती थी। भगवान्का तो बड़ा ही उदार एवं प्रेमभरा स्वभाव है कि वे जिस किसीको कुछ देते हैं, उसको इस बातका पता ही नहीं लगने देते कि यह भगवान्की दी हुई है, प्रत्युत जिसको जो कुछ मिला है, उसको वह अपनी और अपने लिये ही मान लेता है। यह भगवान्का देनेका एक विलक्षण ढंग है। उनकी इस कृपाको केवल भक्तलोग ही जान सकते हैं। परन्तु जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं, वे सोच ही नहीं सकते कि इन वस्तुओंको हम सदा पासमें रख सकते हैं क्या? अथवा

वस्तुओंके पास हम सदा रह सकते हैं क्या? इन वस्तुओंपर हमारा आधिपत्य चल सकता है क्या? इसलिये वे अनन्यभावसे भगवान्के शरण नहीं हो सकते।

इस श्लोकका भाव यह हुआ कि जो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं अर्थात् जो केवल दैवी सम्पत्तिवाले होते हैं, वे भगवान्की गुणमयी मायाको तर जाते हैं। परन्तु जो भगवान्के शरण न होकर देवता आदिके शरण होते हैं अर्थात् जो केवल आसुरी सम्पत्तिवाले (प्राण-पिण्ड-पोषण-परायण, सुखभोग-परायण) होते हैं, वे भगवान्की गुणमयी मायाको नहीं तर सकते। ऐसे आसुर स्वभाववाले मनुष्य भले ही ब्रह्मलोकतक चले जायें, तो भी उनको (ब्रह्म-लोकतक गुणमयी माया होनेसे) वहाँसे लौटना ही पड़ता है, जन्मना-मरना ही पड़ता है।

परिशिष्ट भाव —जब मनुष्य संसारसे विमुख होकर भगवान्की शरणागति स्वीकार कर लेता है, तब वह माया-(अपरा प्रकृतिके कार्य-)को तर जाता है अर्थात् उसके अहम्का सर्वथा नाश हो जाता है। भगवान्की शरणागति स्वीकार करनेका तात्पर्य है—भगवान्की सत्तामें ही अपनी सत्ता मिला दे अर्थात् केवल भगवान्की ही सत्ताको स्वीकार कर ले। न अपनी स्वतन्त्र सत्ता माने, न मायाकी स्वतन्त्र सत्ता माने। न अहम्का आश्रय ले, न माया-(गुणों-) का आश्रय ले। इसमें कोई परिश्रम, उद्योग नहीं है।

मायाको सत्ता मनुष्यने ही दी है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५), ‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५।७)। अगर वह मायाको सत्ता न देकर केवल भगवान्की ही शरणमें रहता तो वह मायाको तर जाता अर्थात् उसके लिये मायाकी सत्ता रहती ही नहीं।

जीव जड़ताका आश्रय लेनेसे अर्थात् उसको अपना एवं अपने लिये माननेसे जड़तामें चला जाता है और जगत् बन जाता है (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान्का आश्रय लेनेसे वह स्वतःसिद्ध चिन्मयतामें चला जाता है और भक्त हो जाता है। भक्त होनेपर जगत् लुप्त हो जाता है अर्थात् जगत् जगत्-रूपसे नहीं रहता, प्रत्युत भगवत्स्वरूप हो जाता है, जो वास्तवमें है।

‘मामेव’ पदसे भगवान्का तात्पर्य है कि जीव मेरा ही (मम एव) अंश है—‘ममैवांशो जीवलोकै’ (गीता १५।७); अतः मेरे ही (माम् एव) शरण होनेसे वह मायाको तर जाता है। इसलिये मेरी शरण लेनेवाले भक्तोंका मेरे सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध होता ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं; क्योंकि उनको दृष्टिमें मेरे (भगवान्के) सिवाय अन्य कोई होता ही नहीं। न तो उनको दृष्टि दूसरेमें जाती है और न दूसरा उनकी दृष्टिमें आता है। उनकी दृष्टिमें अपरा प्रकृतिकी न तो सत्ता रहती है, न महत्ता रहती है और न अपनापन ही रहता है। उनकी केवल भगवद्वुद्धि हो जाती है, जो वास्तवमें भगवत्स्वरूप ही है।

जिनमें विवेककी प्रधानता है, ऐसे भक्त अहम्का आश्रय छोड़कर अर्थात् संसारका त्याग करके भगवान्के आश्रित होते हैं। परन्तु जिनमें विवेककी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भगवान्में श्रद्धा-विश्वासकी प्रधानता है, ऐसे सीधे-सरल भक्त अहम्के साथ (जैसे हैं, वैसे ही) भगवान्के आश्रित हो जाते हैं। ऐसे भक्तोंके अहम्का नाश भगवान् स्वयं करते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि मेरे शरण होनेवाले सभी मायासे तर जाते हैं। अतः सब-के-सब प्राणी मेरे शरण क्यों नहीं होते—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२५

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥

परन्तु—

मायया= मायाके द्वाराभावम्= भावकादुष्कृतिनः= पाप-कर्म
अपहृतज्ञानाः= जिनका ज्ञान
हरा गया
है, (वे)आश्रिताः= आश्रय
लेनेवाले (और)करनेवाले
आसुरम्= आसुरनराधमाः= मनुष्योंमें महान्
नीच (तथा)मूढाः= मूढ़ मनुष्य
माम्= मेरे
न, प्रपद्यन्ते= शरण नहीं होते।

व्याख्या— 'न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः'—जो दुष्कृती और मूढ़ होते हैं, वे भगवान् के शरण नहीं होते। दुष्कृती वे ही होते हैं, जो नाशवान्, परिवर्तनशील प्राप्त पदार्थोंमें 'ममता' रखते हैं और अप्राप्त पदार्थोंकी 'कामना' रखते हैं। कामना पूरी होनेपर 'लोभ' और कामनाकी पूर्तिमें बाधा लगनेपर 'क्रोध' पैदा होता है। इस तरह जो 'कामना' में फँसकर व्यभिचार आदि शास्त्र-निषिद्ध विषयोंका सेवन करते हैं, 'लोभ' में फँसकर झूठ, कपट, विश्वासघात, बेईमानी आदि पाप करते हैं और 'क्रोध' के वशीभूत होकर द्वेष, वैर आदि दुर्भावपूर्णक हिंसा आदि पाप करते हैं, वे 'दुष्कृती' हैं।

