श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
५४२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
कभी नाचता है और कभी चुप होकर शान्त हो जाता है।* इस तरह उसका जीवन अलौकिक आनन्दसे परिपूर्ण हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। वह सर्वथा पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसके लिये किसी भी अवस्थामें, किसी भी परिस्थितिमें कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता।
जो भक्तिमार्गपर चलता है, वह 'यह सत् है और यह असत् है' इस विवेकको लेकर नहीं चलता। उसमें विवेक-ज्ञानकी प्रधानता नहीं रहती। उसमें केवल भगवद्भावकी ही प्रधानता रहती है। केवल भगवद्भावकी प्रधानता रहनेके कारण उसके लिये यह सब संसार चिन्मय हो जाता है। उसकी दृष्टिमें जडता रहती ही नहीं। भगवान्में तल्लीनता होनेसे भक्तका शरीर भी जड नहीं रहता, प्रत्युत चिन्मय हो जाता है, जैसे—मीराबाईका शरीर (चिन्मय होनेसे) भगवान्के विग्रहमें लीन हो गया था।
ज्ञानमार्गमें जहाँ सत्-असत्का विवेक होता है, वहाँ परिणाममें सत्-असत् दोकी सत्ता नहीं रहती, केवल सत्-स्वरूप ही रह जाता है। परन्तु भक्तिमार्गमें सत्-असत् सब कुछ भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। फिर भक्त भगवत्स्वरूप संसारकी सेवा करता है। सेवामें पहले तो सेवक, सेवा और सेव्य—ये तीन होते हैं। परन्तु जब भगवद्भावकी अत्यधिक गद्गदा हो जाती है, तब सेवक-भावकी विस्मृति हो जाती है। फिर भक्त स्वयं सेवारूप होकर सेव्यमें लीन हो जाता है। केवल एक भगवत्सत् ही शेष रह जाता है। इस तरह भगवद्भावमें तल्लीन हुए भगवान्के प्रेमी भक्त जहाँ-कहीं भी विचरते हैं, वहाँ उनके दर्शन, स्पर्श, भाषण आदिका प्राणियोंपर बड़ा असर पड़ता है।
जबतक मनुष्योंकी पदार्थोंमें भोगबुद्धि रहती है, तबतक उनको उन पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप समझमें नहीं आता। परन्तु जब भोगबुद्धि सर्वथा हट जाती है, तब केवल भगवत्स्वरूप ही देखनेमें आ जाता है।
मार्मिक बात
'वासुदेवः सर्वम्'—इस तत्त्वको समझनेके दो प्रकार हैं—(१) संसारका अभाव करके परमात्माको रखना
अर्थात् संसार नहीं है और परमात्मा है, (२) सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं। इसमें जो परिवर्तन दीखता है, वह भी भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि भगवान्के सिवाय उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।
उपर्युक्त दोनों ही प्रकार साधकोंके लिये हैं। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें आकर्षण (राग) है, उसको 'यह सब कुछ नहीं है, केवल परमात्मा ही है'—इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें किंचिन्मात्र भी आकर्षण नहीं है और जो केवल भगवान्के स्मरण, चिन्तन, जप, कीर्तन आदिमें लगा रहता है, उसको 'संसाररूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। वास्तवमें देखा जाय तो ये दोनों प्रणालियाँ तत्त्वसे एक ही हैं। इन दोनोंमें फरक इतना ही है कि जैसे सोनेमें गहने और गहनोंके नाम, रूप, आकृति आदि अलग-अलग होते हुए भी सब कुछ सोना-ही-सोना जानना। जहाँपर संसारका अभाव करके परमात्माको तत्त्वसे जानना है, वहाँ 'विवेक' की प्रधानता है; और जहाँ संसारको भगवत्स्वरूप मानना है, वहाँ 'भाव' की प्रधानता है। निर्गुणके उपासकोंमें विवेककी प्रधानता होती है और सगुणके उपासकोंमें भावकी प्रधानता होती है।
संसारका अभाव करके परमात्मतत्त्वको जानना भी तत्त्वसे जानना है और संसारको भगवत्स्वरूप मानना भी तत्त्वसे जानना है। कारण कि वास्तवमें तत्त्व एक ही है। फरक इतना ही है कि ज्ञानमार्गमें जाननेकी प्रधानता रहती है और भक्तिमार्गमें माननेकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानमार्गमें माननेको भी जाननेके अर्थमें लिया है—'इति मत्वा न सज्जते' (गीता ३।२८), और भक्तिमार्गमें जाननेको भी माननेके अर्थमें लिया है (पाँचवें अध्यायका उनीसवाँ, नवें अध्यायका तेरहवाँ, दसवें अध्यायका तीसरा, सातवाँ, चौबीसवाँ, सत्ताईसवाँ और इकतालीसवाँ श्लोक)। इसमें एक खास बात समझनेकी है कि परमात्माको जानना और मानना—दोनों ही ज्ञान हैं तथा संसारको सत्ता देकर संसारको जानना और मानना—दोनों ही अज्ञान हैं।
- वाग् गदगदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्षणं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उदगायति नृत्यते च मद्भक्तिमुक्तो भुवनं पुनाति॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२४)
'जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करती-करती गदगद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण, प्रभाव और लीलाओंको याद करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बारंबार रोता रहता है, कभी-कभी हँसने लग जाता है, कभी लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है, कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।'
संसारको तत्त्वसे जाननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका
अभाव हो जाता है, और परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर
परमात्माका अनुभव हो जाता है। ऐसे ही संसार भगवत्स्वरूप
है-ऐसा दृढ़तासे माननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव
हो जाता है और फिर संसार संसार-रूपसे न दीखकर
भगवत्स्वरूप दीखने लग जाता है। तात्पर्य है कि
परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेपर जानना और मानना-दोनों
एक हो जाते हैं।
'इति ज्ञानवान्मा प्रपद्यते'-जो प्रतिक्षण बदलने-
वाले संसारकी सत्ताको मानते हैं, वे अज्ञानी हैं, मूढ़ हैं;
परन्तु जिनकी दृष्टि कभी न बदलनेवाले भगवत्तत्त्वकी
तरफ रहती है, वे ज्ञानवान् हैं, असम्मूढ़ हैं।
'ज्ञानवान्' कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्वसे समझता
है कि सब जगह, सबमें और सबके रूपमें वस्तुतः एक
भगवान् ही हैं। ऐसे ज्ञानवान्को ही आगे पन्द्रहवें अध्यायके
उन्नीसवें श्लोकमें 'सर्ववित्' कहा गया है।
ज्ञानवान्की शरणागति अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु
भक्तोंकी तरह नहीं है। भगवान्ने ज्ञानीको अपनी आत्मा
बताया है-'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' (गीता ७।१८)।
जब ज्ञानी भगवान्की आत्मा हुआ तो ज्ञानीकी आत्मा
भगवान् हुए। अतः एक भगवत्तत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ता
ही नहीं रही। इसलिये ज्ञानीकी शरणागति उन तीनों भक्तोंसे
विलक्षण होती है। उसके अनुभवमें एक भगवत्तत्त्वके
सिवाय कोई दूसरी सत्ता होती ही नहीं-यही उसकी
शरणागति है।
भगवान्की दृष्टिमें अपने सिवाय कोई अन्य तत्त्व है
ही नहीं-'मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव' (गीता
७।७)। जैसे सूतकी मालामें मणियोंकी जगह सूतकी गाँठ
लगा दी, तो मालामें सूतके सिवाय अन्य क्या रहा? केवल
सूत ही रहा। हाँ, दीखनेमें गाँठें अलग दीखती हैं और धागा
अलग दीखता है; परन्तु तत्त्वसे एक ही चीज (सूत) है।
ऐसे ही परमात्मा संसारमें व्यापक दीखते हैं; परन्तु तत्त्वसे
परमात्मा और संसार एक ही है। उनमें व्याप्य-व्यापकका
भाव नहीं है। अतः सब कुछ एक वासुदेव ही है-ऐसा
जिसको अनुभव होता है, वह भी भगवत्स्वरूप ही हुआ।
भगवत्स्वरूप हो जाना ही उसकी शरणागति है।
'स महात्मा सुदुर्लभः'-बहुत-से मनुष्य तो 'हमें
परमात्माकी प्राप्ति करनी है' इस तरफ दृष्टि ही नहीं डालते
और ऐसा चाहते ही नहीं। जो इस तरफ दृष्टि डालते हैं,
वे भी उत्कण्ठापूर्वक अनन्यभावसे अपने जीवनको सफल
करनेमें नहीं लगते। जो अपना कल्याण करनेमें लगते हैं,
वे भी मूर्खताके कारण परमात्मप्राप्तिसे निराश होकर अपने
असली अवसरको खो देते हैं, जिससे वे परम लाभसे
वंचित रह जाते हैं।
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि
मनुष्योंमें हजारों और हजारोंमें कोई एक मनुष्य वास्तविक
सिद्धिके लिये यत्न करता है। यत्न करनेवाले उन सिद्धोंमें
भी कोई एक मनुष्य 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसा तत्त्वसे
जानता है। ऐसा तत्त्वसे जाननेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ
है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परमात्मा दुर्लभ हैं, प्रत्युत
सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिसे लिये लगनेवाले दुर्लभ हैं।
सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिसे लिये लगनेपर मनुष्यमात्रको
परमात्मप्राप्ति हो सकती है; क्योंकि उसकी प्राप्तिके लिये
ही मनुष्य-शरीर मिला है।
संसारमें सब-के-सब मनुष्य धनी नहीं हो सकते।
सांसारिक भोग-सामग्री सबको समान रीतिसे नहीं मिल
सकती। परन्तु जो परमात्मतत्त्व भगवान् शंकरको प्राप्त है,
सनकादिकोंको प्राप्त है, नारद, वसिष्ठ आदि देवर्षि-
महर्षियोंको प्राप्त है, वही तत्त्व सब मनुष्योंको समानरूपसे
अवश्य प्राप्त हो सकता है। इसलिये मनुष्यको ऐसा दुर्लभ
अवसर कभी नहीं खोना चाहिये।
भगवान्की यह एक अलौकिक विलक्षणता है कि वे
भूखेके लिये अन्नरूपसे, प्यासेके लिये जलरूपसे और
विषयीके लिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-रूपसे
बनकर आते हैं। वे ही मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ बनकर आते हैं।
वे ही संकल्प-विकल्प बनकर आते हैं। वे ही व्यक्ति
बनकर आते हैं। परन्तु साथ-ही-साथ दुःख-रूपसे आकर
मनुष्यको चेताते हैं कि अगर तुम इन वस्तुओंको भोग्य
मानकर इनके भोक्ता बनोगे, तो इसके फलस्वरूप तुमको
दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको शर्म
आनी चाहिये कि मैं भगवान्को भोग-सामग्री बनाता हूँ,
मेरे सुखके लिये भगवान्को सुखकी सामग्री बनना पड़ता
है! भगवान् कितने विचित्र दयालु हैं कि यह प्राणी जो
चाहता है, भगवान् वैसे ही बन जाते हैं!
देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ आ रहा है, और
जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, वह सब भगवान्
ही हैं और भगवान्का ही है-ऐसा मान ले, वास्तविकतासे
अनुभव कर ले तो मनुष्य विलक्षण हो जाता है, 'स
५४४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
महात्मा सुदुर्लभः ’ हो जाता है।
एक वैरागी बाबाजी थे। वे गणेशजीका पूजन किया करते थे। उनके पास सोनेकी बनी हुई एक गणेशजीकी और एक चूहेकी मूर्ति थी। वे दोनों मूर्तियों तौलमें बराबर थीं। एक बार बाबाजीने तीर्थमें जानेका विचार किया और वे उन मूर्तियोंकी बिक्री करनेके लिये सुनारके पास गये। सुनारने उन दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके बराबर दाम बता दिये तो बाबाजी सुनारपर बिगड़ गये कि तू क्या कह रहा है? गणेशजी तो देवता हैं और चूहा उनका वाहन है, पर तू दोनोंका बराबर मूल्य बता रहा है! यह कैसे हो सकता है? सुनार बोला कि बाबाजी! मैं गणेश और चूहेको नहीं खरीदता हूँ, मैं तो सोना खरीदता हूँ, सोनेका जितना वजन होगा, उसके अनुसार ही उसका मूल्य होगा। अगर सुनार गणेश और चूहेको देखेगा तो उसको सोना नहीं दीखेगा और अगर सोनेको देखेगा तो उसको गणेश और चूहा नहीं दीखेगा। इसलिये सुनार न गणेशको देखता है, न चूहेको, वह तो केवल सोनेको ही देखता है। ऐसे ही भगवान्के साथ अभिन्न हुआ महात्मा संसारको नहीं देखता, वह तो केवल भगवान्को ही देखता है।
कोई एक सन्त रास्तेमें चलते-चलते किसी खेतमें लघुशंका करनेको बैठे। उस खेतके मालिकने उनको देखा तो ‘मतीरा (तरबूजा) चुरानेवाला यही आदमी है’—ऐसा समझकर पीछेसे आकर उनके सिरपर लाठी मार दी। फिर देखा कि ये तो कोई बाबाजी हैं; अतः हाथ जोड़कर बोला—‘महाराज! मैंने आपको जाना नहीं और चोर समझकर लाठी मार दी; इसलिये महाराज! मुझे माफ करो।’ सन्तने कहा—‘माफ क्या करना? तूने मेरेको तो मारा नहीं, तूने तो चोरको मारा है।’ उसने कहा—‘अब क्या करूँ महाराज?’ सन्तने कहा—‘तरी जैसी मरजी हो, वैसे कर।’ उसने सन्तको बैलगाड़ीमें ले जाकर अस्पतालमें भरती कर दिया। वहाँ मलहम-पट्टी करनेके बाद कोई आदमी दूध लेकर आया और बोला—‘महाराज! दूध पी लो।’ सन्तने कहा—‘तू बड़ा चालाक-होशियार है। तेरे विचित्र-विचित्र रूप हैं। तू विचित्र-विचित्र लीलाएँ करता है। पहले तो तूने लाठीसे मारा और अब कहता है दूध पी लो!’ वह आदमी डर गया और कहने लगा—‘बाबाजी! मैंने नहीं मारा है।’ सन्त बोले—‘बिलकुल झूठी बात है। मैं पहचानता हूँ, तू ही था। तूने ही मारा है। तेरे सिवाय और कौन आये, कहाँसे आये? और कैसे आये? पहले तो मारा लाठीसे और अब आया दूध पिलाने! मैं
दूध पी लूँगा, पर था तू ही।’ इस तरह बाबाजी तो अपनी ‘वासुदेवः सर्वम्’—वाली भाषामें बोल रहे थे और वह सोच रहा था कि बाबाजी कहीं फँसा न दें! तात्पर्य यह है कि सन्त केवल भगवान्को ही देखते हैं कि लाठी मारनेवाला, मरहम-पट्टी करनेवाला, दूध पिलानेवाला—सब वह ही है।
महात्माओंकी महिमा
जहाँ सन्त-महात्माओंका वर्णन आता है, वहाँ कहा गया है—
(१) जो ऊँचे दर्जेके तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, वे अभिन्नभाव और अखण्डरूपसे केवल अपने स्वरूपमें अथवा भगवत्त्वमें स्थित रहते हैं। उनके जीवनसे, उनके दर्शनसे, उनके चिन्तनसे, उनके शरीरका स्पर्श की हुई वायुके स्पर्शसे जीवोंका कल्याण होता रहता है।
(२) जो मनुष्य उन महापुरुषोंकी महिमाको नहीं जानते, उनके सामने वे महापुरुष अपने भावोंसे नीचे उतरते हैं तो कुछ कह देते हैं; जैसे—सन्त-महात्माओंने ऐसा किया है, उनके किये हुए आचरणों और कहे हुए वचनोंके अनुसार ही शास्त्र बनते हैं, आदि।
(३) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो कह देते हैं कि सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये।
(४) जिनसे उपर्युक्त बातका पालन नहीं होता, उन साधकोंके सामने वे स्वयं ऐसा विधान कर देते हैं कि ऐसा करना चाहिये, ऐसा नहीं करना चाहिये।
(५) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो ‘ऐसा करो और ऐसा मत करो’—ऐसी आज्ञा दे देते हैं।
[सन्तोंकी आज्ञामें जो सिद्धान्त भरा हुआ है, वह आज्ञापालकमें उतर आता है। उनकी आज्ञापालनके बिना भी उनके सिद्धान्तका पालन करनेवालोंका कल्याण हो जाता है; परन्तु वे महात्मा आज्ञाके रूपमें जिसको जो कुछ कह देते हैं, उसमें एक विलक्षण शक्ति आ जाती है। आज्ञापालन करनेवालेको कोई परिश्रम नहीं पड़ता और उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक वैसे आचरण होने लगते हैं।]
(६) जो उनकी आज्ञाका पालन नहीं करते, ऐसे नीचे दर्जेके साधकोंको वे कहीं-कहीं, कभी-कभी शाप या वरदान दे देते हैं।
इस परम्परामें देखा जाय तो (१) जो कुछ नहीं करते, निरन्तर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं—यह उन सन्त-महापुरुषोंका ऊँचा दर्जा हो गया, (२) शास्त्रोंने ऐसा कहा,
श्लोक ११]
- साधक-संजीवनी *
५४५
सन्त-महात्माओंने ऐसा किया—इस तरह संकेत करनेसे उन सन्तोंका दूसरा दर्जा हो गया, (३) सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—ऐसा कहनेसे सन्तोंका तीसरा दर्जा हो गया, (४) ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—इस तरहका विधान करनेसे उन सन्तोंका चौथा दर्जा हो गया, (५) तुम ऐसा करो और ऐसा मत करो—ऐसा कहना उन सन्तोंके पाँचवें दर्जेकी बात हो गयी, (६) शाप और वरदान देना उन सन्तोंके छठे दर्जेकी बात हो गयी। इन सब दर्जोंमें सन्त-महापुरुषोंका जो नीचे उतरना है, उसमें उनकी क्रमशः अधिकाधिक दयालुता है। वे शाप और वरदान दे दें, ताड़ना कर दें, इसमें उन सन्तोंका दर्जा तो नीचे हुआ, पर इसमें उनका अत्यधिक त्याग है। कारण कि उन्होंने जीवोंके
उद्धारके लिये ही नीचा दर्जा स्वीकार कर लिया है। इसमें उनका लेशामात्र भी अपना स्वार्थ नहीं है।
ऐसे ही भगवान् भी अपने स्वरूपमें नित्य-निरन्तर स्थित रहते हैं, यह उनके ऊँचे दर्जेकी बात है; परन्तु वे ही भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण, कृपाके परवश होकर जीवोंका उद्धार करनेके लिये अवतार लेकर आदर्श लीला करते हैं। उनकी लीलाओंको देखने-सुननेसे लोगोंका उद्धार होता है। भगवान् और भी नीचे उतरते हैं तो उपदेश देते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो आज्ञा दे देते हैं। और भी नीचे उतरते हैं तो शासन करके लोगोंको सही रास्तेपर लाते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो शाप और वरदान दे देते हैं अथवा उसके और संसारके हितके लिये उसका शरीरसे वियोग भी करा देते हैं।
परिशिष्ट भाव —सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चार प्रकारके भक्तोंद्वारा अपना भजन करनेकी बात कही थी—‘चतुर्विधा भजन्ते माम् ’। उनमें ज्ञानीके भजनका क्या स्वरूप है—इसको इस श्लोकमें बताते हैं कि ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा अनुभव करना ही ज्ञानीका भजन है, शरणागति है। असली शरणागति वही है, जिसमें शरणागतकी सत्ता ही न रहे, प्रत्युत शरण्य ही रह जाय।
सब कुछ भगवान् ही हैं—यह वास्तविक ज्ञान है। ऐसे वास्तविक ज्ञानवाला महात्मा भक्त भगवान्के शरण हो जाता है अर्थात् अपना अस्तित्व (मैंपन) मिटाकर भगवान्में लीन हो जाता है। फिर मैंपन नहीं रहता अर्थात् प्रेमवाला नहीं रहता, प्रत्युत केवल प्रेमस्वरूप भगवान् रह जाते हैं, जिनमें मैं-तू-यह-वह चारों ही नहीं हैं। यही शरणागतिका वास्तविक स्वरूप है।
‘महात्मा’ शब्दका अर्थ है—महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा१। जिसमें अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयता है, वह ‘अल्पात्मा’ है।
यहाँ ‘वासुदेवः’ पद पुँल्लिंगमें आया है; अतः यहाँ ‘वासुदेवः सर्वः’ पद आने चाहिये थे। परन्तु यहाँ ‘सर्वः’ पद न देकर ‘सर्वम्’ पद दिया गया है, जो नपुंसकलिंगमें है। अगर तीनों लिंगों—(सर्वः, सर्वा और सर्वम्)—का एकशेष किया जाय तो नपुंसकलिंग (सर्वम्) ही एकशेष रहता है। नपुंसकलिंगके अन्तर्गत तीनों लिंग आ जाते हैं। अतः ‘सर्वम्’ पदमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक—सबका समाहार हो जाता है। गीतामें जगत्, जीव और परमात्मा—इन तीनोंके लिये पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग—इन तीनों ही लिंगोंका प्रयोग हुआ है२। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि जगत्, जीव और परमात्मा—ये तीनों ही ‘सर्वम्’ शब्दके अन्तर्गत हैं। अतः तीनों लिंगोंसे कही जानेवाली सब-की-सब वस्तुएँ, व्यक्ति, परिस्थितियाँ आदि परमात्मा ही हैं।
‘वासुदेवः सर्वम्’—इसमें ‘सर्वम्’ तो असत् है और ‘वासुदेवः’ सत् है। असत्का भाव विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। तात्पर्य है कि
१-गीतामें भगवान्ने ‘महात्मा’ शब्दका प्रयोग केवल भक्तके लिये ही किया है। जो भक्तिमार्गपर चलते हैं, उन साधकोंको भी महात्मा कहा है—‘महात्मानस्तु मां पार्थ देवीं प्रकृतिमाश्रिताः’ (१।१३), जो भगवान्से अभिन्न हो गये हैं, उनको भी महात्मा कहा है—‘वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः’ (७।१९), और जो परमसिद्धि (परमप्रेम)-को प्राप्त हो चुके हैं, उनको भी महात्मा कहा है—‘नाणुर्वन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः’ (८।१५)। इसी तरह गीतामें भगवान्ने ‘सुकृतिनः’ (७।१६), ‘उदाराः’ (७।१८), ‘सुदुर्लभः’ (७।१९), ‘युक्ततमः’ (६।४७; १२।२), ‘अद्भुष्टा’, ‘मैत्रः’, ‘कृष्णः’ (१२।१३), ‘अतीव मे प्रियाः’ (१२।२०) आदि पदोंका प्रयोग भी केवल भक्तके लिये ही किया है।
२-द्रष्टव्य—‘गीता-दर्पण’ ग्रन्थमें लेख-संख्या १९—‘गीतामें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिको अलिंगता’।
५४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
सत्-ही-सत् है, असत् है ही नहीं। वासुदेव-ही-वासुदेव है, 'सर्वम्' है ही नहीं। परन्तु कहने, सुनने, पढ़नेवाले साधकोंकी दृष्टिमें 'सर्वम्' (संसार) रहता है, इसलिये भगवान् 'सर्वम्' की धारणा मिटानेके लिये 'वासुदेवः सर्वम्' कहते हैं।
कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, लययोगी, हठयोगी, राजयोगी, मन्त्रयोगी, अनासक्तयोगी आदि अनेक तरहके योगी हैं, जिनका शास्त्रोंमें वर्णन हुआ है, पर उनको भगवान् अत्यन्त दुर्लभ नहीं बताते हैं, प्रत्युत 'सब कुछ वासुदेव ही है'—इसका अनुभव करनेवाले महात्माको ही अत्यन्त दुर्लभ बताते हैं।
भगवान् सम्पूर्ण संसारके बीज हैं—'यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन' (गीता १०।३९), 'बीजं मां सर्वभूतानां विद्वि पार्थ सनातनम्' (गीता ७।१०)। बीजसे जितनी चीजें पैदा होती हैं, वे सब बीजरूप ही होती हैं। जैसे, गेहूँसे पैदा होनेवाली खेतीको भी गेहूँ ही कहते हैं। किसानलोग कहते हैं कि गेहूँकी खेती बहुत अच्छी हुई है! देखो, खेतमें गेहूँ खड़े हैं, गेहूँसे खेत भरा है! परन्तु कोई शहरमें रहनेवाला व्यापारी हो, वह उसको गेहूँ कैसे मान लेगा? वह कहेगा कि मैंने बोर-के-बोर गेहूँ खरीदा और बेचा है, क्या मैं नहीं जानता कि गेहूँ कैसा होता है? यह तो घास है, डंठल और पत्ती है, यह गेहूँ नहीं है। परन्तु खेती करनेवाला जानकार आदमी तो यही कहेगा कि यह वह घास नहीं है, जो पशु खाया करते हैं; यह तो गेहूँ है। खेतीको गाय खा जाती है तो कहते हैं कि तुम्हारी गाय हमारा गेहूँ खा गयी, जबकि उसने गेहूँका एक दाना भी नहीं खाया। खेतमें भले ही गेहूँका एक दाना भी न दीखे, पर यह गेहूँ है—इसमें सन्देह नहीं होता। कारण कि यह पहले भी गेहूँ ही था, अन्तमें भी गेहूँ रहेगा; अतः बीचमें खेतीरूपसे अलग दीखते हुए भी गेहूँ ही है। अभी तो यह हरी-हरी घास दीखती है, पर बादमें पकनेपर इससे गेहूँ ही निकलेगा। इसी तरह संसारके पहले भी परमात्मा थे—'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छान्दोग्य० ६।२।१), अन्तमें भी परमात्मा ही रहेंगे—'शिष्यते शेषसंज्ञः' (श्रीमद्भग० १०।३।२५)। अतः बीचमें भी सब कुछ परमात्मा ही हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।
