श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ११]
- साधक-संजीवनी *
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भेद हैं कि दो व्यक्तियोंको भी एक रंग समानरूपसे नहीं दीखता। इस प्रकार सृष्टिमें एक समान दीखनेवाली दो चीजें भी वास्तवमें समान नहीं होतीं। इतनी अनेकता होनेपर भी सृष्टिका बीज एक ही है। तात्पर्य है कि एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं और अनेक रूपोंमें प्रकट होनेपर भी एक ही रहते हैं।
भगवान् देश, काल आदि सभी दृष्टियोंसे अनन्त हैं। जब भगवान्की बनायी हुई सृष्टिका भी अन्त नहीं आ सकता तो फिर भगवान्का अन्त आ ही कैसे सकता है? आजतक भगवान्के विषयमें जो कुछ सोचा गया है, जो कुछ कहा गया है, जो कुछ लिखा गया है, जो कुछ माना गया है, वह पूरा-का-पूरा मिलकर भी अधूरा है। इतना ही नहीं, भगवान् भी अपने विषयमें पूरी बात नहीं कह सकते, अगर कह दें तो अनन्त कैसे रहेंगे?
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
| भरतर्षभ | = हे भरतवंशियोंमें | रागसे रहित | धर्माविरुद्धः | = धर्मसे |
|---|---|---|---|---|
| श्रेष्ठ अर्जुन! | बलम् | = बल | अविरुद्ध | |
| बलवताम् | अहम् | = मैं हूँ | (धर्मयुक्त) | |
| कामराग- | च | = और | कामः | = काम |
| विवर्जितम् | भूतेषु | = प्राणियोंमें | अस्मि | = मैं हूँ। |
व्याख्या —‘बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्’—कठिन-से-कठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामना-आसक्तिरहित शुद्ध, निर्मल उत्साह रहता है। काम पूरा होनेपर भी ‘मेरा कार्य शास्त्र और धर्मके अनुकूल है तथा लोकमर्यादाके अनुसार सन्तजनानुमोदित है’—ऐसे विचारसे मनमें एक उत्साह रहता है। इसका नाम ‘बल’ है। यह बल भगवान्का ही स्वरूप है। अतः यह बल ग्राह्य है।
गीतामें भगवान्ने खुद ही बलकी व्याख्या कर दी है। सत्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘कामरागबलान्विताः’ पदमें आया बल कामना और आसक्तिसे युक्त होनेसे दुराग्रह और हठका वाचक है। अतः यह बल भगवान्का स्वरूप नहीं है, प्रत्युत आसुरी सम्पत्ति होनेसे त्याज्य है। ऐसे ही ‘सिद्धोऽहं बलवान्सुखी’ (गीता १६।१४) और ‘अहङ्कारं बलं दर्पम्’ (गीता १६।१८; १८।५३) पदोंमें आया बल भी त्याज्य है। छठे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें
‘बलवदूदृढम्’ पदमें आया बल शब्द मनका विशेषण है। वह बल भी आसुरी सम्पत्तिका ही है; क्योंकि उसमें कामना और आसक्ति है। परन्तु यहाँ (७।११में) जो बल आया है, वह कामना और आसक्तिसे रहित है, इसलिये यह सात्त्विक उत्साहका वाचक है और ग्राह्य है। सत्रहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें ‘आयुःसत्त्वबलारोग्य’ पदमें आया बल शब्द भी इसी सात्त्विक बलका वाचक है।
‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ’ —हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! मनुष्योंमें धर्मसे अविरुद्ध अर्थात् धर्मयुक्त ‘काम’ मेरा स्वरूप है। कारण कि शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुसार शुभ-भावसे केवल सन्तान-उत्पत्तिके लिये जो काम होता है, वह काम मनुष्यके अधीन होता है। परंतु आसक्ति, कामना, सुखभोग आदिके लिये जो काम होता है, उस काममें मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके वशमें होकर वह न करनेलायक शास्त्रविरुद्ध काममें
१-प्राणियोंमें अनेकता होनेपर भी उनमें परस्पर प्रेमकी एकता होनी चाहिये। जैसे काँटा पैरमें गड़ता है, पर आँसू नेत्रोंमें आते हैं, ऐसा ही भाव सम्पूर्ण प्राणियोंमें रहना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः’ (गीता ५।२५, १२।४)। एकमात्र प्रेम ही ऐसी चीज है, जिसमें कोई भेद नहीं रहता। प्रेमका भेद नहीं कर सकते। प्रेममें सब एक हो जाते हैं। ज्ञानमें तत्त्वभेद तो नहीं रहता, पर मतभेद रहता है। प्रेममें मतभेद भी नहीं रहता। अतः प्रेमसे आगे कुछ भी नहीं है। प्रेमसे त्रिलोकीनाश भगवान् भी वशमें हो जाते हैं।
२-धर्मका विधान मनुष्योंके लिये ही है; क्योंकि मनुष्येतर प्राणियोंमें धर्मकी मर्यादा लागू ही नहीं होती।
३-तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस कामको सम्पूर्ण पापीका हेतु बताया है, उस कामका वाचक यहाँ ‘काम’ शब्द नहीं है। यहाँ ‘काम’ शब्द गृहस्थधर्मके पालनका वाचक है।