जब मनुष्य भगवान् के सिवाय दूसरी सत्ता मानकर उसको महत्त्व देते हैं, तभी कामना पैदा होती है। कामना पैदा होनेसे मनुष्य मायासे मोहित हो जाते हैं और 'हम जीते रहे तथा भोग भोगते रहे'—यह बात उनको जँच जाती है। इसलिये वे भगवान् के शरण नहीं होते, प्रत्युत विनाशी वस्तु, पदार्थ आदिके शरण हो जाते हैं।

तमोगुणकी अधिकता होनेसे सार-असार, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, ग्राह्य-त्याज्य, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिकी तरफ ध्यान न देनेवाले भगवद्विमुख मनुष्य 'मूढ़' हैं। दुष्कृती और मूढ़ पुरुष परमात्माकी तरफ चलनेका निश्चय ही नहीं कर सकते, फिर वे परमात्माकी शरण तो हो ही कैसे सकते हैं?

'नराधमाः' कहनेका मतलब है कि वे दुष्कृती और मूढ़ मनुष्य पशुओंसे भी नीचे हैं। पशु तो फिर भी अपनी मर्यादामें रहते हैं, पर ये मनुष्य होकर भी अपनी मर्यादामें नहीं रहते हैं। पशु तो अपनी योनि भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहे हैं और ये मनुष्य होकर (जिनको कि परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये मनुष्यशरीर दिया), पाप, अन्याय आदि करके नरकों और पशुयोनिओंकी तरफ जा रहे हैं। ऐसे मूहतापूर्णक पाप करनेवाले प्राणी नरकोंके

अधिकारी होते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये भगवान्ने (गीता—सोलहवें अध्यायके उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें) कहा है कि 'द्वेष रखनेवाले, मूढ़, क्रूर और संसारमें नराधम पुरुषोंको मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वे आसुरी योनियोंको प्राप्त होकर फिर घोर नरकोंमें जाते हैं।'

'माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः' — भगवान्की जो तीनों गुणोंवाली माया है (गीता—सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक), उस मायासे विवेक ढक जानेके कारण जो आसुर भावको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और प्राणोंका पोषण करनेमें लगे हुए हैं, वे मेरेसे सर्वथा विमुख ही रहते हैं। इसलिये वे मेरे शरण नहीं होते।

दूसरा भाव यह है कि जिनका ज्ञान मायासे अपहृत है, उनकी वृत्ति पदार्थोंके आदि और अन्तकी तरफ जाती ही नहीं। उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको प्रत्यक्ष नश्वर देखते हुए भी वे रुपये-पैसे, सम्पत्ति आदिके संग्रहमें और मान, योग्यता, प्रतिष्ठा, कीर्ति आदिमें ही आसक्त रहते हैं और उनकी प्राप्ति करनेमें ही अपनी बहादुरी और उद्योगकी सफलता, इतिश्री मानते हैं। इस कारण वे यह समझ ही नहीं सकते कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्ति होनेपर भी अन्तमें वह 'नहीं' ही रहेगा और उसके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं रहेगा।

'असु' नाम प्राणोंका है। प्राणोंको प्रत्यक्ष ही आने-जानेवाले अर्थात् क्रियाशील और नाशवान् देखते हुए भी वे उन प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे रहते हैं। जीवन-निर्वाहमें काम आनेवाली सांसारिक वस्तुओंको ही वे महत्त्व देते हैं। उन वस्तुओंसे भी बढ़कर वे रुपये-पैसोंको महत्त्व देते हैं, जो कि स्वयं काममें नहीं आते, प्रत्युत वस्तुओंके द्वारा काममें आते हैं। वे केवल रुपयोंको ही आदर नहीं देते, प्रत्युत उनकी संख्याको बहुत आदर देते हैं। रुपयोंकी संख्या अभिमान बढ़ानेमें काम आती है। अभिमान सम्पूर्ण

५२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

आसुरी सम्पत्तिका आधार और सम्पूर्ण दुःखों एवं पापोंका कारण है*। ऐसे अभिमानको लेकर ही जो अपनेको मुख्य मानते हैं, वे आसुर भावको प्राप्त हैं।

विशेष बात

यहाँ भगवान्ने कहा है कि दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं हो सकते और नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कहा है कि सुरुचारी मनुष्य भी अगर अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है तथा निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है—यह कैसे? इसका समाधान यह है कि वहाँ (९।३०) में 'अपि चेतु' पद आये हैं, जिनका अर्थ होता है—दुराचारीकी प्रवृत्ति परमात्माकी तरफ स्वाभाविक नहीं होती; परन्तु अगर वह भगवान्के शरण हो जाय, तो उसके लिये भगवान्की तरफसे मना नहीं है। भगवान्की तरफसे किसी भी जीवके लिये किंचिन्मात्र भी बाधा नहीं है; क्योंकि भगवान् प्राणिमात्रके लिये सम हैं। उनका किसी भी प्राणीमें राग-द्वेष नहीं होता (गीता—नवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी भगवान्के द्वेषका विषय नहीं है। सब प्राणियोंपर भगवान्का प्यार और कृपा समान ही है।

वास्तवमें दुराचारी अधिक दयाका पात्र है। कारण कि वह अपना ही महान् अहित कर रहा है, भगवान्का कुछ भी नहीं बिगाड़ रहा है। इसलिये किसी कारणवशात् कोई आफत आ जाय, बड़ा भारी संकट आ जाय और उसका कोई सहारा न रहे तो वह भगवान्को पुकार उठेगा। ऐसे ही किसी सन्तको उसने दुःख दिया और संतके हृदयमें कृपा आ जाय तो उस सन्तकी कृपासे वह भगवान्में लग जाय अथवा किसी ऐसे स्थानमें चला जाय, जहाँ अच्छे-अच्छे बड़े विलक्षण दयालु महात्मा रह चुके हैं और उनके प्रभावसे उसका भाव बदल जाय अथवा किसी कारणवशात् उसका कोई पुराना विलक्षण पुण्य उदय हो जाय, तो वह अचानक चेत सकता है और भगवान्के शरण हो सकता है। ऐसा पापी पुरुष अगर भगवान्में लगता है तो बड़ी दृढ़तासे लगता है। कारण कि उसके भीतर कोई अच्छाई नहीं होती, इसलिये उसमें अच्छेपनका अभिमान नहीं होता।

तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवान्की व्यापकता और कृपा समान है। सदाचार और दुराचार तो

उन प्राणियोंके किये हुए कार्य हैं। मूलमें तो वे प्राणी सदा भगवान्के शुद्ध अंश हैं। केवल दुराचारके कारण उनकी भगवान्में रुचि नहीं होती। अगर किसी कारणवशात् रुचि हो जाय, तो भगवान् उनके किये हुएको न देखकर उनको स्वीकार कर लेते हैं—

रहित न प्रभु चित् चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥

(मानस १।२९।३)

जैसे, माँका हृदय अपने सम्बन्धसे बालकोंपर समान ही रहता है। उनके सदाचार-दुराचारसे उनके प्रति माँका व्यवहार तो विषम होता है, पर हृदय विषम नहीं होता—'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।' माँ तो एक जन्मको और एक शरीरको देनेवाली होती है; परन्तु प्रभु तो सदा रहनेवाली माँ हैं। प्रभुका हृदय तो प्राणिमात्रपर सदैव द्रवित रहता ही है। प्राणी निमित्तमात्र भी शरण हो जाय तो प्रभु विशेष द्रवित हो जाते हैं। भगवान् कहते हैं— जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥ तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥

(मानस ५।४८।१-२)

इसका तात्पर्य है कि जो चराचर प्राणियोंके साथ द्वेष करनेवाला है, वह अगर कहीं भी आश्रय न मिलनेसे भयभीत होकर सर्वथा मेरा ही आश्रय लेकर मेरे शरण हो जाता है, तो उसमें होनेवाले मद, मोह, कपट, नाना छल आदि दोषोंकी तरफ न देखकर, केवल उसके भावकी तरफ देखकर मैं उसको बहुत जल्दी साधु बना लेता हूँ।

धर्मका आश्रय रहनेसे धर्मात्मा पुरुषके भीतर अनन्यभाव होनेमें कठिनता रहती है। परन्तु दुरात्मा पुरुष जब किसी कारणसे भगवान्के सम्मुख होता है, तब उसमें किसी प्रकारके शुभकर्मका आश्रय न होनेसे केवल भगवत्-परायणताका ही बल रहता है। यह बल बहुत शीघ्र पवित्र करता है। कारण कि यह बल खुदका होता है अर्थात् किसी तरहका आश्रय न रहनेसे उसकी खुदकी पुकार होती है। इस पुकारसे भगवान् बहुत शीघ्र पिघल जाते हैं। ऐसी पुकार होनेमें पुण्यात्मा-पापात्मा, विद्वान्-मूर्ख, सुजाति-कुजाति आदिका होना कारण नहीं है, प्रत्युत संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होना ही खास कारण है। यह निराशा हरेक मनुष्यको हो सकती है।

दूसरी बात, भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि दुष्कृती

  • संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ (मानस ७।७४।३)

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२७

पुरुष मेरे शरण नहीं होते; क्योंकि उनका स्वभाव मेरे विपरीत होता है। उनमेंसे अगर कोई मेरे शरण हो जाय, तो मैं उससे प्यार करनेके लिये हरदम तैयार हूँ। भगवान्की कृपालुता इतनी विलक्षण है कि भगवान् भी अपनी कृपाके परवश होकर जीवका शीघ्र कल्याण कर देते हैं। अतः यहाँके और वहाँके प्रसंगमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपालुता ही प्रकट होती है।

सुकृती और दुष्कृती* का होना उनकी क्रियाओंपर निर्भर नहीं है, प्रत्युत भगवान्के सम्मुख और विमुख होनेपर निर्भर है। जो भगवान्के सम्मुख है, वह सुकृती है और जो भगवान्से विमुख है, वह दुष्कृती है। भगवान्के सम्मुख होनेका जैसा माहात्म्य है, वैसा माहात्म्य सकामभावपूर्वक किये गये यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि शुभ कर्मोंका भी नहीं है। यद्यपि यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाएँ भी पवित्र हैं, पर जो अपनेको सर्वथा अयोग्य समझकर और अपनेमें किसी तरहकी पवित्रता न देखकर आर्तभावसे भगवान्के सम्मुख रो पड़ता है, उसकी पवित्रता भगवत्कृपासे बहुत

जल्दी होती है। भगवत्कृपासे होनेवाली पवित्रता अनेक जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मोंकी अपेक्षा बहुत ही विलक्षण होती है। इसी तरहसे शुभ कर्म करनेवाले सुकृती भी शुभ कर्मोंका आश्रय छोड़कर भगवान्को पुकार उठते हैं, तो उनका भी शुभ कर्मोंका आश्रय न रहकर एक भगवान्का आश्रय हो जाता है। केवल भगवान्का ही आश्रय होनेके कारण वे भी भगवान्के प्यारे भक्त हो जाते हैं।

एक कृति होती है और एक भाव होता है। कृतिमें बाहरकी क्रिया होती है और भाव भीतरमें होता है। भावके पीछे उद्देश्य होता है और उद्देश्यके पीछे भगवान्की तरफ अनन्यता होती है। वह अनन्यता कृतियों और भावोंसे बहुत विलक्षण होती है; क्योंकि वह स्वयंकी होती है। उस अनन्यताके सामने कोई दुराचार टिक ही नहीं सकता। वह अनन्यता दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषको भी बहुत जल्दी पवित्र कर देती है। वास्तवमें यह जीव परमात्माका अंश होनेसे पवित्र तो है ही। केवल दुर्भावों और दुराचारोंके कारण ही इसमें अपवित्रता आती है।

परिशिष्ट भाव— जो मनुष्य भगवान्का आश्रय नहीं लेते, वे आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले होते हैं (गीता—नवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। उनकी दृष्टि संसार-(पदार्थ और क्रिया-) को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं। उनकी दृष्टिमें भगवान्की सत्ता ही नहीं होती, फिर भगवान्की शरण लेनेका प्रश्न ही नहीं उठता! भोग भोगना और संग्रह करना ही उनका अन्तिम लक्ष्य होता है—‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चित्ताः’ (गीता १६।११)। उनका ज्ञान मायाके द्वारा अपहृत होनेसे वे मायाके वशमें होते हैं। मायाके वशमें होनेसे वे मायाको तर ही नहीं सकते।