जबतक साधकमें अहम् है, तबतक वह भोगी है। मैं योगी हूँ—यह योगका भोग है, मैं ज्ञानी हूँ—यह ज्ञानका भोग है, मैं प्रेमी हूँ—यह प्रेमका भोग है। जबतक साधकमें भोग रहता है, तबतक उसके पतनकी सम्भावना रहती है। जो योगका भोगी है, वह कभी विषयोंका भोगी भी हो सकता है; जो ज्ञानका भोगी है, वह कभी अज्ञानका भोगी भी हो सकता है और जो प्रेमका भोगी है, वह कभी रागका भोगी भी हो सकता है। कारण कि उसमें पहलेसे भोगकी प्रवृत्ति, आदत रही है। जब भोगी नहीं रहता, तब केवल योग रहता है। योग रहनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। परन्तु मुक्त होनेपर भी महापुरुषने जिस साधनसे मुक्ति प्राप्त की है, उस साधनका एक संस्कार (अहम्की सूक्ष्म गन्ध) रह जाता है, जो दूसरे दार्शनिकोंके साथ एकता नहीं होने देता। इस संस्कारके कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें मतभेद रहता है। अपने मतका संस्कार दूसरे दार्शनिकोंके मतोंका समान आदर नहीं करने देता। परन्तु प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति होनेपर अपने मतका संस्कार भी नहीं रहता और सबके साथ एकता हो जाती है अर्थात् सम्पूर्ण मतभेद मिट जाते हैं और 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव हो जाता है। वास्तवमें 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव करनेवाला, इसको जाननेवाला, कहनेवाला भी नहीं रहता, प्रत्युत एक वासुदेव ही रहता है, जो अनादिकालसे ज्यों-का-त्यों है। सबमें परमात्माको देखनेसे सम्पूर्ण मतोंमें समान आदरभाव हो जाता है; क्योंकि अपने इष्ट परमात्मासे विरोध सम्भव ही नहीं है—'निज प्रभुमय देखहि जगत केहि सन करहि विरोध' (मानस, उत्तर० ११२ ख)।
ईश्वर और जीवके विषयमें दो तरहका वर्णन है—(१) ईश्वर समुद्र है और जीव उसकी तरंग है अर्थात् तरंग समुद्रकी है और (२) जीव (स्वरूप) समुद्र है और ईश्वर उसकी तरंग है अर्थात् समुद्र तरंगका है। इन दोनोंमें तरंग समुद्रकी है—ऐसा मानना ही ठीक दीखता है। समुद्र तरंगका है—ऐसा मानना ठीक नहीं दीखता; क्योंकि समुद्र अपेक्षाकृत नित्य है और तरंग अनित्य (क्षणभंगुर) है। अतः तरंग समुद्रकी होती है, समुद्र तरंगका नहीं होता। अगर अपनेको समुद्र और ईश्वरको तरंग मानें तो इस मान्यतासे अनर्थ होगा; क्योंकि ऐसा माननेसे अभिमान पैदा हो जायगा तथा अहम् (चिञ्जड्ग्रन्थि) तो नित्य रहेगा और ईश्वर अनित्य हो जायगा! कारण कि जीवमें अनादिकालसे अहम्- (व्यक्तित्व-) का अभ्यास पड़ा हुआ है। अतः जहाँ स्वरूपको अहम् कहेंगे, वहाँ वही अहम् आयेगा, जो अनादिकालसे है। उस अहम्के मिटनेसे ही मुक्ति होती है। उपर्युक्त दोनों बातोंके सिवाय तीसरी एक विलक्षण बात है कि जल-तत्वमें न समुद्र है, न तरंग है अर्थात् वहाँ समुद्र और तरंगका भेद नहीं है। यही वास्तविक बात है। समुद्र
श्लोक ११]
- साधक-संजीवनी *
५४७
और तरंग तो सापेक्ष हैं, पर जल-तत्त्व निरपेक्ष है।
जैसे जल-तत्त्वमें समुद्र, नदी, वर्षा, ओस, कोहरा, भाप, बादल आदि सब मिटकर एक हो जाते हैं, ऐसे ही 'वासुदेवः सर्वम्' में सभी साधन, योगमार्ग मिटकर एक (वासुदेवरूप) हो जाते हैं। जैसे जल-तत्त्वमें कोई भेद नहीं है, ऐसे ही 'वासुदेवः सर्वम्' में कोई भेद नहीं है। मतभेदसे असन्तोष होता है, पर 'वासुदेवः सर्वम्' में कोई मतभेद न होनेसे सबको सर्वथा सन्तोष हो जाता है। 'वासुदेवः सर्वम्' में न योगी है, न ज्ञानी है, न प्रेमी है, इसलिये इसका अनुभव करनेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
एक ही जल बर्फ, कोहरा, बादल, ओला, वर्षा, नदी, तालाब, समुद्र आदि अनेक रूपोंमें हो जाता है। कड़ाहीमें बर्फ डालकर उसको अगिनपर रखा जाय तो बर्फ पिघलकर पानी हो जायगी। फिर पानी भी भाप हो जायगा और भाप परमाणु होकर निराकार हो जायगा। जल ही कोहरारूपसे होता है, वही बादलरूपसे होता है, वही निराकाररूपसे होता है, वही बर्फरूपसे होता है, वही ओलारूपसे होता है, वही वर्षारूप होकर पृथ्वीपर बरसता है, वही नदीरूपसे होता है, वही समुद्ररूपसे होता है। अनेक रूपसे होनेपर भी तत्त्वसे जल एक ही रहता है। इसी तरह एक ही भगवान् अनेक रूपसे बन जाते हैं। जैसे जल ठण्डकसे जमकर बर्फ हो जाता है और गरमीसे पिघलकर तथा भाप बनकर परमाणुरूप हो जाता है, ऐसे ही अज्ञानरूपी ठण्डकसे भगवान् स्थूल तथा जड़ संसाररूपसे दीखते हैं और ज्ञानरूपी अगिनसे सूक्ष्म तथा चेतन वासुदेवरूपसे दीखते हैं। जल चाहे बर्फरूपसे दीखे, चाहे भाप, बादल आदि रूपोंसे दीखे, हैं वह जल ही। जलके सिवाय कुछ नहीं है। ऐसे ही भगवान् चाहे संसाररूपसे दीखें, चाहे अन्य रूपोंसे दीखें, हैं वे भगवान् ही। भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है।
साधकसे एक गलती होती है कि वह अपनेको अलग रखकर संसारको भगवत्स्वरूप देखनेकी चेष्टा करता है अर्थात् 'वासुदेवः सर्वम्' को अपनी बुद्धिका विषय बनाता है। वास्तवमें दीखनेवाला संसार ही भगवत्स्वरूप नहीं है, प्रत्युत देखनेवाला भी भगवत्स्वरूप है—'सकलमिदमहं च वासुदेवः' (विष्णुपुराण ३।७।३२)। अतः साधकको ऐसा मानना चाहिये कि अपनी देहसहित सब कुछ भगवान् ही हैं अर्थात् शरीर भी भगवत्स्वरूप है, इन्द्रियाँ भी भगवत्स्वरूप हैं, मन भी भगवत्स्वरूप है, बुद्धि भी भगवत्स्वरूप है, प्राण भी भगवत्स्वरूप हैं और अहम् (मैंपन) भी भगवत्स्वरूप है। सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको माननेके लिये साधकको बुद्धिसे जोर नहीं लगाना चाहिये, प्रत्युत सहजरूपसे जैसा है, वैसा स्वीकार कर लेना चाहिये। इसलिये श्रीमद्भागवतमें आया है—
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्मनीषया । परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः ॥
(११।२९।१८)
जब 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—ऐसा निश्चय हो जाय, तब साधक इस अध्यात्मविद्या-(ब्रह्मविद्या-) के द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह भगवान्को भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् भगवान् ही दीखने लगे।
तात्पर्य है कि 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस भावसे भी उपराम हो जाय अर्थात् न द्रष्टा (देखनेवाला) रहे, न दृश्य (दीखनेवाला) रहे और न दर्शन (देखनेकी वृत्ति) ही रहे, केवल भगवान् ही रहें।
'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव अनेक दृष्टियोंसे हो सकता है; जैसे—
(१) क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिका तो आदि और अन्त होता है, पर सत्ता निरन्तर ज्यों-की-त्यों रहती है। इसलिये मनुष्यमात्रको क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिके अभावका तो अनुभव होता है, पर अपनी सत्ताके अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। इस नित्य-निरन्तर रहनेवाली सत्ताका अनुभव होना विवेककी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है।
(२) सृष्टिसे पहले भी केवल भगवान् थे और पीछे भी केवल भगवान् रहेंगे, फिर बीचमें भगवान्के सिवाय दूसरा कैसे आ सकता है?—यह युक्तिकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है।
(३) मेरे तो एक भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय मेरा कोई है ही नहीं और कोई है तो होगा, हमें उससे क्या मतलब?—यह सीधे-सरल, विश्वासी भक्तोंकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है। जैसे, ब्रजमें एक साधु कुएँपर किसीसे बातें कर रहा था कि ब्रह्म ऐसा होता है, जीव ऐसा होता है आदि-आदि। वहाँ जल भरनेके लिये आयी एक गोपीने ये बातें
४४८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
सुनीं तो उसने दूसरी गोपीसे पूछा—अरी वीर! ये ब्रह्म, जीव आदि क्या होते हैं? वह गोपी बोली कि ये हमारे लालाके ही कोई सगे-सम्बन्धी होंगे, तभी साधुलोग उनकी बात करते हैं, नहीं तो साधुओंको लालाके सिवाय औरसे क्या मतलब?
(४) जिसके भीतर भगवत्त्वको जाननेकी व्याकुलता है, दिनमें भूख नहीं लगती, रातमें नींद नहीं आती, वह किसी सन्तसे सुनकर अथवा पुस्तकमें पढ़कर दृढ़तापूर्वक मान लेता है कि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् कैसे हैं—इसका तो पता नहीं, पर भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है—यह सन्तके वचनोंपर विश्वासकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है। सन्त वचनपर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होनेपर फिर वैसा ही दीखने लग जाता है अर्थात् अनुभव हो जाता है।
दार्शनिक दृष्टिसे विचार करें तो सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं। श्रद्धा-विश्वास (भक्ति) की दृष्टिसे देखें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। भक्तकी दृष्टि भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं और भगवान्के सिवाय दूसरा कोई उसकी दृष्टिमें आता ही नहीं।
सम्बन्ध—जो भगवान्की महत्ताको समझकर भगवान्की शरण होते हैं, ऐसे भक्तोंका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक करनेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें देवताओंके शरण होनेवाले मनुष्योंका वर्णन करते हैं।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥
परन्तु—
| तैः, तैः | = उन-उन | प्रकृत्या | = प्रकृति अर्थात् | उन-उन |
|---|---|---|---|---|
| कामैः | = कामनाओंसे | स्वभावसे | नियमम् | |
| हृतज्ञानाः | = जिनका ज्ञान हरा गया है, (ऐसे मनुष्य) | नियताः | = नियन्त्रित होकर | आस्थाय |
| स्वया | = अपनी-अपनी | तम्, तम् | = उस-उस अर्थात् | अन्यदेवताः |
| देवताओंके | प्रपद्यन्ते | = शरण हो जाते हैं। |
व्याख्या—'कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः'—उन-उन अर्थात् इस लोकके और परलोकके भोगोंकी कामनाओंसे जिनका ज्ञान ढक गया है, आच्छादित हो गया है। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये जो विवेकयुक्त मनुष्यशरीर मिला है, उस शरीरमें आकर परमात्माकी प्राप्ति न करके वे अपनी कामनाओंकी पूर्ति करनेमें ही लगे रहते हैं। संयोगजन्य सुखकी इच्छाको कामना कहते हैं। कामना दो तरहकी होती है—यहाँके भोग भोगनेके लिये धन-संग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोकके भोग भोगनेके लिये पुण्य-संग्रहकी कामना।
धन-संग्रहकी कामना दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ चाहे जैसे भोग भोगें; चाहे जब, चाहे जहाँ और चाहे जितना धन खर्च करें, सुख-आरामसे दिन बीतें आदिके
लिये अर्थात् संयोगजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है और दूसरी, मैं धनी हो जाऊँ, धनसे मैं बड़ा बन जाऊँ आदिके लिये अर्थात् अभिमानजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है। ऐसे ही पुण्य-संग्रहकी कामना भी दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ मैं पुण्यात्मा कहलाऊँ और दूसरी, परलोकमें मेरेको भोग मिलें। इन सभी कामनाओंसे सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, बन्ध-मोक्ष आदिका विवेक आच्छादित हो जाता है। विवेक आच्छादित होनेसे वे यह समझ ही नहीं पाते कि जिन पदार्थोंकी हम कामना कर रहे हैं, वे पदार्थ हमारे साथ कबतक रहेंगे और हम उन पदार्थोंके साथ कबतक रहेंगे?
