भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

५२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

जानेसे यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता।

‘परमव्ययम्’ पदसे भगवान् कहते हैं कि मैं इन गुणोंसे पर हूँ अर्थात् इन गुणोंसे सर्वथा रहित, असम्बद्ध,

निलिप्त हूँ। मैं न कभी किसी गुणसे बँधा हुआ हूँ और न गुणोंके परिवर्तनसे मेरेमें कोई परिवर्तन ही होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूपको गुणोंसे मोहित प्राणी नहीं जान सकते।

परिशिष्ट भाव —जो मनुष्य भगवान्को न देखकर सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको ही देखता है, उनका भोग करता है, उनसे सुख लेता है, वह उन भावोंसे मोहित हो जाता है अर्थात् भगवान्की दुरत्यय गुणमयी मायासे बँध जाता है और फलस्वरूप बार-बार जन्मता-मरता है। तात्पर्य है कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव (कर्म, पदार्थ, काल, स्वभाव, गुण आदि) अनित्य हैं और भगवान् नित्य हैं। जो अनित्यका भोग करते हैं, वे बँध जाते हैं; परन्तु जो अनित्यका त्याग करके नित्यस्वरूप भगवान्का आश्रय लेते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।

इस श्लोकमें जीवात्माके लिये ‘जगत्’ शब्द आया है। इसका तात्पर्य है कि जिसकी सत्ता विद्यमान है ही नहीं, उसको सत्ता और महत्ता देकर उससे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव भी जगत् हो जाता है! चेतन भी (चेतनताका दुरुपयोग करके) जड़ हो जाता है! उत्कृष्ट परा प्रकृति भी निकृष्ट अपरा प्रकृति बन जाती है! जीव जगत्के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश, जगत्के लाभ-हानिको अपना लाभ-हानि मान लेता है। जैसे मनुष्य कामनाके साथ अभिन्न होकर ‘कामात्मानः’ अर्थात् कामना-रूप हो जाता है (गीता २।४३) और भगवान्के साथ अभिन्न होकर ‘मन्मयाः’ अर्थात् भगवद्भूत हो जाता है (गीता ४।१०), ऐसे ही जीव जगत्के साथ अभिन्न होकर जगत्-रूप हो जाता है। फर्क यही है कि भगवद्भूतसे वह नित्य है, पर कामनारूप या जगत्-रूपसे वह अनित्य है।

जीवने भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको माना, सत्ता मानकर उसको महत्त्व दिया, महत्त्व देकर उससे सम्बन्ध जोड़ा और सम्बन्ध जोड़कर अपनी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव कर लिया, इसलिये वह ‘जगत्’ बन गया! जो केवल जगत्की सत्ताको मानता है, वह अपनी सत्तासे विमुख होकर जगत् हो जाता है, जो अवास्तविक है और जो केवल भगवान्की सत्ताको मानता है, वह अपनी स्वतन्त्र सत्ताकी मान्यताको मिटाकर भगवान् हो जाता है—‘मम साधर्म्यमागताः’ (गीता १४।२), जो वास्तविक है।

जीवको ‘जगत्’ कहनेका तात्पर्य है कि उसका चेतनताकी तरफ खयाल ही नहीं रहा, प्रत्युत जड़ शरीरको ही ‘मैं’ (अपना स्वरूप) और ‘मेरा’ मानने लग गया। जीव स्वरूपसे निर्गुण तथा अव्यय होनेपर भी ‘जगत्’ हो जानेके कारण सात्त्विक-राजस-तामस गुणोंसे बँध जाता है—‘निबधन्ति महाबाहो देहे देहिन्मव्ययम्’ (गीता १४।५)। वास्तवमें अलौकिक परमात्माका अंश होनेसे जीव भी अलौकिक ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक), पर लौकिक जगत्को पकड़नेसे वह भी लौकिक हो जाता है! अहमसे लेकर पृथ्वीतक सब अपरा प्रकृति है (गीता ७।४)। अतः जैसे पृथ्वी जड़ है, ऐसे ही अहम् भी जड़ है। जब जीव अहम्को दृढ़तासे पकड़कर ‘अहंकारविमूढात्मा’ हो जाता है अर्थात् अहम्को अपना स्वरूप मान लेता है, तब उसका पतन होते-होते वह भी जड़ जगत् ही बन जाता है अर्थात् उसका चेतनपना लुप्त (विस्मृत) हो जाता है, उसको चेतनपनेका अनुभव नहीं होता।

जो गुणोंमें आसक्त नहीं होते, उनके सामने जड़ता रहती ही नहीं, इसलिये उनको सब जगह भगवान्-ही-भगवान् दीखते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। परन्तु जो गुणोंमें आसक्त होते हैं, उनको भगवान् दीखते ही नहीं, प्रत्युत संसार-ही-संसार दीखता है, इसलिये वे भगवान्को भी संसारी ही देखते हैं! वे गुणोंसे अतीत भगवान्को भी गुणोंसे बँधे हुए देखते हैं, अविनाशी भगवान्को भी जन्मने-मरनेवाला देखते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। भक्तकी दृष्टि तो भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती, पर गुणोंमें आसक्त संसारी लोगोंकी दृष्टि संसारको छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती। इसलिये भक्तको आनन्द-ही-आनन्द प्राप्त होता है और संसारी मनुष्यको दुःख-ही-दुख—‘दुःखालयम्’ (गीता ८।१५)।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनेको न जान सकनेमें हेतु बताते हैं।

दैवी होषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४॥

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२३

हि= क्यौंकिदुरत्यया= दुरत्यय है अर्थात्प्रपद्यन्ते= शरण
मम= मेरीइससे पार पानाहोते हैं,
एषा= यहबड़ा कठिन है।ते= वे
गुणमयी= गुणमयीये= जोएताम्= इस
दैवी= दैवीमाम्= केवल मेरेमायाम्= मायाको
माया= मायाएव= हीतरन्ति= तर जाते हैं।

व्याख्या —‘दैवी होषा गुणमयी * मम माया दुरत्यया’—सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंवाली दैवी (देव अर्थात् परमात्माकी) माया बड़ी ही दुरत्यय है। भोग और संग्रहकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य इस मायासे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं कर सकते।

‘दुरत्यय’ कहनेका तात्पर्य है कि ये मनुष्य अपनेको कभी सुखी और कभी दुःखी, कभी समझदार और कभी बेसमझ, कभी निर्बल और कभी बलवान् आदि मानकर इन भावोंमें तल्लीन रहते हैं। इस तरह आने-जानेवाले प्राकृत भावों और पदार्थोंमें ही तादात्म्य, ममता, कामना करके उनसे बँधे रहते हैं और अपनेको इनसे रहित अनुभव नहीं कर सकते। यही इस मायामें दुरत्ययपना है। यह गुणमयी माया तभी दुरत्यय होती है; जब भगवान्के सिवाय गुणोंकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता मानी जाय। अगर मनुष्य भगवान्के सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता और महत्ता नहीं मानेगा, तो वह इस गुणमयी मायासे तर जायगा।

‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते’—मनुष्योंमेंसे जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं; क्यौंकि उनकी दृष्टि केवल मेरी ही तरफ रहती है, तीनों गुणोंकी तरफ नहीं। जैसा कि पहले वर्णन किया है, सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण न मेरेमें हैं और न मैं उनमें हूँ। मैं तो निर्लिप्त रहकर सभी कार्य करता हूँ। इस प्रकार जो मेरे स्वरूपको जानते हैं, वे गुणोंमें नहीं फँसते, इस मायासे तर जाते हैं। वे गुणोंका कार्य मन-बुद्धिका किंचिन्मात्र भी सहारा नहीं लेते। क्यों नहीं लेते? क्यौंकि वे इस बातको जानते हैं कि प्रकृतिका कार्य होनेसे मन-बुद्धि भी तो प्रकृति हैं। प्रकृतिकी क्रियाशीलता प्रकृतिमें ही है। जैसे प्रकृति हरदम प्रलयकी तरफ जा रही है, ऐसे ही ये मन-बुद्धि भी तो प्रलयकी तरफ जा रहे हैं।

  • भगवान् पहले बारहवें श्लोकमें यह कहकर आये हैं कि ये सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं। उसी बातको लेकर भगवान्ने यहाँ गुणमयी मायाको अपनी दैवी (अलौकिक) माया बताया है। पीछेके तेरहवें श्लोकमें जिन तीन गुणमय भावोंसे सम्पूर्ण जगत्को मोहित बताया था, उनको ही यहाँ ‘एषा’ पदसे कहा है। मायाको ‘गुणमयी’ कहनेका तात्पर्य है कि यह माया कार्यरूप है; क्यौंकि गुण प्रकृतिके कार्य हैं और वे गुण ही जीवको बाँधते हैं, स्वयं प्रकृति नहीं।

अतः उनका सहारा लेना परतन्त्रता ही है। ऐसी परतन्त्रता बिलकुल न रहे और परा प्रकृति (जो कि परमात्माका अंश है) केवल परमात्माकी तरफ आकृष्ट हो जाय तथा अपरासे सर्वथा विमुक्त हो जाय—यही भगवान्के सर्वथा शरण होनेका तात्पर्य है।

यहाँ ‘मामेव’ कहनेका तात्पर्य है कि वे अनन्यभावसे केवल मेरे ही शरण होते हैं; क्यौंकि मेरे सिवाय दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं।

कई साधक मेरे शरण तो हो जाते हैं; परन्तु केवल मेरे ही शरण नहीं होते। इसलिये कहा कि जो ‘मामेव’—केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे तर जाते हैं। मायाकी शरण न ले अर्थात् हमारे पास रुपये-पैसे, चीज-वस्तु आदि सब रहें, पर हम इनको अपना आधार न मानें, इनका आश्रय न लें, इनका भरोसा न करें, इनको महत्त्व न दें। इनका उपयोग करनेका हमें अधिकार है। इनपर कब्जा करनेका हमें अधिकार नहीं है। इनपर कब्जा कर लेना ही इनके आश्रित होना है। आश्रित होनेपर इनसे अलग होना कठिन मालूम देता है—यही वास्तवमें दुरत्ययपना है। इस दुरत्ययपनासे छूटनेके लिये ही उपाय बताते हैं—‘मामेव ये प्रपद्यन्ते।’

शरीर, इन्द्रियाँ आदि सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर, भगवान्की और भगवान्के लिये ही मानकर भगवान्के भजनमें, उनके आज्ञापलनमें लगा देना है। अपनेको इनसे कुछ नहीं लेना है। इनको भगवान्में लगा देनेका फल भी अपनेको नहीं लेना है; क्यौंकि जब भगवान्की वस्तु सर्वथा भगवान्के अर्पण कर दी अर्थात् उसमें भूलसे जो अपनापन कर लिया था, वह हटा लिया, तब उस समर्पणका फल हमारा कैसे हो सकता है? यह सब सामग्री तो भगवान्की सेवाके लिये ही भगवान्से मिली है। अतः इसको उनकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य है,

५२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

हमारी ईमानदारी है। इस ईमानदारीसे भगवान् बड़े प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी कृपासे मनुष्य मायाको तर जाते हैं। अपने पास अपनी करके कोई वस्तु है नहीं। भगवान्की दी हुई वस्तुओंको अपनी मानकर अपनेमें अभिमान किया था—यह गलती थी। भगवान्का तो बड़ा ही उदार एवं प्रेमभरा स्वभाव है कि वे जिस किसीको कुछ देते हैं, उसको इस बातका पता ही नहीं लगने देते कि यह भगवान्की दी हुई है, प्रत्युत जिसको जो कुछ मिला है, उसको वह अपनी और अपने लिये ही मान लेता है। यह भगवान्का देनेका एक विलक्षण ढंग है। उनकी इस कृपाको केवल भक्तलोग ही जान सकते हैं। परन्तु जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं, वे सोच ही नहीं सकते कि इन वस्तुओंको हम सदा पासमें रख सकते हैं क्या? अथवा

वस्तुओंके पास हम सदा रह सकते हैं क्या? इन वस्तुओंपर हमारा आधिपत्य चल सकता है क्या? इसलिये वे अनन्यभावसे भगवान्के शरण नहीं हो सकते।

इस श्लोकका भाव यह हुआ कि जो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं अर्थात् जो केवल दैवी सम्पत्तिवाले होते हैं, वे भगवान्की गुणमयी मायाको तर जाते हैं। परन्तु जो भगवान्के शरण न होकर देवता आदिके शरण होते हैं अर्थात् जो केवल आसुरी सम्पत्तिवाले (प्राण-पिण्ड-पोषण-परायण, सुखभोग-परायण) होते हैं, वे भगवान्की गुणमयी मायाको नहीं तर सकते। ऐसे आसुर स्वभाववाले मनुष्य भले ही ब्रह्मलोकतक चले जायें, तो भी उनको (ब्रह्म-लोकतक गुणमयी माया होनेसे) वहाँसे लौटना ही पड़ता है, जन्मना-मरना ही पड़ता है।