‘माययापहृतज्ञानाः’ पदका तात्पर्य है कि मायाके कारण उन मनुष्योंकी विवेकशक्ति तिरस्कृत हो गयी है। वे मनुष्य मायामें ही रचे-पचे रहते हैं अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करने, शरीरको सजाने, मकानकी सजावट करने आदिमें ही लगे रहते हैं। वे शरीरको सुख-आराम देनेवाली वस्तुओंका ही नया-नया अविष्कार करते रहते हैं और उसीको विशेष महत्त्व देते हैं। ऐसे अनित्य, परिवर्तनशील वस्तुओंको ही जाननेवाले लोग नित्य, अपरिवर्तनशील तत्त्वको कैसे जानें? क्योंकि उधर उनकी दृष्टि जाती ही नहीं, जा सकती ही नहीं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि दुष्कृती पुरुष मेरे शरण नहीं होते। तो फिर शरण कौन होते हैं? इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

  • यहाँ (७।१५ में) ‘दुष्कृतिनः’ कहकर बहुवचन दिया गया है और वहाँ (१।३० में) ‘सुदुराचारः’ कहकर एकवचन दिया है। इसका तात्पर्य है कि बहुवचन देना सामान्य शास्त्र (सामान्य बात) है और एकवचन देना विशेष शास्त्र (विशेष बात) है। जहाँ सामान्य और विशेष शास्त्रकी तुलना होती है, वहाँ सामान्य शास्त्रसे विशेष शास्त्र बलवान् हो जाता है—‘सामान्यशास्त्रो न्यूनं विशेषो बलवान् भवेत्’। इसलिये एकवचन बलवान् है।

दूसरी बात, जिसको अलंकार नहीं मिलता, वह विधि बलवान् होती है—‘निरवकाशो विधिपरवादः’। इसका मतलब यह हुआ कि दुष्कृती भगवान्के शरण नहीं होते—यह उनका सामान्य स्वभाव बताया; परन्तु उनमेंसे कोई एक किसी कारण-विशेषसे भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान्की तरफसे कृपाका दरवाजा खुला है—

सनमुद्य होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अद्य नासहिं तबहीं॥ (मानस ५।४४।१)

५२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।

आतों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥

भरतर्षभ, अर्जुन = हे भरतवंशियोंमेंआर्तः = आर्त,चतुर्विधाः = चार प्रकारके
श्रेष्ठ अर्जुन !जिज्ञासुः = जिज्ञासुजनाः = मनुष्य
सुकृतिनः = पवित्र कर्मच = औरमाम् = मेरा
करनेवालेज्ञानी = ज्ञानी अर्थात्भजन्ते = भजन करते हैं अर्थात्
अर्थार्थी = अर्थार्थी,प्रेमी—(ये)मेरे शरण होते हैं ।

व्याख्या —‘चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन’—सुकृती पवित्रात्मा मनुष्य अर्थात् भगवत्सम्बन्धी काम करनेवाले मनुष्य चार प्रकारके होते हैं। ये चारों मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् स्वयं मेरे शरण होते हैं।

पूर्वश्लोकमें ‘दुष्कृतिनः’ पदसे भगवान्में न लगनेवाले मनुष्योंकी बात आयी थी। अब यहाँ ‘सुकृतिनः’ पदसे भगवान्में लगनेवाले मनुष्योंकी बात कहते हैं। ये सुकृती मनुष्य शास्त्रीय सकाम पुण्य-कर्म करनेवाले नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्से अपना सम्बन्ध जोड़कर भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेवाले हैं। सुकृती मनुष्य दो प्रकारके होते हैं—एक तो यज्ञ, दान, तप आदि और वर्ण-आश्रमके शास्त्रीय कर्म भगवान्के लिये करते हैं अथवा उनको भगवान्के अर्पण करते हैं और दूसरे भगवनामका जप तथा कीर्तन करना, भगवान्की लीला सुनना तथा कहना आदि केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म करते हैं।

जिनकी भगवान्में रुचि हो गयी है, वे ही भाग्यशाली हैं, वे ही श्रेष्ठ हैं और वे ही मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। वह रुचि चाहे किसी पूर्व पुण्यसे हो गयी हो, चाहे आफतके समय दूसरोंका सहारा छूट जानेसे हो गयी हो, चाहे किसी विश्वसनीय मनुष्यके द्वारा समयपर धोखा देनेसे हो गयी हो, चाहे सत्संग, स्वाध्याय अथवा विचार आदिसे हो गयी हो, किसी भी कारणसे भगवान्में रुचि होनेसे वे सभी सुकृती मनुष्य हैं।

जब भगवान्की तरफ रुचि हो जाय, वही पवित्र दिन है, वही निर्मल समय है और वही सम्पत्ति है। जब भगवान्की तरफ रुचि नहीं होती, वही काला दिन है, वही विपत्ति है—‘कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई ॥

(मानस ५। ३२। २)

भगवान्ने कृपा करके भगवत्प्राप्तिरूप जिस उद्देश्यको लेकर जिन्हें मानव-शरीर दिया है, वे ‘जनाः’ (जन)

कहलाते हैं। भगवान्का संकल्प मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये बना है; अतः मनुष्यमात्र भगवान्की प्राप्तिका अधिकारी है। तात्पर्य है कि उस संकल्पमें भगवान्ने मनुष्यको अपने उद्धारकी स्वतन्त्रता दी है, जो कि अन्य प्राणियोंको नहीं मिलती; क्योंकि वे भोगयोगिनियाँ हैं और यह मानवशरीर कर्मयोगिन है। वास्तवमें केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही होनेके कारण मानव-शरीरको साधनयोगिन ही मानना चाहिये। इसलिये इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके मनुष्य शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको छोड़कर अगर भगवत्प्राप्तिके लिये ही लग जाय तो उसको भगवत्कृपासे अनायास ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है। परन्तु जो मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके विपरीत मार्गपर चलते हैं, वे नरकों और चौरासी लाख योगिनियोंमें जाते हैं। इस तरह सबके उद्धारके भावको लेकर भगवान्ने कृपा करके जो मानव-शरीर दिया है, उस शरीरको पाकर भगवान्का भजन करनेवाले सुकृती मनुष्य ही ‘जनाः’ अर्थात् मनुष्य कहलानेयोग्य हैं।

