श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
अर्थाथी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः अपनी स्वतन्त्र सत्ता (अहंता) कम होती जाती है और ज्ञानीमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता बिलकुल नहीं रहती। इसलिये ‘त्वात्मैव ’ पदका तात्पर्य है कि प्रेमी भक्तकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रही, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहे अर्थात् प्रेमीके रूपमें साक्षात् भगवान् ही हैं—‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ’ (नारद० ४१)। यह आत्मीयता भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत है, जो ज्ञानयोगके अद्वैतसे भी सुन्दर है—‘भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ’ (बोधसार, भक्ति० ४२)।
‘भामेवानुत्तमां गतिम् ’—भगवान्से बढ़कर उत्तम गति और कोई नहीं है। ‘गति’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—ज्ञान, गमन और प्राप्ति। यहाँ ‘गति’ शब्द प्राप्तिके अर्थमें आया है। अन्तिम प्रापणीय तत्त्व होनेसे भगवान् सर्वोत्तम गति हैं।
‘आस्थितः ’—एक दृढ़ता अभ्याससे होती है और एक दृढ़ता स्वतः होती है। जैसे मात्र प्राणियोंकी ‘मैं हूँ’—इस प्रकार अपने-आपमें स्वतः दृढ़ स्थिति होती है, ऐसे ही ज्ञानी भक्तकी भगवान्में स्वतः दृढ़ स्थिति होती है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहे हुए ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी वास्तविकता और उसके भजनका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्नां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ ११ ॥
| बहूनाम् | = बहुत | सर्वम् | = सब कुछ | माम् | = मेरे |
|---|---|---|---|---|---|
| जन्मनाम् | = जन्मोंके | वासुदेवः | = परमात्मा | प्रपद्यते | = शरण होता है, |
| अन्ते | = अन्तिम | ही हैं— | सः | = वह | |
| जन्ममें अर्थात् | इति | = इस प्रकार | महात्मा | = महात्मा | |
| मनुष्यजन्ममें | ज्ञानवान् | = (जो) ज्ञानवान् | सुदुर्लभः | = अत्यन्त दुर्लभ है। |
व्याख्या —‘बहूनां जन्मनामन्ते ’—मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर देकर उसे जन्म-मरणके प्रवाहसे अलग होकर अपनी प्राप्तिका पूरा अधिकार दिया है। परन्तु यह मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके रागके कारण फिर पुराने प्रवाहमें अर्थात् जन्म-मरणके चक्करमें चला जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसार-वर्त्तनिं ’ (गीता १।३)। जहाँ भगवान् आसुरी योनियों और नरकोंके अधिकारियोंका वर्णन करते हैं, वहाँ दुर्गुण-दुराचारोंके कारण भगवत्प्राप्तिकी सम्भावना न दीखनेपर भी भगवान् कहते हैं—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यात्यधमां गतिम् ’ (गीता १६।२०) अर्थात् मेरेको प्राप्त किये बिना ही ये प्राणी अधम गतिको चले गये अर्थात् वे मरनेके बाद मनुष्ययोनियोंमें भी चले जाते तो कम-से-कम मनुष्य तो रह जाते; पर वे मेरी प्राप्तिका पूरा अधिकार प्राप्त करके भी अधम गतिको चले गये!
संतोंकी वाणीमें और शास्त्रोंमें आता है कि मनुष्यजन्म
केवल अपना कल्याण करनेके लिये मिला है, विषयोंका सुख भोगनेके लिये तथा स्वर्गकी प्राप्तिके लिये नहीं। इसलिये गीताने स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवालोंको मूढ़ और तुच्छ बुद्धिवाले कहा है—‘अविपश्चितः ’ (२।४२) और ‘अल्पमेधसाम् ’ (७।२३)।
यह मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म भी है और अन्तिम जन्म भी है। सम्पूर्ण जन्मोंका आरम्भ मनुष्यजन्मसे ही होता है अर्थात् मनुष्यजन्ममें किये हुए पाप चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें भोगनेपर भी समाप्त नहीं होते, बाकी ही रहते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म है। मनुष्यजन्ममें सम्पूर्ण पापोंका नाश करके, सम्पूर्ण वासनाओंका नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं, भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है।
भगवान्ने आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि ‘जो मनुष्य अन्त-समयमें जिस-जिस भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, उस-उस भावको ही वह प्राप्त
१-भक्तिका यह अद्वैत कल्पना नहीं है, प्रत्युत स्वीकृति है। कल्पित अद्वैत तो असत्य होता है, उसमें प्रेम नहीं होता।
२-एहि तन कर फल विषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ (मानस ७।४४।१)