परिशिष्ट भाव —जब मनुष्य संसारसे विमुख होकर भगवान्की शरणागति स्वीकार कर लेता है, तब वह माया-(अपरा प्रकृतिके कार्य-)को तर जाता है अर्थात् उसके अहम्का सर्वथा नाश हो जाता है। भगवान्की शरणागति स्वीकार करनेका तात्पर्य है—भगवान्की सत्तामें ही अपनी सत्ता मिला दे अर्थात् केवल भगवान्की ही सत्ताको स्वीकार कर ले। न अपनी स्वतन्त्र सत्ता माने, न मायाकी स्वतन्त्र सत्ता माने। न अहम्का आश्रय ले, न माया-(गुणों-) का आश्रय ले। इसमें कोई परिश्रम, उद्योग नहीं है।

मायाको सत्ता मनुष्यने ही दी है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५), ‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५।७)। अगर वह मायाको सत्ता न देकर केवल भगवान्की ही शरणमें रहता तो वह मायाको तर जाता अर्थात् उसके लिये मायाकी सत्ता रहती ही नहीं।

जीव जड़ताका आश्रय लेनेसे अर्थात् उसको अपना एवं अपने लिये माननेसे जड़तामें चला जाता है और जगत् बन जाता है (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान्का आश्रय लेनेसे वह स्वतःसिद्ध चिन्मयतामें चला जाता है और भक्त हो जाता है। भक्त होनेपर जगत् लुप्त हो जाता है अर्थात् जगत् जगत्-रूपसे नहीं रहता, प्रत्युत भगवत्स्वरूप हो जाता है, जो वास्तवमें है।

‘मामेव’ पदसे भगवान्का तात्पर्य है कि जीव मेरा ही (मम एव) अंश है—‘ममैवांशो जीवलोकै’ (गीता १५।७); अतः मेरे ही (माम् एव) शरण होनेसे वह मायाको तर जाता है। इसलिये मेरी शरण लेनेवाले भक्तोंका मेरे सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध होता ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं; क्योंकि उनको दृष्टिमें मेरे (भगवान्के) सिवाय अन्य कोई होता ही नहीं। न तो उनको दृष्टि दूसरेमें जाती है और न दूसरा उनकी दृष्टिमें आता है। उनकी दृष्टिमें अपरा प्रकृतिकी न तो सत्ता रहती है, न महत्ता रहती है और न अपनापन ही रहता है। उनकी केवल भगवद्वुद्धि हो जाती है, जो वास्तवमें भगवत्स्वरूप ही है।

जिनमें विवेककी प्रधानता है, ऐसे भक्त अहम्का आश्रय छोड़कर अर्थात् संसारका त्याग करके भगवान्के आश्रित होते हैं। परन्तु जिनमें विवेककी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भगवान्में श्रद्धा-विश्वासकी प्रधानता है, ऐसे सीधे-सरल भक्त अहम्के साथ (जैसे हैं, वैसे ही) भगवान्के आश्रित हो जाते हैं। ऐसे भक्तोंके अहम्का नाश भगवान् स्वयं करते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि मेरे शरण होनेवाले सभी मायासे तर जाते हैं। अतः सब-के-सब प्राणी मेरे शरण क्यों नहीं होते—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२५

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥

परन्तु—

मायया= मायाके द्वाराभावम्= भावकादुष्कृतिनः= पाप-कर्म
अपहृतज्ञानाः= जिनका ज्ञान
हरा गया
है, (वे)आश्रिताः= आश्रय
लेनेवाले (और)करनेवाले
आसुरम्= आसुरनराधमाः= मनुष्योंमें महान्
नीच (तथा)मूढाः= मूढ़ मनुष्य
माम्= मेरे
न, प्रपद्यन्ते= शरण नहीं होते।

व्याख्या— 'न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः'—जो दुष्कृती और मूढ़ होते हैं, वे भगवान् के शरण नहीं होते। दुष्कृती वे ही होते हैं, जो नाशवान्, परिवर्तनशील प्राप्त पदार्थोंमें 'ममता' रखते हैं और अप्राप्त पदार्थोंकी 'कामना' रखते हैं। कामना पूरी होनेपर 'लोभ' और कामनाकी पूर्तिमें बाधा लगनेपर 'क्रोध' पैदा होता है। इस तरह जो 'कामना' में फँसकर व्यभिचार आदि शास्त्र-निषिद्ध विषयोंका सेवन करते हैं, 'लोभ' में फँसकर झूठ, कपट, विश्वासघात, बेईमानी आदि पाप करते हैं और 'क्रोध' के वशीभूत होकर द्वेष, वैर आदि दुर्भावपूर्णक हिंसा आदि पाप करते हैं, वे 'दुष्कृती' हैं।

जब मनुष्य भगवान् के सिवाय दूसरी सत्ता मानकर उसको महत्त्व देते हैं, तभी कामना पैदा होती है। कामना पैदा होनेसे मनुष्य मायासे मोहित हो जाते हैं और 'हम जीते रहे तथा भोग भोगते रहे'—यह बात उनको जँच जाती है। इसलिये वे भगवान् के शरण नहीं होते, प्रत्युत विनाशी वस्तु, पदार्थ आदिके शरण हो जाते हैं।

तमोगुणकी अधिकता होनेसे सार-असार, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, ग्राह्य-त्याज्य, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिकी तरफ ध्यान न देनेवाले भगवद्विमुख मनुष्य 'मूढ़' हैं। दुष्कृती और मूढ़ पुरुष परमात्माकी तरफ चलनेका निश्चय ही नहीं कर सकते, फिर वे परमात्माकी शरण तो हो ही कैसे सकते हैं?

'नराधमाः' कहनेका मतलब है कि वे दुष्कृती और मूढ़ मनुष्य पशुओंसे भी नीचे हैं। पशु तो फिर भी अपनी मर्यादामें रहते हैं, पर ये मनुष्य होकर भी अपनी मर्यादामें नहीं रहते हैं। पशु तो अपनी योनि भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहे हैं और ये मनुष्य होकर (जिनको कि परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये मनुष्यशरीर दिया), पाप, अन्याय आदि करके नरकों और पशुयोनिओंकी तरफ जा रहे हैं। ऐसे मूहतापूर्णक पाप करनेवाले प्राणी नरकोंके

अधिकारी होते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये भगवान्ने (गीता—सोलहवें अध्यायके उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें) कहा है कि 'द्वेष रखनेवाले, मूढ़, क्रूर और संसारमें नराधम पुरुषोंको मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वे आसुरी योनियोंको प्राप्त होकर फिर घोर नरकोंमें जाते हैं।'

'माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः' — भगवान्की जो तीनों गुणोंवाली माया है (गीता—सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक), उस मायासे विवेक ढक जानेके कारण जो आसुर भावको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और प्राणोंका पोषण करनेमें लगे हुए हैं, वे मेरेसे सर्वथा विमुख ही रहते हैं। इसलिये वे मेरे शरण नहीं होते।

दूसरा भाव यह है कि जिनका ज्ञान मायासे अपहृत है, उनकी वृत्ति पदार्थोंके आदि और अन्तकी तरफ जाती ही नहीं। उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको प्रत्यक्ष नश्वर देखते हुए भी वे रुपये-पैसे, सम्पत्ति आदिके संग्रहमें और मान, योग्यता, प्रतिष्ठा, कीर्ति आदिमें ही आसक्त रहते हैं और उनकी प्राप्ति करनेमें ही अपनी बहादुरी और उद्योगकी सफलता, इतिश्री मानते हैं। इस कारण वे यह समझ ही नहीं सकते कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्ति होनेपर भी अन्तमें वह 'नहीं' ही रहेगा और उसके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं रहेगा।

'असु' नाम प्राणोंका है। प्राणोंको प्रत्यक्ष ही आने-जानेवाले अर्थात् क्रियाशील और नाशवान् देखते हुए भी वे उन प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे रहते हैं। जीवन-निर्वाहमें काम आनेवाली सांसारिक वस्तुओंको ही वे महत्त्व देते हैं। उन वस्तुओंसे भी बढ़कर वे रुपये-पैसोंको महत्त्व देते हैं, जो कि स्वयं काममें नहीं आते, प्रत्युत वस्तुओंके द्वारा काममें आते हैं। वे केवल रुपयोंको ही आदर नहीं देते, प्रत्युत उनकी संख्याको बहुत आदर देते हैं। रुपयोंकी संख्या अभिमान बढ़ानेमें काम आती है। अभिमान सम्पूर्ण

५२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

आसुरी सम्पत्तिका आधार और सम्पूर्ण दुःखों एवं पापोंका कारण है*। ऐसे अभिमानको लेकर ही जो अपनेको मुख्य मानते हैं, वे आसुर भावको प्राप्त हैं।

विशेष बात

यहाँ भगवान्ने कहा है कि दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं हो सकते और नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कहा है कि सुरुचारी मनुष्य भी अगर अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है तथा निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है—यह कैसे? इसका समाधान यह है कि वहाँ (९।३०) में 'अपि चेतु' पद आये हैं, जिनका अर्थ होता है—दुराचारीकी प्रवृत्ति परमात्माकी तरफ स्वाभाविक नहीं होती; परन्तु अगर वह भगवान्के शरण हो जाय, तो उसके लिये भगवान्की तरफसे मना नहीं है। भगवान्की तरफसे किसी भी जीवके लिये किंचिन्मात्र भी बाधा नहीं है; क्योंकि भगवान् प्राणिमात्रके लिये सम हैं। उनका किसी भी प्राणीमें राग-द्वेष नहीं होता (गीता—नवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी भगवान्के द्वेषका विषय नहीं है। सब प्राणियोंपर भगवान्का प्यार और कृपा समान ही है।

वास्तवमें दुराचारी अधिक दयाका पात्र है। कारण कि वह अपना ही महान् अहित कर रहा है, भगवान्का कुछ भी नहीं बिगाड़ रहा है। इसलिये किसी कारणवशात् कोई आफत आ जाय, बड़ा भारी संकट आ जाय और उसका कोई सहारा न रहे तो वह भगवान्को पुकार उठेगा। ऐसे ही किसी सन्तको उसने दुःख दिया और संतके हृदयमें कृपा आ जाय तो उस सन्तकी कृपासे वह भगवान्में लग जाय अथवा किसी ऐसे स्थानमें चला जाय, जहाँ अच्छे-अच्छे बड़े विलक्षण दयालु महात्मा रह चुके हैं और उनके प्रभावसे उसका भाव बदल जाय अथवा किसी कारणवशात् उसका कोई पुराना विलक्षण पुण्य उदय हो जाय, तो वह अचानक चेत सकता है और भगवान्के शरण हो सकता है। ऐसा पापी पुरुष अगर भगवान्में लगता है तो बड़ी दृढ़तासे लगता है। कारण कि उसके भीतर कोई अच्छाई नहीं होती, इसलिये उसमें अच्छेपनका अभिमान नहीं होता।

तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवान्की व्यापकता और कृपा समान है। सदाचार और दुराचार तो

उन प्राणियोंके किये हुए कार्य हैं। मूलमें तो वे प्राणी सदा भगवान्के शुद्ध अंश हैं। केवल दुराचारके कारण उनकी भगवान्में रुचि नहीं होती। अगर किसी कारणवशात् रुचि हो जाय, तो भगवान् उनके किये हुएको न देखकर उनको स्वीकार कर लेते हैं—

रहित न प्रभु चित् चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥

(मानस १।२९।३)

जैसे, माँका हृदय अपने सम्बन्धसे बालकोंपर समान ही रहता है। उनके सदाचार-दुराचारसे उनके प्रति माँका व्यवहार तो विषम होता है, पर हृदय विषम नहीं होता—'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।' माँ तो एक जन्मको और एक शरीरको देनेवाली होती है; परन्तु प्रभु तो सदा रहनेवाली माँ हैं। प्रभुका हृदय तो प्राणिमात्रपर सदैव द्रवित रहता ही है। प्राणी निमित्तमात्र भी शरण हो जाय तो प्रभु विशेष द्रवित हो जाते हैं। भगवान् कहते हैं— जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥ तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥

(मानस ५।४८।१-२)

इसका तात्पर्य है कि जो चराचर प्राणियोंके साथ द्वेष करनेवाला है, वह अगर कहीं भी आश्रय न मिलनेसे भयभीत होकर सर्वथा मेरा ही आश्रय लेकर मेरे शरण हो जाता है, तो उसमें होनेवाले मद, मोह, कपट, नाना छल आदि दोषोंकी तरफ न देखकर, केवल उसके भावकी तरफ देखकर मैं उसको बहुत जल्दी साधु बना लेता हूँ।

