श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
महात्मा सुदुर्लभः ’ हो जाता है।
एक वैरागी बाबाजी थे। वे गणेशजीका पूजन किया करते थे। उनके पास सोनेकी बनी हुई एक गणेशजीकी और एक चूहेकी मूर्ति थी। वे दोनों मूर्तियों तौलमें बराबर थीं। एक बार बाबाजीने तीर्थमें जानेका विचार किया और वे उन मूर्तियोंकी बिक्री करनेके लिये सुनारके पास गये। सुनारने उन दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके बराबर दाम बता दिये तो बाबाजी सुनारपर बिगड़ गये कि तू क्या कह रहा है? गणेशजी तो देवता हैं और चूहा उनका वाहन है, पर तू दोनोंका बराबर मूल्य बता रहा है! यह कैसे हो सकता है? सुनार बोला कि बाबाजी! मैं गणेश और चूहेको नहीं खरीदता हूँ, मैं तो सोना खरीदता हूँ, सोनेका जितना वजन होगा, उसके अनुसार ही उसका मूल्य होगा। अगर सुनार गणेश और चूहेको देखेगा तो उसको सोना नहीं दीखेगा और अगर सोनेको देखेगा तो उसको गणेश और चूहा नहीं दीखेगा। इसलिये सुनार न गणेशको देखता है, न चूहेको, वह तो केवल सोनेको ही देखता है। ऐसे ही भगवान्के साथ अभिन्न हुआ महात्मा संसारको नहीं देखता, वह तो केवल भगवान्को ही देखता है।
कोई एक सन्त रास्तेमें चलते-चलते किसी खेतमें लघुशंका करनेको बैठे। उस खेतके मालिकने उनको देखा तो ‘मतीरा (तरबूजा) चुरानेवाला यही आदमी है’—ऐसा समझकर पीछेसे आकर उनके सिरपर लाठी मार दी। फिर देखा कि ये तो कोई बाबाजी हैं; अतः हाथ जोड़कर बोला—‘महाराज! मैंने आपको जाना नहीं और चोर समझकर लाठी मार दी; इसलिये महाराज! मुझे माफ करो।’ सन्तने कहा—‘माफ क्या करना? तूने मेरेको तो मारा नहीं, तूने तो चोरको मारा है।’ उसने कहा—‘अब क्या करूँ महाराज?’ सन्तने कहा—‘तरी जैसी मरजी हो, वैसे कर।’ उसने सन्तको बैलगाड़ीमें ले जाकर अस्पतालमें भरती कर दिया। वहाँ मलहम-पट्टी करनेके बाद कोई आदमी दूध लेकर आया और बोला—‘महाराज! दूध पी लो।’ सन्तने कहा—‘तू बड़ा चालाक-होशियार है। तेरे विचित्र-विचित्र रूप हैं। तू विचित्र-विचित्र लीलाएँ करता है। पहले तो तूने लाठीसे मारा और अब कहता है दूध पी लो!’ वह आदमी डर गया और कहने लगा—‘बाबाजी! मैंने नहीं मारा है।’ सन्त बोले—‘बिलकुल झूठी बात है। मैं पहचानता हूँ, तू ही था। तूने ही मारा है। तेरे सिवाय और कौन आये, कहाँसे आये? और कैसे आये? पहले तो मारा लाठीसे और अब आया दूध पिलाने! मैं
दूध पी लूँगा, पर था तू ही।’ इस तरह बाबाजी तो अपनी ‘वासुदेवः सर्वम्’—वाली भाषामें बोल रहे थे और वह सोच रहा था कि बाबाजी कहीं फँसा न दें! तात्पर्य यह है कि सन्त केवल भगवान्को ही देखते हैं कि लाठी मारनेवाला, मरहम-पट्टी करनेवाला, दूध पिलानेवाला—सब वह ही है।
महात्माओंकी महिमा
जहाँ सन्त-महात्माओंका वर्णन आता है, वहाँ कहा गया है—
(१) जो ऊँचे दर्जेके तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, वे अभिन्नभाव और अखण्डरूपसे केवल अपने स्वरूपमें अथवा भगवत्त्वमें स्थित रहते हैं। उनके जीवनसे, उनके दर्शनसे, उनके चिन्तनसे, उनके शरीरका स्पर्श की हुई वायुके स्पर्शसे जीवोंका कल्याण होता रहता है।
(२) जो मनुष्य उन महापुरुषोंकी महिमाको नहीं जानते, उनके सामने वे महापुरुष अपने भावोंसे नीचे उतरते हैं तो कुछ कह देते हैं; जैसे—सन्त-महात्माओंने ऐसा किया है, उनके किये हुए आचरणों और कहे हुए वचनोंके अनुसार ही शास्त्र बनते हैं, आदि।
(३) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो कह देते हैं कि सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये।
(४) जिनसे उपर्युक्त बातका पालन नहीं होता, उन साधकोंके सामने वे स्वयं ऐसा विधान कर देते हैं कि ऐसा करना चाहिये, ऐसा नहीं करना चाहिये।
(५) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो ‘ऐसा करो और ऐसा मत करो’—ऐसी आज्ञा दे देते हैं।
[सन्तोंकी आज्ञामें जो सिद्धान्त भरा हुआ है, वह आज्ञापालकमें उतर आता है। उनकी आज्ञापालनके बिना भी उनके सिद्धान्तका पालन करनेवालोंका कल्याण हो जाता है; परन्तु वे महात्मा आज्ञाके रूपमें जिसको जो कुछ कह देते हैं, उसमें एक विलक्षण शक्ति आ जाती है। आज्ञापालन करनेवालेको कोई परिश्रम नहीं पड़ता और उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक वैसे आचरण होने लगते हैं।]
(६) जो उनकी आज्ञाका पालन नहीं करते, ऐसे नीचे दर्जेके साधकोंको वे कहीं-कहीं, कभी-कभी शाप या वरदान दे देते हैं।
इस परम्परामें देखा जाय तो (१) जो कुछ नहीं करते, निरन्तर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं—यह उन सन्त-महापुरुषोंका ऊँचा दर्जा हो गया, (२) शास्त्रोंने ऐसा कहा,