श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
तीसरा श्लोक)। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योगोंसे पाप नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह निकला कि अन्तिम मनुष्यजन्म केवल कल्याणके लिये ही मिला है।
मनुष्यजन्ममें सत्संग मिल जाय, गीता—जैसे ग्रन्थसे परिचय हो जाय, भगवन्नामसे परिचय हो जाय तो साधकको यह समझना चाहिये कि भगवान्ने बहुत विशेषतासे कृपा कर दी है; अतः अब तो हमारा उद्धार होगा ही, अब आगे हमारा जन्म-मरण नहीं होगा। कारण कि अगर हमारा उद्धार नहीं होना होता, तो ऐसा मौका नहीं मिलता। परन्तु 'भगवान्की कृपासे उद्धार होगा ही'—इसके भरोसे साधन नहीं छोड़ना चाहिये, प्रत्युत तत्परता और उत्साहपूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। समय सार्थक बने, कोई समय खाली न जाय—ऐसी सावधानी हरदम रखनी चाहिये। परन्तु अपने कल्याणकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि अबतक जिसने इतना प्रबन्ध किया है, वही आगे भी करेगा। जैसे, किसीने भोजनके लिये निमन्त्रण दे दिया, आसन बिछा दिया, आसनपर बैठा दिया, पतल दे दी, लोटेमें जल भरकर पासमें रख दिया। अब कोई चिन्ता करे कि यह व्यक्ति भोजन देगा कि नहीं देगा, तो यह बिलकुल गलतीकी बात है। कारण कि अगर भोजन नहीं देना होता तो वह निमन्त्रण क्यों देता? भोजनकी तैयारी क्यों करता? परन्तु जब उसने निमन्त्रण दिया है, बुलाया है, तैयारी की है, तब उसको भोजन देना ही पड़ेगा। हम भोजनकी चिन्ता क्यों करें? अब तो बस,
ज्यों-ज्यों भोजनके पदार्थ आर्ये, त्यों-त्यों उनको पाते जायँ। ऐसे ही भगवान्ने हमको मनुष्यशरीर दिया है और उद्धारकी सब सामग्री (सत्संग, भगवन्नाम आदि) जुटा दी है, तो हमारा उद्धार होगा ही, अब तो हम संसार-समुद्रके किनारे आ गये हैं—ऐसा दृढ़ विश्वास करके निमित्तमात्र बनकर साधन करना चाहिये।
जिसके पूर्वजन्मोंके पुण्य होते हैं, वही भगवान्की तरफ चल सकता है—अगर ऐसा माना जाय तो पूर्वजन्मोंके पाप-पुण्योंका फल तो पशु-पक्षी-कीट-पतंग आदि योनि-वाले प्राणी भोगते ही हैं, फिर मनुष्यमें और उन प्राणियोंमें क्या फरक रहेगा? भगवान्का कृपा करके मनुष्यशरीर देना कहीं सार्थक होगा? तथा मनुष्यजन्मकी विलक्षणता, महिमा क्या होगी? मनुष्यजन्मकी महिमा तो इसीमें है कि मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर अपने कल्याणके मार्गमें लग जाय।१
'वासुदेवः सर्वम्'२—महासर्गके आदिमें एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें हो जाते हैं—'सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छान्दोग्य० ६।२।३) और अन्तमें अर्थात् महाप्रलयमें एक भगवान् ही शेष रह जाते हैं—'शिष्यते शेषसंज्ञः' (श्रीमद्भा० १०।३।२५)। इस प्रकार जब आदि और अन्तमें एक भगवान् ही रहते हैं, तब बीचमें दूसरा कहाँसे आया? क्योंकि संसारकी रचना करनेमें भगवान्के पास अपने सिवाय कोई सामग्री नहीं थी, वे तो स्वयं संसारके रूपसे प्रकट हुए हैं। इसलिये यह सब वासुदेव ही है।
जो चीज आदि और अन्तमें होती है, वही चीज मध्यमें
१-(१) लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमित्यमपीह धीरः।
तूर्णं यतेन न पतेदमुत्प्लुयावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० ११।१।२९)
'अनेक जन्मोंके बाद इस परमपुरुषार्थके साधनरूप मनुष्यशरीरको, जो अनित्य होनेपर भी अत्यन्त दुर्लभ है, पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शीघ्र-से-शीघ्र, मृत्यु आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर ले। विषयभोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें इस अमूल्य जीवनको नहीं खोना चाहिये।'
(२) नुदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलंन नभस्वतेतिरितं पुमान् भवाभिर्व न तेरतु स आत्महा॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।१७)
'यह मनुष्यशरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसारसागरसे पार होनेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है, जिसे गुरुरूप नाविक चलाता है और मैं (भगवान्) वायुरूप होकर इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ानेमें सहायता देता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो मनुष्य इस संसारसागरसे पार नहीं होता, वह अपनी आत्माका हनन करनेवाला अर्थात् पतन करनेवाला है।'
२-यहाँ 'वासुदेवः' शब्द पुँल्लिंगमें और 'सर्वम्' शब्द नपुंसकलिंगमें आया है। यहाँ 'वासुदेवः सर्वः' भी कह सकते थे; परन्तु ऐसा न कहकर 'वासुदेवः सर्वम्' कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि 'सर्वम्' शब्दमें स्त्री, पुरुष, नपुंसक, स्थावर-जंगम आदि सबका समाहार हो जाता है।