धर्मका आश्रय रहनेसे धर्मात्मा पुरुषके भीतर अनन्यभाव होनेमें कठिनता रहती है। परन्तु दुरात्मा पुरुष जब किसी कारणसे भगवान्के सम्मुख होता है, तब उसमें किसी प्रकारके शुभकर्मका आश्रय न होनेसे केवल भगवत्-परायणताका ही बल रहता है। यह बल बहुत शीघ्र पवित्र करता है। कारण कि यह बल खुदका होता है अर्थात् किसी तरहका आश्रय न रहनेसे उसकी खुदकी पुकार होती है। इस पुकारसे भगवान् बहुत शीघ्र पिघल जाते हैं। ऐसी पुकार होनेमें पुण्यात्मा-पापात्मा, विद्वान्-मूर्ख, सुजाति-कुजाति आदिका होना कारण नहीं है, प्रत्युत संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होना ही खास कारण है। यह निराशा हरेक मनुष्यको हो सकती है।

दूसरी बात, भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि दुष्कृती

  • संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ (मानस ७।७४।३)

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२७

पुरुष मेरे शरण नहीं होते; क्योंकि उनका स्वभाव मेरे विपरीत होता है। उनमेंसे अगर कोई मेरे शरण हो जाय, तो मैं उससे प्यार करनेके लिये हरदम तैयार हूँ। भगवान्की कृपालुता इतनी विलक्षण है कि भगवान् भी अपनी कृपाके परवश होकर जीवका शीघ्र कल्याण कर देते हैं। अतः यहाँके और वहाँके प्रसंगमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपालुता ही प्रकट होती है।

सुकृती और दुष्कृती* का होना उनकी क्रियाओंपर निर्भर नहीं है, प्रत्युत भगवान्के सम्मुख और विमुख होनेपर निर्भर है। जो भगवान्के सम्मुख है, वह सुकृती है और जो भगवान्से विमुख है, वह दुष्कृती है। भगवान्के सम्मुख होनेका जैसा माहात्म्य है, वैसा माहात्म्य सकामभावपूर्वक किये गये यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि शुभ कर्मोंका भी नहीं है। यद्यपि यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाएँ भी पवित्र हैं, पर जो अपनेको सर्वथा अयोग्य समझकर और अपनेमें किसी तरहकी पवित्रता न देखकर आर्तभावसे भगवान्के सम्मुख रो पड़ता है, उसकी पवित्रता भगवत्कृपासे बहुत

जल्दी होती है। भगवत्कृपासे होनेवाली पवित्रता अनेक जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मोंकी अपेक्षा बहुत ही विलक्षण होती है। इसी तरहसे शुभ कर्म करनेवाले सुकृती भी शुभ कर्मोंका आश्रय छोड़कर भगवान्को पुकार उठते हैं, तो उनका भी शुभ कर्मोंका आश्रय न रहकर एक भगवान्का आश्रय हो जाता है। केवल भगवान्का ही आश्रय होनेके कारण वे भी भगवान्के प्यारे भक्त हो जाते हैं।

एक कृति होती है और एक भाव होता है। कृतिमें बाहरकी क्रिया होती है और भाव भीतरमें होता है। भावके पीछे उद्देश्य होता है और उद्देश्यके पीछे भगवान्की तरफ अनन्यता होती है। वह अनन्यता कृतियों और भावोंसे बहुत विलक्षण होती है; क्योंकि वह स्वयंकी होती है। उस अनन्यताके सामने कोई दुराचार टिक ही नहीं सकता। वह अनन्यता दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषको भी बहुत जल्दी पवित्र कर देती है। वास्तवमें यह जीव परमात्माका अंश होनेसे पवित्र तो है ही। केवल दुर्भावों और दुराचारोंके कारण ही इसमें अपवित्रता आती है।

परिशिष्ट भाव— जो मनुष्य भगवान्का आश्रय नहीं लेते, वे आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले होते हैं (गीता—नवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। उनकी दृष्टि संसार-(पदार्थ और क्रिया-) को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं। उनकी दृष्टिमें भगवान्की सत्ता ही नहीं होती, फिर भगवान्की शरण लेनेका प्रश्न ही नहीं उठता! भोग भोगना और संग्रह करना ही उनका अन्तिम लक्ष्य होता है—‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चित्ताः’ (गीता १६।११)। उनका ज्ञान मायाके द्वारा अपहृत होनेसे वे मायाके वशमें होते हैं। मायाके वशमें होनेसे वे मायाको तर ही नहीं सकते।

‘माययापहृतज्ञानाः’ पदका तात्पर्य है कि मायाके कारण उन मनुष्योंकी विवेकशक्ति तिरस्कृत हो गयी है। वे मनुष्य मायामें ही रचे-पचे रहते हैं अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करने, शरीरको सजाने, मकानकी सजावट करने आदिमें ही लगे रहते हैं। वे शरीरको सुख-आराम देनेवाली वस्तुओंका ही नया-नया अविष्कार करते रहते हैं और उसीको विशेष महत्त्व देते हैं। ऐसे अनित्य, परिवर्तनशील वस्तुओंको ही जाननेवाले लोग नित्य, अपरिवर्तनशील तत्त्वको कैसे जानें? क्योंकि उधर उनकी दृष्टि जाती ही नहीं, जा सकती ही नहीं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि दुष्कृती पुरुष मेरे शरण नहीं होते। तो फिर शरण कौन होते हैं? इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

  • यहाँ (७।१५ में) ‘दुष्कृतिनः’ कहकर बहुवचन दिया गया है और वहाँ (१।३० में) ‘सुदुराचारः’ कहकर एकवचन दिया है। इसका तात्पर्य है कि बहुवचन देना सामान्य शास्त्र (सामान्य बात) है और एकवचन देना विशेष शास्त्र (विशेष बात) है। जहाँ सामान्य और विशेष शास्त्रकी तुलना होती है, वहाँ सामान्य शास्त्रसे विशेष शास्त्र बलवान् हो जाता है—‘सामान्यशास्त्रो न्यूनं विशेषो बलवान् भवेत्’। इसलिये एकवचन बलवान् है।

दूसरी बात, जिसको अलंकार नहीं मिलता, वह विधि बलवान् होती है—‘निरवकाशो विधिपरवादः’। इसका मतलब यह हुआ कि दुष्कृती भगवान्के शरण नहीं होते—यह उनका सामान्य स्वभाव बताया; परन्तु उनमेंसे कोई एक किसी कारण-विशेषसे भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान्की तरफसे कृपाका दरवाजा खुला है—

सनमुद्य होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अद्य नासहिं तबहीं॥ (मानस ५।४४।१)

५२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।

आतों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥

भरतर्षभ, अर्जुन = हे भरतवंशियोंमेंआर्तः = आर्त,चतुर्विधाः = चार प्रकारके
श्रेष्ठ अर्जुन !जिज्ञासुः = जिज्ञासुजनाः = मनुष्य
सुकृतिनः = पवित्र कर्मच = औरमाम् = मेरा
करनेवालेज्ञानी = ज्ञानी अर्थात्भजन्ते = भजन करते हैं अर्थात्
अर्थार्थी = अर्थार्थी,प्रेमी—(ये)मेरे शरण होते हैं ।

व्याख्या —‘चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन’—सुकृती पवित्रात्मा मनुष्य अर्थात् भगवत्सम्बन्धी काम करनेवाले मनुष्य चार प्रकारके होते हैं। ये चारों मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् स्वयं मेरे शरण होते हैं।

पूर्वश्लोकमें ‘दुष्कृतिनः’ पदसे भगवान्में न लगनेवाले मनुष्योंकी बात आयी थी। अब यहाँ ‘सुकृतिनः’ पदसे भगवान्में लगनेवाले मनुष्योंकी बात कहते हैं। ये सुकृती मनुष्य शास्त्रीय सकाम पुण्य-कर्म करनेवाले नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्से अपना सम्बन्ध जोड़कर भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेवाले हैं। सुकृती मनुष्य दो प्रकारके होते हैं—एक तो यज्ञ, दान, तप आदि और वर्ण-आश्रमके शास्त्रीय कर्म भगवान्के लिये करते हैं अथवा उनको भगवान्के अर्पण करते हैं और दूसरे भगवनामका जप तथा कीर्तन करना, भगवान्की लीला सुनना तथा कहना आदि केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म करते हैं।

जिनकी भगवान्में रुचि हो गयी है, वे ही भाग्यशाली हैं, वे ही श्रेष्ठ हैं और वे ही मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। वह रुचि चाहे किसी पूर्व पुण्यसे हो गयी हो, चाहे आफतके समय दूसरोंका सहारा छूट जानेसे हो गयी हो, चाहे किसी विश्वसनीय मनुष्यके द्वारा समयपर धोखा देनेसे हो गयी हो, चाहे सत्संग, स्वाध्याय अथवा विचार आदिसे हो गयी हो, किसी भी कारणसे भगवान्में रुचि होनेसे वे सभी सुकृती मनुष्य हैं।

जब भगवान्की तरफ रुचि हो जाय, वही पवित्र दिन है, वही निर्मल समय है और वही सम्पत्ति है। जब भगवान्की तरफ रुचि नहीं होती, वही काला दिन है, वही विपत्ति है—‘कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई ॥

(मानस ५। ३२। २)

भगवान्ने कृपा करके भगवत्प्राप्तिरूप जिस उद्देश्यको लेकर जिन्हें मानव-शरीर दिया है, वे ‘जनाः’ (जन)

कहलाते हैं। भगवान्का संकल्प मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये बना है; अतः मनुष्यमात्र भगवान्की प्राप्तिका अधिकारी है। तात्पर्य है कि उस संकल्पमें भगवान्ने मनुष्यको अपने उद्धारकी स्वतन्त्रता दी है, जो कि अन्य प्राणियोंको नहीं मिलती; क्योंकि वे भोगयोगिनियाँ हैं और यह मानवशरीर कर्मयोगिन है। वास्तवमें केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही होनेके कारण मानव-शरीरको साधनयोगिन ही मानना चाहिये। इसलिये इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके मनुष्य शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको छोड़कर अगर भगवत्प्राप्तिके लिये ही लग जाय तो उसको भगवत्कृपासे अनायास ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है। परन्तु जो मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके विपरीत मार्गपर चलते हैं, वे नरकों और चौरासी लाख योगिनियोंमें जाते हैं। इस तरह सबके उद्धारके भावको लेकर भगवान्ने कृपा करके जो मानव-शरीर दिया है, उस शरीरको पाकर भगवान्का भजन करनेवाले सुकृती मनुष्य ही ‘जनाः’ अर्थात् मनुष्य कहलानेयोग्य हैं।

‘आतों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ’—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी—ये चार प्रकारके भक्त भगवान्का भजन करते हैं अर्थात् भगवान्के शरण होते हैं।

(१) अर्थार्थी भक्त —जिनको अपनी न्याययुक्त सुख-सुविधाकी इच्छा हो जाती है अर्थात् धन-सम्पत्ति, वैभव आदिकी इच्छा हो जाती है, परन्तु उसको वे केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरोंसे नहीं, ऐसे भक्त अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं।

चार प्रकारके भक्तोंमें अर्थार्थी आरम्भिक भक्त होता है। पूर्व-संस्कारोंसे उसकी धनकी इच्छा रहती है और वह धनके लिये चेष्टा भी करता है, पर वह समझता है कि भगवान्के समान धनकी इच्छा पूरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ऐसा समझकर वह धनप्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक भगवनामका जप-कीर्तन, भगवत्स्वरूपका ध्यान आदि

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५२९

करता है। धन प्राप्त करनेके लिये उसका भगवान्पर ही विश्वास, निष्ठा होती है।

जिसको धनकी इच्छा तो है, पर उसकी प्राप्तिके लिये वह सांसारिक उपायोंका सहारा लेता है और कभी धनके लिये भगवान्को भी याद कर लेता है, वह केवल अर्थार्थी अर्थात् अर्थका भक्त है, भगवान्का भक्त नहीं है। कारण कि उसमें धनकी इच्छा ही मुख्य है। परन्तु जिसमें भगवान्के सम्बन्धकी मुख्यता है, वह क्रमशः भगवान्की तरफ ही बढ़ता चला जाता है। भगवान्में लगे रहनेसे उसकी धनकी इच्छा बहुत कम हो जाती है और समय पाकर मिट भी जाती है। यही भगवान्का अर्थार्थी भक्त है। इसमें मुख्यतया ध्रुवजीका नाम लिया जाता है।

