भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 540

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३९

होता है।' इस तरह मनुष्यको जिस किसी भावका स्मरण करनेमें जो स्वतन्त्रता दी गयी है, इससे मालूम होता है कि भगवान्ने मनुष्यको पूरा अधिकार दिया है अर्थात् मनुष्यके उद्धारके लिये भगवान्ने अपनी तरफसे यह अन्तिम जन्म दिया है। अब इसके आगे यह नये जन्मकी तैयारी कर ले अथवा अपना उद्धार कर ले—इसमें यह सर्वथा स्वतन्त्र है*। इस बातको लेकर गीता मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्तिका अधिकारी मानती है और ढंकेकी चोटके साथ, खुले शब्दोंमें कहती है कि वर्तमानका दुराचारी-से-दुराचारी, पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनिमें जन्मा हुआ पापयोन और चारों वर्णवाले स्त्री-पुरुष—ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकते हैं (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक)। गीताने (नवें अध्यायके बत्तीसवें श्लोकमें) ऐसा विचित्र 'पापयोन' शब्द कहा है, जिसमें शूद्रसे भी नीचे कहे और माने जानेवाले चाण्डाल, यवन आदि तथा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी लिये जा सकते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि पशु-पक्षी आदि मनुष्येतर प्राणियोंमें परमात्माकी तरफ चलनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु परमात्माके अंश होनेसे उनके लिये परमात्माकी तरफसे मना नहीं है। उनमेंसे बहुत-से प्राणी भगवान् और संत-महापुरुषोंकी कृपासे तथा तीर्थ और भगवद्भाक्के प्रभावसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। देवता भोगयोन हैं; वे भोगोंमें ही लगे रहते हैं, इसलिये उनको 'अपना उद्धार करना है' ऐसा विचार नहीं होता। परन्तु वे अगर किसी कारणसे भगवान्की तरफ लग जायें तो उनका भी उद्धार हो जाता है। इन्द्रको भी ज्ञान प्राप्त हुआ था—ऐसा शास्त्रोंमें आता है।

भगवान्की तरफसे मनुष्यमात्रका जन्म अन्तिम जन्म है। कारण कि भगवान्का यह संकल्प है कि मेरे दिये हुए इस शरीरसे यह अपना कल्याण कर ले। अतः यह अपना कोई संकल्प न रखकर केवल निमित्तमात्र बन जाय, तो भगवान्के संकल्पसे इसका कल्याण हो जाय। जैसे ग्यारहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे—'मया हार्तास्त्वं जहि'। तू चिन्ता मत कर—'मा व्यथिष्ठाः।' तू युद्ध कर, तेरी विजय होगी—'युध्यस्व जेतोसि।' इसी तरहसे भगवान्ने कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है। अगर

मनुष्य भगवान्से विमुख होकर संसारके रागमें न फँसे, तो भगवान्के उस संकल्पसे अनायास ही मुक्त हो जाय।

भगवान्का संकल्प ऐसा नहीं है कि साधककी इच्छाके बिना उसका कल्याण हो जाय अर्थात् जैसे शाग या वरदान दिया जाता है, वैसा यह संकल्प नहीं है। तो फिर कैसा है यह संकल्प? भगवान्ने मनुष्यको अपना कल्याण करनेकी स्वतन्त्रता इस मनुष्यजन्ममें दी है। अगर यह प्राणी उस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे अर्थात् भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चले, कम-से-कम अपने विवेकके विरुद्ध न चले तो उससे भगवान् और शास्त्रोंके अनुकूल चलना स्वाभाविक होगा। कारण कि भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चलनेपर दो अवस्थाओंमेंसे एक अवस्था स्वाभाविक होगी—या तो वह शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धिसे कुछ नहीं करेगा या केवल भगवान् और शास्त्रके अनुकूल ही करेगा।

कुछ नहीं करनेकी अवस्थामें अर्थात् कुछ करनेकी रुचि न रहनेकी अवस्थामें मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। कारण कि कुछ-न-कुछ करनेकी इच्छासे ही कर्तृत्वभिमान उत्पन्न होकर अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और अपने लिये करनेसे फलके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। कुछ भी न करनेसे न कर्तृत्व-भिमान होगा और न फलेच्छा होगी, प्रत्युत स्वरूपमें स्वतः स्थिति होगी।

शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेकी अवस्थामें करनेका प्रवाह मिट जाता है और क्रिया तथा पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे नयी कामना होगी नहीं और पुराना राग मिट जायगा तो स्वतः बोध हो जायगा—'तत्त्वव्यं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति' (गीता ४।३२)।

गीतामें आया है—निष्कामभावसे विधिपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मका पालन किया जाय तो अनादिकालसे बने हुए सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे तर जाता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् भक्तको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देते हैं (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)। जो भगवान्को अज-अनादि जानता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है (दसवें अध्यायका

  • नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ (मानस ७।१२१।५)