‘आतों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ’—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी—ये चार प्रकारके भक्त भगवान्का भजन करते हैं अर्थात् भगवान्के शरण होते हैं।

(१) अर्थार्थी भक्त —जिनको अपनी न्याययुक्त सुख-सुविधाकी इच्छा हो जाती है अर्थात् धन-सम्पत्ति, वैभव आदिकी इच्छा हो जाती है, परन्तु उसको वे केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरोंसे नहीं, ऐसे भक्त अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं।

चार प्रकारके भक्तोंमें अर्थार्थी आरम्भिक भक्त होता है। पूर्व-संस्कारोंसे उसकी धनकी इच्छा रहती है और वह धनके लिये चेष्टा भी करता है, पर वह समझता है कि भगवान्के समान धनकी इच्छा पूरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ऐसा समझकर वह धनप्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक भगवनामका जप-कीर्तन, भगवत्स्वरूपका ध्यान आदि

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२९

करता है। धन प्राप्त करनेके लिये उसका भगवान्पर ही विश्वास, निष्ठा होती है।

जिसको धनकी इच्छा तो है, पर उसकी प्राप्तिके लिये वह सांसारिक उपायोंका सहारा लेता है और कभी धनके लिये भगवान्को भी याद कर लेता है, वह केवल अर्थार्थी अर्थात् अर्थका भक्त है, भगवान्का भक्त नहीं है। कारण कि उसमें धनकी इच्छा ही मुख्य है। परन्तु जिसमें भगवान्के सम्बन्धकी मुख्यता है, वह क्रमशः भगवान्की तरफ ही बढ़ता चला जाता है। भगवान्में लगे रहनेसे उसकी धनकी इच्छा बहुत कम हो जाती है और समय पाकर मिट भी जाती है। यही भगवान्का अर्थार्थी भक्त है। इसमें मुख्यतया ध्रुवजीका नाम लिया जाता है।

एक दिन बालक ध्रुवके मनमें राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर छोटी माँने बैठने नहीं दिया। उसने ध्रुवसे कहा कि 'तूने भजन नहीं किया है, तू अभाग है और अभागिनके यहाँ ही तूने जन्म लिया है; अतः तू राजाकी गोदमें बैठनेका अधिकारी नहीं है।' ध्रुवने छोटी माँकी कही हुई सब बात अपनी माँसे कह दी। माँने कहा कि 'बेटा! तेरी छोटी माँने ठीक ही कहा है; क्योंकि भजन न तूने किया और न मैंने ही किया।' इसपर ध्रुवने माँसे कहा कि 'माँ! अब तो मैं भजन करूँगा।' ऐसा कहकर वे भगवद्भजन करनेके लिये घरसे निकल पड़े और माँने भी बड़ी हिम्मत करके ध्रुवको जंगलमें जानेके लिये आज्ञा दे दी। रास्तेमें जाते हुए नारदजी महाराज मिल गये। नारदजीने ध्रुवसे कहा कि 'अरे भोले बालक! तू अकेला कहाँ जा रहा है? यों भगवान् जल्दी थोड़े ही मिलते हैं? तू जंगलमें कहाँ रहेगा? वहाँ बड़े-बड़े जंगली जानवर हैं। वे तेरेको खा जायेंगे। वहाँ तेरी माँ थोड़े ही बैठे है! तू मेरे साथ चल। राजा मेरी बात मानते हैं। मैं तेरा और तेरी माँका प्रबन्ध करवा दूँगा।' नारदजीकी बातोंको सुनकर ध्रुवकी भगवद्भजनमें और दृढ़ता हो गयी कि देखो, भगवान्की तरफ चलनेसे नारदजी भी इतनी बात कहते हैं। अब ये मेरेको घर चलनेके लिये कहते हैं, पर पहले ये कहाँ गये थे! ध्रुवने नारदजीसे कहा कि 'महाराज! मैं तो अब भगवान्का भजन ही करूँगा।' ध्रुवजीका ऐसा दृढ़ निश्चय

देखकर नारदजीने उनको द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) दिया और चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान बताकर मधुवनमें जाकर भजन करनेकी आज्ञा दी।

ध्रुवजीने मधुवनमें जाकर ऐसी निष्ठासे भजन किया कि उनकी निष्ठाको देखकर छः महीनेकी अवधिके भीतर-ही भीतर भगवान् ध्रुवके सामने प्रकट हो गये। भगवान्ने ध्रुवजीको राजगद्दीका वरदान दिया, पर इस वरदानसे ध्रुवजी विशेष राजी नहीं हुए। भजनसे अन्तःकरण शुद्ध होनेके कारण उनको धन-(राज्य-) के लिये भगवान्की तरफ चलनेमें बड़ी लज्जा हुई कि मैंने बड़ी गलती की!

तात्पर्य यह हुआ कि ध्रुवजीको तो पहले राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर उन्होंने उस इच्छाकी पूर्तिका मुख्य उपाय भगवान्का भजन ही माना। भजन करनेसे उनको राज्य मिल गया और इच्छा मिट गयी। इस तरह अर्थार्थी भक्त केवल भगवान्की तरफ ही लगता है।

आजकल जो धन-प्राप्तिके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि करते हैं, वे भी धनके लिये समय-समयपर भगवान्को पुकारते हैं। वे अर्थार्थी तो हैं, पर भगवान्के भक्त नहीं हैं। वे तो झूठ, कपट, बेईमानी आदिके भक्त हैं; क्योंकि उनका 'पापके बिना, झूठ-कपटके बिना काम नहीं चलता'—इस तरह झूठ-कपट आदिपर जितना विश्वास है, उतना विश्वास भगवान्पर नहीं है।

जो केवल भगवान्के ही परायण हैं और जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्का ही भजन करते हैं; परन्तु कभी-कभी पूर्व-संस्कारोंसे अथवा किसी कारणसे जिनमें अपने शरीर आदिके लिये अनुकूल परिस्थितिकी इच्छा हो जाती है, वे भी अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। उनकी अनुकूलताकी इच्छा ही अर्थार्थीपन है।