एक दिन बालक ध्रुवके मनमें राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर छोटी माँने बैठने नहीं दिया। उसने ध्रुवसे कहा कि 'तूने भजन नहीं किया है, तू अभाग है और अभागिनके यहाँ ही तूने जन्म लिया है; अतः तू राजाकी गोदमें बैठनेका अधिकारी नहीं है।' ध्रुवने छोटी माँकी कही हुई सब बात अपनी माँसे कह दी। माँने कहा कि 'बेटा! तेरी छोटी माँने ठीक ही कहा है; क्योंकि भजन न तूने किया और न मैंने ही किया।' इसपर ध्रुवने माँसे कहा कि 'माँ! अब तो मैं भजन करूँगा।' ऐसा कहकर वे भगवद्भजन करनेके लिये घरसे निकल पड़े और माँने भी बड़ी हिम्मत करके ध्रुवको जंगलमें जानेके लिये आज्ञा दे दी। रास्तेमें जाते हुए नारदजी महाराज मिल गये। नारदजीने ध्रुवसे कहा कि 'अरे भोले बालक! तू अकेला कहाँ जा रहा है? यों भगवान् जल्दी थोड़े ही मिलते हैं? तू जंगलमें कहाँ रहेगा? वहाँ बड़े-बड़े जंगली जानवर हैं। वे तेरेको खा जायेंगे। वहाँ तेरी माँ थोड़े ही बैठे है! तू मेरे साथ चल। राजा मेरी बात मानते हैं। मैं तेरा और तेरी माँका प्रबन्ध करवा दूँगा।' नारदजीकी बातोंको सुनकर ध्रुवकी भगवद्भजनमें और दृढ़ता हो गयी कि देखो, भगवान्की तरफ चलनेसे नारदजी भी इतनी बात कहते हैं। अब ये मेरेको घर चलनेके लिये कहते हैं, पर पहले ये कहाँ गये थे! ध्रुवने नारदजीसे कहा कि 'महाराज! मैं तो अब भगवान्का भजन ही करूँगा।' ध्रुवजीका ऐसा दृढ़ निश्चय

देखकर नारदजीने उनको द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) दिया और चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान बताकर मधुवनमें जाकर भजन करनेकी आज्ञा दी।

ध्रुवजीने मधुवनमें जाकर ऐसी निष्ठासे भजन किया कि उनकी निष्ठाको देखकर छः महीनेकी अवधिके भीतर-ही भीतर भगवान् ध्रुवके सामने प्रकट हो गये। भगवान्ने ध्रुवजीको राजगद्दीका वरदान दिया, पर इस वरदानसे ध्रुवजी विशेष राजी नहीं हुए। भजनसे अन्तःकरण शुद्ध होनेके कारण उनको धन-(राज्य-) के लिये भगवान्की तरफ चलनेमें बड़ी लज्जा हुई कि मैंने बड़ी गलती की!

तात्पर्य यह हुआ कि ध्रुवजीको तो पहले राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर उन्होंने उस इच्छाकी पूर्तिका मुख्य उपाय भगवान्का भजन ही माना। भजन करनेसे उनको राज्य मिल गया और इच्छा मिट गयी। इस तरह अर्थार्थी भक्त केवल भगवान्की तरफ ही लगता है।

आजकल जो धन-प्राप्तिके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि करते हैं, वे भी धनके लिये समय-समयपर भगवान्को पुकारते हैं। वे अर्थार्थी तो हैं, पर भगवान्के भक्त नहीं हैं। वे तो झूठ, कपट, बेईमानी आदिके भक्त हैं; क्योंकि उनका 'पापके बिना, झूठ-कपटके बिना काम नहीं चलता'—इस तरह झूठ-कपट आदिपर जितना विश्वास है, उतना विश्वास भगवान्पर नहीं है।

जो केवल भगवान्के ही परायण हैं और जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्का ही भजन करते हैं; परन्तु कभी-कभी पूर्व-संस्कारोंसे अथवा किसी कारणसे जिनमें अपने शरीर आदिके लिये अनुकूल परिस्थितिकी इच्छा हो जाती है, वे भी अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। उनकी अनुकूलताकी इच्छा ही अर्थार्थीपन है।

(२) 'आर्त भक्त'—प्राण-संकट आनेपर, आफत आनेपर, मनके प्रतिकूल घटना घटनेपर जो दुःखी होकर अपना दुःख दूर करनेके लिये भगवान्को पुकारते हैं और दुःखको दूर करना केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरे किसी उपायको काममें नहीं लेते, वे आर्त भक्त कहलाते हैं। आर्त भक्तोंमें उत्तराका दृष्टान्त लेना ठीक बैठता है*। कारण कि जब उसपर आफत आयी, तब उसने भगवान्के

  • आर्त भक्तोंमें द्रौपदी और गजेन्द्रका दृष्टान्त ठीक नहीं बैठता; क्योंकि उन्होंने अपनी रक्षाके लिये अन्य उपायोंका भी सहारा लिया था, केवल भगवान्का ही नहीं। जबतक अपना दुःख दूर करनेके लिये अन्य उपायोंका सहारा रहता है, अन्य उपायोंकी तरफ वृत्ति रहती है, तबतक वे अनन्यभक्त नहीं हैं और तभीतक उनपर कष्ट आता है। जब यह अन्यकी तरफसे वृत्ति मिट जाती है, तब वे भक्त कहलाते हैं और उनपर कष्ट नहीं आता। जैसे, चीर-हरणके समय जबतक द्रौपदीकी दूसरोंकी तरफ

५३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सिवाय अन्य किसी उपायका सहारा नहीं लिया। अन्य उपायोंकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं गयी। उसने केवल भगवान्का ही सहारा लिया*। तात्पर्य यह हुआ कि सकामभाव रहनेपर भी आर्त भक्त उसकी पूर्ति केवल भगवान्से ही चाहते हैं।

जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्के परायण हैं और अनुकूलताकी वैसी इच्छा नहीं करते; पर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर इच्छा हो जाती है कि भगवान्ने ऐसा क्यों किया? 'यह प्रतिकूलता मिट जाय तो बहुत अच्छा है।' इस प्रकार प्रतिकूलता मिटानेका भाव पैदा होनेसे वे भी आर्त भक्त कहलाते हैं।

(३) जिज्ञासु भक्त —जिसमें अपने स्वरूपको, भगवत्तत्त्वको जाननेकी जोरदार इच्छा जाग्रत् हो जाती है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? इस प्रकार तत्त्वको जाननेके लिये शास्त्र, गुरु अथवा पुरुषार्थ (श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि उपायों) का भी आश्रय न रखते हुए केवल भगवान्के आश्रित होकर उस तत्त्वको केवल भगवान्से ही जो जानना चाहते हैं; वे जिज्ञासु भक्त कहलाते हैं।

जिज्ञासु भक्त वही होता है, जिसका जिज्ञास्य केवल भगवत्तत्त्व और उपाय केवल भगवद्भक्ति ही होती है अर्थात् उपेय और उपायमें अनन्यता होती है।

जिज्ञासु भक्तोंमें उद्धवजीका नाम लिया जाता है। भगवान्ने उद्धवजीको दिव्यज्ञानका उपदेश दिया था, जो 'उद्धवगीता' (श्रीमद्भगवत् ११।७—३०) के नामसे प्रसिद्ध है।

जो भगवान्में अपनापन करके भगवान्के भजनमें ही तल्लीन रहते हैं; परन्तु कभी-कभी संगसे, संस्कारोंसे मनमें यह भाव पैदा हो जाता है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? वे भी जिज्ञासु कहलाते हैं।

दृष्टि थी, दूरसोंका भरोसा था, अपने बलका सहारा था, तबतक वह कष्ट पाती रही। परन्तु जब दूरसोंकी तरफसे तो क्या, अपने हाथसे भी साड़ीको नहीं पकड़ा अर्थात् अपने बलका भी सहारा नहीं लिया, तब उसका अनन्यभाव हो गया और उसको दुःख नहीं पाना पड़ा।

ऐसे ही गजेन्द्रने जबतक हाथियों और हथिनियोंका सहारा लिया, अपने बलका सहारा लिया, तबतक वह वर्षांतक दुःख पाता रहा। जब सब सहारा छूट गया, केवल भगवान्का ही सहारा रहा, तब उसको दुःख नहीं पाना पड़ा।

  • पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते। नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्॥

अभिद्वति मामीश शरत्सप्तायसो विभो। कामं ददतु मां नाथ मा मे गभं निपात्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १।८।९-१०)

'देवाधिदेव! जगदीश्वर! महायोगिन्! आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके सिवाय इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी आपसमें एक-दूसरेकी मृत्युका कारण बन रहे हैं। प्रभो! सर्वशक्तिमान्! यह दहकता हुआ लोहेका बाण मेरी तरफ दौड़ा आ रहा है। स्वामिन्! यह मुझे भले ही जला डाले, पर मेरे गभंको नष्ट न करे।'

(४) ज्ञानी (प्रेमी) भक्त —अर्थात्, आर्त और जिज्ञासु—तीनों भक्तोंसे ज्ञानी भक्तकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ 'च' अव्यय आया है।

ज्ञानी भक्तको अनुकूल-से-अनुकूल और प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना, व्यक्ति, वस्तु आदि सब भगवत्स्वरूप ही दीखते हैं अर्थात् उसको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति केवल भगवल्लीला ही दीखती है। जैसे भगवान्में अपने लिये अनुकूलता प्राप्त करने, प्रतिकूलता हटाने, बोध प्राप्त करने आदि किसी तरहकी कभी किंचिन्मात्र भी इच्छा होती ही नहीं, वे तो केवल भक्तोंके प्रेममें ही मस्त रहते हैं; ऐसे ही ज्ञानी (प्रेमी) भक्तोंमें किंचिन्मात्र भी कोई इच्छा नहीं होती, वे केवल भगवान्के प्रेममें ही मस्त रहते हैं।

ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तोंमें गोपिकाओंका नाम प्रसिद्ध है। देवर्षि नारदजीने भी 'यथा व्रजगोपिकानाम्' (भक्तिसूत्र २१) कहकर गोपियोंको प्रेमी भक्तोंका आदर्श माना है। कारण कि गोपियोंमें अपने सुखका सर्वथा त्याग था। प्रियतम भगवान्का सुख ही उनका सुख था।

यहाँ एक बात समझनेकी है कि धनकी इच्छा, दुःख दूर करनेकी इच्छा और जिज्ञासा-पूर्तिकी इच्छाको लेकर जो भगवान्की तरफ लगते हैं, उनमें तो भगवान्का प्रेम जाग्रत् हो जाता है और वे भक्त कहलाते हैं। परन्तु जिनकी यह भावना रहती है कि अन्य उपायोंसे धन मिल सकता है, दुःख दूर हो सकता है, जिज्ञासा-पूर्ति हो सकती है, उनका भगवान्के साथ सम्बन्ध न होनेसे उनमें प्रेम जाग्रत् नहीं होता और उनकी भक्त संज्ञा नहीं होती।

संतोंकी वाणीमें आता है कि प्रेम तो केवल भगवान् ही करते हैं, भक्त केवल भगवान्में अपनापन करता है। कारण कि प्रेम वही करता है, जिसे कभी किसीसे कुछ भी लेना नहीं है। भगवान्ने जीवमात्रके प्रति अपने-आपको सर्वथा

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३१

अर्पित कर रखा है और जीवसे कभी कुछ भी प्राप्त करनेकी इच्छाकी कोई सम्भावना ही नहीं रखी है। इसलिये भगवान् ही वास्तवमें प्रेम करते हैं। जीवको भगवान्की आवश्यकता है, इसलिये जीव भगवान्से अपनापन ही करता है। जब अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित करनेपर भक्तमें कभी कुछ भी पानेकी कोई अभिलाषा नहीं रहती, तब वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त कहा जाता है। अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेसे उस भक्तकी सत्ता भगवान्से किंचिन्मात्र भी अलग नहीं रहती, प्रत्युत उसकी जगह केवल भगवान्की सत्ता ही रह जाती है।

विशेष बात

(१)

चार लड़के खेल रहे थे। इतनेमें उनके पिताजी चार आम लेकर आये। उनको देखते ही एक लड़का आम माँगने लग गया और एक लड़का आम लेनेके लिये रो पड़ा। पिताजीने उन दोनोंको एक-एक आम दे दिया। तीसरा लड़का न तो रोता है और न माँगता है, केवल आमकी तरफ देखता है और चौथा लड़का आमकी तरफ न देखकर जैसे पहले खेल रहा था, वैसे ही मस्तीसे खेल रहा है। उन दोनोंको भी पिताजीने एक-एक आम दे दिया। इस प्रकार चारों ही लड़कोंको आम मिलता है। यहाँ आम माँगनेवाला लड़का अर्थार्थी है, रोनेवाला लड़का आर्त है, केवल आमकी तरफ देखनेवाला जिज्ञासु है और आमकी परवाह न करके खेलमें लगे रहनेवाला लड़का ज्ञानी है। ऐसे ही अर्थार्थी भक्त भगवान्से अनुकूलता माँगता है, आर्त भक्त भगवान्से प्रतिकूलता दूर करना चाहता है, जिज्ञासु भक्त भगवान्को जानना चाहता है और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त भगवान्से कुछ भी नहीं चाहता।

अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चारों ही भक्त भगवनिष्ठ हैं। अतः इनको योगश्रष्ट पुरुषों (गीता—छठे अध्यायका इकतालिसर्वाँ-बयालीसर्वाँ श्लोक)—में नहीं लिया जा सकता। ऐसे ही अर्थार्थी और आर्त—ये दोनों सकाम पुरुषोंसे अलग हैं; क्योंकि इन दोनों भक्तोंमें भगवान्का आश्रय मुख्य है। सकाम पुरुष कामनापूर्तिमें ही लगे रहनेके कारण ‘हृतज्ञानः’ हैं (गीता ७। २०), इसलिये उनको आसुरी सम्पत्तिवाले पुरुषोंमें लिया गया है। यद्यपि अर्थार्थी आदि भक्तोंमें जो कुछ न्यूनाधिकता है, वह कामनाके कारण ही है, परन्तु कामना होते हुए भी वे

‘हृतज्ञानः’ नहीं हैं। उनको तो भगवान्ने ‘सुकृतिनः’ और ‘उदाराः’ (७। १८) कहा है।

जो भगवान्के शरण होते हैं, उनमें सकामभाव भी हो सकता है; परन्तु उनमें मुख्यता भगवनिष्ठ होनेकी ही होती है। इसलिये उनकी भगवान्के साथ जितनी-जितनी घनिष्ठता होती जाती है, उतना-उतना ही उनमें सकामभाव मिटता जाता है और विलक्षणता आती जाती है। इसलिये उनको भगवान्ने ‘उदाराः’ कहा है और ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—‘ज्ञानी त्वान्वैव मे मतम्’ (७। १८)।

(२)

भगवान्के साथ अपनापन माननेके समान दूसरा कोई साधन नहीं है, कोई योग्यता नहीं है, कोई बल नहीं है, कोई अधिकारिता नहीं है। भगवान्का प्राणिमात्रपर अपनापन सदासे है और सदा ही रहेगा। उस अपनेपनको केवल प्राणी ही भूला है और उसने भूलसे संसारके साथ अपनापन मान लिया है। अतः इस भूलसे किये हुए अपनेपनको हटाना है और प्रभुके साथ जो स्वतःसिद्ध अपनापन है, उसको मानना है। प्रभुको अपना माननेमें मन, बुद्धि आदि किसीकी सहायता नहीं लेनी पड़ती, जबकि दूसरे साधनोंमें मन, बुद्धि आदिकी सहायता लेनी पड़ती है।

भगवान्के साथ अपनापन होनेपर अर्थात् ‘मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हूँ’—ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर साधक भक्तको अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें भावोंकी, गुणोंकी कमी भी दीख सकती है, पर भगवान्के साथ अपनापन होनेसे वह टिकेगी नहीं। दूसरी बात, साधक भक्तमें कुछ गुणोंकी कमी रहनेपर भी भगवान्की दृष्टि केवल अपनेपनपर ही जाती है, गुणोंकी कमीपर नहीं। कारण कि भगवान्के साथ हमारा जो अपनापन है, वह वास्तविक है।

भगवान्का अपनापन तो दुष्ट-से-दुष्ट मनुष्यपर भी वैसा ही है। इसलिये सोलहवें अध्यायमें आसुरी प्रकृतिवालोंका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि ‘क्रूर, द्वेष करनेवाले, नराधम दुष्टोंको मैं आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ।’ इस प्रकार भगवान् उनको आसुरी योनियोंमें गिराकर शुद्ध करते हैं। जैसे माता अपने बच्चेको स्नान कराती है तो उसकी सम्पत्ति नहीं लेती, ऐसे ही उनको शुद्ध करनेके लिये भगवान् उनकी सम्पत्ति नहीं लेते; क्योंकि भगवान्का उनपर अपनापन है।

५३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध पहलेसे ही है। फिर भी कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो भक्तका भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध मुख्य होता है और कामना गौण होती है। इस दृष्टिसे ये भक्त पहली श्रेणीके हैं।

भगवान्का सम्बन्ध तो पहलेसे ही है, पर समय-समयपर कामना उत्पन्न हो जाती है, जिसकी पूर्ति दूसरोंसे चाहते हैं। जब दूसरोंसे कामनाकी पूर्ति नहीं होती, तब अन्तर्मे भगवान्से चाहते हैं। इस तरह अनन्यताकी कमी होनेके कारण ये भक्त दूसरी श्रेणीके हैं।

जहाँ केवल कामना-पूर्तिके लिये ही भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध किया जाय, वहाँ कामना मुख्य होती है और भगवान्का सम्बन्ध गौण होता है। इस दृष्टिसे ये भक्त तीसरी श्रेणीके हैं।

मार्मिक बात

कामना दो तरहकी होती है—पारमार्थिक और लौकिक।

(१) पारमार्थिक कामना—पारमार्थिक कामना दो तरहकी होती है—मुक्ति-(कल्याण-)की और भक्ति-(भगवत्प्रेम-) की।

जो मुक्तिकी कामना है, उसमें तत्त्वको जाननेकी इच्छा होती है, जिसे जिज्ञासा कहते हैं। यह जिज्ञासा जिसमें होती है, वह जिज्ञासु होता है। गहरा विचार किया जाय तो जिज्ञासा कामना नहीं है; क्योंकि वह अपने स्वरूपको अर्थात् तत्त्वको जानना चाहता है, जो वास्तवमें उसकी आवश्यकता है। आवश्यकता उसको कहते हैं, जो जरूर पूरी होती है और पूरी होनेपर फिर दूसरी आवश्यकता पैदा नहीं होती। यह आवश्यकता सत्-विषयकी होती है।

दूसरी कामना प्रभु-प्रेम-प्राप्तिकी होती है। उसको प्राप्ति तो कहते हैं, पर वास्तवमें वह प्राप्ति अपने लिये नहीं होती, प्रत्युत प्रभुके लिये ही होती है। उसमें अपना किंचिन्मात्र प्रयोजन नहीं रहता; प्रभुके समर्पित होनेका ही प्रयोजन रहता है। प्रेमी तो अपने-आपको प्रभुके समर्पित कर देता है, जो कि उसीका अंश है।

उपर्युक्त दोनों ही पारमार्थिक कामनाएँ वास्तवमें 'कामना' नहीं हैं।

(२) लौकिक कामना—लौकिक कामना भी दो तरहकी होती है—सुख प्राप्त करनेकी और दुःख दूर करनेकी।

शरीरको आराम मिले; जीते-जी मेरा आदर-सत्कार होता रहे और मरनेके बाद मेरा नाम अमर हो जाय, मेरा स्मारक बन जाय; कोई ग्रन्थ बना दे, जिसको लोग देखते रहें, पढ़ते रहें और यह जान जायें कि ऐसा कोई विलक्षण पुरुष हुआ है; मरनेके बाद स्वर्ग आदिमें भोग भोगते रहें आदि-आदि लौकिक सुख-प्राप्तिकी कामनाएँ होती हैं। ऐसी कामनाओंसे तो वासना ही बढ़ती है, जिससे बन्धन और पतन ही होता है, उद्धार नहीं होता। यह कामना आसुरी सम्पत्ति है इसलिये यह त्याज्य है।

दूसरी कामना दुःख दूर करनेकी है। दुःख तीन प्रकारके हैं—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक।

अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सरदी-गरमी, वायु आदिसे जो दुःख होता है, उसको 'आधिदैविक' कहते हैं। यह दुःख देवताओंके अधिकारसे होता है।

सिंह, साँप, चोर आदि प्राणियोंसे जो दुःख होता है, उसको 'आधिभौतिक' कहते हैं।

शरीर और अन्तःकरणको लेकर जो दुःख होता है, वह

१-कामना वह होती है, जो कभी पूरी नहीं होती। एक कामना पूरी होनेपर फिर दूसरी कामना पैदा हो जाती है। जैसे, धनकी कामना हुई। जितना धन चाहता है, उतना धन मिल जाय तो फिर और अधिक धनकी कामना होती है। धनकी तरह ही मान-बड़ाईकी, जीनेकी, भोगकी, नीरोगताकी, यश-कीर्तिकी, स्त्री-पुत्रकी आदि-आदि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी कामना होती है। ये धनादि वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, क्योंकि इनमेंसे कोई भी वस्तु स्वयंतक पहुँचती ही नहीं। इनकी कामनापूर्ति केवल शरीर और नामतक ही पहुँचती है। कामना असत्-विषयकी होती है। कामनापूर्तिके बाद फिर और कामना पैदा हो जाती है; इस प्रकार अपूर्ति ही बाकी रहती है। अतः कामना त्याज्य है; क्योंकि ये चीजें तो रहेगी नहीं और उनकी पूर्तिके लिये की हुई कामना और प्रयत्न—ये दोनों ही निष्फल होंगे।

२-मुक्तिकी अपेक्षा भक्तिकी कामना श्रेष्ठ है; क्योंकि मुक्तिमें स्वयं मुक्त होना चाहता है और भक्तिमें भगवान्के समर्पित होना चाहता है। तात्पर्य है कि मुक्तिमें लेनेकी इच्छा और भक्तिमें देनेकी इच्छा रहती है। इसलिये मुक्तिमें तो सूक्ष्म अहं रहता है, पर भक्तिमें अहं बिलकुल नहीं रहता।

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३३

‘आध्यात्मिक’ होता है।*

इन दुःखोंको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी जो कामना होती है, वह सर्वथा निरर्थक है; क्योंकि उस कामनाकी पूर्ति नहीं होती। पूर्ति हो भी जाती है तो दूसरी

नयी कामना पैदा हो जाती है और अन्तमें अपूर्ति ही बाकी रहती है। इसलिये इन दोनों कामनाओंकी पूर्ति किसी भी मनुष्यकी कभी भी नहीं हुई, न होती है और न भविष्यमें ही पूरी होनेवाली है।

परिशिष्ट भाव —चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि मेरी शरण लेनेवाले भक्त गुणमयी मायाको तर जाते हैं। वे शरण लेनेवाले भक्त कौन हैं—इसको अब इस श्लोकमें बताते हैं।

पूर्व श्लोकमें ‘दुष्कृती’ मनुष्योंकी और इस श्लोकमें ‘सुकृती’ मनुष्योंकी बात आयी है। जो हमारेसे अलग है, उस संसारको अपना मानना सबसे बड़ा दुष्कृत अर्थात् पाप है और जो हमारेसे अभिन्न हैं, उन भगवान्को अपना मानना सबसे बड़ा सुकृत अर्थात् पुण्य है। अतः जो संसारको अपना मानते हैं, वे दुष्कृती हैं और जो भगवान्को अपना मानते हैं, वे सुकृती हैं।

भोगी मनुष्य भगवान्में नहीं लगता, इसलिये ‘अर्थार्थी’ तो भगवान्का भक्त हो सकता है, पर ‘भोगार्थी’ भगवान्का भक्त नहीं हो सकता। कारण कि भोगार्थीमें संसारकी लिप्तता अधिक होती है और अर्थार्थीमें लिप्तता कम होती है तथा भगवान्की मुख्यता होती है।

कुछ अंशमें भगवान्के सिवाय अन्य सत्ताकी मान्यता होनेके कारण ही भक्त अर्थार्थी, आर्त अथवा जिज्ञासु होता है। अगर अन्य सत्ताकी मान्यता सर्वथा न हो तो वह ज्ञानी (प्रेमी) हो जाता है। तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही ये चार भेद होते हैं। वास्तवमें एक भगवान्की सत्ताके सिवाय दूसरी सत्ता सम्भव ही नहीं है।

जो विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् परमात्माके समग्ररूपको जानना चाहता है, वह ‘जिज्ञासु’ है। जिज्ञासु भगवान्के ऐश्वर्य, प्रभाव, सामर्थ्यको जानना चाहता है, इसलिये भगवान्की लीला-कथामें उसको विशेष रस आता है। भगवान्ने ‘मुमुक्षु’ पद न देकर ‘जिज्ञासु’ पद दिया है; क्योंकि मुमुक्षु तो केवल तत्त्वज्ञान चाहनेवाला ही हो सकता है, पर ‘जिज्ञासु’ ज्ञान चाहनेवाला भी हो सकता है और भक्ति चाहनेवाला भी। मुमुक्षुमें अपने कल्याणकी बात मुख्य होती है और जिज्ञासु भक्तमें अपनेको भगवान्के अर्पित करनेकी बात मुख्य होती है। मुमुक्षुको ब्रह्मका ज्ञान होता है और जिज्ञासु भक्तको ‘वासुदेवः सर्वम्’ का ज्ञान होता है। तत्त्वज्ञानीको तो ब्रह्मका ज्ञान होता है, पर भक्तको समग्रका ज्ञान होता है (गीता इसी अध्यायका उन्तीसवाँ, तीसवाँ श्लोक)।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः संसारका सम्बन्ध घटता जाता है और परमात्माका सम्बन्ध बढ़ता जाता है। जबतक जीव जगत्को धारण किये रहता है, तभीतक अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु रहते हैं। जब वह जगत्को धारण नहीं करता, तब केवल ‘ज्ञानी’ रहता है।

जिस भक्तको ‘सब कुछ वासुदेव ही है’— इस प्रकार परमात्माके समग्ररूपका ज्ञान हो गया है, उसको यहाँ ‘ज्ञानी’ कहा गया है। इसी ज्ञानी भक्तको आगे उन्नीसवें श्लोकमें ‘ज्ञानवान्’ कहा गया है।

