श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंसारको तत्त्वसे जाननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका
अभाव हो जाता है, और परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर
परमात्माका अनुभव हो जाता है। ऐसे ही संसार भगवत्स्वरूप
है-ऐसा दृढ़तासे माननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव
हो जाता है और फिर संसार संसार-रूपसे न दीखकर
भगवत्स्वरूप दीखने लग जाता है। तात्पर्य है कि
परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेपर जानना और मानना-दोनों
एक हो जाते हैं।
'इति ज्ञानवान्मा प्रपद्यते'-जो प्रतिक्षण बदलने-
वाले संसारकी सत्ताको मानते हैं, वे अज्ञानी हैं, मूढ़ हैं;
परन्तु जिनकी दृष्टि कभी न बदलनेवाले भगवत्तत्त्वकी
तरफ रहती है, वे ज्ञानवान् हैं, असम्मूढ़ हैं।
'ज्ञानवान्' कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्वसे समझता
है कि सब जगह, सबमें और सबके रूपमें वस्तुतः एक
भगवान् ही हैं। ऐसे ज्ञानवान्को ही आगे पन्द्रहवें अध्यायके
उन्नीसवें श्लोकमें 'सर्ववित्' कहा गया है।
ज्ञानवान्की शरणागति अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु
भक्तोंकी तरह नहीं है। भगवान्ने ज्ञानीको अपनी आत्मा
बताया है-'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' (गीता ७।१८)।
जब ज्ञानी भगवान्की आत्मा हुआ तो ज्ञानीकी आत्मा
भगवान् हुए। अतः एक भगवत्तत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ता
ही नहीं रही। इसलिये ज्ञानीकी शरणागति उन तीनों भक्तोंसे
विलक्षण होती है। उसके अनुभवमें एक भगवत्तत्त्वके
सिवाय कोई दूसरी सत्ता होती ही नहीं-यही उसकी
शरणागति है।
भगवान्की दृष्टिमें अपने सिवाय कोई अन्य तत्त्व है
ही नहीं-'मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव' (गीता
७।७)। जैसे सूतकी मालामें मणियोंकी जगह सूतकी गाँठ
लगा दी, तो मालामें सूतके सिवाय अन्य क्या रहा? केवल
सूत ही रहा। हाँ, दीखनेमें गाँठें अलग दीखती हैं और धागा
अलग दीखता है; परन्तु तत्त्वसे एक ही चीज (सूत) है।
ऐसे ही परमात्मा संसारमें व्यापक दीखते हैं; परन्तु तत्त्वसे
परमात्मा और संसार एक ही है। उनमें व्याप्य-व्यापकका
भाव नहीं है। अतः सब कुछ एक वासुदेव ही है-ऐसा
जिसको अनुभव होता है, वह भी भगवत्स्वरूप ही हुआ।
भगवत्स्वरूप हो जाना ही उसकी शरणागति है।
'स महात्मा सुदुर्लभः'-बहुत-से मनुष्य तो 'हमें
परमात्माकी प्राप्ति करनी है' इस तरफ दृष्टि ही नहीं डालते
और ऐसा चाहते ही नहीं। जो इस तरफ दृष्टि डालते हैं,
वे भी उत्कण्ठापूर्वक अनन्यभावसे अपने जीवनको सफल
करनेमें नहीं लगते। जो अपना कल्याण करनेमें लगते हैं,
वे भी मूर्खताके कारण परमात्मप्राप्तिसे निराश होकर अपने
असली अवसरको खो देते हैं, जिससे वे परम लाभसे
वंचित रह जाते हैं।
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि
मनुष्योंमें हजारों और हजारोंमें कोई एक मनुष्य वास्तविक
सिद्धिके लिये यत्न करता है। यत्न करनेवाले उन सिद्धोंमें
भी कोई एक मनुष्य 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसा तत्त्वसे
जानता है। ऐसा तत्त्वसे जाननेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ
है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परमात्मा दुर्लभ हैं, प्रत्युत
सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिसे लिये लगनेवाले दुर्लभ हैं।
सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिसे लिये लगनेपर मनुष्यमात्रको
परमात्मप्राप्ति हो सकती है; क्योंकि उसकी प्राप्तिके लिये
ही मनुष्य-शरीर मिला है।
संसारमें सब-के-सब मनुष्य धनी नहीं हो सकते।
सांसारिक भोग-सामग्री सबको समान रीतिसे नहीं मिल
सकती। परन्तु जो परमात्मतत्त्व भगवान् शंकरको प्राप्त है,
सनकादिकोंको प्राप्त है, नारद, वसिष्ठ आदि देवर्षि-
महर्षियोंको प्राप्त है, वही तत्त्व सब मनुष्योंको समानरूपसे
अवश्य प्राप्त हो सकता है। इसलिये मनुष्यको ऐसा दुर्लभ
अवसर कभी नहीं खोना चाहिये।
भगवान्की यह एक अलौकिक विलक्षणता है कि वे
भूखेके लिये अन्नरूपसे, प्यासेके लिये जलरूपसे और
विषयीके लिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-रूपसे
बनकर आते हैं। वे ही मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ बनकर आते हैं।
वे ही संकल्प-विकल्प बनकर आते हैं। वे ही व्यक्ति
बनकर आते हैं। परन्तु साथ-ही-साथ दुःख-रूपसे आकर
मनुष्यको चेताते हैं कि अगर तुम इन वस्तुओंको भोग्य
मानकर इनके भोक्ता बनोगे, तो इसके फलस्वरूप तुमको
दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको शर्म
आनी चाहिये कि मैं भगवान्को भोग-सामग्री बनाता हूँ,
मेरे सुखके लिये भगवान्को सुखकी सामग्री बनना पड़ता
है! भगवान् कितने विचित्र दयालु हैं कि यह प्राणी जो
चाहता है, भगवान् वैसे ही बन जाते हैं!
देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ आ रहा है, और
जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, वह सब भगवान्
ही हैं और भगवान्का ही है-ऐसा मान ले, वास्तविकतासे
अनुभव कर ले तो मनुष्य विलक्षण हो जाता है, 'स