भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 523

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

जानेसे यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता।

‘परमव्ययम्’ पदसे भगवान् कहते हैं कि मैं इन गुणोंसे पर हूँ अर्थात् इन गुणोंसे सर्वथा रहित, असम्बद्ध,

निलिप्त हूँ। मैं न कभी किसी गुणसे बँधा हुआ हूँ और न गुणोंके परिवर्तनसे मेरेमें कोई परिवर्तन ही होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूपको गुणोंसे मोहित प्राणी नहीं जान सकते।

परिशिष्ट भाव —जो मनुष्य भगवान्को न देखकर सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको ही देखता है, उनका भोग करता है, उनसे सुख लेता है, वह उन भावोंसे मोहित हो जाता है अर्थात् भगवान्की दुरत्यय गुणमयी मायासे बँध जाता है और फलस्वरूप बार-बार जन्मता-मरता है। तात्पर्य है कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव (कर्म, पदार्थ, काल, स्वभाव, गुण आदि) अनित्य हैं और भगवान् नित्य हैं। जो अनित्यका भोग करते हैं, वे बँध जाते हैं; परन्तु जो अनित्यका त्याग करके नित्यस्वरूप भगवान्का आश्रय लेते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।

इस श्लोकमें जीवात्माके लिये ‘जगत्’ शब्द आया है। इसका तात्पर्य है कि जिसकी सत्ता विद्यमान है ही नहीं, उसको सत्ता और महत्ता देकर उससे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव भी जगत् हो जाता है! चेतन भी (चेतनताका दुरुपयोग करके) जड़ हो जाता है! उत्कृष्ट परा प्रकृति भी निकृष्ट अपरा प्रकृति बन जाती है! जीव जगत्के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश, जगत्के लाभ-हानिको अपना लाभ-हानि मान लेता है। जैसे मनुष्य कामनाके साथ अभिन्न होकर ‘कामात्मानः’ अर्थात् कामना-रूप हो जाता है (गीता २।४३) और भगवान्के साथ अभिन्न होकर ‘मन्मयाः’ अर्थात् भगवद्भूत हो जाता है (गीता ४।१०), ऐसे ही जीव जगत्के साथ अभिन्न होकर जगत्-रूप हो जाता है। फर्क यही है कि भगवद्भूतसे वह नित्य है, पर कामनारूप या जगत्-रूपसे वह अनित्य है।

जीवने भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको माना, सत्ता मानकर उसको महत्त्व दिया, महत्त्व देकर उससे सम्बन्ध जोड़ा और सम्बन्ध जोड़कर अपनी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव कर लिया, इसलिये वह ‘जगत्’ बन गया! जो केवल जगत्की सत्ताको मानता है, वह अपनी सत्तासे विमुख होकर जगत् हो जाता है, जो अवास्तविक है और जो केवल भगवान्की सत्ताको मानता है, वह अपनी स्वतन्त्र सत्ताकी मान्यताको मिटाकर भगवान् हो जाता है—‘मम साधर्म्यमागताः’ (गीता १४।२), जो वास्तविक है।

जीवको ‘जगत्’ कहनेका तात्पर्य है कि उसका चेतनताकी तरफ खयाल ही नहीं रहा, प्रत्युत जड़ शरीरको ही ‘मैं’ (अपना स्वरूप) और ‘मेरा’ मानने लग गया। जीव स्वरूपसे निर्गुण तथा अव्यय होनेपर भी ‘जगत्’ हो जानेके कारण सात्त्विक-राजस-तामस गुणोंसे बँध जाता है—‘निबधन्ति महाबाहो देहे देहिन्मव्ययम्’ (गीता १४।५)। वास्तवमें अलौकिक परमात्माका अंश होनेसे जीव भी अलौकिक ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक), पर लौकिक जगत्को पकड़नेसे वह भी लौकिक हो जाता है! अहमसे लेकर पृथ्वीतक सब अपरा प्रकृति है (गीता ७।४)। अतः जैसे पृथ्वी जड़ है, ऐसे ही अहम् भी जड़ है। जब जीव अहम्को दृढ़तासे पकड़कर ‘अहंकारविमूढात्मा’ हो जाता है अर्थात् अहम्को अपना स्वरूप मान लेता है, तब उसका पतन होते-होते वह भी जड़ जगत् ही बन जाता है अर्थात् उसका चेतनपना लुप्त (विस्मृत) हो जाता है, उसको चेतनपनेका अनुभव नहीं होता।

जो गुणोंमें आसक्त नहीं होते, उनके सामने जड़ता रहती ही नहीं, इसलिये उनको सब जगह भगवान्-ही-भगवान् दीखते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। परन्तु जो गुणोंमें आसक्त होते हैं, उनको भगवान् दीखते ही नहीं, प्रत्युत संसार-ही-संसार दीखता है, इसलिये वे भगवान्को भी संसारी ही देखते हैं! वे गुणोंसे अतीत भगवान्को भी गुणोंसे बँधे हुए देखते हैं, अविनाशी भगवान्को भी जन्मने-मरनेवाला देखते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। भक्तकी दृष्टि तो भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती, पर गुणोंमें आसक्त संसारी लोगोंकी दृष्टि संसारको छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती। इसलिये भक्तको आनन्द-ही-आनन्द प्राप्त होता है और संसारी मनुष्यको दुःख-ही-दुख—‘दुःखालयम्’ (गीता ८।१५)।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनेको न जान सकनेमें हेतु बताते हैं।

दैवी होषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४॥