‘अर्थार्थी’ प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष न करके धन चाहता है। ‘आर्त’ प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष तो करता है, पर दुःख आनेपर उससे दुःख सहा नहीं जाता। ‘अर्थार्थी’ में अर्थकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है। उसमें धनकी इच्छा तो रहती है, पर उस इच्छाको वह केवल भगवान्से ही पूरी कराना चाहता है। कारण कि भगवान्में कोई कमी नहीं है। अपरा प्रकृति है तो भगवान्की ही! ‘आर्त’ भी अपना दुःख केवल भगवान्से ही दूर करना चाहता है। ‘जिज्ञासु’ भी केवल भगवान्से ही अपनी जिज्ञासाकी पूर्ति करना चाहता है। परन्तु जब भक्तमें ऐसी उत्कट अभिलाषा रहती है कि ‘मेरेको केवल भगवान् ही प्यारे लगे’, तब उसमें अर्थार्थीपना, आर्तपना और जिज्ञासुपना नहीं रहता और वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी हो जाता है।

  • आध्यात्मिक दुःखके दो प्रकार हैं—आधि और व्याधि। मनकी चिन्ता ‘आधि’ है और शरीरका रोग ‘व्याधि’ है। आधि भी दो तरहकी होती है—(१) पागलपन और (२) चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि। पागलपन तो प्रारब्धसे होता है और चिन्ता, शोक आदि अज्ञानसे होते हैं। ज्ञान होनेपर चिन्ता, शोक आदि तो मिट जाते हैं, पर पागलपन प्रारब्धवशात् हो सकता है।

५३४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

‘अर्थार्थी’ का तो अर्थसे निरन्तर सम्बन्ध रहता है; क्योंकि अर्थकी वासना हरदम रहती है। परन्तु ‘आर्त’ का दुःखसे निरन्तर सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि दुःख हरदम नहीं रहता। ‘जिज्ञासु’ को सुख-दुःखकी परवाह नहीं होती; अतः वह न तो सुखके आनेकी इच्छा करता है और न दुःखके जानेकी इच्छा करता है। अर्थार्थी और आर्त—दोनों जिज्ञासु होकर ज्ञानी हो जाते हैं।

‘अर्थार्थी’ भक्तको जब अर्थ मिलता है, तब उसको अपनी भूलपर पश्चाताप होता है; जैसे—ध्रुवजीको राज्य मिलनेपर पश्चाताप हुआ। परन्तु ‘आर्त’ भक्तको उतना पश्चाताप नहीं होता, प्रत्युत उसमें यह भाव रहता है कि भगवान् दुःख दूर करनेवाले हैं; जैसे—द्रौपदी और गजेन्द्रकी रक्षा होनेपर उनको पश्चाताप नहीं हुआ, प्रत्युत भगवान्की तरफ ही उनकी वृत्ति रही। ‘आर्त’ भक्त आये हुए दुःखको सह नहीं सकता—यह उसकी कमजोरी है।

‘जिज्ञासु’ भक्तमें भगवान्के समग्ररूपको जाननेकी कमी रहती है। उसको मुक्ति, तत्त्वज्ञान होनेपर भी सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत उसमें प्रेम प्राप्त करनेकी भूख रहती है। परन्तु ‘ज्ञानी’ भक्तकी दृष्टिमें एक वासुदेवके सिवाय अन्य सत्ता लेशमात्र भी नहीं होती, फिर उसमें कोई कमी कैसे रह सकती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ (गीता ७।१८)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों भक्तोंमेंसे ज्ञानी भक्तकी विशेषताका विशद वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं—

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तर्विशिष्यते।

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥

तेषाम्= उन चारप्रेमी भक्तप्रियः= प्रिय हूँ
भक्तोंमेंविशिष्यते= श्रेष्ठ है;= और
नित्ययुक्तः= मुझमें निरन्तरहि= क्योंकिसः
लगा हुआज्ञानिनः= ज्ञानी भक्तकोमम= मुझे
एकभक्तिः= अनन्य भक्तिवालाअहम्= मैंप्रियः
ज्ञानी= ज्ञानी अर्थात्अत्यर्थम्= अत्यन्त

व्याख्या—‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’— उन (अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी) भक्तोंमें ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वह नित्ययुक्त है अर्थात् वह सदा-सर्वदा केवल भगवान्में ही लगा रहता है। भगवान्के सिवाय दूसरे किसीमें वह किंचिन्मात्र भी नहीं लगता। जैसे गोपियोंँ गाय दूहते, दही बिलोते, धान कूटते आदि सभी लौकिक कार्य करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्णमें चित्तवाली रहती हैं*, ऐसे ही वह ज्ञानी भक्त लौकिक और पारमार्थिक सब क्रियाएँ करते समय सदा-सर्वदा भगवान्से जुड़ा रहता है। भगवान्का सम्बन्ध रखते हुए ही उसकी

सब क्रियाएँ होती हैं।

‘एकभक्तर्विशिष्यते’— उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तका आकर्षण केवल भगवान्में होता है। उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रहती। इसलिये वह श्रेष्ठ है।

अर्थार्थी आदि भक्तोंमें पूर्वसंस्कारोंके कारण जबतक व्यक्तिगत इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं, तबतक उनकी एकभक्ति नहीं होती अर्थात् केवल भगवान्में प्रेम नहीं होता। परन्तु उन भक्तोंमें इन इच्छाओंको नष्ट करनेका भाव भी होता रहता है और इच्छाओंके सर्वथा नष्ट होनेपर सभी भक्त भगवान्के प्रेमी और भगवान्के प्रेमास्पद हो जाते हैं।

  • या दोहनेऽवहने मथनोपलेपप्रेक्षेद्वुनाभरुदितोक्षणमार्जनादी।

गायन्ति चैनमनुत्तुक्तधियोऽशुक्लकण्ठो धन्या ब्रजस्त्रिय उरुकमचित्तयानाः ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।४४।१५)

‘जो गौओंका दूध दूहते समय, धान आदि कूटते समय, दही मथते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालनेमें झूलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, तुलसी आदिको जलसे सींचते समय तथा झाड़ू देने आदि सब कर्मोंको करते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे श्रीकृष्णकी दिव्य लीलाओंका गान करती रहती हैं, वे श्रीकृष्णमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेवाली ब्रजवासिनी गोपियाँ धन्य हैं।’

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३५

वहाँ भक्त और भगवान्में द्वैतका भाव न रहकर प्रेमाद्वैत (प्रेममें अद्वैत) हो जाता है।

ऐसे तो चारों भक्त भगवान्में नित्य-निरन्तर लगे रहते हैं; परन्तु तीन भक्तोंके भीतरमें कुछ-न-कुछ व्यक्तिगत इच्छा रहती है; जैसे—अर्थाथी भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं, आर्त भक्त प्रतिकूलताको मिटानेकी इच्छा करते हैं और जिज्ञासु भक्त अपने स्वरूपको या भगवतत्त्वको जाननेकी इच्छा करते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती; अतः वह एकभक्ति है।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’—

उस ज्ञानी प्रेमी भक्तको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ। उसमें अपनी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है, केवल मेरेमें प्रेम है। इसलिये वह मेरेको अत्यन्त प्यारा है।

वास्तवमें तो भगवान्का अंश होनेसे सभी जीव स्वाभाविक ही भगवान्को प्यारे हैं। भगवान्के प्यारमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। जैसे माता अपने बच्चोंका पालन

परिशिष्ट भाव— भगवान्ने अपने प्रेमी भक्तको ‘ज्ञानी’ नामसे इसलिये कहा है कि ‘सब कुछ परमात्मा ही है’—यही वास्तविक और अन्तिम ज्ञान है, इससे आगे कुछ नहीं है। इसलिये ऐसा अनुभव करनेवाला प्रेमी भक्त ही वास्तविक ज्ञानी है (इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। कारण कि ऐसे भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, जबकि विवेकी पुरुषकी दृष्टिमें सत् और असत्—दो सत्ता रहती है। तात्पर्य है कि यहाँ ‘ज्ञानी’ शब्द जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानीके लिये नहीं आया है, प्रत्युत ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करनेवाले ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तके लिये आया है। गीतामें भगवान्ने मुख्य रूपसे भक्तको ही ‘ज्ञानी’ कहा है (इसी अध्यायका सोलहवाँ, सत्रहवाँ और अठारहवाँ श्लोक); क्योंकि वही अन्तिम और असली ज्ञानी है। उसका केवल भगवान्में ही प्रेम होता है, इसलिये वह श्रेष्ठ है— ‘एकभक्तिर्विशिष्यते’

भगवान्का अर्थाथी भक्त अनित्ययुक्त (निरन्तर भगवान्में न लगा हुआ) होता है। अर्थाथीकी अपेक्षा आर्त कम अनित्ययुक्त होता है। आर्तकी अपेक्षा भी जिज्ञासु कम अनित्ययुक्त होता है। परन्तु ज्ञानी सर्वथा नित्ययुक्त होता है।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ पदोंका तात्पर्य है कि ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव होनेपर फिर भक्त और भगवान्—दोनोंमें परस्पर प्रेम-ही-प्रेम शेष रहता है। इसीको शास्त्रोंमें प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम, अनन्तरस आदि नामोंसे कहा गया है।

सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना अत्यन्त प्यारा बताया, तो इससे यह असर पड़ता है कि भगवान्ने दूसरे भक्तोंका आदर नहीं किया। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें कहते हैं—

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्सैव मे मतम्।

आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥

एते= पहले कहे हुएभाववाले) हैं।आत्मा= स्वरूप
सर्वै, एव= सब-के-सबतु= परन्तुएव
(चारों) ही भक्तज्ञानी= ज्ञानी (प्रेमी) तोमतम्= (ऐसा मेरा)
उदाराः= बड़े उदार (श्रेष्ठ)मे= मेरा

५३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

हि= कारण किअनुत्तमाम्,(ऐसे)
सः= वहगतिम्= जिससे श्रेष्ठमाम्
युक्तात्मा= मुझसे अभिन्न हैदूसरी कोईएव
(और)गति नहीं है,आस्थितः= दृढ़ स्थित है।

व्याख्या—'उदाराः सर्व एवैते'— ये सब-के-सब भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ भाववाले हैं। भगवान्ने यहाँ जो 'उदाराः' शब्दका प्रयोग किया है, उसमें कई विचित्र भाव हैं; जैसे—

(१) चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि 'भक्त जिस प्रकार मेरे शरण होते हैं, उसी प्रकार मैं उनका भजन करता हूँ।' भक्त भगवान्को चाहते हैं और भगवान् भक्तको चाहते हैं। परन्तु इन दोनोंमें पहले भक्तने ही सम्बन्ध जोड़ा है और जो पहले सम्बन्ध जोड़ता है, वह उदार होता है। तात्पर्य यह है कि भगवान् सम्बन्ध जोड़ें या न जोड़ें, इसकी भक्त परवाह नहीं करता। वह तो अपनी तरफसे पहले सम्बन्ध जोड़ता है और अपनेको समर्पित करता है। इसलिये वह उदार है।

(२) देवताओंके भक्त सकामभावसे विधिपूर्वक यज्ञ, दान, तप आदि कर्म करते हैं तो देवताओंको उनकी कामनाके अनुसार वह चीज देनी ही पड़ती है; क्योंकि देवतालोग उनका हित-अहित नहीं देखते। परन्तु भगवान्का भक्त अगर भगवान्से कोई चीज माँगता है तो भगवान् अगर उचित समझें तो वह चीज दे देते हैं अर्थात् देनेसे उसकी भक्ति बढ़ती हो तो दे देते हैं और भक्ति न बढ़ती हो, संसारमें फँसावट होती हो तो नहीं देते। कारण कि भगवान् परम पिता हैं और परम हितैषी हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपनी कामनाकी पूर्ति हो अथवा न हो, तो भी वे भगवान्का ही भजन करते हैं, भगवान्के भजनको नहीं छोड़ते—यह उनकी उदारता ही है।

(३) संसारके भोग और रुपये-पैसे प्रत्यक्ष सुखदायी दीखते हैं और भगवान्के भजनमें प्रत्यक्ष जल्दी सुख नहीं दीखता, फिर भी संसारके प्रत्यक्ष सुखको छोड़कर अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करनेकी लालसाको छोड़कर भगवान्का भजन करते हैं, यह उनकी उदारता ही है।

(४) भगवान्के दरबारमें माँगनेवालोंको भी उदार कहा जाता है—'यहि दरबार दीनको आदर रीति सदा चलि आई।' (विनयपत्रिका १६५।५) अर्थात् कोई कुछ माँगता है, कोई धन चाहता है, कोई दुःख दूर करना चाहता है—ऐसे माँगनेवाले भक्तोंको भी भगवान् उदार कहते हैं,

