भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

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भी होती है। जैसे, सोनेके गहने आदिमें सोना थे और अन्तमें सोना रहेंगे, तो गहनोंमें दूसरी चीज कहाँसे आयेगी? केवल सोना-ही-सोना है। मिट्टीसे बननेवाले बर्तन पहले मिट्टी थे और अन्तमें मिट्टी हो जायेंगे, तो बीचमें मिट्टीके सिवाय क्या है? केवल मिट्टी-ही-मिट्टी है। खाँड़से बने हुए खिलौने पहले खाँड़ थे और अन्तमें खाँड़ ही हो जायेंगे, तो बीचमें खाँड़के सिवाय क्या है? केवल खाँड़-ही-खाँड़ है। इसी तरह सुष्टिके पहले भगवान् थे और अन्तमें भगवान् ही रहेंगे; तो बीचमें भगवान्के सिवाय क्या है? केवल भगवान्-ही-भगवान् हैं। जैसे सोनेको चाहे गहनोंके रूपमें देखें, चाहे पासेके रूपमें देखें, चाहे वरकके रूपमें देखें, है वह सोना ही। ऐसे ही संसारमें अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें एक भगवान् ही हैं।

जबतक मनुष्यकी दृष्टि गहनोंकी तरफ, उसकी आकृतियोंकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक 'यह सोना ही है' इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही जबतक मनुष्यकी दृष्टि संसारकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक 'सब कुछ भगवान् ही हैं' इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। परन्तु जब गहनोंकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब गहनोंमें सोनेकी भावना नहीं होती, प्रत्युत 'यह सोना ही है' ऐसी भावना होती है। ऐसे ही जब संसारकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब संसारमें भगवान्की भावना नहीं होती, प्रत्युत 'सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं' ऐसी भावना होती है। कारण कि संसारमें भगवान्की भावना करनेसे संसारकी सत्ता साथमें रहती है अर्थात् संसारकी भावना रखते हुए उसकी सत्ता मानते हुए, उसमें भगवान्की भावना करते हैं। अतः जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, संसारको महत्त्व देते हैं, तबतक संसारमें भगवान्की भावना करते रहनेपर भी 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव नहीं होता। ब्रह्मभूत मनुष्य निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है (पाँचवें

अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत योगीको उत्तम सुख मिलता है (छठे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत भगवान्की पराभक्तिको प्राप्त होता है और उस भक्तिसे तत्त्वको जानकर उसमें प्रवेश करता है (अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ-पचपनवाँ श्लोक)— गीताकी दृष्टिसे ये तीनों ही अवस्थाएँ हैं। अवस्थाओंमें परिवर्तन होता है। परन्तु 'वासुदेवः सर्वम्'—यह अवस्था नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्व है। इसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

यह जो कुछ संसार दीखता है, सब भगवान्का ही स्वरूप है। भगवान्के सिवाय इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता थी नहीं, है नहीं और कभी होगी भी नहीं। अतः देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, वह सब-का-सब भगवत्स्वरूप ही है। भगवान्की आज्ञा है—

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्णातेऽन्यैरपीन्द्रियैः।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वर्मजसा॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ११।१३।२४)

'मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक समझ लीजिये।'

इस आज्ञाके अनुसार ही उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमीका जीवन हो जाता है। वह सब जगह भगवान्को ही देखता है—'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति' (गीता ६।३०)। वह सब कुछ करता हुआ भी भगवान्में ही रहता है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१)।

किसीको एक जगह भी अपनी प्रिय वस्तु मिल जाती है, तो उसको बड़ी प्रसन्नता होती है, फिर जिसको सब जगह ही अपने प्यारे इष्टदेवका अनुभव होता है,* उसकी प्रसन्नताका, आनन्दका क्या ठिकाना? उस आनन्दमें विभोर होकर भगवान्का प्रेमी भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है,

  • जित देखों तित स्याममई है।

स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घन घटा छड़ है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है॥ हैं बीरी, कै लोगन ही की, स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद सार काम बिजई है॥ नीलकंठको कंठ स्याम है, मनहुँ स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीप सिखापर स्यामतई है॥ नर देबनकी कोन कथा है, अलख ब्रह्मछवि स्याममई है॥