'प्रकृत्या नियताः स्वया'२—कामनाओंके कारण विवेक ढका जानेसे वे अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित रहते हैं
१—इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें वर्णित पुरुषोंका ज्ञान तो मायासे ढका हुआ है और यहाँ वर्णित पुरुषोंका ज्ञान कामनासे ढका हुआ है। वहाँके पुरुष तो कामनापूर्तिके लिये जड़-पदार्थोंका आश्रय लेते हैं और यहाँके पुरुष कामनापूर्तिके लिये देवताओंका आश्रय लेते हैं। वहाँके पुरुष दुष्टताके कारण नरकोंमें जाते हैं और यहाँके पुरुष कामनाके कारण बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं।
२—यहाँ जो 'प्रकृत्या नियताः स्वया' कहा है, इसीको सत्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'यो यच्छद्धः स एव सः' कहा है।
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
५४९
अर्थात् अपने स्वभावके परवश रहते हैं। यहाँ 'प्रकृति' शब्द व्यक्तिगत स्वभावका वाचक है, समष्टि प्रकृतिका वाचक नहीं। यह व्यक्तिगत स्वभाव सबमें मुख्य होता है—'स्वभावो मूर्ध्न वर्तते।' अतः व्यक्तिगत स्वभावको कोई छोड़ नहीं सकता—'या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते।' परन्तु इस स्वभावमें जो दोष हैं, उनको तो मनुष्य छोड़ ही सकता है, अगर उन दोषोंको मनुष्य छोड़ नहीं सकता, तो फिर मनुष्यजन्यकी महिमा ही क्या हुई? मनुष्य अपने स्वभावको निर्दोष, शुद्ध बनानेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। परन्तु जबतक मनुष्यके भीतर कामनापूर्तिके उद्देश्य रहता है, तबतक वह अपने स्वभावको सुधार नहीं सकता और तभीतक स्वभावकी प्रबलता और अपनेमें निर्बलता दीखती है। परन्तु जिसका उद्देश्य कामना मिटानेका हो जाता है, वह अपनी प्रकृति—(स्वभाव—) का सुधार कर सकता है अर्थात् उसमें प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती।
'तं तं नियममास्थाप्य' —कामनाओंके कारण अपनी प्रकृतिके परवश होनेपर मनुष्य कामनापूर्तिके अनेक उपायोंको और विधियों (नियमों—) को दृढ़ता रहता है। अमुक यज्ञ करनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक तप
करनेसे? अमुक दान देनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक मन्त्रका जप करनेसे? आदि—आदि उपाय खोजता रहता है। उन उपायोंकी विधियाँ अर्थात् नियम अलग—अलग होते हैं। जैसे—अमुक कामनापूर्तिके लिये अमुक विधिसे यज्ञ आदि करना चाहिये और अमुक स्थानपर करना चाहिये आदि—आदि। इस तरह मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करता है।
'प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः' —कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करके मनुष्य अन्य देवताओंकी शरण लेते हैं, भगवान्की शरण नहीं लेते। यहाँ 'अन्यदेवताः' कहनेका तात्पर्य है कि वे देवताओंको भगवत्स्वरूप नहीं मानते हैं, प्रत्युत उनकी अलग सत्ता मानते हैं, इसीसे उनको अन्तवाला (नाशवान्) फल मिलता है—'अन्तवन्तु फलं तेषाम्' (गीता ७।२३)। अगर वे देवताओंकी अलग सत्ता न मानकर उनको भगवत्स्वरूप ही मानें तो फिर उनको अन्तवाला फल नहीं मिलेगा, प्रत्युत अविनाशी फल मिलेगा।
यहाँ देवताओंकी शरण लेनेमें दो कारण मुख्य हुए—एक कामना और एक अपने स्वभावकी परवशता।
परिशिष्ट भाव —भगवान्के अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें जो कामनाएँ हैं, वही कामनाएँ इस श्लोकमें वर्णित मनुष्योंमें भी हैं। परन्तु दोनोंमें फर्क यह है कि अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें कामनाकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है, इसलिये वे 'हृतज्ञानाः' नहीं हैं। परन्तु यहाँ वर्णित मनुष्योंमें कामनाकी मुख्यता है; इसलिये ये 'हृतज्ञानाः' हैं।
अर्थार्थी और आर्त भक्त तो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं, पर ये मनुष्य भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंके शरण होते हैं। कामनाएँ, देवता, मनुष्य और नियम—ये सभी अनेक हुआ करते हैं। अगर अनेक कामनाएँ होनेपर भी उपास्यदेव एक परमात्मा हों तो वे उपासकका उद्धार कर देंगे। परन्तु कामनाएँ भी अनेक हों और उपास्यदेव भी अनेक हों तो उद्धार कौन करेगा?
एक भगवान्के सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—यह ज्ञान सुखकी कामनाके कारण ढक जाता है। यह कामना न तो प्रकृतिकी बनायी हुई है और न परमात्माकी बनायी हुई है, प्रत्युत मनुष्यकी अपनी बनायी हुई है। इसलिये इसको मिटानेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। 'हृतज्ञानाः' कहनेका तात्पर्य है कि यह ज्ञान नष्ट नहीं हुआ है, प्रत्युत कामनाके कारण हरा गया है। इस बातको गीतामें 'माययापहृतज्ञानाः' (७।१५), 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (५।१५) आदि पदोंसे भी कहा गया है।
इसी अध्ययके पन्द्रहवें श्लोकमें आये 'माययापहृतज्ञानाः' पदमें तमोगुणकी प्रधानता और रजोगुणकी गौणता है, पर यहाँ आये 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' पदमें रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणता है। 'माययापहृतज्ञानाः' पदमें अर्थकी इच्छा मुख्य है और 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' पदमें भोगोंकी इच्छा मुख्य है। दोनोंमें फर्क यह है कि मायासे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन नहीं करते, पर कामनाओंसे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन कर सकते हैं। कारण कि अर्थसे अरुचि नहीं होती—'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' , पर भोगोंसे अरुचि होती ही है। 'माययापहृतज्ञानाः' में तो आसुरभावका, झूठ, कपट, बेईमानी आदिका आश्रय है, पर 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' में
'स्वया' कहनेका तात्पर्य है कि अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार सबकी कामनाएँ भी अलग—अलग होती हैं।
५५०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
देवताओंका आश्रय है। अतः 'माययापहृतज्ञानाः' में तो विशेष जड़ता है, पर 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' में उनकी अपेक्षा चेतनता है।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥
| यः, यः | = जो-जो | अर्चितुम् | = पूजन करना | अहम् | = मैं |
|---|---|---|---|---|---|
| भक्तः | = भक्त | इच्छति | = चाहता है, | ताम् | = उसी |
| याम्, याम्२ | = जिस-जिस | तस्य, तस्य | = उस-उस | श्रद्धाम् | = श्रद्धाको |
| तनुम् | = देवताका | देवतामें | अचलाम् | = दृढ़ | |
| श्रद्धया | = श्रद्धापूर्वक | एव | = ही | विदधामि | = कर देता हूँ। |
व्याख्या —'यो यो यां यां तनुं भक्तः' '..... तामेव विदधाम्यहम्'—जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताका भक्त होकर श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करना चाहता है, उस-उस मनुष्यकी श्रद्धा उस-उस देवताके प्रति मैं अचल (दृढ़) कर देता हूँ। वे दूसरोंमें न लगकर मेरेमें ही लग जायें—ऐसा मैं नहीं करता। यद्यपि उन-उन देवताओंमें लगनेसे कामनाके कारण उनका कल्याण नहीं होता, फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूँ, तो जो मेरेमें श्रद्धा-प्रेम रखते हैं, अपना कल्याण करना चाहते हैं, उनकी श्रद्धाको मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूँगा अर्थात् अवश्य करूँगा। कारण कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता ५।२९)।
इसपर यह शंका होती है कि आप सबकी श्रद्धा अपनेमें ही दृढ़ क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् मानो यह कहते हैं कि अगर मैं सबकी श्रद्धाको अपने प्रति दृढ़ करूँ तो मनुष्यजन्मकी स्वतन्त्रता, सार्थकता ही कहाँ रही? तथा मेरी स्वार्थपरताका त्याग कहाँ हुआ? अगर लोगोंको अपनेमें ही लगानेका मेरा आग्रह रहे, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि ऐसा बताव तो दुनियाके सभी स्वार्थी जीवोंका स्वाभाविक होता है। अतः मैं इस स्वार्थपरताको मिटाकर ऐसा स्वभाव सिखाना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य पक्षपात करके दूसरोंसे केवल अपनी पूजा-प्रतिष्ठा करवानेमें ही न लगा रहे और किसीको पराधीन न बनाये।
अब दूसरी शंका यह होती है कि आप उनकी श्रद्धाको उन देवताओंके प्रति दृढ़ कर देते हैं, इससे आपकी साधुता तो सिद्ध हो गयी, पर उन जीवोंका तो आपसे विमुख होनेसे अहित ही हुआ? इसका समाधान यह है कि अगर मैं उनकी श्रद्धाको दूसरोंसे हटाकर अपनेमें लगानेका भाव रखूँगा तो उनकी मेरेमें अश्रद्धा हो जायगी। परन्तु अगर मैं अपनेमें लगानेका भाव नहीं रखूँगा और उनको स्वतन्त्रता दूँगा, तो उस स्वतन्त्रताको पानेवालोंमें जो बुद्धिमान् होंगे, वे मेरे इस बतावको देखकर मेरी तरफ ही आकृष्ट होंगे। अतः उनके उद्धारका यही तरीका बढ़िया है।
अब तीसरी शंका यह होती है कि जब आप स्वयं उनकी श्रद्धाको दूसरोंमें दृढ़ कर देते हैं, तो फिर उस श्रद्धाको कोई मिटा ही नहीं सकता। फिर तो उसका पतन ही होता चला जायगा? इसका समाधान यह है कि मैं उनकी श्रद्धाको देवताओंके प्रति ही दृढ़ करता हूँ, दूसरोंके प्रति नहीं—ऐसी बात नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाके अनुसार ही उनकी श्रद्धाको दृढ़ करता हूँ और अपनी इच्छाको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, योग्य है। इच्छाको बदलनेमें वे परवश, निर्बल और अयोग्य नहीं हैं। अगर इच्छाको बदलनेमें वे परवश होते तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही कहाँ रही? और इच्छा (कामना-) का त्याग करनेकी आज्ञा भी मैं कैसे दे सकता था—'जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्' (गीता ३।४३)?