यह भगवान्की विशेष उदारता ही है।

(५) भक्तोंका लौकिक-पारलौकिक कामनापूर्तिके लिये अन्यकी तरफ किंचिन्मात्र भी भाव नहीं जाता। वे केवल भगवान्से ही कामनापूर्ति चाहते हैं। भक्तोंका यह अनन्यभाव ही उनकी उदारता है।

'ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्'—यहाँ 'तु' पदसे ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी विलक्षणता बतायी है कि दूसरे भक्त तो उदार हैं ही, पर ज्ञानीको उदार क्या कहें, वह तो मेरा स्वरूप ही है। स्वरूपमें किसी निमित्तसे, किसी कारण-विशेषसे प्रियता नहीं होती, प्रत्युत अपना स्वरूप होनेसे स्वतःस्वाभाविक प्रियता होती है।

प्रेममें प्रेमी अपने-आपको प्रेमास्पदपर न्योछावर कर देता है अर्थात् प्रेमी अपनी सत्ता अलग नहीं मानता। ऐसे ही प्रेमास्पद भी स्वयं प्रेमीपर न्योछावर हो जाते हैं। उनको इस प्रेमाद्वैतकी विलक्षण अनुभूति होती है। ज्ञानमार्गका जो अद्वैतभाव है, वह नित्य-निरन्तर अखण्डरूपसे शान्त, सम रहता है। परन्तु प्रेमका जो अद्वैतभाव है, वह एक-दूसरेकी अभिन्नताका अनुभव कराता हुआ प्रतिक्षण वर्धमान रहता है। प्रेमका अद्वैतभाव एक होते हुए भी दो हैं और दो होते हुए भी एक है। इसलिये प्रेम-तत्त्व अनिवर्चनीय है। शरीरके साथ सर्वथा अभिन्नता (एकता) मानते हुए भी निरन्तर भिन्नता बनी रहती है और भिन्नताका अनुभव होनेपर भी भिन्नता बनी रहती है। इसी तरह प्रेमतत्त्वमें भिन्नता रहते हुए भी अभिन्नता बनी रहती है और अभिन्नताका अनुभव होनेपर भी अभिन्नता बनी रहती है।

जैसे, नदी समुद्रमें प्रविष्ट होती है तो प्रविष्ट होते ही नदी और समुद्रके जलकी एकता हो जाती है। एकता होनेपर भी दोनों तरफसे जलका एक प्रवाह चलता रहता है अर्थात् कभी नदीका समुद्रकी तरफ और कभी समुद्रका नदीकी तरफ एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। ऐसे ही प्रेमीका प्रेमास्पदकी तरफ और प्रेमास्पदका प्रेमीकी तरफ प्रेमका एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। उनका नित्ययोगमें वियोग और वियोगमें नित्ययोग—इस प्रकार प्रेमकी एक विलक्षण लीला अनन्तरूपसे अनन्तकालतक चलती रहती है। उसमें कौन प्रेमास्पद है और कौन प्रेमी

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३७

है—इसका खयाल नहीं रहता। वहाँ दोनों ही प्रेमास्पद हैं और दोनों ही प्रेमी हैं। यही ‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ पदोंका तात्पर्य है।

‘आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्’—क्योंकि जिससे उत्तम गति कोई हो ही नहीं सकती, ऐसे सर्वांपरि मेरेमें ही उसकी दृढ़ स्थिति है।

परिशिष्ट भाव —सांसारिक अर्थार्थी भगवान्को छोड़कर केवल अर्थको ही चाहता है; अतः वह झूठ, कपट, बेईमानी आदिका भक्त होता है। उसके भीतर धनका महत्त्व ज्यादा होनेसे वह उदार नहीं होता, प्रत्युत महान् कृपण होता है। अतः उसके लिये ‘उदार’ शब्द लागू ही नहीं होता। परन्तु जो अर्थार्थी भगवान्का भक्त होता है, उसके भीतर अर्थका महत्त्व न होकर भगवान्का महत्त्व होता है। इसलिये उसमें कृपणता नहीं होती, प्रत्युत उदारता होती है। अतः उसको भगवान्ने यहाँ उदार कहा है। यहाँ उदारभावका अर्थ है—त्याग। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भक्त संसार-(भोग और संग्रह-) को छोड़कर भगवान्में लग गये—यह उनका त्याग है। इसलिये वे सभी उदार हैं—‘उदाराः सर्व एवेते।’ एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध मुख्य होनेसे अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भी आगे चलकर स्वतः ‘ज्ञानी’ हो जाते हैं।

एक मार्मिक बात है कि भगवान्को न मानना कामनासे भी अधिक दोषी है। जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, उनमें यदि कामना रह जाय तो वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९।२१)। परन्तु जो केवल भगवान्का ही भजन करते हैं, उनमें यदि कामना रह भी जाय तो भगवान्की कृपा और भजनके प्रभावसे वे भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। कारण कि मनुष्यका किसी भी तरहसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ जाय तो वह भगवान्को ही प्राप्त होता है*; क्योंकि वह मूलमें भगवान्का ही अंश है।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु—इन तीनोंको ही भगवान्ने यहाँ ‘उदार’ कहा है। परन्तु जो भगवान्के सिवाय अन्यका भजन करनेवाले हैं, उनको भगवान्ने उदार न कहकर ‘अल्पमेधा’ कहा है (गीता—इसी अध्यायका तेईसवाँ श्लोक) और उनके भजनको अविधिपूर्वक किया गया बताया है (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। देवताओंको भगवान्से अलग समझनेके कारण अर्थात् देवताओंमें भगवदबुद्धि न होनेके कारण तथा कामना भी होनेके कारण उनकी उपासना अविधिपूर्वक है। तात्पर्य है कि सबमें भगवदबुद्धि न होना सकामभावसे भी अधिक घातक है; क्योंकि चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ!

तत्त्वज्ञानीकी ब्रह्मसे ‘तात्त्विक एकता’ अर्थात् सधर्मता होती है; परन्तु भक्तकी भगवान्के साथ ‘आत्मीय एकता’ होती है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’। तत्त्वज्ञानीकी तात्त्विक एकता-(सधर्मता-) में जीव और ब्रह्ममें अभेद हो जाता है अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, ऐसे वह भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाता है और एक तत्त्वके सिवाय कुछ नहीं रहता। परन्तु भक्तकी आत्मीय एकतामें जीव और भगवान्में अभिन्नता हो जाती है। अभिन्नतामें भक्त और भगवान् एक होते हुए भी प्रेमके लिये दो हो जाते हैं। उनमें दोनों ही प्रेमी और दोनों ही प्रेमास्पद होते हैं। इसलिये वे दो होते हुए भी एक ही रहते हैं।

जीव परमात्माका अंश है। अतः वह परमात्मासे जितना-जितना दूर जाता है, उतना-उतना अहंकार दृढ़ होता जाता है और वह ज्यों-ज्यों परमात्माकी तरफ आता है, त्यों-त्यों अहंकार मिटता जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहम्की गन्ध रह सकती है। परन्तु प्रेममें परमात्माके साथ अभिन्नता (आत्मीयता) होनेपर जीवका अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और अहंकार सर्वथा मिट जाता है, क्योंकि अहंकार अपरा प्रकृतिका ही कार्य है। इसलिये भगवान्ने कहा है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’।

  • कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः ॥

( श्रीमद्भगवद्गीता ७।१२१ )

‘एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप धोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे।’

५३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

अर्थाथी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः अपनी स्वतन्त्र सत्ता (अहंता) कम होती जाती है और ज्ञानीमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता बिलकुल नहीं रहती। इसलिये ‘त्वात्मैव ’ पदका तात्पर्य है कि प्रेमी भक्तकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रही, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहे अर्थात् प्रेमीके रूपमें साक्षात् भगवान् ही हैं—‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ’ (नारद० ४१)। यह आत्मीयता भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत है, जो ज्ञानयोगके अद्वैतसे भी सुन्दर है—‘भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ’ (बोधसार, भक्ति० ४२)।

भामेवानुत्तमां गतिम् ’—भगवान्से बढ़कर उत्तम गति और कोई नहीं है। ‘गति’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—ज्ञान, गमन और प्राप्ति। यहाँ ‘गति’ शब्द प्राप्तिके अर्थमें आया है। अन्तिम प्रापणीय तत्त्व होनेसे भगवान् सर्वोत्तम गति हैं।

आस्थितः ’—एक दृढ़ता अभ्याससे होती है और एक दृढ़ता स्वतः होती है। जैसे मात्र प्राणियोंकी ‘मैं हूँ’—इस प्रकार अपने-आपमें स्वतः दृढ़ स्थिति होती है, ऐसे ही ज्ञानी भक्तकी भगवान्में स्वतः दृढ़ स्थिति होती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहे हुए ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी वास्तविकता और उसके भजनका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्नां प्रपद्यते।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ ११ ॥

बहूनाम्= बहुतसर्वम्= सब कुछमाम्= मेरे
जन्मनाम्= जन्मोंकेवासुदेवः= परमात्माप्रपद्यते= शरण होता है,
अन्ते= अन्तिमही हैं—सः= वह
जन्ममें अर्थात्इति= इस प्रकारमहात्मा= महात्मा
मनुष्यजन्ममेंज्ञानवान्= (जो) ज्ञानवान्सुदुर्लभः= अत्यन्त दुर्लभ है।

व्याख्या —‘बहूनां जन्मनामन्ते ’—मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर देकर उसे जन्म-मरणके प्रवाहसे अलग होकर अपनी प्राप्तिका पूरा अधिकार दिया है। परन्तु यह मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके रागके कारण फिर पुराने प्रवाहमें अर्थात् जन्म-मरणके चक्करमें चला जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसार-वर्त्तनिं ’ (गीता १।३)। जहाँ भगवान् आसुरी योनियों और नरकोंके अधिकारियोंका वर्णन करते हैं, वहाँ दुर्गुण-दुराचारोंके कारण भगवत्प्राप्तिकी सम्भावना न दीखनेपर भी भगवान् कहते हैं—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यात्यधमां गतिम् ’ (गीता १६।२०) अर्थात् मेरेको प्राप्त किये बिना ही ये प्राणी अधम गतिको चले गये अर्थात् वे मरनेके बाद मनुष्ययोनियोंमें भी चले जाते तो कम-से-कम मनुष्य तो रह जाते; पर वे मेरी प्राप्तिका पूरा अधिकार प्राप्त करके भी अधम गतिको चले गये!

संतोंकी वाणीमें और शास्त्रोंमें आता है कि मनुष्यजन्म

केवल अपना कल्याण करनेके लिये मिला है, विषयोंका सुख भोगनेके लिये तथा स्वर्गकी प्राप्तिके लिये नहीं। इसलिये गीताने स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवालोंको मूढ़ और तुच्छ बुद्धिवाले कहा है—‘अविपश्चितः ’ (२।४२) और ‘अल्पमेधसाम् ’ (७।२३)।

यह मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म भी है और अन्तिम जन्म भी है। सम्पूर्ण जन्मोंका आरम्भ मनुष्यजन्मसे ही होता है अर्थात् मनुष्यजन्ममें किये हुए पाप चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें भोगनेपर भी समाप्त नहीं होते, बाकी ही रहते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म है। मनुष्यजन्ममें सम्पूर्ण पापोंका नाश करके, सम्पूर्ण वासनाओंका नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं, भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है।

भगवान्ने आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि ‘जो मनुष्य अन्त-समयमें जिस-जिस भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, उस-उस भावको ही वह प्राप्त

१-भक्तिका यह अद्वैत कल्पना नहीं है, प्रत्युत स्वीकृति है। कल्पित अद्वैत तो असत्य होता है, उसमें प्रेम नहीं होता।

२-एहि तन कर फल विषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ (मानस ७।४४।१)

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३९

होता है।' इस तरह मनुष्यको जिस किसी भावका स्मरण करनेमें जो स्वतन्त्रता दी गयी है, इससे मालूम होता है कि भगवान्ने मनुष्यको पूरा अधिकार दिया है अर्थात् मनुष्यके उद्धारके लिये भगवान्ने अपनी तरफसे यह अन्तिम जन्म दिया है। अब इसके आगे यह नये जन्मकी तैयारी कर ले अथवा अपना उद्धार कर ले—इसमें यह सर्वथा स्वतन्त्र है*। इस बातको लेकर गीता मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्तिका अधिकारी मानती है और ढंकेकी चोटके साथ, खुले शब्दोंमें कहती है कि वर्तमानका दुराचारी-से-दुराचारी, पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनिमें जन्मा हुआ पापयोन और चारों वर्णवाले स्त्री-पुरुष—ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकते हैं (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक)। गीताने (नवें अध्यायके बत्तीसवें श्लोकमें) ऐसा विचित्र 'पापयोन' शब्द कहा है, जिसमें शूद्रसे भी नीचे कहे और माने जानेवाले चाण्डाल, यवन आदि तथा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी लिये जा सकते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि पशु-पक्षी आदि मनुष्येतर प्राणियोंमें परमात्माकी तरफ चलनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु परमात्माके अंश होनेसे उनके लिये परमात्माकी तरफसे मना नहीं है। उनमेंसे बहुत-से प्राणी भगवान् और संत-महापुरुषोंकी कृपासे तथा तीर्थ और भगवद्भाक्के प्रभावसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। देवता भोगयोन हैं; वे भोगोंमें ही लगे रहते हैं, इसलिये उनको 'अपना उद्धार करना है' ऐसा विचार नहीं होता। परन्तु वे अगर किसी कारणसे भगवान्की तरफ लग जायें तो उनका भी उद्धार हो जाता है। इन्द्रको भी ज्ञान प्राप्त हुआ था—ऐसा शास्त्रोंमें आता है।