(२) 'आर्त भक्त'—प्राण-संकट आनेपर, आफत आनेपर, मनके प्रतिकूल घटना घटनेपर जो दुःखी होकर अपना दुःख दूर करनेके लिये भगवान्को पुकारते हैं और दुःखको दूर करना केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरे किसी उपायको काममें नहीं लेते, वे आर्त भक्त कहलाते हैं। आर्त भक्तोंमें उत्तराका दृष्टान्त लेना ठीक बैठता है*। कारण कि जब उसपर आफत आयी, तब उसने भगवान्के

  • आर्त भक्तोंमें द्रौपदी और गजेन्द्रका दृष्टान्त ठीक नहीं बैठता; क्योंकि उन्होंने अपनी रक्षाके लिये अन्य उपायोंका भी सहारा लिया था, केवल भगवान्का ही नहीं। जबतक अपना दुःख दूर करनेके लिये अन्य उपायोंका सहारा रहता है, अन्य उपायोंकी तरफ वृत्ति रहती है, तबतक वे अनन्यभक्त नहीं हैं और तभीतक उनपर कष्ट आता है। जब यह अन्यकी तरफसे वृत्ति मिट जाती है, तब वे भक्त कहलाते हैं और उनपर कष्ट नहीं आता। जैसे, चीर-हरणके समय जबतक द्रौपदीकी दूसरोंकी तरफ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सिवाय अन्य किसी उपायका सहारा नहीं लिया। अन्य उपायोंकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं गयी। उसने केवल भगवान्का ही सहारा लिया*। तात्पर्य यह हुआ कि सकामभाव रहनेपर भी आर्त भक्त उसकी पूर्ति केवल भगवान्से ही चाहते हैं।

जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्के परायण हैं और अनुकूलताकी वैसी इच्छा नहीं करते; पर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर इच्छा हो जाती है कि भगवान्ने ऐसा क्यों किया? 'यह प्रतिकूलता मिट जाय तो बहुत अच्छा है।' इस प्रकार प्रतिकूलता मिटानेका भाव पैदा होनेसे वे भी आर्त भक्त कहलाते हैं।

(३) जिज्ञासु भक्त —जिसमें अपने स्वरूपको, भगवत्तत्त्वको जाननेकी जोरदार इच्छा जाग्रत् हो जाती है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? इस प्रकार तत्त्वको जाननेके लिये शास्त्र, गुरु अथवा पुरुषार्थ (श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि उपायों) का भी आश्रय न रखते हुए केवल भगवान्के आश्रित होकर उस तत्त्वको केवल भगवान्से ही जो जानना चाहते हैं; वे जिज्ञासु भक्त कहलाते हैं।

जिज्ञासु भक्त वही होता है, जिसका जिज्ञास्य केवल भगवत्तत्त्व और उपाय केवल भगवद्भक्ति ही होती है अर्थात् उपेय और उपायमें अनन्यता होती है।

जिज्ञासु भक्तोंमें उद्धवजीका नाम लिया जाता है। भगवान्ने उद्धवजीको दिव्यज्ञानका उपदेश दिया था, जो 'उद्धवगीता' (श्रीमद्भगवत् ११।७—३०) के नामसे प्रसिद्ध है।

जो भगवान्में अपनापन करके भगवान्के भजनमें ही तल्लीन रहते हैं; परन्तु कभी-कभी संगसे, संस्कारोंसे मनमें यह भाव पैदा हो जाता है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? वे भी जिज्ञासु कहलाते हैं।

दृष्टि थी, दूरसोंका भरोसा था, अपने बलका सहारा था, तबतक वह कष्ट पाती रही। परन्तु जब दूरसोंकी तरफसे तो क्या, अपने हाथसे भी साड़ीको नहीं पकड़ा अर्थात् अपने बलका भी सहारा नहीं लिया, तब उसका अनन्यभाव हो गया और उसको दुःख नहीं पाना पड़ा।

ऐसे ही गजेन्द्रने जबतक हाथियों और हथिनियोंका सहारा लिया, अपने बलका सहारा लिया, तबतक वह वर्षांतक दुःख पाता रहा। जब सब सहारा छूट गया, केवल भगवान्का ही सहारा रहा, तब उसको दुःख नहीं पाना पड़ा।

  • पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते। नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्॥

अभिद्वति मामीश शरत्सप्तायसो विभो। कामं ददतु मां नाथ मा मे गभं निपात्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १।८।९-१०)

'देवाधिदेव! जगदीश्वर! महायोगिन्! आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके सिवाय इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी आपसमें एक-दूसरेकी मृत्युका कारण बन रहे हैं। प्रभो! सर्वशक्तिमान्! यह दहकता हुआ लोहेका बाण मेरी तरफ दौड़ा आ रहा है। स्वामिन्! यह मुझे भले ही जला डाले, पर मेरे गभंको नष्ट न करे।'

(४) ज्ञानी (प्रेमी) भक्त —अर्थात्, आर्त और जिज्ञासु—तीनों भक्तोंसे ज्ञानी भक्तकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ 'च' अव्यय आया है।

ज्ञानी भक्तको अनुकूल-से-अनुकूल और प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना, व्यक्ति, वस्तु आदि सब भगवत्स्वरूप ही दीखते हैं अर्थात् उसको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति केवल भगवल्लीला ही दीखती है। जैसे भगवान्में अपने लिये अनुकूलता प्राप्त करने, प्रतिकूलता हटाने, बोध प्राप्त करने आदि किसी तरहकी कभी किंचिन्मात्र भी इच्छा होती ही नहीं, वे तो केवल भक्तोंके प्रेममें ही मस्त रहते हैं; ऐसे ही ज्ञानी (प्रेमी) भक्तोंमें किंचिन्मात्र भी कोई इच्छा नहीं होती, वे केवल भगवान्के प्रेममें ही मस्त रहते हैं।

ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तोंमें गोपिकाओंका नाम प्रसिद्ध है। देवर्षि नारदजीने भी 'यथा व्रजगोपिकानाम्' (भक्तिसूत्र २१) कहकर गोपियोंको प्रेमी भक्तोंका आदर्श माना है। कारण कि गोपियोंमें अपने सुखका सर्वथा त्याग था। प्रियतम भगवान्का सुख ही उनका सुख था।