१-जो अपनेको तथा दूसरेको भी जाने, वह 'चेतन' है और जो अपनेको तथा दूसरेको भी नहीं जाने, वह 'जड़' है। २-जैसे यहाँ 'यो यः, यां याम्' आया है, ऐसे ही आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'यं यं वापि स्मरन्भावम्' आया है। दो बार 'यत्' शब्दका अर्थात् 'यो यः' 'यां याम्' और 'यं यम्' शब्दोंका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जैसे मनुष्य उपासना करनेमें स्वतन्त्र है अर्थात् देवताओंकी उपासना करे, चाहे मेरी उपासना करे—इसमें वह स्वतन्त्र है, ऐसे ही अन्तकालमें स्मरण करनेमें भी मनुष्य सर्वथा स्वतन्त्र है अर्थात् मेरा स्मरण करे चाहे किसी औरका स्मरण करे—इसमें वह स्वतन्त्र है।
श्लोक २२]
- साधक-संजीवनी *
५५१
परिशिष्ट भाव— प्रायः मनुष्य दूसरे मनुष्योंको अपनी तरफ लगाना चाहते हैं, अपना शिष्य या दास बनाना चाहते हैं, अपने सम्प्रदायमें लाना चाहते हैं, अपनेमें श्रद्धा करवाना चाहते हैं, अपना पूजन, आदर, मान-सम्मान करवाना चाहते हैं, अपनी बात मनवाना चाहते हैं। परन्तु भगवान् सर्वोपरि होते हुए भी किसीको अपने अधीन नहीं बनाते, प्रत्युत जो जहाँ श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको वहाँ दृढ़ कर देते हैं—यह भगवान्की कितनी उदारता है, निष्पक्षता है।
भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ उनका ही स्वरूप है—‘मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति ’। इसलिये भगवान्में किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है। परन्तु भगवान्का यह पक्षपातरहित स्वभाव सहज ही समझमें नहीं आता, प्रत्युत गहरा विचार करनेसे ही समझमें आता है। अगर यह स्वभाव किसीकी समझमें आ जाय तो वह भगवान्का भक्त हो जायगा—उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहिं भजनु तजि भाव न आना॥
(मानस, सुन्दर० ३४।२)
स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत॥ (गीता १५।१९)
दूसरेको अपना दास वही बनाता है, जिसमें कोई कमी है। भगवान्में कोई कमी है ही नहीं, इसलिये वे अपनी तरफसे किसीको अपना दास (अधीन) कैसे बना सकते हैं? परन्तु कोई उनका दास बनना चाहे तो वे मना नहीं करते और दयापूर्वक उसको दास स्वीकार कर लेते हैं। यह उनकी विशेष उदारता है! जैसे छोटे-से बालकको देखकर कोई व्यक्ति रौझ जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस बालकसे उसका कोई स्वार्थभाव है। ऐसे ही जो भगवान्का दास बनता है, उसके सरलभावसे भगवान् रौझ जाते हैं—‘मोरं अधिक दास पर प्रीती ’ (मानस, उत्तर० १६।४)। गीताके अठारहवें अध्यायमें जब भगवान्के द्वारा ‘यथेच्छसि तथा कुरु ’ सुनकर अर्जुन घबरा गये, तब भगवान् दयापरवश होकर अर्जुनसे बोले कि तू मेरी शरणमें आ जा—‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) परन्तु ऐसा कहनेसे पहले भगवान्ने कहा कि यह सबसे अत्यन्त गोपनीय बात है (अठारहवें अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) और बादमें भी कहा कि इसे हर किसीको मत कहना (अठारहवें अध्यायका सड़सठवाँ श्लोक)। इससे सिद्ध होता है कि दूसरेको अपना दास बनानेकी नीयत न होनेपर भी अगर कोई दूसरा सहारा न मिलनेपर मनुष्य घबरा जाय और उनका दास बनना चाहे तो भगवान् दयापरवश होकर उसको स्वीकार कर लेते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जो किसी देवतापर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् उस देवतामें दृढ़ कर देते हैं और जो भगवान्पर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् अपनेमें दृढ़ कर दें—इसमें सन्देह ही क्या है! कारण कि भगवान्की दृष्टि भक्तके हितके लिये होती है, अपने स्वार्थके लिये नहीं।
स तथा श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ २२ ॥
| तया | = उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) | भावपूर्वक) | हि | = परन्तु |
|---|---|---|---|---|
| श्रद्धया | = श्रद्धासे | उपासना | तान् | = वह कामना-पूर्ति |
| युक्तः | = युक्त होकर | ईहते | मया | = मेरे द्वारा |
| सः | = वह मनुष्य | च | एव | = ही |
| तस्य | = उस देवताकी | ततः | विहितान् | = विहित की हुई |
| आराधनम् | = (सकाम- | कामान् | होती है। | होती है। |
| लभते | ||||
व्याख्या— ‘स तथा श्रद्धया युक्तः : ..... मयैव विहितान्हि तान् ’—मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे सम्पन्न हुआ वह मनुष्य उस देवताकी आराधनाकी चेष्टा करता है और उस देवतासे जिस कामनापूर्तिकी आशा रखता है, उस कामनाकी पूर्ति होती है। यद्यपि वास्तवमें उस कामनाकी
पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है; परन्तु वह उसको देवतासे ही पूरी की हुई मानता है। वास्तवमें देवताओंमें मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधानसे वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं। जैसे सरकारी अफसरोंको एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुम लोग अमुक विभागमें अमुक अवसरपर
५५२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
इतना खर्च कर सकते हो, इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओंमें एक सीमातक ही देनेकी शक्ति होती है; अतः वे उतना ही दे सकते हैं, अधिक नहीं। देवताओंमें अधिक-से-अधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपने-अपने उपासकोंको अपने-अपने लोकोंमें ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासनाका फल भोगनेपर उनको वहाँसे लौटकर पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—आठवें
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने सब देवताओंको अलग-अलग और सीमित अधिकार दिये हुए हैं। परन्तु भगवान्का अधिकार असीम है। भगवान्में यह विशेषता है कि वे किसीपर शासन नहीं करते, किसीको अपना गुलाम नहीं बनाते, किसीको अपना चेला नहीं बनाते, प्रत्युत हर एकको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं। जैसे, निषादराज सिद्ध भक्त था, विभीषण साधक था और सुग्रीव विषयी था, पर भगवान् श्रीरामने तीनोंको ही अपना सखा बनाया। यह विशेषता देवताओं आदि किसीमें भी नहीं है। इसलिये वेदोंमें भी भगवान्को जीवका सखा बताया गया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
(मुण्डक० ३।१।१, श्वेता० ४।६)
गीतामें भी भगवान्ने अर्जुनको कहा है—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति ’ (४।३)। यहाँ भगवान्ने ‘भक्त’ तो अर्जुनकी दृष्टिसे कहा है*, पर अपनी दृष्टिसे ‘सखा’ कहा है। ‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (१५।७)—इन पदोंमें भी भगवान्ने ‘एव’ पदसे जीवको साक्षात् अपना स्वरूप बताया है। यह मेरा ही अंश है—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इसमें प्रकृतिका अंश बिलकुल नहीं है।
सम्बन्ध—अब भगवान् उपासनाके अनुसार फलका वर्णन करते हैं।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥
| तु | = परन्तु | अन्तवत् | = अन्तवाला | यान्ति | = प्राप्त होते हैं |
|---|---|---|---|---|---|
| तेषाम् | = उन | (नाशवान्) ही | (और) | ||
| अल्पमेधसाम् | = तुच्छ बुद्धिवाले | भवति | = मिलता है। | मद्भक्ताः | = मेरे भक्त |
| मनुष्योंको | देवयजः | = देवताओंका | माम् | = मुझे | |
| तत् | = उन देवताओंको | पूजन | अपि | = ही | |
| आराधनाका | करनेवाले | यान्ति | = प्राप्त | ||
| फलम् | = फल | देवान् | = देवताओंको | होते हैं। |
व्याख्या —‘अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्’—देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धि-युक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये, फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है? इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थकी कामना है और दूसरी बात, वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको
अध्यायका सोलहवाँ श्लोक।
यहाँ ‘मयैव ’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें स्वतः जो कुछ संचालन हो रहा है, वह सब मेरा ही किया हुआ है। अतः जिस किसीको जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है। कारण कि मेरे सिवाय विधान करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अगर कोई मनुष्य इस रहस्यको समझ ले, तो फिर वह केवल मेरी तरफ ही खिंचेगा।
नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है—एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा, वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर, अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी, तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है।
- अर्जुनकी दृष्टिसे इसलिये ‘भक्त’ कहा कि अर्जुनने भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी—‘शाधि मां त्वां प्रपन्म’ (गीता १।७)
श्लोक २३]
- साधक-संजीवनी *
५५३
यहाँ 'तत्' कहनेका तात्पर्य है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है, पर कामना होनेसे वह नाशवान् हो जाता है।
यहाँ 'अत्यमेधसाम्' कहनेका तात्पर्य है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं तथा विधियाँ भी अधिक करनी पड़ती हैं, पर फल मिलता है सीमित और अन्तवाला। परन्तु मेरी आराधना करनेमें इतने नियमोंकी जरूरत नहीं है तथा उतनी विधियोंकी भी आवश्यकता नहीं है, पर फल मिलता है असीम और अनन्त। इस तरह देवताओंकी उपासनामें नियम हों अधिक, फल हो थोड़ा और हो जाय जन्म-मरणरूप बन्धन और मेरी आराधनामें नियम हों कम, फल हो अधिक और हो जाय कल्याण—ऐसा होनेपर भी वे उन देवताओंकी उपासनामें लगते हैं और मेरी उपासनामें नहीं लगते। इसलिये उनकी बुद्धि अल्प है, तुच्छ है।
'देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'—देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं। यहाँ 'अपि' पदसे यह सिद्ध होता है कि मेरी उपासना करनेवालोंकी कामनापूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति तो हो ही जाती है अर्थात् मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम, वे सब-के-सब मेरेको ही प्राप्त होते हैं। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवालोंकी सभी कामनाएँ पूरी हो जायँ, यह नियम नहीं है। भगवान् उचित समझें तो पूरी कर भी दें और न भी करें अर्थात् उनका हित होता हो तो पूरी कर देते हैं और अहित होता हो तो कितना ही पुकारनेपर तथा रोनेपर भी पूरी नहीं करते।
यह नियम है कि भगवान्का भजन करनेसे भगवान्के
परिशिष्ट भाव —देवताओंकी उपासना करनेवाले तो सकते हैं, पर भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। हाँ, अगर साधककी देवताओंमें भगवद्बुद्धि हो अथवा अपनेमें निष्कामभाव हो तो उसका उद्धार हो जायगा अर्थात् वह भी भगवान्को प्राप्त हो जायगा। परन्तु देवताओंमें भगवद्बुद्धि न हो और अपनेमें निष्कामभाव भी न हो तो उद्धार नहीं होगा।
देवताओंकी उपासनाका दोष यह है कि उसका फल अन्तवाला अर्थात् नाशवान् होता है; क्योंकि देवता खुद भी सीमित अधिकारवाले हैं। अतः जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अल्प बुद्धिवाले हैं। यदि वे अल्प बुद्धिवाले न होते तो नाशवान् फल देनेवाले देवताओंकी उपासना क्यों करते? भगवान्की ही उपासना करते अथवा देवताओंमें भगवद्बुद्धि करते। भगवान्की उपासना तो बड़ी सुगम है, उसमें विधिकी, नियमकी, परिश्रमकी जरूरत नहीं है। उसमें तो केवल भावकी ही प्रधानता है। परन्तु देवताओंकी उपासनामें क्रिया, विधि और पदार्थकी प्रधानता है।
नित्य-सम्बन्धकी स्मृति हो जाती है; क्योंकि भगवान्का सम्बन्ध सदा रहनेवाला है। अतः भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना पड़ता—'यदगत्वा न निवर्तन्ते' (१५।६)। परन्तु देवताओंका सम्बन्ध सदा रहनेवाला नहीं है; क्योंकि वह कर्मजनित है। अतः देवताओंको लोककी प्राप्ति होनेपर संसारमें लौटकर आना ही पड़ता है—'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' (९।२१)।
मेरा भजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं—इसी भावको लेकर भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चारों प्रकारके भक्तोंको सुकृती और उदार कहा है (सातवें अध्यायका सोलहवाँ और अठारहवाँ श्लोक)।
यहाँ 'मद्भक्ता यान्ति मामपि' का तात्पर्य है कि जीव कैसे ही आचरणोंवाला क्यों न हो अर्थात् वह दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न हो, आखिर है तो मेरा ही अंश। उसने केवल आसक्ति और आग्रहपूर्वक संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया है। अगर संसारकी आसक्ति और आग्रह न हो तो उसे मेरी प्राप्ति हो ही जायगी।
विशेष बात
सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान्का विधान भी भगवत्स्वरूप है—ऐसा होते हुए भी भगवान्से भिन्न संसारकी सत्ता मानना और अपनी कामना रखना—ये दोनों ही पतनके कारण हैं। इनमेंसे यदि कामनाका सर्वथा नाश हो जाय तो संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जायगा और यदि संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जाय तो कामना मिट जायगी। फिर मात्र क्रियाओंके द्वारा भगवान्की सेवा होने लग जायगी। अगर संसारका भगवत्स्वरूप दीखना और कामनाका नाश होना—दोनों एक साथ हो जायँ, तो फिर कहना ही क्या है!