भगवान्की तरफसे मनुष्यमात्रका जन्म अन्तिम जन्म है। कारण कि भगवान्का यह संकल्प है कि मेरे दिये हुए इस शरीरसे यह अपना कल्याण कर ले। अतः यह अपना कोई संकल्प न रखकर केवल निमित्तमात्र बन जाय, तो भगवान्के संकल्पसे इसका कल्याण हो जाय। जैसे ग्यारहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे—'मया हार्तास्त्वं जहि'। तू चिन्ता मत कर—'मा व्यथिष्ठाः।' तू युद्ध कर, तेरी विजय होगी—'युध्यस्व जेतोसि।' इसी तरहसे भगवान्ने कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है। अगर

मनुष्य भगवान्से विमुख होकर संसारके रागमें न फँसे, तो भगवान्के उस संकल्पसे अनायास ही मुक्त हो जाय।

भगवान्का संकल्प ऐसा नहीं है कि साधककी इच्छाके बिना उसका कल्याण हो जाय अर्थात् जैसे शाग या वरदान दिया जाता है, वैसा यह संकल्प नहीं है। तो फिर कैसा है यह संकल्प? भगवान्ने मनुष्यको अपना कल्याण करनेकी स्वतन्त्रता इस मनुष्यजन्ममें दी है। अगर यह प्राणी उस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे अर्थात् भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चले, कम-से-कम अपने विवेकके विरुद्ध न चले तो उससे भगवान् और शास्त्रोंके अनुकूल चलना स्वाभाविक होगा। कारण कि भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चलनेपर दो अवस्थाओंमेंसे एक अवस्था स्वाभाविक होगी—या तो वह शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धिसे कुछ नहीं करेगा या केवल भगवान् और शास्त्रके अनुकूल ही करेगा।

कुछ नहीं करनेकी अवस्थामें अर्थात् कुछ करनेकी रुचि न रहनेकी अवस्थामें मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। कारण कि कुछ-न-कुछ करनेकी इच्छासे ही कर्तृत्वभिमान उत्पन्न होकर अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और अपने लिये करनेसे फलके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। कुछ भी न करनेसे न कर्तृत्व-भिमान होगा और न फलेच्छा होगी, प्रत्युत स्वरूपमें स्वतः स्थिति होगी।

शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेकी अवस्थामें करनेका प्रवाह मिट जाता है और क्रिया तथा पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे नयी कामना होगी नहीं और पुराना राग मिट जायगा तो स्वतः बोध हो जायगा—'तत्त्वव्यं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति' (गीता ४।३२)।

गीतामें आया है—निष्कामभावसे विधिपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मका पालन किया जाय तो अनादिकालसे बने हुए सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे तर जाता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् भक्तको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देते हैं (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)। जो भगवान्को अज-अनादि जानता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है (दसवें अध्यायका

  • नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ (मानस ७।१२१।५)

५४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

तीसरा श्लोक)। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योगोंसे पाप नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह निकला कि अन्तिम मनुष्यजन्म केवल कल्याणके लिये ही मिला है।

मनुष्यजन्ममें सत्संग मिल जाय, गीता—जैसे ग्रन्थसे परिचय हो जाय, भगवन्नामसे परिचय हो जाय तो साधकको यह समझना चाहिये कि भगवान्ने बहुत विशेषतासे कृपा कर दी है; अतः अब तो हमारा उद्धार होगा ही, अब आगे हमारा जन्म-मरण नहीं होगा। कारण कि अगर हमारा उद्धार नहीं होना होता, तो ऐसा मौका नहीं मिलता। परन्तु 'भगवान्की कृपासे उद्धार होगा ही'—इसके भरोसे साधन नहीं छोड़ना चाहिये, प्रत्युत तत्परता और उत्साहपूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। समय सार्थक बने, कोई समय खाली न जाय—ऐसी सावधानी हरदम रखनी चाहिये। परन्तु अपने कल्याणकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि अबतक जिसने इतना प्रबन्ध किया है, वही आगे भी करेगा। जैसे, किसीने भोजनके लिये निमन्त्रण दे दिया, आसन बिछा दिया, आसनपर बैठा दिया, पतल दे दी, लोटेमें जल भरकर पासमें रख दिया। अब कोई चिन्ता करे कि यह व्यक्ति भोजन देगा कि नहीं देगा, तो यह बिलकुल गलतीकी बात है। कारण कि अगर भोजन नहीं देना होता तो वह निमन्त्रण क्यों देता? भोजनकी तैयारी क्यों करता? परन्तु जब उसने निमन्त्रण दिया है, बुलाया है, तैयारी की है, तब उसको भोजन देना ही पड़ेगा। हम भोजनकी चिन्ता क्यों करें? अब तो बस,

ज्यों-ज्यों भोजनके पदार्थ आर्ये, त्यों-त्यों उनको पाते जायँ। ऐसे ही भगवान्ने हमको मनुष्यशरीर दिया है और उद्धारकी सब सामग्री (सत्संग, भगवन्नाम आदि) जुटा दी है, तो हमारा उद्धार होगा ही, अब तो हम संसार-समुद्रके किनारे आ गये हैं—ऐसा दृढ़ विश्वास करके निमित्तमात्र बनकर साधन करना चाहिये।

जिसके पूर्वजन्मोंके पुण्य होते हैं, वही भगवान्की तरफ चल सकता है—अगर ऐसा माना जाय तो पूर्वजन्मोंके पाप-पुण्योंका फल तो पशु-पक्षी-कीट-पतंग आदि योनि-वाले प्राणी भोगते ही हैं, फिर मनुष्यमें और उन प्राणियोंमें क्या फरक रहेगा? भगवान्का कृपा करके मनुष्यशरीर देना कहीं सार्थक होगा? तथा मनुष्यजन्मकी विलक्षणता, महिमा क्या होगी? मनुष्यजन्मकी महिमा तो इसीमें है कि मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर अपने कल्याणके मार्गमें लग जाय।१

'वासुदेवः सर्वम्'२—महासर्गके आदिमें एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें हो जाते हैं—'सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छान्दोग्य० ६।२।३) और अन्तमें अर्थात् महाप्रलयमें एक भगवान् ही शेष रह जाते हैं—'शिष्यते शेषसंज्ञः' (श्रीमद्भा० १०।३।२५)। इस प्रकार जब आदि और अन्तमें एक भगवान् ही रहते हैं, तब बीचमें दूसरा कहाँसे आया? क्योंकि संसारकी रचना करनेमें भगवान्के पास अपने सिवाय कोई सामग्री नहीं थी, वे तो स्वयं संसारके रूपसे प्रकट हुए हैं। इसलिये यह सब वासुदेव ही है।

जो चीज आदि और अन्तमें होती है, वही चीज मध्यमें

१-(१) लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमित्यमपीह धीरः।

तूर्णं यतेन न पतेदमुत्प्लुयावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० ११।१।२९)

'अनेक जन्मोंके बाद इस परमपुरुषार्थके साधनरूप मनुष्यशरीरको, जो अनित्य होनेपर भी अत्यन्त दुर्लभ है, पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शीघ्र-से-शीघ्र, मृत्यु आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर ले। विषयभोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें इस अमूल्य जीवनको नहीं खोना चाहिये।'

(२) नुदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।

मयानुकूलंन नभस्वतेतिरितं पुमान् भवाभिर्व न तेरतु स आत्महा॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।१७)

'यह मनुष्यशरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसारसागरसे पार होनेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है, जिसे गुरुरूप नाविक चलाता है और मैं (भगवान्) वायुरूप होकर इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ानेमें सहायता देता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो मनुष्य इस संसारसागरसे पार नहीं होता, वह अपनी आत्माका हनन करनेवाला अर्थात् पतन करनेवाला है।'

२-यहाँ 'वासुदेवः' शब्द पुँल्लिंगमें और 'सर्वम्' शब्द नपुंसकलिंगमें आया है। यहाँ 'वासुदेवः सर्वः' भी कह सकते थे; परन्तु ऐसा न कहकर 'वासुदेवः सर्वम्' कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि 'सर्वम्' शब्दमें स्त्री, पुरुष, नपुंसक, स्थावर-जंगम आदि सबका समाहार हो जाता है।

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

५४१

भी होती है। जैसे, सोनेके गहने आदिमें सोना थे और अन्तमें सोना रहेंगे, तो गहनोंमें दूसरी चीज कहाँसे आयेगी? केवल सोना-ही-सोना है। मिट्टीसे बननेवाले बर्तन पहले मिट्टी थे और अन्तमें मिट्टी हो जायेंगे, तो बीचमें मिट्टीके सिवाय क्या है? केवल मिट्टी-ही-मिट्टी है। खाँड़से बने हुए खिलौने पहले खाँड़ थे और अन्तमें खाँड़ ही हो जायेंगे, तो बीचमें खाँड़के सिवाय क्या है? केवल खाँड़-ही-खाँड़ है। इसी तरह सुष्टिके पहले भगवान् थे और अन्तमें भगवान् ही रहेंगे; तो बीचमें भगवान्के सिवाय क्या है? केवल भगवान्-ही-भगवान् हैं। जैसे सोनेको चाहे गहनोंके रूपमें देखें, चाहे पासेके रूपमें देखें, चाहे वरकके रूपमें देखें, है वह सोना ही। ऐसे ही संसारमें अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें एक भगवान् ही हैं।

जबतक मनुष्यकी दृष्टि गहनोंकी तरफ, उसकी आकृतियोंकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक 'यह सोना ही है' इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही जबतक मनुष्यकी दृष्टि संसारकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक 'सब कुछ भगवान् ही हैं' इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। परन्तु जब गहनोंकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब गहनोंमें सोनेकी भावना नहीं होती, प्रत्युत 'यह सोना ही है' ऐसी भावना होती है। ऐसे ही जब संसारकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब संसारमें भगवान्की भावना नहीं होती, प्रत्युत 'सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं' ऐसी भावना होती है। कारण कि संसारमें भगवान्की भावना करनेसे संसारकी सत्ता साथमें रहती है अर्थात् संसारकी भावना रखते हुए उसकी सत्ता मानते हुए, उसमें भगवान्की भावना करते हैं। अतः जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, संसारको महत्त्व देते हैं, तबतक संसारमें भगवान्की भावना करते रहनेपर भी 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव नहीं होता। ब्रह्मभूत मनुष्य निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है (पाँचवें

अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत योगीको उत्तम सुख मिलता है (छठे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत भगवान्की पराभक्तिको प्राप्त होता है और उस भक्तिसे तत्त्वको जानकर उसमें प्रवेश करता है (अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ-पचपनवाँ श्लोक)— गीताकी दृष्टिसे ये तीनों ही अवस्थाएँ हैं। अवस्थाओंमें परिवर्तन होता है। परन्तु 'वासुदेवः सर्वम्'—यह अवस्था नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्व है। इसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

यह जो कुछ संसार दीखता है, सब भगवान्का ही स्वरूप है। भगवान्के सिवाय इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता थी नहीं, है नहीं और कभी होगी भी नहीं। अतः देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, वह सब-का-सब भगवत्स्वरूप ही है। भगवान्की आज्ञा है—

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्णातेऽन्यैरपीन्द्रियैः।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वर्मजसा॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ११।१३।२४)

'मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक समझ लीजिये।'

इस आज्ञाके अनुसार ही उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमीका जीवन हो जाता है। वह सब जगह भगवान्को ही देखता है—'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति' (गीता ६।३०)। वह सब कुछ करता हुआ भी भगवान्में ही रहता है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१)।

किसीको एक जगह भी अपनी प्रिय वस्तु मिल जाती है, तो उसको बड़ी प्रसन्नता होती है, फिर जिसको सब जगह ही अपने प्यारे इष्टदेवका अनुभव होता है,* उसकी प्रसन्नताका, आनन्दका क्या ठिकाना? उस आनन्दमें विभोर होकर भगवान्का प्रेमी भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है,

  • जित देखों तित स्याममई है।

स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घन घटा छड़ है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है॥ हैं बीरी, कै लोगन ही की, स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद सार काम बिजई है॥ नीलकंठको कंठ स्याम है, मनहुँ स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीप सिखापर स्यामतई है॥ नर देबनकी कोन कथा है, अलख ब्रह्मछवि स्याममई है॥