यहाँ एक बात समझनेकी है कि धनकी इच्छा, दुःख दूर करनेकी इच्छा और जिज्ञासा-पूर्तिकी इच्छाको लेकर जो भगवान्की तरफ लगते हैं, उनमें तो भगवान्का प्रेम जाग्रत् हो जाता है और वे भक्त कहलाते हैं। परन्तु जिनकी यह भावना रहती है कि अन्य उपायोंसे धन मिल सकता है, दुःख दूर हो सकता है, जिज्ञासा-पूर्ति हो सकती है, उनका भगवान्के साथ सम्बन्ध न होनेसे उनमें प्रेम जाग्रत् नहीं होता और उनकी भक्त संज्ञा नहीं होती।

संतोंकी वाणीमें आता है कि प्रेम तो केवल भगवान् ही करते हैं, भक्त केवल भगवान्में अपनापन करता है। कारण कि प्रेम वही करता है, जिसे कभी किसीसे कुछ भी लेना नहीं है। भगवान्ने जीवमात्रके प्रति अपने-आपको सर्वथा

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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अर्पित कर रखा है और जीवसे कभी कुछ भी प्राप्त करनेकी इच्छाकी कोई सम्भावना ही नहीं रखी है। इसलिये भगवान् ही वास्तवमें प्रेम करते हैं। जीवको भगवान्की आवश्यकता है, इसलिये जीव भगवान्से अपनापन ही करता है। जब अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित करनेपर भक्तमें कभी कुछ भी पानेकी कोई अभिलाषा नहीं रहती, तब वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त कहा जाता है। अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेसे उस भक्तकी सत्ता भगवान्से किंचिन्मात्र भी अलग नहीं रहती, प्रत्युत उसकी जगह केवल भगवान्की सत्ता ही रह जाती है।

विशेष बात

(१)

चार लड़के खेल रहे थे। इतनेमें उनके पिताजी चार आम लेकर आये। उनको देखते ही एक लड़का आम माँगने लग गया और एक लड़का आम लेनेके लिये रो पड़ा। पिताजीने उन दोनोंको एक-एक आम दे दिया। तीसरा लड़का न तो रोता है और न माँगता है, केवल आमकी तरफ देखता है और चौथा लड़का आमकी तरफ न देखकर जैसे पहले खेल रहा था, वैसे ही मस्तीसे खेल रहा है। उन दोनोंको भी पिताजीने एक-एक आम दे दिया। इस प्रकार चारों ही लड़कोंको आम मिलता है। यहाँ आम माँगनेवाला लड़का अर्थार्थी है, रोनेवाला लड़का आर्त है, केवल आमकी तरफ देखनेवाला जिज्ञासु है और आमकी परवाह न करके खेलमें लगे रहनेवाला लड़का ज्ञानी है। ऐसे ही अर्थार्थी भक्त भगवान्से अनुकूलता माँगता है, आर्त भक्त भगवान्से प्रतिकूलता दूर करना चाहता है, जिज्ञासु भक्त भगवान्को जानना चाहता है और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त भगवान्से कुछ भी नहीं चाहता।

अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चारों ही भक्त भगवनिष्ठ हैं। अतः इनको योगश्रष्ट पुरुषों (गीता—छठे अध्यायका इकतालिसर्वाँ-बयालीसर्वाँ श्लोक)—में नहीं लिया जा सकता। ऐसे ही अर्थार्थी और आर्त—ये दोनों सकाम पुरुषोंसे अलग हैं; क्योंकि इन दोनों भक्तोंमें भगवान्का आश्रय मुख्य है। सकाम पुरुष कामनापूर्तिमें ही लगे रहनेके कारण ‘हृतज्ञानः’ हैं (गीता ७। २०), इसलिये उनको आसुरी सम्पत्तिवाले पुरुषोंमें लिया गया है। यद्यपि अर्थार्थी आदि भक्तोंमें जो कुछ न्यूनाधिकता है, वह कामनाके कारण ही है, परन्तु कामना होते हुए भी वे

‘हृतज्ञानः’ नहीं हैं। उनको तो भगवान्ने ‘सुकृतिनः’ और ‘उदाराः’ (७। १८) कहा है।

जो भगवान्के शरण होते हैं, उनमें सकामभाव भी हो सकता है; परन्तु उनमें मुख्यता भगवनिष्ठ होनेकी ही होती है। इसलिये उनकी भगवान्के साथ जितनी-जितनी घनिष्ठता होती जाती है, उतना-उतना ही उनमें सकामभाव मिटता जाता है और विलक्षणता आती जाती है। इसलिये उनको भगवान्ने ‘उदाराः’ कहा है और ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—‘ज्ञानी त्वान्वैव मे मतम्’ (७। १८)।

(२)

भगवान्के साथ अपनापन माननेके समान दूसरा कोई साधन नहीं है, कोई योग्यता नहीं है, कोई बल नहीं है, कोई अधिकारिता नहीं है। भगवान्का प्राणिमात्रपर अपनापन सदासे है और सदा ही रहेगा। उस अपनेपनको केवल प्राणी ही भूला है और उसने भूलसे संसारके साथ अपनापन मान लिया है। अतः इस भूलसे किये हुए अपनेपनको हटाना है और प्रभुके साथ जो स्वतःसिद्ध अपनापन है, उसको मानना है। प्रभुको अपना माननेमें मन, बुद्धि आदि किसीकी सहायता नहीं लेनी पड़ती, जबकि दूसरे साधनोंमें मन, बुद्धि आदिकी सहायता लेनी पड़ती है।

भगवान्के साथ अपनापन होनेपर अर्थात् ‘मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हूँ’—ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर साधक भक्तको अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें भावोंकी, गुणोंकी कमी भी दीख सकती है, पर भगवान्के साथ अपनापन होनेसे वह टिकेगी नहीं। दूसरी बात, साधक भक्तमें कुछ गुणोंकी कमी रहनेपर भी भगवान्की दृष्टि केवल अपनेपनपर ही जाती है, गुणोंकी कमीपर नहीं। कारण कि भगवान्के साथ हमारा जो अपनापन है, वह वास्तविक है।