अधिक-से-अधिक देवताओंके पुनरावर्ती लोकोंमें ही जा सकते हैं, पर भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। हाँ, अगर साधककी देवताओंमें भगवद्बुद्धि हो अथवा अपनेमें निष्कामभाव हो तो उसका उद्धार हो जायगा अर्थात् वह भी भगवान्को प्राप्त हो जायगा। परन्तु देवताओंमें भगवद्बुद्धि न हो और अपनेमें निष्कामभाव भी न हो तो उद्धार नहीं होगा।
देवताओंकी उपासनाका दोष यह है कि उसका फल अन्तवाला अर्थात् नाशवान् होता है; क्योंकि देवता खुद भी सीमित अधिकारवाले हैं। अतः जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अल्प बुद्धिवाले हैं। यदि वे अल्प बुद्धिवाले न होते तो नाशवान् फल देनेवाले देवताओंकी उपासना क्यों करते? भगवान्की ही उपासना करते अथवा देवताओंमें भगवद्बुद्धि करते। भगवान्की उपासना तो बड़ी सुगम है, उसमें विधिकी, नियमकी, परिश्रमकी जरूरत नहीं है। उसमें तो केवल भावकी ही प्रधानता है। परन्तु देवताओंकी उपासनामें क्रिया, विधि और पदार्थकी प्रधानता है।
मनुष्यको संसारकी कितनी ही विद्याओंका, कला-कौशल आदिका ज्ञान हो जाय तो भी वह 'अत्यमेधा' (तुच्छ
५५४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
बुद्धिवाला) ही है। वह ज्ञान वास्तवमें अज्ञानको दृढ़ करनेवाला है। परन्तु जिसने भगवान्को जान लिया है, उसको किसी सांसारिक विद्या, कला-कौशल आदिका ज्ञान न होनेपर भी वह 'सर्ववित्' (सब कुछ जाननेवाला) है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) !
सम्बन्ध—यद्यपि देवताओंकी उपासनाका फल सीमित और अन्तवाला होता है, फिर भी मनुष्य उसमें क्यों उलझ जाते हैं, भगवान्में क्यों नहीं लगते—इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
| अबुद्धयः | = बुद्धिहीन मनुष्य | भावम् | = भावको | परमात्मा- | को |
|---|---|---|---|---|---|
| मम | = मेरे | अजानन्तः | = न जानते हुए | व्यक्तिम् | = मनुष्यकी तरह |
| परम् | = परम, | अव्यक्तम् | = अव्यक्त (मन- | शरीर | |
| अव्ययम् | = अविनाशी (और) | इन्द्रियोंसे पर) | आपन्तम् | = धारण करनेवाला | |
| अनुत्तमम् | = सर्वश्रेष्ठ | माम् | = मुझ-(सच्चिदानन्दधन) | मन्यन्ते | = मानते हैं। |
व्याख्या—'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं ..... ममाव्यय-मनुत्तमम्'—जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरेमें श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वे अल्पमेधाके कारण अर्थात् समझकी कमीके कारण मेरेको साधारण मनुष्यकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् जन्मने-मरनेवाला मानते हैं। मेरा जो अविनाशी अव्ययभाव है अर्थात् जिससे बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता और जो देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत, सदा एकरूप रहनेवाला, निर्मल और असम्बद्ध है—ऐसे मेरे अविनाशी भावको वे नहीं जानते और मेरा अवतार लेनेका जो तत्त्व है, उसको नहीं जानते। इसलिये वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नहीं करते, प्रत्युत देवताओंकी उपासना करते हैं।
'अबुद्धयः' पदका यह अर्थ नहीं है कि उनमें बुद्धिका अभाव है, प्रत्युत बुद्धिमें विवेक रहते हुए भी अर्थात् संसारको उत्पत्ति-विनाशशील जानते हुए भी इसे मानते नहीं—यही उनमें बुद्धिरहितपना है, मूढ़ता है।
दूसरा भाव यह है कि कामनाको कोई रख नहीं सकता, कामना रह नहीं सकती; क्योंकि कामना पहले नहीं थी और कामनापूर्तिके बाद भी कामना नहीं रहेगी। वास्तवमें कामनाकी सत्ता ही नहीं है, फिर भी उसका त्याग नहीं कर सकते—यही अबुद्धिपना है।
मेरे स्वरूपको न जाननेसे वे अन्य देवताओंकी उपासनामें लग गये और उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी
कामनामें लग जानेसे वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरेसे विमुख हो गये। यद्यपि वे मेरेसे अलग नहीं हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नहीं हो सकता, तथापि कामनाके कारण ज्ञान ढक जानेसे वे देवताओंकी तरफ खिंच जाते हैं। अगर वे मेरेको जान जाते, तो फिर केवल मेरा ही भजन करते।
(१) बुद्धिमान् मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्के शरण होते हैं। वे भगवान्को ही सर्वोपरि मानते हैं।
(२) अल्पमेधावाले मनुष्य वे होते हैं, जो देवताओंके शरण होते हैं। वे देवताओंको अपनेसे बड़ा मानते हैं, जिससे उनमें थोड़ी नम्रता, सरलता रहती है।
(३) अबुद्धिवाले मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्को देवता-जैसा भी नहीं मानते; किन्तु साधारण मनुष्य-जैसा ही मानते हैं। वे अपनेको ही सर्वोपरि, सबसे बड़ा मानते हैं (गीता—सोलहवें अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक)। यही तीनोंमें अन्तर है।
'परं भावमजानन्तः' का तात्पर्य है कि मैं अज रहता हुआ, अविनाशी होता हुआ और लोकोंका ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृतिको वशमें करके योगमायासे प्रकट होता हूँ—इस मेरे परमभावको बुद्धिहीन मनुष्य नहीं जानते।
'अनुत्तमम्' कहनेका तात्पर्य है कि पन्द्रहवें अध्यायमें जिसको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम बताया है अर्थात् जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नहीं, ऐसे मेरे अनुत्तम भावको वे नहीं जानते।
श्लोक २४]
- साधक-संजीवनी *
५५५
विशेष बात
इस (चौबीसवें) श्लोकका अर्थ कोई ऐसा करते हैं कि '(ये) अत्यक्त मां व्यक्तिमापनं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः' अर्थात् जो सदा निराकार रहनेवाले मेरेको केवल साकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे अत्यक्त, निर्विंकार और निराकार स्वरूपको नहीं जानते। दूसरे कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि '(ये) व्यक्तिमापनं मां अत्यक्तं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः' अर्थात् मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हुआ हूँ—ऐसे मेरेको केवल निराकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भावको नहीं जानते।
उपर्युक्त दोनों अर्थोंमेंसे कोई भी अर्थ ठीक नहीं है। कारण कि ऐसा अर्थ माननेपर केवल निराकारको माननेवाले साकाररूपकी और साकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे और केवल साकार माननेवाले निराकाररूपकी और निराकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे। यह सब एकदेशीयपना ही है।
पृथ्वी, जल, तेज आदि जो महाभूत हैं, जो कि विनाशी और विकारी हैं, वे भी दो-दो तरहके होते हैं—स्थूल और सूक्ष्म। जैसे, स्थूलरूपसे पृथ्वी साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है; जल बर्फ, बूँदें, बादल और
परिशिष्ट भाव —भगवान् व्यक्त भी हैं और अत्यक्त भी हैं, लौकिक भी हैं और अलौकिक भी हैं—'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९), 'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९।१९)। परन्तु बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्को उन प्राणियोंकी तरह अत्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् लौकिक (जन्मने-मरनेवाला) मानते हैं, जिनके लिये भगवान्ने कहा है—
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
(गीता २।२८)
'हे भारत! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायेंगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं; अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?'
भगवान् मनुष्योंकी तरह अत्यक्तसे व्यक्त नहीं होते, प्रत्युत अत्यक्त रहते हुए ही व्यक्त होते हैं और व्यक्त होते हुए भी अत्यक्त रहते हैं।
'परम्'—भगवान् देवताओंकी उपासना करनेवालोंको श्रद्धा भी देते हैं और उनकी उपासनाका फल भी देते हैं—यह भगवान्का परम अर्थात् पक्षपातरहित भाव है।
'अव्ययम्'—देवता सापेक्ष अविनाशी (अमर) हैं, सर्वथा अविनाशी नहीं। परन्तु भगवान् निरपेक्ष अविनाशी हैं। उनके समान अविनाशी दूसरा कोई नहीं है और हो भी नहीं सकता।
'अनुत्तमम्'—भगवान् प्राणिमात्रका हित चाहते हैं—यह भगवान्का सर्वश्रेष्ठ भाव है। इससे श्रेष्ठ दूसरा कोई भाव हो ही नहीं सकता।
सम्बन्ध—भगवान्को साधारण मनुष्य माननेमें क्या कारण है? इसपर आगेका श्लोक कहते हैं।
५५६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥
| अयम् | = यह जो | न, अभि- | = टीक तरहसे | समावृतः | = योगमायासे |
|---|---|---|---|---|---|
| मूढः | = मूढ़ | जानाति | नहीं जानता | अच्छी तरह | |
| लोकः | = मनुष्यसमुदाय | (मानता), | ढका हुआ | ||
| माम् | = मुझे | सर्वस्य | = उन सबके | अहम् | = मैं |
| अजम् | = अज (और) | (सामने) | प्रकाशः | = प्रकट | |
| अव्ययम् | = अविनाशी | योगमाया- | न | = नहीं होता। |
व्याख्या —‘मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामज-मव्ययम्’—मैं अज और अविनाशी हूँ अर्थात् जन्म-मरणसे रहित हूँ। ऐसा होनेपर भी मैं प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ अर्थात् जब मैं अवतार लेता हूँ, तब अज (अजन्मा) रहता हुआ ही अवतार लेता हूँ और अव्ययात्मा रहता हुआ ही अन्तर्धान हो जाता हूँ। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं, छिप जाते हैं, ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ। जो मेरेको इस प्रकार जन्म-मरणसे रहित मानते हैं, वे तो असम्भूढ हैं (गीता—दसवें अध्यायका तीसरा और पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो मेरेको साधारण प्राणियोंकी तरह जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, वे मूढ हैं (गीता—नवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
भगवान्को अज, अविनाशी न माननेमें कारण है कि इस मनुष्यका भगवान्के साथ जो स्वतः अपनापन है, उसको भूलकर इसने शरीरको अपना मान लिया कि ‘यह शरीर ही मैं हूँ और यह शरीर मेरा है।’ इसलिये उसके सामने परदा आ गया, जिससे वह भगवान्को भी अपने समान ही जन्मने-मरनेवाला मानने लगा।
मूढ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी नहीं जानते। उनके न जाननेमें दो कारण हैं—एक तो मेरा योगमायासे छिपा रहना और एक उनकी मूढ़ता। जैसे, किसी शहरमें किसीका एक घर है और वह अपने घरमें बंद है तथा शहरके सब-के-सब घर शहरकी चहारदीवारी (परकोटे) में बंद हैं। अगर वह मनुष्य बाहर निकलना चाहे तो अपने घरसे निकल सकता है, पर शहरकी चहारदीवारीसे निकलना
उसके हाथकी बात नहीं है। हाँ, यदि उस शहरका राजा चाहे तो वह चहारदीवारीका दरवाजा भी खोल सकता है और उसके घरका दरवाजा भी खोल सकता है। अगर वह मनुष्य अपने घरका दरवाजा नहीं खोल सकता तो राजा उस दरवाजेको तोड़ भी सकता है। ऐसे ही यह प्राणी अपनी मूढ़ताको दूर करके अपने नित्य स्वरूपको जान सकता है। परन्तु सर्वथा भगवत्तत्त्वका बोध तो भगवान्की कृपासे ही हो सकता है। भगवान् जिसको जानना चाहें, वही उनको जान सकता है—‘सोऽ जानइ जेहि देहु जानई’ (मानस २।१२७।२)। अगर मनुष्य सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् उसके अज्ञानको भी दूर कर देते हैं और अपनी मायाको भी दूर कर देते हैं।
‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः’—उन सबके सामने अर्थात् उस मूढ समुदायके सामने मैं भगवद्दृपसे प्रकट नहीं होता। कारण कि वे मेरेको अज-अविनाशी भगवद्दृपसे जानना अथवा मानना ही नहीं चाहते, प्रत्युत वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना करते हैं। अतः उनके सामने मैं अपने भगवत्-स्वरूपसे कैसे प्रकट होऊँ? तात्पर्य है कि जो मेरेको अज-अविनाशी नहीं मानते, प्रत्युत मेरेको जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उनके सामने मैं अपनी योगमायामें छिपा रहता हूँ और सामान्य मनुष्य-जैसा ही रहता हूँ। परन्तु जो मेरेको अज, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर मानते हैं, मेरेमें श्रद्धा-विश्वास रखते हैं, उनके भावोंके अनुसार मैं उनके सामने प्रकट रहता हूँ।
भगवान्की योगमाया विचित्र, विलक्षण, अलौकिक है। मनुष्योंका भगवान्के प्रति जैसा भाव होता है, उसके अनुसार ही वे योगमाया-समावृत भगवान्को देखते हैं।*
- (१) मल्लानामशनिर्नुणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
योगानां स्वजनेऽसतां क्षितिभुजो शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ (श्रीमद्भा० १०।४३।१७)
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
५५७
यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मेरेको अज-अविनाशी नहीं जानते, वे मूढ़ हैं और दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा है कि देवता और महर्षि मेरे प्रभावको नहीं जानते। इसपर शंका होती है कि भगवान्को अज-अविनाशी नहीं जानना और उनके प्रभवको नहीं जानना—ये दोनों बातें तो एक ही हो गयीं; परन्तु यहाँ न जाननेवालोंको मूढ़ बताया है और वहाँ उनको मूढ़ नहीं बताया है, ऐसा क्यों ? इसका समाधान है कि भगवान्के प्रभवको अर्थात् प्रकट होनेको न जानना दोषी नहीं है; क्योंकि वहाँ भगवान्ने स्वयं कहा है कि मैं सब तरहसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। जैसे
परिशिष्ट भाव —जो बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्को नहीं मानते, भगवान् अवतारकालमें सबके सामने प्रकट होते हुए भी उनके सामने प्रकट नहीं होते—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’ (गीता ४।११)। वास्तवमें भगवान् अप्रकट रहना चाहते नहीं, पर जो उनको नहीं मानते, उनके सामने वे कैसे प्रकट हों ?
