भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 538

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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है—इसका खयाल नहीं रहता। वहाँ दोनों ही प्रेमास्पद हैं और दोनों ही प्रेमी हैं। यही ‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ पदोंका तात्पर्य है।

‘आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्’—क्योंकि जिससे उत्तम गति कोई हो ही नहीं सकती, ऐसे सर्वांपरि मेरेमें ही उसकी दृढ़ स्थिति है।

परिशिष्ट भाव —सांसारिक अर्थार्थी भगवान्को छोड़कर केवल अर्थको ही चाहता है; अतः वह झूठ, कपट, बेईमानी आदिका भक्त होता है। उसके भीतर धनका महत्त्व ज्यादा होनेसे वह उदार नहीं होता, प्रत्युत महान् कृपण होता है। अतः उसके लिये ‘उदार’ शब्द लागू ही नहीं होता। परन्तु जो अर्थार्थी भगवान्का भक्त होता है, उसके भीतर अर्थका महत्त्व न होकर भगवान्का महत्त्व होता है। इसलिये उसमें कृपणता नहीं होती, प्रत्युत उदारता होती है। अतः उसको भगवान्ने यहाँ उदार कहा है। यहाँ उदारभावका अर्थ है—त्याग। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भक्त संसार-(भोग और संग्रह-) को छोड़कर भगवान्में लग गये—यह उनका त्याग है। इसलिये वे सभी उदार हैं—‘उदाराः सर्व एवेते।’ एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध मुख्य होनेसे अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भी आगे चलकर स्वतः ‘ज्ञानी’ हो जाते हैं।

एक मार्मिक बात है कि भगवान्को न मानना कामनासे भी अधिक दोषी है। जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, उनमें यदि कामना रह जाय तो वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९।२१)। परन्तु जो केवल भगवान्का ही भजन करते हैं, उनमें यदि कामना रह भी जाय तो भगवान्की कृपा और भजनके प्रभावसे वे भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। कारण कि मनुष्यका किसी भी तरहसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ जाय तो वह भगवान्को ही प्राप्त होता है*; क्योंकि वह मूलमें भगवान्का ही अंश है।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु—इन तीनोंको ही भगवान्ने यहाँ ‘उदार’ कहा है। परन्तु जो भगवान्के सिवाय अन्यका भजन करनेवाले हैं, उनको भगवान्ने उदार न कहकर ‘अल्पमेधा’ कहा है (गीता—इसी अध्यायका तेईसवाँ श्लोक) और उनके भजनको अविधिपूर्वक किया गया बताया है (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। देवताओंको भगवान्से अलग समझनेके कारण अर्थात् देवताओंमें भगवदबुद्धि न होनेके कारण तथा कामना भी होनेके कारण उनकी उपासना अविधिपूर्वक है। तात्पर्य है कि सबमें भगवदबुद्धि न होना सकामभावसे भी अधिक घातक है; क्योंकि चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ!

तत्त्वज्ञानीकी ब्रह्मसे ‘तात्त्विक एकता’ अर्थात् सधर्मता होती है; परन्तु भक्तकी भगवान्के साथ ‘आत्मीय एकता’ होती है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’। तत्त्वज्ञानीकी तात्त्विक एकता-(सधर्मता-) में जीव और ब्रह्ममें अभेद हो जाता है अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, ऐसे वह भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाता है और एक तत्त्वके सिवाय कुछ नहीं रहता। परन्तु भक्तकी आत्मीय एकतामें जीव और भगवान्में अभिन्नता हो जाती है। अभिन्नतामें भक्त और भगवान् एक होते हुए भी प्रेमके लिये दो हो जाते हैं। उनमें दोनों ही प्रेमी और दोनों ही प्रेमास्पद होते हैं। इसलिये वे दो होते हुए भी एक ही रहते हैं।

जीव परमात्माका अंश है। अतः वह परमात्मासे जितना-जितना दूर जाता है, उतना-उतना अहंकार दृढ़ होता जाता है और वह ज्यों-ज्यों परमात्माकी तरफ आता है, त्यों-त्यों अहंकार मिटता जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहम्की गन्ध रह सकती है। परन्तु प्रेममें परमात्माके साथ अभिन्नता (आत्मीयता) होनेपर जीवका अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और अहंकार सर्वथा मिट जाता है, क्योंकि अहंकार अपरा प्रकृतिका ही कार्य है। इसलिये भगवान्ने कहा है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’।

  • कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः ॥

( श्रीमद्भगवद्गीता ७।१२१ )

‘एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप धोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे।’

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