भगवान्का अपनापन तो दुष्ट-से-दुष्ट मनुष्यपर भी वैसा ही है। इसलिये सोलहवें अध्यायमें आसुरी प्रकृतिवालोंका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि ‘क्रूर, द्वेष करनेवाले, नराधम दुष्टोंको मैं आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ।’ इस प्रकार भगवान् उनको आसुरी योनियोंमें गिराकर शुद्ध करते हैं। जैसे माता अपने बच्चेको स्नान कराती है तो उसकी सम्पत्ति नहीं लेती, ऐसे ही उनको शुद्ध करनेके लिये भगवान् उनकी सम्पत्ति नहीं लेते; क्योंकि भगवान्का उनपर अपनापन है।

५३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध पहलेसे ही है। फिर भी कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो भक्तका भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध मुख्य होता है और कामना गौण होती है। इस दृष्टिसे ये भक्त पहली श्रेणीके हैं।

भगवान्का सम्बन्ध तो पहलेसे ही है, पर समय-समयपर कामना उत्पन्न हो जाती है, जिसकी पूर्ति दूसरोंसे चाहते हैं। जब दूसरोंसे कामनाकी पूर्ति नहीं होती, तब अन्तर्मे भगवान्से चाहते हैं। इस तरह अनन्यताकी कमी होनेके कारण ये भक्त दूसरी श्रेणीके हैं।

जहाँ केवल कामना-पूर्तिके लिये ही भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध किया जाय, वहाँ कामना मुख्य होती है और भगवान्का सम्बन्ध गौण होता है। इस दृष्टिसे ये भक्त तीसरी श्रेणीके हैं।

मार्मिक बात

कामना दो तरहकी होती है—पारमार्थिक और लौकिक।

(१) पारमार्थिक कामना—पारमार्थिक कामना दो तरहकी होती है—मुक्ति-(कल्याण-)की और भक्ति-(भगवत्प्रेम-) की।

जो मुक्तिकी कामना है, उसमें तत्त्वको जाननेकी इच्छा होती है, जिसे जिज्ञासा कहते हैं। यह जिज्ञासा जिसमें होती है, वह जिज्ञासु होता है। गहरा विचार किया जाय तो जिज्ञासा कामना नहीं है; क्योंकि वह अपने स्वरूपको अर्थात् तत्त्वको जानना चाहता है, जो वास्तवमें उसकी आवश्यकता है। आवश्यकता उसको कहते हैं, जो जरूर पूरी होती है और पूरी होनेपर फिर दूसरी आवश्यकता पैदा नहीं होती। यह आवश्यकता सत्-विषयकी होती है।

दूसरी कामना प्रभु-प्रेम-प्राप्तिकी होती है। उसको प्राप्ति तो कहते हैं, पर वास्तवमें वह प्राप्ति अपने लिये नहीं होती, प्रत्युत प्रभुके लिये ही होती है। उसमें अपना किंचिन्मात्र प्रयोजन नहीं रहता; प्रभुके समर्पित होनेका ही प्रयोजन रहता है। प्रेमी तो अपने-आपको प्रभुके समर्पित कर देता है, जो कि उसीका अंश है।

उपर्युक्त दोनों ही पारमार्थिक कामनाएँ वास्तवमें 'कामना' नहीं हैं।

(२) लौकिक कामना—लौकिक कामना भी दो तरहकी होती है—सुख प्राप्त करनेकी और दुःख दूर करनेकी।

शरीरको आराम मिले; जीते-जी मेरा आदर-सत्कार होता रहे और मरनेके बाद मेरा नाम अमर हो जाय, मेरा स्मारक बन जाय; कोई ग्रन्थ बना दे, जिसको लोग देखते रहें, पढ़ते रहें और यह जान जायें कि ऐसा कोई विलक्षण पुरुष हुआ है; मरनेके बाद स्वर्ग आदिमें भोग भोगते रहें आदि-आदि लौकिक सुख-प्राप्तिकी कामनाएँ होती हैं। ऐसी कामनाओंसे तो वासना ही बढ़ती है, जिससे बन्धन और पतन ही होता है, उद्धार नहीं होता। यह कामना आसुरी सम्पत्ति है इसलिये यह त्याज्य है।

दूसरी कामना दुःख दूर करनेकी है। दुःख तीन प्रकारके हैं—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक।

अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सरदी-गरमी, वायु आदिसे जो दुःख होता है, उसको 'आधिदैविक' कहते हैं। यह दुःख देवताओंके अधिकारसे होता है।

सिंह, साँप, चोर आदि प्राणियोंसे जो दुःख होता है, उसको 'आधिभौतिक' कहते हैं।

शरीर और अन्तःकरणको लेकर जो दुःख होता है, वह

१-कामना वह होती है, जो कभी पूरी नहीं होती। एक कामना पूरी होनेपर फिर दूसरी कामना पैदा हो जाती है। जैसे, धनकी कामना हुई। जितना धन चाहता है, उतना धन मिल जाय तो फिर और अधिक धनकी कामना होती है। धनकी तरह ही मान-बड़ाईकी, जीनेकी, भोगकी, नीरोगताकी, यश-कीर्तिकी, स्त्री-पुत्रकी आदि-आदि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी कामना होती है। ये धनादि वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, क्योंकि इनमेंसे कोई भी वस्तु स्वयंतक पहुँचती ही नहीं। इनकी कामनापूर्ति केवल शरीर और नामतक ही पहुँचती है। कामना असत्-विषयकी होती है। कामनापूर्तिके बाद फिर और कामना पैदा हो जाती है; इस प्रकार अपूर्ति ही बाकी रहती है। अतः कामना त्याज्य है; क्योंकि ये चीजें तो रहेगी नहीं और उनकी पूर्तिके लिये की हुई कामना और प्रयत्न—ये दोनों ही निष्फल होंगे।

२-मुक्तिकी अपेक्षा भक्तिकी कामना श्रेष्ठ है; क्योंकि मुक्तिमें स्वयं मुक्त होना चाहता है और भक्तिमें भगवान्के समर्पित होना चाहता है। तात्पर्य है कि मुक्तिमें लेनेकी इच्छा और भक्तिमें देनेकी इच्छा रहती है। इसलिये मुक्तिमें तो सूक्ष्म अहं रहता है, पर भक्तिमें अहं बिलकुल नहीं रहता।