अवतारकालमें भगवान् लौकिक रूपमें दीखनेपर भी वास्तवमें सदा अलौकिक ही रहते हैं। परन्तु राग-द्वेषके कारण अज्ञानी मनुष्योंको भगवान् लौकिक दीखते हैं अर्थात् भगवान् रूपसे न दीखकर मनुष्य रूपसे ही दीखते हैं।
सम्बन्ध —जो भगवान्को अज-अविनाशी नहीं मानते, उनके ही सामने मायाका परदा रहता है, पर भगवान्के सामने वह परदा नहीं रहता—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
| अर्जुन | = हे अर्जुन ! | च | = और | तु | = परन्तु |
|---|---|---|---|---|---|
| भूतानि | = जो प्राणी | भविष्याणि | = जो भविष्यमें | माम् | = मुझे |
| समतीतानि | = भूतकालमें हो चुके हैं, | होंगे, (उन सब प्राणियोंको तो) | कश्चन | = (भक्तके सिवाय कोई भी) | |
| च | = तथा | अहम् | = मैं | न | = नहीं |
| वर्तमानानि | = जो वर्तमानमें हैं | वेद | = जानता हूँ; | वेद | = जानता। |
व्याख्या —‘वेदाहं समतीतानि ..... मां तु वेद न कश्चन ’—यहाँ भगवान्ने प्राणियोंके लिये तो भूत, वर्तमान और भविष्यकालके तीन विशेषण दिये हैं; परन्तु अपने लिये ‘अहं वेद’ पदोंसे केवल वर्तमानकालका ही प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान्की दृष्टिमें भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीनों काल वर्तमान ही हैं। अतः
भूतके प्राणी हों, भविष्यके प्राणी हों अथवा वर्तमानके प्राणी हों—सभी भगवान्की दृष्टिमें वर्तमान होनेसे भगवान् सभीको जानते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीनों काल तो प्राणियोंकी दृष्टिमें हैं, भगवान्की दृष्टिमें नहीं। जैसे सिनेमा देखनेवालोंके लिये भूत, वर्तमान और भविष्य-कालका भेद रहता है, पर सिनेमाकी फिल्ममें सब कुछ
‘जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकट्टर-शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिताके समान बड़े-बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परमतत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णविशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े।’
(२) जिन्ह के रही भावना जैसी। प्रभु मूर्ति तिन्ह देखी तैसी। (मानस १।२४१।२)
५५८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
वर्तमान है, ऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिमें भूत, वर्तमान और भविष्यकालका भेद रहता है, पर भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ वर्तमान ही रहता है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी कालके अन्तर्गत हैं और भगवान् कालसे अतीत हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि बदलते रहते हैं और भगवान् हरदम वैसे-के-वैसे ही रहते हैं। कालके अन्तर्गत आये हुए प्राणियोंका ज्ञान सीमित होता है और भगवान्का ज्ञान असीम है। उन प्राणियोंमें भी कोई योगका अभ्यास करके ज्ञान बढ़ा लेंगे तो वे 'युञ्जान योगी' होंगे और जिस समय जिस वस्तुको जानना चाहेंगे, उस समय उसी वस्तुको वे जानेंगे। परन्तु भगवान् तो 'युक्त योगी' हैं' अर्थात् बिना योगका अभ्यास किये ही वे मात्र जीवोंको और मात्र संसारको सब समय स्वतः जानते हैं।
भूत, भविष्य और वर्तमानके सभी जीव नित्य-निरन्तर भगवान्में ही रहते हैं, भगवान्से कभी अलग हो ही नहीं सकते। भगवान्में भी यह ताकत नहीं है कि वे जीवोंसे अलग हो जायें। अतः प्राणी कहीं भी रहें, वे कभी भी भगवान्की दृष्टिसे ओझल नहीं हो सकते।
'मां तु वेद न कश्चन' का तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें कहे हुए मूढ़ समुदायमेंसे मेरेको कोई नहीं जानता अर्थात् जो मेरेको अज और अविनाशी नहीं मानते, प्रत्युत मेरेको साधारण मनुष्य-जैसा जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उन मूढ़ोंमेंसे मेरेको कोई भी नहीं जानता, पर मैं सबको जानता हूँ।
जैसे बाँसकी चिक दरवाजेपर लटका देनेसे भीतरवाले तो बाहरवालोंको पूर्णतया देखते हैं, पर बाहरवाले केवल दरवाजेपर टँगी हुई चिकको ही देखते हैं, भीतरवालोंको नहीं। ऐसे ही योगमारा रूपी चिकसे अच्छी तरहसे आवृत होनेके कारण भगवान्को मूढ़ लोग नहीं देख पाते, पर भगवान् सबको देखते हैं।
यहाँ एक शंका होती है कि भगवान् जब भविष्यमें होनेवाले सब प्राणियोंको जानते हैं, तो किसकी मुक्ति होगी और कौन बन्धनमें रहेगा—यह भी जानते ही हैं; क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है। अतः वे जिनकी मुक्ति जानते हैं, उनको तो मुक्ति होगी और जिनको बन्धनमें जानते हैं, वे बन्धनमें ही रहेंगे। भगवान्की इस सर्वज्ञतासे तो मनुष्यकी मुक्ति परतन्त्र हो गयी, मनुष्यके प्रयत्नसे साध्य नहीं रही।
इसका समाधान यह है कि भगवान्ने अपनी तरफसे मनुष्यको अन्तिम जन्म दिया है। अब इस जन्ममें मनुष्य अपना उद्धार कर ले अथवा पतन कर ले—यह उसके ऊपर निर्भर करता है (गीता—सातवें अध्यायका सताईसवाँ और आठवें अध्यायका छठा श्लोक)। उसके उद्धार अथवा पतनका निर्णय भगवान् नहीं करते।
इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् यह कह आये हैं कि बहुत जन्मोंके इस अन्तिम मनुष्यजन्ममें जो 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसे मेरे शरण होता है, वह महात्मा दुर्लभ है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यशरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको यह स्वतन्त्रता है कि वे अपने अनन्त जन्मोंके संचित कर्म-समुदायका नाश करके भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, अपनी मुक्ति कर सकते हैं। अगर यही माना जाय कि कौन-सा प्राणी आगे किस गतिमें जायगा—ऐसा भगवान्का संकल्प है, तो फिर अपना उद्धार करनेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता ही नहीं रहेगी और 'ऐसा करो, ऐसा मत करो'—यह भगवान्, सन्त, शास्त्र, गुरु आदिका उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा। इसके सिवाय 'जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताकी उपासना करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ कर देता हूँ' (सातवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक) और 'अन्त-समयमें मनुष्य जिस-जिस भावका स्मरण करके शरीर छोड़ता है, वह उस-उसको ही प्राप्त होता है' (आठवें अध्यायका छठा श्लोक)—इस तरह उपासना और अन्तकालीन स्मरणमें स्वतन्त्रता भी नहीं रहेगी, जो भगवान्ने मनुष्यमात्रको दे रखी है।
बिना कारण कृपा करनेवाले प्रभु जीवको मनुष्यशरीर देते हैं*, जिससे यह जीव मनुष्यशरीर पाकर स्वतन्त्रतासे अपना कल्याण कर ले। गीतामें ग्यारहवें अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें जैसे भगवान्ने अर्जुनसे कहा—'मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' अर्थात् मेरे द्वारा ये पहले ही मारे जा चुके हैं, तू केवल निमित्तमात्र बन जा। ऐसे ही मनुष्यमात्रको विवेक और उद्धारकी पूरी सामग्री देकर भगवान्ने कहा है कि तू अपना उद्धार कर ले अर्थात् अपने उद्धारमें तू केवल निमित्तमात्र बन जा, मेरी कृपा तेरे साथ है। इस मनुष्यशरीररूपी नौकाको पाकर मेरी कृपारूपी अनुकूल हवासे जो भवसागरको नहीं तरता अर्थात् अपना
- कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईम बिनु हेतु सनेही॥ (मानस ७।४४।३)
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
५५९
उद्धार नहीं करता, वह आत्महत्यार है—‘मयानुकूलेन न भस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तेरेत् स आत्मह’ (श्रीमद्भा० ११।२०।१७)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि जो परमात्माको सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण देखता है, वह अपनी हत्या नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त होता है (तेरहवें अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक)। इससे भी यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर अपना उद्धार करनेका अधिकार, सामर्थ्य, समझ आदि पूरी सामग्री मिलती है। ऐसा अमूल्य अवसर पाकर भी जो अपना उद्धार नहीं करता, वह अपनी हत्या करता है और इसीसे वह जन्म-मरणमें जाता है। अगर यह जीव मनुष्यशरीर पाकर शास्त्र और भगवान्से विरुद्ध न चले तथा मिली हुई सामग्रीका ठीक-ठीक उपयोग करे, तो इसकी मुक्ति स्वतःसिद्ध है। इसमें कोई बाधा लग ही नहीं सकती।
मनुष्यके लिये यह खास बात है कि भगवान्ने कृपा करके जो सामर्थ्य, समझ आदि सामग्री दी है, उसका मैं दुरुपयोग नहीं करूँगा, भगवान्के सिद्धान्तके विरुद्ध नहीं चलूँगा—ऐसा वह अदल निश्चय कर ले और उस निश्चयपर डटा रहे। अगर अपनी असामर्थ्यसे कभी दुरुपयोग भी हो जाय तो मनमें उसकी जलन पैदा हो जाय और भगवान्से कह दे कि ‘हे नाथ! मेरेसे गलती हो गयी, अब ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा। हे नाथ! ऐसा बल दो, जिससे कभी आपके सिद्धान्तसे विपरीत न चलूँ’ तो उसका प्रायश्चित्त हो जाता है और भगवान्से मदद मिलती है।
परिशिष्ट भाव —यहाँ शंका हो सकती है कि जब भगवान् सब जीवोंको जानते ही हैं तो फिर जिसको बद्ध जानते हैं, वह बद्ध ही रहेगा और जिसको मुक्त जानते हैं, वही मुक्त होगा; क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है! यह शंका वस्तुतः संसारकी सत्ता और महत्ताको लेकर (हमारी दृष्टिमें) है। वास्तवमें भगवान् और महात्मा—दोनोंकी ही दृष्टिमें संसार नहीं है, प्रत्युत केवल भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’। हमने ही अहम्के कारण संसारको सत्ता और महत्ता दे रखी है। इसलिये भगवान् हमारी भाषामें भूत-भविष्य-वर्तमानकी बात कहते हैं। अगर वे हमारी भाषामें नहीं बोलेंगे तो हम समझेंगे कैसे? जैसे, हमें अंग्रेजी भाषा सिखानेवाला अगर अंग्रेजी भाषामें ही बोले तो हम अंग्रेजी सीख ही नहीं सकेंगे।
भगवान्का ज्ञान नित्य है। सब कुछ भगवान्के ज्ञानके अन्तर्गत है। उनके ज्ञानसे बाहर कुछ भी नहीं है। भगवान्के ज्ञानमें उनके सिवाय कुछ नहीं है—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिकिंचिदस्ति’ (गीता ७।७)। जीवने ही अहम्के कारण (अज्ञानसे) जगत्को धारण कर रखा है—‘यथेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। अतः बन्धन और मोक्ष जीवके ही बनाये हुए हैं। तत्त्वसे न बन्धन है, न मोक्ष; किन्तु केवल परमात्मा ही हैं*।
दो बार ‘च’ पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी काल स्थायी नहीं है। न भूतकाल सदा रहता है, न वर्तमान सदा
- न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षूर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ (आत्मोपनिषद् ३१)
‘न प्रलय है और न उत्पत्ति है, न बद्ध है और न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त है—यही परमार्थता अर्थात् वास्तविक तत्त्व है।’
