भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

प्रवृत्त हो जाता है। शास्त्रविरुद्ध काम पतनका तथा सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका हेतु होता है।

कृत्रिम उपायोंसे सन्तति-निरोध करार कर केवल भोग-बुद्धिसे काममें प्रवृत्त होना महान् नरकोंका दरवाजा है। जो सन्तानकी उत्पत्ति कर सके, वह 'पुरुष' कहलाता है और जो गर्भ धारण कर सके, वह 'स्त्री' कहलाती है। अगर पुरुष और स्त्री आपरेषनके द्वारा अपनी सन्तानोत्पत्ति करनेकी योग्यता-(पुरुषत्व और स्त्रीत्व-) को नष्ट कर

परिशिष्ट भाव —जंगम सृष्टिमात्र कामसे पैदा होती है। अतः मनुष्यमें जो काम धर्मसे विरुद्ध नहीं है, मर्यादाके अनुसार है, वह काम भगवान्का स्वरूप है। भगवान् पहले कह चुके हैं—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७) और आगे भी कहेंगे—'ये चैव सात्त्विका भावाः' (७।१२), 'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९)। अतः जैसे धर्मयुक्त काम भगवान्का स्वरूप है, ऐसे ही धर्मविरुद्ध काम भी भगवान्से अलग नहीं है। जो धर्मविरुद्ध कामका आचरण करते हैं, उनको नरकरूपसे भगवान् मिलते हैं; क्योंकि नरक भी भगवान् ही हैं! परन्तु गीताका उद्देश्य मनुष्यको नरकोंमें अथवा जन्म-मरणमें भेजना नहीं है, प्रत्युत उसका कल्याण करना है। उद्देश्य सदा कल्याणका, आनन्दका ही होता है, दुःखका नहीं। दुःख कोई भी नहीं चाहता। अर्जुनने भी कल्याणकी बात पूछी है। उदाहरणार्थ, शब्द अच्छे भी होते हैं और बुरे भी, पर व्याकरणमें अच्छे शब्दोंपर ही विचार किया जाता है; क्योंकि व्याकरण आदि भी मनुष्यके उद्धारके लिये हैं।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥

और तो क्या कहूँ—

ये= जितने= तथाविद्धि= समझो।
एव= भीतामसाः= तामस (भाव हैं,
वे सब)तु= परन्तु
सात्त्विकाः= सात्त्विकमत्तः= मुझसेअहम्= मैं
भावाः= भाव हैं (और)एव= ही होते हैं—तेषु= उनमें (और)
ये= जितनेइति= ऐसाते= वे
= भीतान्= उनकोमयि= मुझमें
राजसाः= राजस= नहीं हैं।

व्याख्या —'ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये'—ये जो सात्त्विक, राजस और तामस भाव (गुण, पदार्थ और क्रिया) हैं, वे भी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिमात्रमें जो कुछ हो रहा है, मूलमें सबका आश्रय, आधार और प्रकाशक भगवान्

ही हैं अर्थात् सब भगवान्से ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। सात्त्विक, राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं, इसलिये इनमें जो कुछ विलक्षणता दीखती है, वह सब भगवान्की ही है; अतः मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये, सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ नहीं। यदि

१-'स्यै शब्दसंधातयोः।' स्यायतः—संगते भवतः अस्यां शुक्लशोणिते इति स्त्री। (सिद्धान्तकौमुदी, बालमनोरमा)।

२-अंगहीनाश्रोत्रियषण्दशृङ्गवर्जम्। (कात्यायनश्रौतसूत्र १।१।५)

३-'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' (गीता २।७)

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाजुष्याम् ॥ (गीता ३।२)

यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ (गीता ५।१)