भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

कभी नाचता है और कभी चुप होकर शान्त हो जाता है।* इस तरह उसका जीवन अलौकिक आनन्दसे परिपूर्ण हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। वह सर्वथा पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसके लिये किसी भी अवस्थामें, किसी भी परिस्थितिमें कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता।

जो भक्तिमार्गपर चलता है, वह 'यह सत् है और यह असत् है' इस विवेकको लेकर नहीं चलता। उसमें विवेक-ज्ञानकी प्रधानता नहीं रहती। उसमें केवल भगवद्भावकी ही प्रधानता रहती है। केवल भगवद्भावकी प्रधानता रहनेके कारण उसके लिये यह सब संसार चिन्मय हो जाता है। उसकी दृष्टिमें जडता रहती ही नहीं। भगवान्में तल्लीनता होनेसे भक्तका शरीर भी जड नहीं रहता, प्रत्युत चिन्मय हो जाता है, जैसे—मीराबाईका शरीर (चिन्मय होनेसे) भगवान्के विग्रहमें लीन हो गया था।

ज्ञानमार्गमें जहाँ सत्-असत्का विवेक होता है, वहाँ परिणाममें सत्-असत् दोकी सत्ता नहीं रहती, केवल सत्-स्वरूप ही रह जाता है। परन्तु भक्तिमार्गमें सत्-असत् सब कुछ भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। फिर भक्त भगवत्स्वरूप संसारकी सेवा करता है। सेवामें पहले तो सेवक, सेवा और सेव्य—ये तीन होते हैं। परन्तु जब भगवद्भावकी अत्यधिक गद्गदा हो जाती है, तब सेवक-भावकी विस्मृति हो जाती है। फिर भक्त स्वयं सेवारूप होकर सेव्यमें लीन हो जाता है। केवल एक भगवत्सत् ही शेष रह जाता है। इस तरह भगवद्भावमें तल्लीन हुए भगवान्के प्रेमी भक्त जहाँ-कहीं भी विचरते हैं, वहाँ उनके दर्शन, स्पर्श, भाषण आदिका प्राणियोंपर बड़ा असर पड़ता है।

जबतक मनुष्योंकी पदार्थोंमें भोगबुद्धि रहती है, तबतक उनको उन पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप समझमें नहीं आता। परन्तु जब भोगबुद्धि सर्वथा हट जाती है, तब केवल भगवत्स्वरूप ही देखनेमें आ जाता है।

मार्मिक बात

'वासुदेवः सर्वम्'—इस तत्त्वको समझनेके दो प्रकार हैं—(१) संसारका अभाव करके परमात्माको रखना

अर्थात् संसार नहीं है और परमात्मा है, (२) सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं। इसमें जो परिवर्तन दीखता है, वह भी भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि भगवान्के सिवाय उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

उपर्युक्त दोनों ही प्रकार साधकोंके लिये हैं। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें आकर्षण (राग) है, उसको 'यह सब कुछ नहीं है, केवल परमात्मा ही है'—इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें किंचिन्मात्र भी आकर्षण नहीं है और जो केवल भगवान्के स्मरण, चिन्तन, जप, कीर्तन आदिमें लगा रहता है, उसको 'संसाररूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। वास्तवमें देखा जाय तो ये दोनों प्रणालियाँ तत्त्वसे एक ही हैं। इन दोनोंमें फरक इतना ही है कि जैसे सोनेमें गहने और गहनोंके नाम, रूप, आकृति आदि अलग-अलग होते हुए भी सब कुछ सोना-ही-सोना जानना। जहाँपर संसारका अभाव करके परमात्माको तत्त्वसे जानना है, वहाँ 'विवेक' की प्रधानता है; और जहाँ संसारको भगवत्स्वरूप मानना है, वहाँ 'भाव' की प्रधानता है। निर्गुणके उपासकोंमें विवेककी प्रधानता होती है और सगुणके उपासकोंमें भावकी प्रधानता होती है।

संसारका अभाव करके परमात्मतत्त्वको जानना भी तत्त्वसे जानना है और संसारको भगवत्स्वरूप मानना भी तत्त्वसे जानना है। कारण कि वास्तवमें तत्त्व एक ही है। फरक इतना ही है कि ज्ञानमार्गमें जाननेकी प्रधानता रहती है और भक्तिमार्गमें माननेकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानमार्गमें माननेको भी जाननेके अर्थमें लिया है—'इति मत्वा न सज्जते' (गीता ३।२८), और भक्तिमार्गमें जाननेको भी माननेके अर्थमें लिया है (पाँचवें अध्यायका उनीसवाँ, नवें अध्यायका तेरहवाँ, दसवें अध्यायका तीसरा, सातवाँ, चौबीसवाँ, सत्ताईसवाँ और इकतालीसवाँ श्लोक)। इसमें एक खास बात समझनेकी है कि परमात्माको जानना और मानना—दोनों ही ज्ञान हैं तथा संसारको सत्ता देकर संसारको जानना और मानना—दोनों ही अज्ञान हैं।

  • वाग् गदगदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्षणं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उदगायति नृत्यते च मद्भक्तिमुक्तो भुवनं पुनाति॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२४)

'जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करती-करती गदगद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण, प्रभाव और लीलाओंको याद करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बारंबार रोता रहता है, कभी-कभी हँसने लग जाता है, कभी लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है, कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।'