मनुष्यकी असामर्थ्य दो तरहसे होती है—एक असामर्थ्य यह होती है कि वह कर ही नहीं सकता; जैसे—किसी नौकरसे कोई मालिक यह कह दे कि तुम इस मकानको उठाकर एक मीलतक ले जाकर रख दो, तो वह यह काम कर ही नहीं सकता। दूसरी असामर्थ्य यह होती है कि वह कर तो सकता है और करना चाहता भी है, फिर भी समयपर प्रमादवश नहीं करता। यह असामर्थ्य साधकमें आती रहती है। इसको दूर करनेके लिये साधक भगवान्से कहे कि ‘हे नाथ! मैं ऐसा प्रमाद फिर कभी न करूँ, ऐसी मेरेको शक्ति दो।’
भगवान्की ही दी हुई स्वतन्त्रताके कारण भगवान् ऐसा संकल्प कभी कर ही नहीं सकते कि इस जीवके इतने जन्म होंगे। इतना ही नहीं, चर-अचर अनन्त जीवोंके लिये भी भगवान् ऐसा संकल्प नहीं करते कि उनके अनेक जन्म होंगे। हाँ, यह बात जरूर है कि मनुष्यके सिवाय दूसरे प्राणियोंके पीछे परम्परासे कर्म-फलोंका ताँता लगा हुआ है, जिससे वे बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। ऐसी परम्परामें पड़े हुए जीवोंमेंसे कोई जीव किसी कारणसे मनुष्यशरीरमें अथवा किसी अन्य योनिमें भी प्रभुके चरणोंकी शरण हो जाता है, तो भगवान् उसके अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट कर देते हैं— कोटि बिप्र बधु लागहिं जाहू। आरुं सरन तजउं नहिं ताहू॥ सनमुख होइ जीव मोहिजबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस ५।४४।१)
५६०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
रहता है और न भविष्य सदा रहता है, पर भगवान् सदा रहते हैं। जैसे भूतकाल और भविष्यकाल अभी नहीं हैं, ऐसे ही वर्तमानकाल भी नहीं है। भूतकाल और भविष्यकालकी सन्धिको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। पाणिनि-व्याकरणका एक सूत्र है—‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ (३।३।१३१) अर्थात् वर्तमानसामीप्य भी वर्तमानकी तरह होता है। जैसे, भूतकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी आया हूँ’ और भविष्यकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी जा रहा हूँ’—यह वर्तमानसामीप्य है। वास्तवमें वर्तमानसामीप्यको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। अगर वर्तमानकाल वास्तवमें होता तो वह कभी भूतकालमें परिणत नहीं होता। वास्तवमें काल वर्तमान नहीं है, प्रत्युत भगवान् ही वर्तमान हैं। तात्पर्य है कि जो प्रतिक्षण बदलता है, वह वर्तमान नहीं है, प्रत्युत जो कभी नहीं बदलता, वही वर्तमान है। इसलिये भगवान्ने श्लोकके आरम्भमें वर्तमान-क्रिया दी है—‘वेदाहम्’ (मैं जानता हूँ)। भगवान् भूत, भविष्य और वर्तमान—सबमें सदा वर्तमान हैं, पर भगवान्में न भूत है, न भविष्य है और न वर्तमान है। भगवान्का वर्तमानपना कालके अधीन नहीं है; क्योंकि भगवान् कालातीत हैं। काल न भगवान्की दृष्टिमें है, न महात्माकी दृष्टिमें।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह कहा कि मुझे कोई भी नहीं जानता, तो भगवान्को न जाननेमें मुख्य कारण क्या है? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्रन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गं यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥
कारण कि—
| भारत | = हे भरतवंशमें उत्पन्न | द्रन्द्वमोहेन | = द्वन्द्व-मोहसे (मोहित) | सर्गं | = संसारमें (अनादिकालसे) |
|---|---|---|---|---|---|
| परन्तप | = शत्रुतापन अर्जुन! | सम्मोहम् | = सम्पूर्ण प्राणी | यान्ति | = प्राप्त हो रहे हैं। |
| इच्छा-द्वेषसमुत्थेन | = इच्छा (राग) और |
व्याख्या —‘इच्छाद्वेषसमुत्थेन ..... सर्गं यान्ति परन्तप’—इच्छा और द्वेषसे द्रन्द्वमोह पैदा होता है, जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान्से बिलकुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होनेसे बार-बार संसारमें जन्म लेते हैं।
मनुष्यको संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्में लगनेकी आवश्यकता है। भगवान्में न लगनेमें बड़ी बाधा क्या है? यह मनुष्यशरीर विवेक-प्रधान है; अतः मनुष्यकी प्रवृत्ति और निवृत्ति पशु-पक्षियोंकी तरह न होकर अपने विवेकके अनुसार होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर राग और द्वेषको लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है, जिससे उसका पतन होता है।
मनुष्यकी दो मनोवृत्तियाँ हैं—एक तरफ लगाना और एक तरफसे हटाना। मनुष्यको परमात्मामें तो अपनी वृत्ति लगानी है और संसारसे अपनी वृत्ति हटानी है अर्थात् परमात्मासे तो प्रेम करना है और संसारसे वैराग्य करना है। परन्तु इन दोनों वृत्तियोंको जब मनुष्य केवल संसारमें ही लगा देता है, तब वही प्रेम और वैराग्य क्रमशः राग
और द्वेषका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे मनुष्य संसारमें उलझ जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है। फिर भगवान्की तरफ चलनेका अवसर ही नहीं मिलता। कभी-कभी वह सत्संगकी बातें भी सुनता है, शास्त्र भी पढ़ता है, अच्छी बातोंपर विचार भी करता है, मनमें अच्छी बातें पैदा हो जाती हैं तो उनको ठीक भी समझता है। फिर भी उसके मनमें रागके कारण यह बात गहरी बैठी रहती है कि मुझे तो सांसारिक अनुकूलताको प्राप्त करना है और प्रतिकूलताको हटाना है, यह मेरा खास काम है; क्योंकि इसके बिना मेरा जीवन-निर्वाह नहीं होगा। इस प्रकार वह हृदयमें दृढ़तासे राग-द्वेषको पकड़े रखता है; जिससे सुनने, पढ़ने और विचार करनेपर भी उसकी वृत्ति राग-द्वेषरूप द्रन्द्वको नहीं छोड़ती। इसीसे वह परमात्माकी तरफ चल नहीं सकता।
द्रन्द्वोंमें भी अगर उसका राग मुख्यरूपसे एक ही विषयमें हो जाय, तो भी ठीक है। जैसे, भक्त बिल्बमंगलकी वृत्ति चिन्तामणि नामक वेश्यामें लग गयी,
श्लोक २७]
- साधक-संजीवनी *
५६१
तो उनकी वृत्ति संसारसे तो हट ही गयी। जब वेश्याने यह ताड़ना की—‘ऐसे हाड़-मांसके शरीरमें तू आकृष्ट हो गया, अगर भगवान्में इतना आकृष्ट हो जाता तो तू निहाल हो जाता’ तब उनकी वृत्ति वेश्यासे हटकर भगवान्में लग गयी और उनका उद्धार हो गया। इसी तरहसे गोपियोंका भगवान्में राग हो गया, तो वह राग भी कल्याण करनेवाला हो गया। शिशुपालका भगवान्के साथ वैर (द्वेष) रहा तो वैरपूर्वक भगवान्का चिन्तन करनेसे भी उसका कल्याण हो गया। कंसको भगवान्से भय हुआ, तो भयवृत्तिसे भगवान्का चिन्तन करनेसे उसका भी कल्याण हो गया। हाँ, यह बात जरूर है कि वैर और भयसे भगवान्का चिन्तन करनेसे शिशुपाल और कंस भक्तिके आनन्दको नहीं ले सके। तात्पर्य यह है कि किसी भी तरहसे भगवान्की तरफ आकर्षण हो जाय तो मनुष्यका उद्धार हो जाता है। परन्तु संसारमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, ठीक-बेठीक, अनुकूल-प्रतिकूल आदि द्रष्ट्र रहनेसे मूढ़ता दृढ़ होती है और मनुष्यका पतन हो जाता है।
दूसरी रीतिसे यों समझें कि संसारका सम्बन्ध द्रष्ट्रसे दृढ़ होता है। जब कामनाको लेकर मनोवृत्तिका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है, तब सांसारिक अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर राग-द्वेष हो जाते हैं अर्थात् एक ही पदार्थ कभी ठीक लगता है, कभी बेठीक लगता है; कभी उसमें राग होता है, कभी द्वेष होता है, जिनसे संसारका सम्बन्ध दृढ़ हो जाता है। इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें ‘निर्द्वन्द्वः’ (२।४५) पदसे द्रष्ट्ररहित होनेकी आज्ञा दी है। निर्द्वन्द्व पुरुष सुखपूर्वक मुक्त होता है—‘निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (५।३)। सुख-दुःख आदि द्रष्ट्रोंसे रहित होकर भक्तजन अनिवासी पदको प्राप्त होते हैं—‘द्रष्ट्रैर्विमुक्ताः सुखदुःख-सञ्जर्गैश्चन्त्यमूहाः पदमव्ययं तत्’ (१५।५)। भगवान्ने द्रष्ट्रको मनुष्यका खास शत्रु बताया है (तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। जो द्रष्ट्रमोहसे रहित होते हैं, वे दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं (सातवें अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक) इत्यादि रूपसे गीतामें द्रष्ट्ररहित होनेकी बात बहुत बार आयी है।
जन्म-मरणमें जानेका कारण क्या है? शास्त्रोंकी दृष्टिसे तो जन्म-मरणका कारण अज्ञान है; परन्तु सन्तवाणीको देखा जाय तो जन्म-मरणका खास कारण रागके कारण प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग है। फलेच्छापूर्वक शास्त्रविहित कर्म करनेसे और प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् भगवदाज्ञा-विरुद्ध कर्म करनेसे सत्-असत् योनियोंकी
प्राप्ति होती है अर्थात् देवताओंकी योनि, चौरासी लाख योनि और नरक प्राप्त होते हैं।
प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेसे सम्मोह अर्थात् जन्म-मरण मिट जाता है। उसका सदुपयोग कैसे करें? हमारेको जो अवस्था, परिस्थिति मिली है, उसका दुरुपयोग न करनेका निर्णय किया जाय कि ‘हम दुरुपयोग नहीं करेंगे अर्थात् शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम नहीं करेंगे।’ इस प्रकार रागरहित होकर दुरुपयोग न करनेका निर्णय होनेपर सदुपयोग अपने-आप होने लगा। अर्थात् शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुकूल काम होने लगा। जब सदुपयोग होने लगा तो उसका हमें अभिमान नहीं होगा। कारण कि हमने तो दुरुपयोग न करनेका विचार किया है, सदुपयोग करनेका विचार तो हमने किया ही नहीं, फिर करनेका अभिमान कैसे? इससे तो कर्तृत्व-अभिमानका त्याग हो जायगा। जब हमने सदुपयोग किया ही नहीं तो उसका फल भी हम कैसे चाहेंगे? क्योंकि सदुपयोग तो हुआ है, किया नहीं। अतः इससे फलेच्छाका त्याग हो जायगा। कर्तृत्व-अभिमान और फलेच्छाका त्याग होनेसे अर्थात् बन्धनका अभाव होनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है।
प्रायः साधकोंमें यह बात गहराईसे बैठी हुई है कि साधन-भजन, जप-ध्यान आदि करनेका विभाग अलग है और सांसारिक काम-धंधा करनेका विभाग अलग है। इन दो विभागोंके कारण साधक भजन-ध्यान आदिको तो बढ़ावा देते हैं, पर सांसारिक काम-धंधा करते हुए राग-द्वेष, काम-क्रोध आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते, प्रत्युत ऐसी दृढ़ भावना बना लेते हैं कि काम-धंधा करते हुए तो राग-द्वेष होते ही हैं, ये मिटनेवाले थोड़े ही हैं। इस भावनासे बड़ा भारी अनर्थ यह होता है कि साधकके राग-द्वेष बने रहते हैं, जिससे उसके साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। वास्तवमें साधक चाहे पारमार्थिक कार्य करें, चाहे सांसारिक कार्य करें उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं रहने चाहिये।
पारमार्थिक और सांसारिक क्रियाओंमें भेद होनेपर भी साधकके भावमें भेद नहीं होना चाहिये अर्थात् पारमार्थिक और सांसारिक दोनों क्रियाएँ करते समय साधकका भाव एक ही रहना चाहिये कि ‘मैं साधक हूँ और मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है।’ इस प्रकार क्रियाभेद तो रहेगा ही और रहना भी चाहिये, पर भावभेद नहीं रहेगा। भावभेद न रहनेसे अर्थात् एक भगवत्प्राप्तिका ही भाव (उद्देश्य) रहनेसे पारमार्थिक और सांसारिक दोनों ही क्रियाएँ साधन बन जायँगी।